देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १४ ] षष्ठ स्कन्ध ७९१
अ० १४ ] षष्ठ स्कन्ध ७९१
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्मिन्यज्ञे समाराध्या देवी श्रीजगदम्बिका।<br>तत्प्रीत्यर्थमहं यज्ञं करोमि विधिपूर्वकम्॥ २७<br>तच्छ्रुत्वासौ निमेर्वाक्यं वसिष्ठः प्राह भूपतिम्।<br>इन्द्रेणाहं वृतः पूर्वं यज्ञार्थं नृपसत्तम॥ २८<br>पराशक्तिमखं कर्तुमुद्युक्तः पाकशासनः।<br>स दीक्षां गमितो देवः पञ्चवर्षशतात्मिकाम्॥ २९<br>तस्मात्त्वमन्तरं तावत्प्रतिपालय पार्थिव।<br>इन्द्रयज्ञे समाप्तेऽत्र कृत्वा कार्यं दिवस्पतेः॥ ३०<br>आगमिष्याम्यहं राजंस्तावत्त्वं प्रतिपालय। | जिस यज्ञमें भगवती जगदम्बाकी आराधना होती हो, उस यज्ञको मैं उनकी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक करना चाहता हूँ॥ २७॥<br>निमिकी वह बात सुनकर वसिष्ठजीने राजासे कहा—हे नृपश्रेष्ठ! मैं इन्द्रके द्वारा यज्ञके लिये पहले ही वरण कर लिया गया हूँ। इन्द्र पराशक्तिके प्रीत्यर्थ यज्ञ करनेके लिये तत्पर हैं और देवेन्द्रने पाँच सौ वर्षतक चलनेवाले यज्ञकी दीक्षा ले ली है। अतः हे राजन्! तबतक आप यज्ञ-सामग्रियोंकी रक्षा करें, इन्द्रके यज्ञके पूर्ण हो जानेपर उन देवराजका कार्य सम्पन्न करके मैं आ जाऊँगा। हे राजन्! तबतक आप समयकी प्रतीक्षा करें॥ २८—३० १/२॥ |
| राजोवाच<br>मया निमन्त्रिताश्चान्ये मुनयो यज्ञकारणात्॥ ३१<br>सम्भाराः सम्भृताः सर्वे पालयामि कथं गुरो।<br>इक्ष्वाकूणां कुले ब्रह्मन्गुरुस्त्वं वेदवित्तमः॥ ३२<br>कथं त्यक्त्वाद्य मे कार्यमुद्यतो गन्तुमाशु वै।<br>न ते युक्तं द्विजश्रेष्ठ यदुत्सृज्य मखं मम॥ ३३<br>गन्तासि धनलोभेन लोभाकुलितचेतनः। | राजा बोले—हे गुरुदेव! मैंने यज्ञके लिये दूसरे बहुत-से मुनियोंको निमन्त्रित कर दिया है तथा समस्त यज्ञीय सामग्रियाँ भी एकत्र कर ली हैं, मैं इन सबको [इतने समयतक] कैसे सुरक्षित रखूँगा ? हे ब्रह्मन्! आप इक्ष्वाकुवंशके वेदवेत्ता गुरु हैं, आज मेरा कार्य छोड़कर आप अन्यत्र जानेके लिये क्यों उद्यत हैं? हे द्विजश्रेष्ठ! यह आपके लिये उचित नहीं है जो कि लोभसे व्याकुलचित्तवाले आप मेरा यज्ञ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं॥ ३१—३३ १/२॥ |
| निवारितोऽपि राज्ञा स जगामेन्द्रमखं गुरुः॥ ३४<br>राजापि विमना भूत्वा गौतमं प्रत्यपूजयत्।<br>इयाज हिमवत्पार्श्वे सागरस्य समीपतः॥ ३५<br>दक्षिणा बहुला दत्ता विप्रेभ्यो मखकर्मणि।<br>निमिना पञ्चसाहस्त्री दीक्षा तत्र कृता नृप॥ ३६<br>ऋत्विजः पूजिताः कामं धनैर्गोभिर्मुदा युताः। | राजाके इस प्रकार रोकनेपर भी वे गुरु वसिष्ठ इन्द्रके यज्ञमें चले गये। राजाने भी उदास होकर [अपना आचार्य बनाकर] गौतमऋषिका पूजन किया। उन्होंने हिमालयके पार्श्वभागमें समुद्रके निकट यज्ञ किया और उस यज्ञकर्ममें ब्राह्मणोंको बहुत दक्षिणा दी। हे राजन्! निमिने उस पाँच हजार वर्षवाले यज्ञकी दीक्षा ली और ऋत्विजोंको उनके इच्छानुसार धन और गौएँ प्रदान करके उनकी पूजा की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए॥ ३४—३६ १/२॥ |
| शक्रयज्ञसमाप्ते तु पञ्चवर्षशतात्मके॥ ३७<br>आजगाम वसिष्ठस्तु राज्ञः सत्रदिदृक्षया।<br>आगत्य संस्थितस्तत्र दर्शनार्थं नृपस्य च॥ ३८ | इन्द्रके पाँच सौ वर्षवाले यज्ञके समाप्त होनेपर वसिष्ठजी राजाके यज्ञको देखनेकी इच्छासे आये और आकरके राजाके दर्शनके लिये वहाँ रुके रहे॥ ३७-३८॥ |
