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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अथ नवमोऽध्यायः

४४०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्युक्ता विष्णुभक्तेन सर्वे ते दानवास्तदा ॥ ४३<br>तेनैव सह पातालात्रिर्ययुः परया मुदा।<br>ते समेत्य च दैतेया दानवाश्च महाबलाः ॥ ४४<br>नैमिषारण्यमासाद्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः।<br>प्रह्लादस्तत्र तीर्थेषु चरन्दैत्यैः समन्वितः ॥ ४५<br>सरस्वतीं महापुण्यां ददर्श विमलोदकाम्।<br>तीर्थे तत्र नृपश्रेष्ठ प्रह्लादस्य महात्मनः ॥ ४६<br>मनः प्रसन्नं सञ्जातं स्नात्वा सारस्वते जले।<br>विधिवत्तत्र दैत्येन्द्रः स्नानदानादिकं शुभे ॥ ४७<br>चकारातिप्रसन्नात्मा तीर्थे परमपावने ॥ ४८विष्णुभक्त प्रह्लादके ऐसा कहनेपर वे समस्त दानव परम प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ पाताललोकसे निकल पड़े। उन महाबली दैत्यों तथा दानवोंने एक साथ नैमिषारण्य पहुँचकर आनन्दपूर्वक स्नान किया। दैत्योंके साथ वहाँके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए प्रह्लादने स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा महापुण्यदायिनी सरस्वतीनदीका दर्शन किया। हे नृपश्रेष्ठ! उस पवित्र तीर्थमें सरस्वतीके जलमें स्नान करनेसे महात्मा प्रह्लादका मन प्रसन्न हो गया। दैत्येन्द्र प्रह्लादने उस शुभ तथा परम पावन तीर्थमें प्रसन्न मनसे स्नान, दान आदि कर्म विधिवत् सम्पन्न किये॥ ४३—४८॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादतीर्थयात्रावर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥


अथ नवमोऽध्यायः

प्रह्लादजीका तीर्थयात्राके क्रममें नैमिषारण्य पहुँचना और वहाँ नर-नारायणसे उनका घोर युद्ध, भगवान् विष्णुका आगमन और उनके द्वारा प्रह्लादको नर-नारायणका परिचय देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
कुर्वंस्तीर्थविधिं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>न्यग्रोधं सुमहच्छायमपश्यत्पुरतस्तदा ॥ १[हे राजन्!] इस प्रकार तीर्थके कृत्य सम्पन्न करते हुए हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लादको अपने समक्ष एक विशाल छाया सम्पन्न वटवृक्ष दिखायी पड़ा॥ १॥
ददर्श बाणानपरान्नानाजातीयकांस्तदा।<br>गृध्रपक्षयुतांस्तीव्राञ्शिलाधौतान्महोज्ज्वलान् ॥ २वहाँपर प्रह्लादने गीधोंके पंखोंसे सुसज्जित, नुकीले तथा शिलापर घर्षित करके अत्यन्त दीप्त एवं उज्ज्वल बनाये गये अनेक प्रकारके बाण देखे॥ २॥
चिन्तयामास मनसा कस्येमे विशिखास्त्विह।<br>ऋषीणामाश्रमे पुण्ये तीर्थे परमपावने ॥ ३उन्हें देखकर प्रह्लादने मनमें सोचा कि इस परम पवित्र तीर्थमें ऋषियोंके पुण्यमय आश्रममें ये बाण किसके हैं?॥ ३॥
एवं चिन्तयतानेन कृष्णाजिनधरौ मुनी।<br>समुन्नतजटाभारौ दृष्टौ धर्मसुतौ तदा ॥ ४इस प्रकार चिन्तन करते हुए प्रह्लादने कृष्ण-मृगचर्म धारण किये हुए तथा सिरपर विशाल जटाओंसे सुशोभित धर्मपुत्र नर-नारायण मुनियोंको देखा॥ ४॥
तयोरग्रे धृते शुभ्रे धनुषी लक्षणान्विते।<br>शार्ङ्गमाजगवञ्चैव तथाक्षय्यौ महेषुधी ॥ ५उनके आगे धनुर्वेदके लक्षणोंसे सम्पन्न चमकीले शार्ङ्ग तथा आजगव नामक दो धनुष तथा दो अक्षय तरकस रखे हुए थे॥ ५॥
