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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३१९
पृष्ठ 328स्थायी लिंक
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लोभोऽतीव च पापिष्ठस्तेन को न वशीकृतः।<br>किं न कुर्यात्तदाविष्टः पापं पार्थिवसत्तमः॥ २१<br><br>पितरं मातरं भ्रातॄन्गुरून्स्वजनबान्धवान्।<br>हन्ति लोभसमाविष्टो जनो नात्र विचारणा॥ २२<br><br>अभक्ष्यभक्षणं लोभादगम्यागमनं तथा।<br>करोति किल तृष्णार्तो धर्मत्यागं तथा पुनः॥ २३ | लोभ बड़ा ही पापी होता है, इसने किसको अपने वशमें नहीं किया। लोभसे ग्रस्त हो जानेपर श्रेष्ठ राजा भी कौन-सा पाप नहीं कर सकता। लोभसे अभिभूत मनुष्य अपने माता-पिता, भाई, गुरु तथा बन्धु-बान्धवोंको भी मार डालता है; इसमें सन्देह नहीं है। लोभके कारण मनुष्य अभक्ष्यका भक्षण तथा अगम्या स्त्रीके साथ गमन भी कर लेता है; यहाँतक कि लोभसे व्याकुल होकर वह धर्मका त्याग भी कर देता है॥ २१—२३॥ |
| न सहायोऽस्ति मे कश्चिन्नगरेऽत्र महाबलः।<br>यदाधारे स्थिता चाहं पालयामि सुतं शुभम्॥ २४ | अब इस नगरमें कोई बलवान् पुरुष मुझे सहायता देनेवाला भी नहीं रह गया, जिसके आश्रयमें रहकर मैं अपने सुन्दर पुत्रका पालन कर सकूँ॥ २४॥ |
| हते पुत्रे नृपेणाद्य किं करिष्याम्यहं पुनः।<br>न मे त्रातास्ति भुवने येन वै सुस्थिता ह्यहम्॥ २५ | यदि राजा युधाजित् मेरे पुत्रको मार डाले, तो मैं फिर क्या करूँगी? इस संसारमें मेरा कोई रक्षक नहीं है, जिसके सहारे मैं निश्चिन्त रह सकूँ?॥ २५॥ |
| सापि वैरयुता कामं सपत्नी सर्वदा भवेत्।<br>लीलावती न मे पुत्रे भविष्यति दयावती॥ २६ | मेरी सौत लीलावती भी सदा मुझसे वैरभाव रखती है, अतः वह भी मेरे पुत्रपर दया नहीं करेगी॥ २६॥ |
| युधाजिति समायाते न मे निःसरणं भवेत्।<br>ज्ञात्वा बालं सुतं सोऽद्य कारागारं नयिष्यति॥ २७ | युधाजित्के रणभूमिसे लौटकर आ जानेपर मेरा यहाँसे निकल भागना सम्भव नहीं हो सकेगा; वह मेरे पुत्रको बालक जानकर उसे कारागारमें डाल देगा॥ २७॥ |
| श्रूयते हि पुरेन्द्रेण मातुर्गर्भगतः शिशुः।<br>कृन्तितः सप्तधा पश्चात्कृतास्ते सप्त सप्तधा॥ २८<br><br>प्रविश्य चोदरं मातुः करे कृत्वल्पकं पविम्।<br>एकोनपञ्चाशदपि तेऽभवन्मरुतो दिवि॥ २९ | सुना जाता है कि पूर्वकालमें इन्द्रने अपने वज्रको अत्यन्त छोटा बनाकर अपनी सौतेली माता दितिके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ शिशुको काटकर उसके सात टुकड़े कर दिये थे। इसके बाद उसने पुनः एक-एक टुकड़ेके सात-सात खण्ड कर दिये थे। वे ही आगे चलकर देवलोकमें उनचास मरुत्के रूपमें प्रतिष्ठित हुए॥ २८—२९॥ |
| सपत्न्यै गरलं दत्तं सपत्न्या नृपभार्यया।<br>गर्भनाशार्थमुद्दिश्य पुरैतद्वै मया श्रुतम्॥ ३०<br><br>जातस्तु बालकः पश्चाद्देहे विषयुतः किल।<br>तेनासौ सगरो नाम विख्यातो भुवि मण्डले॥ ३१ | मैंने यह भी सुना है कि पूर्वकालमें एक राजाकी किसी रानीने अपनी सौतके गर्भको नष्ट करनेके उद्देश्यसे उसे विष दे दिया था। कुछ समय बीतनेपर वह बालक विषके साथ उत्पन्न हुआ, इसीसे वह भूमण्डलपर ‘सगर’ नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ ३०—३१॥ |
| जीवमानोऽथ भर्ता वै कैकेय्या नृपभार्यया।<br>रामः प्रव्राजितो ज्येष्ठो मृतो दशरथो नृपः॥ ३२ | महाराज दशरथकी भार्या कैकेयीने पतिके जीवनकालमें ही उनके ज्येष्ठ पुत्र रामचन्द्रको वनवास दे दिया था, जिसके फलस्वरूप राजा दशरथकी मृत्यु भी हो गयी॥ ३२॥ |