| तदा राजा प्रसुप्तस्तु निद्रयापहतो भृशम्।<br>नासौ प्रबोधितो भृत्यैर्नागतस्तु मुनिं नृपः॥ ३९<br>वसिष्ठस्य ततो मन्युः प्रादुर्भूतोऽवमानतः।<br>अदर्शनान्निमेस्तत्र चुकोप मुनिसत्तमः॥ ४० | उस समय राजा निमि सोये हुए थे और उन्हें गहरी नींद आ गयी थी। सेवकोंने उन्हें नहीं जगाया, जिससे वे राजा मुनिके पास न आ सके। तब अपमानके कारण वसिष्ठजीको क्रोध आ गया। मिलनेके लिये निमिके न आनेसे मुनिश्रेष्ठ कुपित हो उठे। क्रोधके वशीभूत हुए |
७९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शापं च दत्तवांस्तस्मै राज्ञे मन्युवशं गतः।<br>यस्मात्त्वं मां गुरुं त्यक्त्वा कृत्वान्यं गुरुमात्मनः॥ ४१<br>दीक्षितोऽसि बलान्मन्द मामवज्ञाय पार्थिव।<br>वारितोऽपि मया तस्माद्विदेहस्त्वं भविष्यसि॥ ४२<br>पतत्विदं शरीरं ते विदेहो भव भूपते। | उन मुनिने राजाको शाप दे दिया—‘हे मूर्ख पार्थिव ! मेरे द्वारा मना किये जानेपर भी तुम मुझ गुरुका त्याग करके दूसरेको अपना गुरु बनाकर शक्तिके अभिमानमें मेरी अवहेलना करके यज्ञमें दीक्षित हो गये हो, उससे तुम विदेह हो जाओगे। हे राजन् ! तुम्हारा यह शरीर नष्ट हो जाय और तुम विदेह हो जाओ’॥ ३९–४२ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्व्याहृतं श्रुत्वा राज्ञस्तु परिचारकाः॥ ४३<br>सद्यः प्रबोधयामासुर्मुनिमाहुः प्रकोपितम्।<br>कुपितं तं समागत्य राजा विगतकल्मषः॥ ४४ | **व्यासजी बोले—**उनका यह शापवचन सुनकर राजाके सेवकोंने शीघ्रतासे जाकर राजाको जगाया और उन्हें बताया कि मुनि वसिष्ठ बहुत क्रोधित हो गये हैं, तब उन कुपित मुनिके पास आकर निष्पाप राजाने मधुर शब्दोंमें युक्तिपूर्ण तथा सारगर्भित वचन कहा—॥ ४३–४४ ½॥ |
| उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुगर्भं च युक्तिमत्।<br>मम दोषो न धर्मज्ञ गतस्त्वं तृष्णयाकुलः॥ ४५<br>हित्वा मां यजमानं वै प्रार्थितोऽपि मया भृशम्।<br>न लज्जसे द्विजश्रेष्ठ कृत्वा कर्म जुगुप्सितम्॥ ४६<br>सन्तोषे ब्राह्मणश्रेष्ठ जानन्धर्मस्य निश्चयम्।<br>पुत्रोऽसि ब्रह्मणः साक्षाद्वेदवेदाङ्गवित्तमः॥ ४७<br>न वेत्सि विप्रधर्मस्य गतिं सूक्ष्मां दुरत्ययाम्।<br>आत्मदोषं मयि ज्ञात्वा मृषा मां शप्तुमिच्छसि॥ ४८<br>त्याज्यस्तु सुजनैः क्रोधश्चण्डालादधिको यतः।<br>वृथा क्रोधपरीतेन मयि शापः प्रपातितः॥ ४९<br>तवापि च पतत्वद्य देहोऽयं क्रोधसंयुतः। | हे धर्मज्ञ ! इसमें मेरा दोष नहीं है, आप ही लोभके वशीभूत होकर मेरे बार-बार अनुरोध करनेपर भी मुझ यजमानको छोड़कर चले गये। हे विप्रवर ! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! ब्राह्मणको सदा सन्तोष रखना चाहिये—धर्मके इस सिद्धान्तको जानते हुए भी ऐसा निन्दित कर्म करके आपको लज्जा नहीं आ रही है। आप तो साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र और वेद-वेदांगोंके सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं तो भी आप ब्राह्मणधर्मकी अत्यन्त कठिन और सूक्ष्म गतिको नहीं जानते। अपना दोष मुझमें आरोपित करके आप मुझे व्यर्थ ही शाप देना चाहते हैं। सज्जनोंको चाहिये कि क्रोधका त्याग कर दें; क्योंकि यह चण्डालसे भी अधिक दूषित है; क्रोधके वशीभूत होकर आपने मुझे व्यर्थ ही शाप दे दिया है। अतः आपकी भी यह क्रोधयुक्त देह आज ही नष्ट हो जाय॥ ४५–४९ ½॥ |