अ० ९ ]चतुर्थ स्कन्ध४४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ध्यानस्थौ तौ महाभागौ नरनारायणावृषी।<br>दृष्ट्वा धर्मसुतौ तत्र दैत्यानामधिपस्तदा॥ ६<br><br>क्रोधरक्तेक्षणस्तौ तु प्रोवाचासुरपालकः।<br>किं भवद्भ्यां समारब्धो दम्भो धर्मविनाशनः॥ ७उन महाभाग धर्मपुत्र नर-नारायण ऋषियोंको उस समय ध्यानावस्थित देखकर क्रोधसे लाल आँखें किये हुए दैत्याधिपति असुररक्षक प्रह्लादने उनसे कहा—आप दोनोंने धर्मको नष्ट करनेवाला यह कैसा पाखण्ड कर रखा है?॥ ६-७॥
न श्रुतं नैव दृष्टं हि संसारेऽस्मिन्कदापि हि।<br>तपसश्चरणं तीव्रं तथा चापस्य धारणम्॥ ८इस प्रकारकी घोर तपस्या तथा धनुष-धारण करना—ऐसा तो इस संसारमें न कभी सुना गया और न देखा ही गया॥ ८॥
विरोधोऽयं युगे चाद्ये कथं युक्तं कलिप्रियम्।<br>ब्राह्मणस्य तपो युक्तं तत्र किं चापधारणम्॥ ९ये तो परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं। कलियुगके लिये प्रिय यह विरोधभाव भला सत्ययुगमें किस प्रकार उचित है? ब्राह्मणके लिये तो तपश्चरण ही उचित है, उन्हें धनुष-धारण करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ९॥
क्व जटाधारणं देहे क्वेषुधी च विडम्बनौ।<br>धर्मस्याचरणं युक्तं युवयोर्दिव्यभावयोः॥ १०कहाँ तो मस्तकपर जटा धारण करना और कहाँ यह तरकस रखना—ये दोनों बातें आडम्बरमात्र हैं। दिव्य भावनावाले आप दोनोंके लिये धर्मका आचरण ही उचित है॥ १०॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा नरः प्रोवाच भारत।<br>का ते चिन्तात्र दैत्येन्द्र वृथा तपसि चावयोः॥ ११**व्यासजी बोले—**हे भारत! प्रह्लादका यह वचन सुनकर मुनिवर नरने कहा—हे दैत्येन्द्र! हम दोनोंकी तपस्याके विषयमें आप यह व्यर्थ चिन्ता क्यों कर रहे हैं?॥ ११॥
सामर्थ्ये सति यत्कुर्यात्तत्संपद्येत तस्य हि।<br>आवां कार्यद्वये मन्द समर्थौ लोकविश्रुतौ॥ १२सामर्थ्यसम्पन्न हो जानेपर व्यक्ति जो कुछ करता है, उसका वह सब कुछ पूर्ण हो जाता है। हे मन्दबुद्धि! हम इन दोनों प्रकारके कार्योंको [एक साथ] करनेमें समर्थ हैं; इसके लिये हम लोकमें प्रसिद्ध हैं॥ १२॥
युद्धे तपसि सामर्थ्यं त्वं पुनः किं करिष्यसि।<br>गच्छ मार्गे यथाकामं कस्मादत्र विकत्थसे॥ १३युद्ध तथा तपस्या दोनोंमें हम समान रूपसे समर्थ हैं। फिर इस विषयमें आप पूछकर क्या करेंगे? आप इच्छानुसार अपने रास्ते चले जाइये, यहाँ व्यर्थकी बात क्यों कर रहे हैं?॥ १३॥
ब्रह्मतेजो दुराराध्यं न त्वं वेद विमोहितः।<br>विप्रचर्चा न कर्तव्या प्राणिभिः सुखमीप्सुभिः॥ १४मोहग्रस्त होनेके कारण आप अत्यन्त कठिनतासे प्राप्त किये जानेवाले ब्रह्मतेजको नहीं जानते। सुखकी कामना करनेवाले प्राणियोंको ब्राह्मणोंसे बहस नहीं करनी चाहिये॥ १४॥
प्रह्लाद उवाच<br>तापसौ मन्दबुद्धी स्थो मृषा वां गर्वमोहितौ।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ १५**प्रह्लाद बोले—**आप दोनों तपस्वी मन्द बुद्धिवाले हैं और व्यर्थ ही अहंकारके वशवर्ती हो गये हैं। धर्मसेतुका प्रवर्तन करनेवाले मुझ दैत्येन्द्र प्रह्लादके रहते

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न युक्तमेतत्तीर्थेऽस्मिन्धर्माचरणं पुनः।<br>का शक्तिस्तव युद्धेऽस्ति दर्शयाद्य तपोधन॥ १६इस पवित्र तीर्थमें इस प्रकारका अधर्मपूर्ण आचरण उचित नहीं है। हे तपोधन! आपमें कितनी शक्ति है, इसे युद्धमें अभी प्रदर्शित कीजिये॥ १५-१६॥