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३२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्त्रिणस्त्ववशाः कामं ये मे पुत्रं सुदर्शनम्।<br>राजानं कर्तुकामा वै युधाजिद्वशगाश्च ते॥ ३३<br><br>न मे भ्राता तथा शूरो यो मां बन्धात्प्रमोचयेत्।<br>महत्कष्टं च सम्प्राप्तं मया वै दैवयोगतः॥ ३४<br><br>उद्यमः सर्वथा कार्यः सिद्धिर्दैवाद्धि जायते।<br>उपायं पुत्ररक्षार्थं करोम्यद्य त्वरान्विता॥ ३५ | जो मन्त्री मेरे पुत्र सुदर्शनको राजा बनाना चाहते थे, वे भी अब विवश होकर युधाजित्के अधीन हो गये हैं। मेरा भाई भी ऐसा योद्धा नहीं है, जो मुझे बन्धनसे छुड़ा सके। दैवयोगसे मैं महान् संकटमें पड़ गयी हूँ। फिर भी उद्योग तो सर्वथा करना ही चाहिये, सफलता तो दैवके आधीन है। अतः अब मैं अपने पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही कोई उपाय करूँगी॥ ३३—३५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला विदल्लं चातिमानिनम्।<br>निपुणं सर्वकार्येषु चिन्त्यं मन्त्रिवरोत्तमम्॥ ३६<br><br>समाहूय तमेकान्ते प्रोवाच बहुदुःखिता।<br>गृहीत्वा बालकं हस्ते रुदती दीनमानसा॥ ३७<br><br>पिता मे निहतः संख्ये पुत्रोऽयं बालकस्तथा।<br>युधाजिद् बलवान् राजा किं विधेयं वदस्व मे॥ ३८ | ऐसा सोचकर वह रानी अतिसम्मानित, सभी कार्योंमें दक्ष तथा विचार-कुशल श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर विदल्लको बुलवाकर उन्हें एकान्तमें ले गयी और बालकको हाथमें लेकर रोती हुई दीन मनवाली उस मनोरमाने अत्यन्त दुःखित होकर उनसे कहा—मेरे पिता युद्धमें मारे गये और मेरा यह पुत्र अभी अबोध बालक है। राजा युधाजित् बलवान् हैं। [ऐसी परिस्थितिमें] मुझे क्या करना चाहिये? मुझे बतायें॥ ३६—३८॥ |
| तामुवाच विदल्लोऽसौ नात्र स्थातव्यमेव च।<br>गमिष्यामो वने कामं वाराणस्याः पुनः किल॥ ३९<br><br>तत्र मे मातुलः श्रीमान्वर्तते बलवत्तरः।<br>सुबाहुरिति विख्यातो रक्षिता स भविष्यति॥ ४० | तब विदल्लने उससे कहा—अब यहाँ नहीं रहना चाहिये, हमलोग यहाँसे वाराणसीके वनमें चलेंगे। वहाँ सुबाहु नामसे विख्यात मेरे मामा रहते हैं। वे समृद्धिशाली तथा महाबलशाली हैं; वे ही हमारे रक्षक होंगे॥ ३९-४०॥ |
| युधाजिद्दर्शनोत्कण्ठमनसा नगराद् बहिः।<br>निर्गत्य रथमारुह्य गन्तव्यं नात्र संशयः॥ ४१ | मनमें युधाजित्के दर्शनकी लालसासे नगरसे बाहर निकल चलना चाहिये और रथपर सवार हो प्रस्थान कर देना चाहिये; इसमें शंकाकी आवश्यकता नहीं है॥ ४१॥ |
| इत्युक्ता तेन सा राज्ञी गत्वा लीलावतीं प्रति।<br>उवाच पितरं द्रष्टुं गच्छाम्यद्य सुलोचने॥ ४२ | विदल्लके ऐसा कहनेपर रानी मनोरमा लीलावतीके पास गयी और बोली—हे सुनयने! मैं [तुम्हारे] पिताजीका दर्शन करने जा रही हूँ॥ ४२॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य सैरन्ध्रीसंयुता तदा।<br>विदल्लेन च संयुक्ता निःसृता नगराद् बहिः॥ ४३<br><br>त्रस्ता ह्यार्तातिकृपणा पितुः शोकसमाकुला।<br>दृष्ट्वा युधाजितं भूपं पितरं गतजीवितम्॥ ४४<br><br>संस्कार्य च त्वरायुक्ता वेपमाना भयाकुला।<br>दिनद्वयेन सम्प्राप्ता राज्ञी भागीरथी तटम्॥ ४५ | ऐसा कहकर मनोरमा एक दासी और मन्त्री विदल्लको साथ लेकर रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकल गयी। उस समय बहुत डरी हुई, दुःखित, अत्यन्त दीन तथा पिताके मृत्युजन्य शोकसे व्याकुल वह मनोरमा राजा युधाजित्से मिलकर तत्काल अपने मृत पिताका दाहसंस्कार कराकर भयसे व्याकुल हो काँपती हुई दो दिनोंमें गंगाजीके तटपर पहुँच गयी॥ ४३—४५॥ |