| एवं शप्तो मुनी राज्ञा राजा च मुनिना तथा॥ ५०<br>परस्परं प्राप्य शापं दुःखितौ तौ बभूवतुः।<br>वसिष्ठस्त्वतिचिन्तार्तो ब्रह्माणं शरणं गतः॥ ५१<br>निवेदयामास तथा शापं भूपकृतं महत्। | इस प्रकार राजाके द्वारा मुनि और मुनिके द्वारा राजा शापित हो गये और दोनों एक-दूसरेसे शाप पाकर बहुत दुःखी हुए। तब वसिष्ठजी अत्यधिक चिन्तातुर होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और उन्होंने राजाके द्वारा प्रदत्त कठिन शापके विषयमें उनसे निवेदन किया॥ ५०–५१ ½॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>राज्ञा शप्तोऽस्मि देहोऽयं पतत्वद्य तवेति वै॥ ५२<br>किं करोमि पितः प्राप्तं कष्टं कायप्रपातजम्।<br>अन्यदेहसमुत्पत्तौ जनकं वद साम्प्रतम्॥ ५३ | **वसिष्ठजी बोले—**हे पिताजी ! राजा निमिने मुझे शाप दे दिया है कि तुम्हारा यह शरीर आज ही नष्ट हो जाय। अतः शरीर नष्ट होनेसे प्राप्त कष्टके लिये मैं क्या करूँ? इस समय आप मुझे यह बतायें कि दूसरे शरीरकी प्राप्तिमें मेरे पिता कौन होंगे? हे पिताजी ! दूसरे देहसे सम्बन्ध होनेपर भी मेरी स्थिति |
| अ० १४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथा मे देहसंयोगः पूर्ववत्सम्पद्यताम्।<br>यादृशं ज्ञानमेतस्मिन्देहे तत्रास्तु तत्पितः॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाराज प्रसादं कर्तुमर्हसि। | पूर्ववत् ही रहे। इस शरीरमें जैसा ज्ञान है, वैसा ही उस शरीरमें भी रहे। हे महाराज! आप समर्थ हैं; मुझपर कृपा करने योग्य हैं॥ ५२—५४ १/२॥ |
| वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा प्रोवाच तं सुतम्॥ ५५<br>मित्रावरुणयोस्तेजस्त्वं प्रविश्य स्थिरो भव।<br>तस्मादयोनिजः काले भविता त्वं न संशयः॥ ५६<br>पुनर्देहं समासाद्य धर्मयुक्तो भविष्यसि।<br>भूतात्मा वेदवित्कामं सर्वज्ञः सर्वपूजितः॥ ५७ | वसिष्ठकी बात सुनकर ब्रह्माजी अपने उस पुत्रसे बोले—तुम मित्रावरुणके तेज हो, अतः इन्हींमें प्रवेश करके स्थिर हो जाओ। कुछ समय बाद तुम उन्हींसे अयोनिज पुत्रके रूपमें प्रकट होओगे; इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त करके तुम धर्मनिष्ठ, प्राणियोंके सुहृद्, वेदवेत्ता, सर्वज्ञ और सबके द्वारा पूजित होओगे॥ ५५—५७॥ |
| एवमुक्तस्तदा पित्रा प्रययौ वरुणालयम्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं प्रीत्या प्रणम्य च पितामहम्॥ ५८<br>विवेश स तयोर्देहे मित्रावरुणयोः किल।<br>जीवांशेन वसिष्ठोऽथ त्यक्त्वा देहमनुत्तमम्॥ ५९ | पिताके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी प्रसन्नतापूर्वक पितामह ब्रह्माजीकी परिक्रमा करके और उन्हें प्रणाम करके वरुणके वासस्थानको चले गये। वसिष्ठजीने अपने उत्तम देहका त्याग करके मित्र और वरुणके शरीरमें जीवांशरूपसे प्रवेश किया॥ ५८-५९॥ |
| कदाचित्तूर्वशी राजन्नागता वरुणालयम्।<br>यदृच्छया वरारोहा सखीगणसमावृता॥ ६० | हे राजन्! किसी समय परम सुन्दरी अप्सरा उर्वशी अपनी सखियोंके साथ स्वेच्छापूर्वक मित्रावरुणके स्थानपर आयी॥ ६०॥ |