व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तस्य नरस्तं प्रत्युवाच ह।<br>युद्धस्वाद्य मया सार्धं यदि ते मतिरीदृशी॥ १७<br>अद्य ते स्फोटयिष्यामि मूर्धानमसुराधम।<br>(युद्धे श्रद्धा न ते पश्चाद्भविष्यति कदाचन।)<br>व्यास उवाचव्यासजी बोले—तब प्रह्लादका वचन सुनकर ऋषि नरने उनसे कहा—यदि आपकी ऐसी ही धारणा है तो मेरे साथ इसी समय युद्ध कर लीजिये। हे असुराधम! आज मैं तुम्हारा सिर विदीर्ण कर डालूँगा (इसके बाद युद्ध करनेकी तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होगी)॥ १७ १/२॥
तन्निशम्य वचस्तस्य दैत्येन्द्रः कुपितस्तदा॥ १८<br>प्रह्लादो बलवानत्र प्रतिज्ञामारुरोह सः।<br>येन केनाप्युपायेन जे ष्यामि तावुभावपि॥ १९<br>नरनारायणौ दान्तावृषी तपिसमन्वितौ।<br>व्यास उवाचव्यासजी बोले—तब ऋषि नरका वचन सुनकर दैत्यपति प्रह्लाद कुपित हो उठे। बलशाली उन प्रह्लादने प्रतिज्ञा की कि जिस किसी भी उपायसे मैं इन दोनों जितेन्द्रिय तथा परम तपस्वी नर-नारायण ऋषियोंको जीतकर रहूँगा॥ १८-१९ १/२॥
इत्युक्त्वा वचनं दैत्यः प्रतिगृह्य शरासनम्॥ २०<br>आकृष्य तरसा चापं ज्याशब्दञ्च चकार ह।<br>नरोऽपि धनुरादाय शरांस्तीव्राञ्छिलाशितान्॥ २१<br>मुमोच बहुशः क्रोधात्प्रह्लादोपरि पार्थिव॥ २२व्यासजी बोले—ऐसा वचन बोलकर दैत्य प्रह्लादने धनुष उठाकर और शीघ्रतापूर्वक उसे खींचकर प्रत्यंचाकी टंकार की। हे राजन्! मुनि नरने भी धनुष लेकर शिलापर घिसकर तेज किये हुए अनेक तीक्ष्ण बाण प्रह्लादके ऊपर क्रोधपूर्वक छोड़े॥ २०—२२॥
तान्दैत्यराजस्तपनीयपुङ्खै-<br>श्चिच्छेद बाणैस्तरसा समेत्य।<br>समीक्ष्य छिन्नांश्च नरः स्वसृष्टा-<br>नन्यान्मुमोचाशु रुषान्वितो वै॥ २३दैत्यराज प्रह्लादने अपने सुनहले पंखोंवाले बाणोंसे शीघ्र ही उन बाणोंको आते ही काट डाला। तब नर अपने द्वारा छोड़े गये बाणोंको प्रह्लादद्वारा छिन्न किया गया देखकर अत्यन्त कोपाविष्ट हो शीघ्रतासे उनपर अन्य बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ २३॥
दैत्याधिपस्तानपि तीव्रवेगै-<br>श्छित्त्वा जघानोरसि तं मुनीन्द्रम्।<br>नरोऽपि तं पञ्चभिराशुगैश्च<br>क्रुद्धोऽहनद्दैत्यपतिं बाहुदेशे॥ २४दैत्यपति प्रह्लादने उन बाणोंको भी अपने द्रुतगामी बाणोंसे काटकर उन मुनिराज नरके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। नरने भी क्रुद्ध होकर अपने तीव्रगामी पाँच बाणोंसे दैत्येन्द्र प्रह्लादके बाहुदेशपर प्रहार किया॥ २४॥
सेन्द्राः सुरास्तत्र तयोर्हि युद्धं<br>द्रष्टुं विमानैर्गगनस्थिताश्च।<br>नरस्य वीर्यं युधि संस्थितस्य<br>ते तुष्टुवुर्दैत्यपतेश्च भूयः॥ २५इन्द्रसहित सभी देवगण उन दोनोंका युद्ध देखनेके लिये विमानोंमें बैठकर आकाशमण्डलमें स्थित हो गये। वे कभी समरांगणमें विराजमान नरके पराक्रमकी प्रशंसा करते थे और फिर कभी दैत्यपति प्रह्लादके पराक्रमकी प्रशंसा करने लगते थे॥ २५॥
ववर्ष दैत्याधिप आत्तचापः<br>शिलीमुखानम्बुधरो यथापः।<br>आदाय शार्ङ्गं धनुरप्रमेयं<br>मुमोच बाणाञ्छितहेमपुङ्खान्॥ २६धनुष धारण किये हुए दैत्यराज प्रह्लाद इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे थे, मानो मेघ जल बरसा रहे हों। [ऋषि नर भी अपना] अप्रतिम शार्ङ्ग धनुष लेकर तीक्ष्ण तथा सुनहले पंखवाले बाण छोड़ रहे थे॥ २६॥