देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अथ चतुर्थोऽध्यायः
| १९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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अथ चतुर्थोऽध्यायः
गंगाजीद्वारा राजा शन्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सूत उवाच<br>प्रतीपेऽथ दिवं याते शन्तनुः सत्यविक्रमः।<br>बभूव मृगयाशीलो निघ्नन्व्याघ्रान्मृगान्नृपः॥ १ | सूतजी बोले—प्रतीपके स्वर्ग चले जानेपर सत्यपराक्रमी राजा शन्तनु व्याघ्र तथा मृगोंको मारते हुए मृगयामें तत्पर हो गये॥ १॥ |
| स कदाचिद्वने घोरे गङ्गातीरे चरन्नृपः।<br>ददर्श मृगशावाक्षीं सुन्दरीं चारुभूषणाम्॥ २ | किसी समय गंगाके किनारे घने वनमें विचरण करते हुए राजाने मृगके बच्चे-जैसी आँखोंवाली तथा सुन्दर आभूषणोंसे युक्त एक सुन्दर स्त्रीको देखा॥ २॥ |
| दृष्ट्वा तां नृपतिर्मग्नः पित्रोक्तेयं वरानना।<br>रूपयौवनसम्पन्ना साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा॥ ३ | उसे देखकर राजा शन्तनु हर्षित हो गये और सोचने लगे कि साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूप-यौवनसे सम्पन्न यह स्त्री वही है, जिसके विषयमें पिताजीने मुझे बताया था॥ ३॥ |
| पिबन्मुखाम्बुजं तस्या न तृप्तिमगमन्नृपः।<br>हृष्टरोमाभवत्तत्र व्याप्तचित्त इवानघः॥ ४ | उसके मुखकमलका पान करते हुए राजा तृप्त नहीं हुए। हर्षातिरेकसे उन निष्पाप राजाको रोमांच हो गया और उनका चित्त उस स्त्रीमें रम गया॥ ४॥ |
| महाभिषं सापि मत्वा प्रेमयुक्ता बभूव ह।<br>किञ्चिन्मन्दस्मितं कृत्वा तस्थावग्रे नृपस्य च॥ ५<br><br>वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं राजा प्रीतमना भृशम्।<br>उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा॥ ६ | वह स्त्री भी उन्हें राजा महाभिष जानकर प्रेमासक्त हो गयी। वह मन्द-मन्द मुसकराती हुई राजाके सामने खड़ी हो गयी। उस सुन्दरीको देखकर राजा अत्यन्त प्रेमविवश हो गये तथा कोमल वाणीसे उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वचन कहने लगे॥ ५-६॥ |
| देवी वा त्वं च वामोरु मानुषी वा वरानने।<br>गन्धर्वी वाथ यक्षी वा नागकन्याप्सरापि वा॥ ७<br><br>यासि कासि वरारोहे भार्या मे भव सुन्दरि।<br>प्रेमयुक्तस्मितैव त्वं धर्मपत्नी भवाद्य मे॥ ८ | हे वामोरु! हे सुमुखि! तुम कोई देवी, मानुषी, गन्धर्वी, यक्षी, नागकन्या अथवा अप्सरा तो नहीं हो। हे वरारोहे! तुम जो कोई भी हो, मेरी भार्या बन जाओ। हे सुन्दरि! तुम प्रेमपूर्वक मुसकरा रही हो; अब मेरी धर्मपत्नी बन जाओ॥ ७-८॥ |
| सूत उवाच<br>राजा तां नाभिजानाति गङ्गेयमिति निश्चितम्।<br>महाभिषं समुत्पन्नं नृपं जानाति जाह्नवी॥ ९<br><br>पूर्वप्रेमसमायोगाच्छ्रुत्वा वाचं नृपस्य ताम्।<br>उवाच नारी राजानं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ १० | सूतजी बोले—राजा शन्तनु तो निश्चितरूपसे नहीं जान सके कि ये वे ही गंगा हैं, किंतु गंगाने उन्हें पहचान लिया कि ये शन्तनुके रूपमें उत्पन्न वही राजा महाभिष हैं। पूर्वकालीन प्रेमवश राजा शन्तनुके उस वचनको सुनकर उस स्त्रीने मन्द मुसकान करके यह वचन कहा॥ ९-१०॥ |
| स्त्र्युवाच<br>जानामि त्वां नृपश्रेष्ठ प्रतीपतनयं शुभम्।<br>का न वाञ्छति चार्वङ्गी भावित्वात्सदृशं पतिम्॥ ११ | स्त्री बोली—हे नृपश्रेष्ठ! मैं यह जानती हूँ कि आप महाराज प्रतीपके योग्य पुत्र हैं। अतः भला कौन ऐसी स्त्री होगी, जो संयोगवश अपने अनुरूप पुरुषको पाकर भी उसे पतिरूपमें स्वीकार न करेगी॥ ११॥ |