| दृष्ट्वा तामप्सरां दिव्यां रूपयौवनसंयुताम्।<br>जातौ कामातुरौ देवौ तदा तामूचतुर्नृप॥ ६१<br>विवशौ चारुसर्वाङ्गीं देवकन्यां मनोरमाम्।<br>आवां त्वमनवद्याङ्गि वरयस्व समाकुलौ॥ ६२<br>विहरस्व यथाकामं स्थानेऽस्मिन्वरवर्णिनि।<br>तथोक्ता सा ततो देवी ताभ्यां तत्र स्थितावशा॥ ६३<br>कृत्वा भावं स्थिरं देवी मित्रावरुणयोर्गृहे।<br>सा गृहीत्वा तयोर्भावं संस्थिता चारुदर्शना॥ ६४ | हे राजन्! उस रूपयौवनसे सम्पन्न दिव्य अप्सराको देखकर वे दोनों देवता कामातुर हो गये और समस्त सुन्दर अंगोंवाली उस मनोरम देवकन्यासे कहने लगे—हे प्रशस्त अंगोंवाली! विवश तथा व्याकुल हम दोनोंका तुम वरण कर लो और हे वरवर्णिनि! तुम अपनी इच्छाके अनुसार इस स्थानपर विहार करो। उनके इस प्रकार कहनेपर वह देवी उर्वशी मन स्थिर करके मित्रावरुणके घरमें उन दोनोंके साथ विवश होकर रहने लगी। प्रिय दर्शनवाली वह अप्सरा उन दोनोंके भावोंको समझकर वहीं रहने लगी॥ ६१—६४॥ |
| तयोस्तु पतितं वीर्यं कुम्भे दैवादनावृते।<br>तस्माज्जातौ मुनी राजन्द्व्वावेवातिमनोंहरौ॥ ६५<br>अगस्तिः प्रथमस्तत्र वसिष्ठश्चापरस्तथा।<br>मित्रावरुणयोर्वीर्यात्तापसावृषिसत्तमौ ॥ ६६ | दैववशात् वहाँ रखे हुए एक आवरणरहित कुम्भमें दोनोंका वीर्य स्खलित हो गया; और हे राजन्! उसमेंसे दो अत्यन्त सुन्दर मुनिकुमारोंने जन्म लिया। उनमें पहले अगस्ति थे और दूसरे वसिष्ठ थे। इस प्रकार मित्र और वरुणके तेजसे वे दोनों ऋषिश्रेष्ठ तपस्वी प्रकट हुए॥ ६५-६६॥ |
| प्रथमस्तु वनं प्राप्तो बाल एव महातपाः।<br>इक्ष्वाकुस्तु वसिष्ठं तं बालं वव्रे पुरोहितम्॥ ६७ | महातपस्वी अगस्ति बाल्यावस्थामें ही वन चले गये और महाराज इक्ष्वाकुने अपने पुरोहितके रूपमें दूसरे बालक वसिष्ठका वरण कर लिया॥ ६७॥ |
| ७९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
|---|
| वंशस्यास्य सुखार्थं ते पालयामास पार्थिव ।<br>विशेषेण मुनिं ज्ञात्वा प्रीत्या युक्तो बभूव ह ॥ ६८ | हे राजन् ! आपका यह वंश सुखी रहे, इसलिये राजा इक्ष्वाकुने वसिष्ठका पालन-पोषण किया और विशेष-रूपसे इन्हें मुनि जानकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ६८ ॥ |
| एतत्ते सर्वमाख्यातं वसिष्ठस्य च कारणम् ।<br>शापाद्देहान्तरप्राप्तिर्मित्रावरुणयोः कुले ॥ ६९ | इस प्रकार शापके कारण मित्रावरुणके कुलमें वसिष्ठजीके अन्य शरीरकी प्राप्तिका समस्त आख्यान मैंने आपको बता दिया ॥ ६९ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे वसिष्ठस्य मैत्रावरुणिरितिनामवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन
| जनमेजय उवाच<br>देहप्राप्तिर्वसिष्ठस्य कथिता भवता किल ।<br>निमिः कथं पुनर्देहं प्राप्तवानिति मे वद ॥ १ | जनमेजय बोले—आपने वसिष्ठकी शरीर-प्राप्तिका वर्णन किया; निमिने पुनः किस प्रकार देह प्राप्त की; यह मुझसे कहिये ॥ १ ॥ |
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| <div align="center">व्यास उवाच</div>वसिष्ठेन च सम्प्राप्तः पुनर्देहो नराधिप ।<br>निमिना न तथा प्राप्तो देहः शापादनन्तरम् ॥ २ | व्यासजी बोले—हे राजन् ! वसिष्ठने जिस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त किया, उस प्रकार निमिको शापके बाद पुनः देह नहीं मिली ॥ २ ॥ |
| यदा शप्तो वसिष्ठेन तदा ते ब्राह्मणाः क्रतौ ।<br>ऋत्विजो ये वृता राज्ञा ते सर्वे समचिन्तयन् ॥ ३ | जब वसिष्ठजीने शाप दिया तो राजाके द्वारा यज्ञमें वरण किये गये ब्राह्मण और ऋत्विज् विचार करने लगे— ॥ ३ ॥ |
| किं कर्तव्यमहोऽस्माभिः शापदग्धो महीपतिः ।<br>अस्मिन्यज्ञे त्वसम्पूर्णे दीक्षायुक्तश्च धार्मिकः ॥ ४ | अहो, यज्ञमें दीक्षित ये धर्मनिष्ठ राजा शापसे दग्ध हो गये हैं और यज्ञ भी अपूर्ण ही रह गया है—ऐसेमें हम सबको क्या करना चाहिये ? अब हम क्या करें ? यह तो विपरीत कार्य हो गया । भवितव्यताके अवश्य होनेके कारण इसका निवारण करनेमें हम असमर्थ हैं ॥ ४-५ ॥ |
| किं कर्तव्यं कार्यमेतद्विपरीतमभूत्किल ।<br>अवश्यम्भाविभावत्वादशक्ताः स्म निवारणे ॥ ५ | |
| मन्त्रैर्बहुविधैर्देहं तदा तस्य महात्मनः ।<br>रक्षितं धारयामासुः किञ्चिच्छ्वसनसंयुतम् ॥ ६ | तब उन महात्मा राजाकी देहको ऋत्विजोंने अनेक प्रकारके मन्त्रोंसे सुरक्षित रखा; उनकी श्वास मन्द गतिसे चल रही थी । मन्त्रशक्तिसे उनकी निर्विकार आत्माको देहमें प्रतिष्ठित करके ऋत्विजोंने उसे अनेक प्रकारके गन्ध, माल्य आदिसे सुपूजित कर रखा था ॥ ६-७ ॥ |
| गन्धैर्माल्यैश्च विविधैः पूज्यमानं मुहुर्मुहुः ।<br>मन्त्रशक्त्या प्रतिष्टभ्य निर्विकारं सुपूजितम् ॥ ७ | |
| समाप्ते च क्रतौ तत्र देवाः सर्वे समागताः ।<br>ऋत्विग्भिस्तु स्तुताः सर्वे सुप्रीताश्चाभवन्नृप ॥ ८ | यज्ञके सम्पूर्ण होनेपर वहाँ सभी देवगण आये । हे राजन् ! ऋत्विजोंने उन सबकी स्तुति की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए । मुनियोंके द्वारा राजाके विषयमें समस्त बातोंको जान लेनेपर स्तोत्रोंसे सन्तुष्ट देवताओंने |
| अ० १५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९५ |
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| विज्ञप्ता मुनिभिः स्तोत्रैर्निर्विण्णात्मानमब्रुवन् ।<br>प्रसन्नाः स्म महीपाल वरं वरय सुव्रत ॥ ९<br>यज्ञेनानेन राजर्षे वरं जन्म विधीयते ।<br>देवदेहं नृदेहं वा यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥ १०<br>दृप्तः कामं पुरोधास्ते मृत्युलोके यथासुखम् ।<br>एवमुक्तो निमेरात्मा सन्तुष्टास्तानुवाच ह ॥ ११ | दुःखी मनवाले राजासे कहा—हे राजन् ! हे सुव्रत ! हम प्रसन्न हैं; वर माँगिये। हे राजर्षे ! इस यज्ञके कारण आपको श्रेष्ठ जन्म प्राप्त हो सकता है। देवशरीर, मनुष्यशरीर अथवा आपके मनमें जो इच्छा हो, उसे आप प्राप्त कर सकते हैं; जैसे कि आपके पुरोहित वसिष्ठ गर्वयुक्त होकर मर्त्यलोकमें सुखपूर्वक रह रहे हैं ॥ ८—१० १/२ ॥<br>उनके ऐसा कहनेपर निमिकी आत्माने परम सन्तुष्ट होकर उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवगण ! सर्वदा विनष्ट होनेवाली इस देहमें रहनेकी मेरी इच्छा नहीं है, सम्पूर्ण प्राणियोंकी दृष्टिमें मेरा निवास हो, जिससे मैं वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरण करूँ ॥ ११-१२ १/२ ॥ |
| न देहे मम वाञ्छास्ति सर्वदैव विनश्वरे ।<br>वासो मे सर्वसत्त्वानां दृष्टावस्तु सुरोत्तमाः ॥ १२<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चराम्यहम् ।<br>एवमुक्ताः सुरास्तत्र निमेरात्मानमब्रुवन् ॥ १३ | उनसे ऐसा कहे जानेपर देवताओंने निमिकी आत्मासे कहा—हे महाराज ! आप कल्याणकारिणी तथा सबकी ईश्वरी भगवतीकी आराधना करें। आपके इस यज्ञसे प्रसन्न होकर वे आपका अभीष्ट अवश्य पूर्ण करेंगी ॥ १३-१४ ॥ |
| प्रार्थय त्वं महाराज देवीं सर्वेश्वरीं शिवाम् ।<br>मखेनानेन सन्तुष्टा सा तेऽभीष्टं विधास्यति ॥ १४ | देवताओंके ऐसा कहनेपर उन्होंने अनेक प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंद्वारा भक्तिपूर्वक गद्गद वाणीमें देवीकी प्रार्थना की ॥ १५ ॥ |