अ० ४] द्वितीय स्कन्ध १९१
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाग्बन्धेन नृपश्रेष्ठ वरिष्यामि पतिं किल।<br>शृणु मे समयं राजन् वृणोमि त्वां नृपोत्तम॥ १२ | हे नृपश्रेष्ठ! वचनबद्ध करके ही मैं आपको अपना पति स्वीकार करूँगी। हे राजन्! हे नृपोत्तम! अब आप मेरी शर्त सुनिये, जिससे मैं आपका वरण कर सकूँ॥ १२॥ |
| यच्च कुर्यामहं कार्यं शुभं वा यदि वाशुभम्।<br>न निषेध्या त्वया राजन्न वक्तव्यं तथाप्रियम्॥ १३<br><br>यदा च त्वं नृपश्रेष्ठ न करिष्यसि मे वचः।<br>तदा मुक्त्वा गमिष्यामि यथेष्टदेशं मारिष॥ १४ | हे राजन्! मैं भला-बुरा जो भी कार्य करूँ, आप मुझे मना नहीं करेंगे तथा न कोई अप्रिय बात ही कहेंगे। जिस समय आप मेरा यह वचन नहीं मानेंगे, उसी समय हे मान्य नृपश्रेष्ठ! मैं आपको त्यागकर जहाँ चाहूँगी, उस जगह चली जाऊँगी॥ १३-१४॥ |
| स्मृत्वा जन्म वसूनां सा प्रार्थनापूर्वकं हृदि।<br>महाभिषस्य प्रेमाथ विचिन्त्यैव च जाह्नवी॥ १५<br><br>तथेत्युक्ताथ सा देवी चकार नृपतिं पतिम्।<br>एवं वृता नृपेणाथ गङ्गा मानुषरूपिणी॥ १६<br><br>नृपस्य मन्दिरं प्राप्ता सुभगा वरवर्णिनी।<br>नृपतिस्तां समासाद्य चिक्रीडोपवने शुभे॥ १७ | उस समय प्रार्थनापूर्वक वसुओंके जन्म ग्रहण करनेका स्मरण करके तथा महाभिषकके पूर्वकालीन प्रेमको अपने मनमें सोच करके गंगाजीने राजा शन्तनुके 'तथास्तु' कहनेपर उन्हें अपना पति बनाना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मानवीरूप धारण करनेवाली रूपवती तथा सुन्दर वर्णवाली गंगा महाराज शन्तनुकी पत्नी बनकर राजभवनमें पहुँच गयीं। राजा शन्तनु उन्हें पाकर सुन्दर उपवनमें विहार करने लगे॥ १५-१७॥ |
| सापि तं रमयामास भावज्ञा वै वराङ्गना।<br>न बुबोध नृपः क्रीडनातान्वर्षगणानथ॥ १८<br><br>स तया मृगशावाक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>सा सर्वगुणसम्पन्ना सोऽपि कामविचक्षणः॥ १९<br><br>रेमाते मन्दिरे दिव्ये रमानारायणाविव।<br>एवं गच्छति काले सा दधार नृपतेस्तदा॥ २० | भावोंको जाननेवाली वे सुन्दरी गंगा भी राजा शन्तनुके साथ विहार करने लगीं। उनके साथ महाराज शन्तनुको क्रीडा करते अनेक वर्ष बीत गये, पर उन्हें समय बीतनेका बोध ही न हुआ। वे उन मृगलोचनाके साथ उसी प्रकार विहार करते थे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। सर्वगुणसम्पन्ना गंगा तथा चतुर शन्तनु भी दिव्य भवनमें लक्ष्मी तथा नारायणकी भाँति विहार करने लगे॥ १८-१९ ½॥ |
| गर्भं गङ्गा वसुं पुत्रं सुषुवे चारुलोचना।<br>जातमात्रं सुतं वारि चिक्षेपैवं द्वितीयके॥ २१<br><br>तृतीयेऽथ चतुर्थेऽथ पञ्चमे षष्ठ एव च।<br>सप्तमे वा हते पुत्रे राजा चिन्तापरोऽभवत्॥ २२ | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गंगाजीने महाराज शन्तनुसे गर्भ धारण किया और यथासमय उन सुनयनीने एक वसुको पुत्ररूपमें जन्म दिया। उन्होंने उस बालकको उत्पन्न होते ही तत्काल जलमें फेंक दिया। इस प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें तथा सातवें पुत्रके मारे जानेपर राजा शन्तनुको बड़ी चिन्ता हुई॥ २०-२२॥ |
| किं करोम्यद्य वंशो मे कथं स्यात्सुस्थिरो भुवि।<br>सप्त पुत्रा हता नूनमनया पापरूपया॥ २३ | [उन्होंने सोचा—] अब मैं क्या करूँ? मेरा वंश इस पृथ्वीपर सुस्थिर कैसे होगा? इस पापिनीने मेरे सात पुत्र मार डाले। यदि इसे रोकता हूँ तो |