| स देवैरेवमुक्तस्तु प्रार्थयामास देवताम् ।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैर्भक्त्या गद्गदया गिरा ॥ १५ | तब प्रसन्न होकर देवीने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया। उनके करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान तथा लावण्यसे दीप्तिमान रूपको देखकर सभी कृतकृत्य हो गये और उनके मनमें परम प्रसन्नता हुई। हे राजन् ! देवीके प्रसन्न हो जानेपर राजाने वर माँगा—मुझे वह विमल ज्ञान दीजिये, जिससे मोक्ष प्राप्त हो जाय तथा समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें मेरा निवास हो जाय ॥ १६—१८ ॥ |
| प्रसन्ना सा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं रूपं लावण्यदीपितम् ॥ १६<br>दृष्ट्वा प्रमुदिताः सर्वे कृतकृत्याश्च चेतसि ।<br>प्रसन्नायां देवतायां राजा वव्रे वरं नृप ॥ १७<br>ज्ञानं तद्विमलं देहि येन मोक्षो भवेदपि ।<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासो मे भवेदिति ॥ १८ | तब प्रसन्न हुई देवेश्वरी जगदम्बाने कहा—तुम्हें विमल ज्ञान प्राप्त होगा, परंतु अभी तुम्हारा प्रारब्ध शेष है। समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें तुम्हारा निवास भी होगा। तुम्हारे कारण ही प्राणियोंके नेत्रोंमें पलक गिरानेकी शक्ति होगी। तुम्हारे निवासके कारण ही मनुष्य, पशु तथा पक्षी 'निमिष' (पलक गिरानेवाले) तथा देवता 'अनिमिष' (पलक न गिरानेवाले) होंगे ॥ १९—२१ ॥ |
| ततः प्रसन्ना देवेशी प्रोवाच जगदम्बिका ।<br>ज्ञानं ते विमलं भूयात्प्रारब्धस्यावशेषतः ॥ १९<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासोऽपि भविष्यति ।<br>निमिषं यान्ति चक्षूंषि त्वत्कृतेनैव देहिनाम् ॥ २०<br>तव वासात्सनिमिषा मानवाः पशवस्तथा ।<br>पतङ्गाश्च भविष्यन्ति पुनश्चानिमिषाः सुराः ॥ २१ | इस प्रकार उन राजाको वर देकर और सब मुनियोंको बुलाकर वे श्रीवरदायिनी भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ २२ ॥ |
| इति दत्त्वा वरं तस्मै तदा श्रीवरदेवता ।<br>आमन्त्र्य च मुनीन्सर्वांस्तत्रैवान्तर्हिताभवत् ॥ २२ | |
| ७९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| अन्तर्हितायां देव्यां तु मुनयस्तत्र संस्थिताः।<br>विचिन्त्य विधिवत्सर्वं निमेर्देहं समाहरन्॥ २३<br>अरणिं तत्र संस्थाप्य ममन्थुर्मन्त्रवत्तदा।<br>मन्त्रहोमैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेरथ॥ २४ | देवीके अन्तर्धान हो जानेपर वहाँ उपस्थित मुनिगण विधिवत् विचार करके निमिके शरीरको ले आये और पुत्रप्राप्तिके लिये उसपर अरणिकाष्ठ रखकर वे महात्मा मन्त्र पढ़कर मन्त्रहोमके द्वारा निमिके देहका मन्थन करने लगे॥ २३-२४॥ |
| अरण्यां मथ्यमानायां पुत्रः प्रादुरभूत्तदा।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नः साक्षान्निमिरिवापरः॥ २५<br>अरण्या मथनाज्जातस्तस्मान्मंथिरिति स्मृतः।<br>येनायं जनकाज्जातस्तेनासौ जनकोऽभवत्॥ २६<br>विदेहस्तु निमिर्जातो यस्मात्तस्मात्तदन्वये।<br>समुद्भूतास्तु राजानो विदेहा इति कीर्तिताः॥ २७ | तब अरणीके मन्थनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और साक्षात् दूसरे निमिकी भाँति था। अरणीके मन्थनसे इसका जन्म हुआ था, अतः यह ‘मिथि’—ऐसा कहा गया और जनकसे जन्म होनेके कारण ‘जनक’ यह नामवाला हुआ। राजा निमि विदेह हुए, अतः उनके कुलमें उत्पन्न सभी राजा ‘विदेह’ ऐसा कहे गये॥ २५-२७॥ |
| एवं निमिसुतो राजा प्रथितो जनकोऽभवत्।<br>नगरी निर्मिता तेन गङ्गातीरे मनोहरा॥ २८<br>मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टालसंयुता।<br>धनधान्यसमायुक्ता हट्टशालाविरजिता॥ २९ | इस प्रकार निमिके पुत्र राजा जनक प्रसिद्ध हुए। उन्होंने गंगाके तटपर एक सुन्दर नगरीका निर्माण कराया, जो मिथिला नामसे विख्यात है। यह गोपुरों, अट्टालिकाओं तथा धन-धान्यसे सम्पन्न और बाजारोंसे सुशोभित है॥ २८-२९॥ |
| वंशेऽस्मिन् येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा।<br>विख्याता ज्ञानिनः सर्वे विदेहाः परिकीर्तिताः॥ ३० | इस वंशमें जो अन्य राजा हुए, वे सभी जनक कहे गये; वे सभी विख्यात ज्ञानी और विदेह कहे जाते थे॥ ३०॥ |
| एतत्ते कथितं राजन्निमेराख्यानमुत्तमम्।<br>शापाद्यस्य विदेहत्वं विस्तरादुदितं मया॥ ३१ | हे राजन्! इस प्रकार निमिकी उत्तम कथाका मैंने आपसे वर्णन किया, शापके कारण उनके विदेह होनेको भी मैंने विस्तारसे कह दिया॥ ३१॥ |
| राजोवाच<br>भगवन्भवता प्रोक्तं निमिशापस्य कारणम्।<br>श्रुत्वा सन्देहमापन्नं मनो मेऽतीव चञ्चलम्॥ ३२ | राजा बोले—हे भगवन्! आपने निमिके शापका कारण बताया, इसे सुनकर मेरा मन संशयग्रस्त और अत्यन्त चंचल हो गया है॥ ३२॥ |
| वसिष्ठो ब्राह्मणः श्रेष्ठो राज्ञश्चैव पुरोहितः।<br>पुत्रः पङ्कजयोनेस्तु राज्ञा शप्तः कथं मुनिः॥ ३३<br>गुरुं च ब्राह्मणं ज्ञात्वा निमिना न कृता क्षमा।<br>यज्ञकर्म शुभं कृत्वा कथं क्रोधमुपागतः॥ ३४<br>ज्ञात्वा धर्मस्य विज्ञानं कथमिक्ष्वाकुसम्भवः।<br>क्रोधस्य वशमापन्नः शप्तवान्ब्राह्मणं गुरुम्॥ ३५ | वसिष्ठजी श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, राजाके पुरोहित थे और वे कमलयोनि ब्रह्माजीके पुत्र थे, तब राजा निमिने उन मुनिको कैसे शाप दिया? निमिने उन्हें गुरु और ब्राह्मण जानकर क्षमा क्यों नहीं किया। यज्ञ-जैसा शुभ कार्य करनेपर भी उन्हें क्रोध कैसे आ गया? धर्मका रहस्य जान करके भी इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजाने क्रोधके वशीभूत होकर अपने ब्राह्मण गुरुको शाप क्यों दिया?॥ ३३-३५॥ |
| व्यास उवाच<br>क्षमातिदुर्लभा राजन्प्राणिभिरजितात्मभिः।<br>क्षमावान्दुर्लभो लोके सुसमर्थो विशेषतः॥ ३६ | व्यासजी बोले—हे राजन्! अजितेन्द्रिय प्राणियोंके लिये क्षमा अत्यन्त दुर्लभ है, विशेषरूपसे सामर्थ्यशाली व्यक्तिका क्षमाशील होना इस संसारमें दुर्लभ है॥ ३६॥ |
| अ० १५] | षष्ठ स्कन्ध | ७९७ |
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| सर्वसङ्गपरित्यागी मुनिर्भवतु तापसः।<br>निद्राक्षुधोर्विजेता च योगाभ्यासे सुनिश्चितः॥ ३७ | मुनिको चाहिये कि वह सभी आसक्तियोंका परित्याग करनेवाला, तपस्वी, निद्रा तथा भूखपर विजय प्राप्त करनेवाला और योगाभ्यासमें सम्यक् रूपसे निष्ठा रखनेवाला हो॥ ३७॥ |
| कामः क्रोधस्तथा लोभो ह्यहङ्कारश्चतुर्थकः।<br>दुर्जेया देहमध्यस्था रिपवस्तेन सर्वथा॥ ३८<br>न भूतपूर्वः संसारे न चैव वर्ततेऽधुना।<br>भविता न पुमान्कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ३९ | काम, क्रोध, लोभ और चौथा अहंकार—ये शत्रु शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं जो सर्वथा दुर्जेय होते हैं। संसारमें न पहले कोई व्यक्ति हुआ है, न इस समय है और न तो आगे होगा जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ३८-३९॥ |
| न स्वर्गे न च भूलोके ब्रह्मलोके हरेः पदे।<br>कैलासे नेदृशः कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ४० | न स्वर्गमें, न पृथ्वीलोकमें, न ब्रह्मलोकमें, न विष्णुलोकमें और न तो कैलासमें भी ऐसा कोई व्यक्ति है, जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ४०॥ |
| मुनयो ब्रह्मपुत्राश्च तथान्ये तापसोत्तमाः।<br>तेऽपि गुणत्रयाविद्धाः किं पुनर्मानवा भुवि॥ ४१ | जो मुनिगण, ब्रह्माजीके सभी पुत्र तथा अन्य श्रेष्ठ तपस्वीलोग हैं, वे भी तीनों गुणोंसे बँधे रहते हैं, तो मर्त्यलोकके मनुष्योंकी बात ही क्या ? ॥ ४१॥ |
| कपिलः सांख्यवेत्ता च योगाभ्यासरतः शुचिः।<br>तेनापि दैवयोगाद्धि प्रदग्धाः सगरात्मजाः॥ ४२ | कपिलमुनि सांख्यशास्त्रके ज्ञाता, योगाभ्यास-परायण और शुद्ध चित्तवाले थे, किंतु उन्होंने भी दैववश सगर-पुत्रोंको भस्म कर दिया॥ ४२॥ |
| तस्माद्राजन्नहङ्कारात्सञ्जातं भुवनत्रयम्।<br>कार्यकारणभावात्तु तद्वियुक्तं कथं भवेत्॥ ४३ | अतः हे राजन्! कार्य-कारणस्वरूप अहंकारसे ही यह त्रिलोक उत्पन्न हुआ है, तो फिर मनुष्य उससे वियुक्त कैसे रह सकता है? ॥ ४३॥ |
| ब्रह्मा गुणत्रयाविष्टो विष्णुश्चैवाथ शङ्करः।<br>प्रभवन्ति शरीरेषु तेषां भावाः पृथक्पृथक्॥ ४४<br>मानवानां च का वार्ता सत्त्वैकान्तव्यवस्थितौ।<br>गुणानां सङ्करो राजन्सर्वत्र समवस्थितः॥ ४५<br>कदाचित्सत्त्ववृद्धिः स्यात्कदाचिद्रजसः किल।<br>कदाचित्तमसो वृद्धिः समभावः कदाचन॥ ४६ | ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी त्रिगुणसे बँधे हुए हैं; उनके भी शरीरोंमें गुणोंके पृथक्-पृथक् भाव उत्पन्न होते हैं। जब एकमात्र सत्त्वप्रधान देवताओंकी भी यह स्थिति है तो फिर मनुष्योंकी क्या बात? हे राजन्! गुणोंका संकर (मेल) सर्वत्र विद्यमान है। कभी सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, कभी रजोगुणकी वृद्धि होती है, कभी तमोगुणकी वृद्धि हो जाती है और कभी तीनों गुण बराबर हो जाते हैं॥ ४४-४६॥ |
| निर्गुणः परमात्मासौ निर्लेपः परमोऽव्ययः।<br>अलक्ष्यः सर्वसत्त्वानामप्रमेयः सनातनः॥ ४७<br>तथैव परमा शक्तिर्निर्गुणा ब्रह्मसंस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया चाल्पमतिभिः सर्वभूतव्यवस्थितिः॥ ४८<br>परात्मनस्तथा शक्तेस्तयोरैक्यं सदैव हि।<br>अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते सर्वदोषतः॥ ४९<br>तज्ज्ञानादेव मोक्षः स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः।<br>यो वेद स विमुक्तोऽस्मिन्संसारे त्रिगुणात्मके॥ ५० | वे परमात्मा निर्गुण, निर्लेप, परम अविनाशी, सभी प्राणियोंसे अलक्ष्य, अप्रमेय और सनातन हैं। उसी प्रकार वे परमा शक्ति भी निर्गुण, ब्रह्ममें स्थित, अल्पबुद्धि प्राणियोंके द्वारा दुर्ज्ञेय, समस्त प्राणियोंकी आश्रय हैं। परमात्मा और पराशक्ति—उन दोनोंमें सदासे ऐक्य है। उनका स्वरूप अभिन्न है—यह जानकर प्राणी समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। इस ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है—यह वेदान्तका डिंडिमघोष है। जो यह जान लेता है, वह इस त्रिगुणात्मक संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ४७-५०॥ |