| १९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवारयामि यदि मां त्यक्त्वा यास्यति सर्वथा।<br>अष्टमोऽयं सुसम्प्राप्तो गर्भो मे मनसीप्सितः॥ २४<br><br>न वारयामि चेदद्य सर्वथेयं जले क्षिपेत्।<br>भविता वा न वा चाग्रे संशयोऽयं ममाद्भुतः॥ २५<br><br>सम्भवेऽपि च दुष्टेयं रक्षेद्यद्वा न रक्षयेत्।<br>एवं संशयिते कार्ये किं कर्तव्यं मयाधुना॥ २६ | यह मुझे त्यागकर चली जायगी। मेरा अभिलषित आठवाँ गर्भ भी इसे प्राप्त हो गया है। यदि अब भी मैं इसे रोकता नहीं हूँ तो यह इसे भी जलमें फेंक देगी। यह भी मुझे महान् सन्देह है कि भविष्यमें कोई और सन्तति होगी अथवा नहीं। यदि उत्पन्न हो भी तो पता नहीं कि यह दुष्टा उसकी रक्षा करेगी अथवा नहीं? इस संशयकी स्थितिमें मैं अब क्या करूँ?॥ २३–२६॥ |
| वंशस्य रक्षणार्थं हि यत्नः कार्यः परो मया।<br>ततः काले यदा जातः पुत्रोऽयमष्टमो वसुः॥ २७<br><br>मुनेर्येन हृता धेनुर्नन्दिनी स्त्रीजितेन हि।<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः पुत्रं तामुवाच पतन्पदे॥ २८ | वंशकी रक्षाके लिये मुझे कोई दूसरा यत्न करना ही होगा। तदनन्तर यथासमय जब वह आठवाँ 'द्यौ' नामक वसु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ, जिसने अपनी स्त्रीके वशीभूत होकर वसिष्ठकी नन्दिनी गौका हरण कर लिया था, तब उस पुत्रको देखकर राजा शान्तनु गंगाजीके पैरोंपर गिरते हुए कहने लगे॥ २७-२८॥ |
| दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि प्रार्थयामि शुचिस्मिते।<br>पुत्रमेकं पुषाम्येनं देहि जीवितमद्य मे॥ २९ | हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ। हे शुचिस्मिते! मैं प्रार्थना करता हूँ। मैं इस पुत्रको पालना चाहता हूँ, अतः इसे जीवित ही मुझे दे दो॥ २९॥ |
| हिंसिताः सप्त पुत्रा मे करभोरु त्वया शुभाः।<br>अष्टमं रक्ष सुश्रोणि पतामि तव पादयोः॥ ३० | हे करभोरु! तुमने मेरे सात सुन्दर पुत्रोंको मार डाला, किंतु इस आठवें पुत्रकी रक्षा करो। हे सुश्रोणि! मैं तुम्हारे पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ३०॥ |
| अन्यद्वै प्रार्थितं तेऽद्य ददाम्यथ च दुर्लभम्।<br>वंशो मे रक्षणीयोऽद्य त्वया परमशोभने॥ ३१ | हे परम रूपवती! इसके बदले तुम मुझसे जो माँगोगी, मैं वह दुर्लभ वस्तु भी तुम्हें दूँगा। अब तुम मेरे वंशकी रक्षा करो॥ ३१॥ |
| अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे वेदविदो विदुः।<br>तस्मादद्य वरारोहे प्रार्थयाम्यष्टमं सुतम्॥ ३२ | वेदविद् विद्वानोंने कहा है कि पुत्रहीन मनुष्यकी स्वर्गमें भी गति नहीं होती। इसी कारण हे सुन्दरि! अब मैं इस आठवें पुत्रके लिये याचना करता हूँ॥ ३२॥ |
| इत्युक्तापि गृहीत्वा तं यदा गन्तुं समुत्सुका।<br>तदातिकुपतो राजा तामुवाचातिदुःखितः॥ ३३<br><br>पापिष्ठे किं करोम्यद्य निरयान्न बिभेषि किम्।<br>कासि पापकराणां त्वं पुत्री पापरता सदा॥ ३४<br><br>यथेच्छं गच्छ वा तिष्ठ पुत्रो मे स्थीयतामिह।<br>किं करोमि त्वया पापे वंशान्तकरयानया॥ ३५ | राजा शान्तनुके ऐसा कहनेपर भी जब गंगा उस पुत्रको लेकर जानेको उद्यत हुईं, तब उन्होंने अत्यन्त कुपित एवं दुःखित होकर उनसे कहा—'हे पापिनि! अब मैं क्या करूँ? क्या तुम नरकसे भी नहीं डरती? तुम कौन हो? लगता है कि तुम पापियोंकी पुत्री हो, तभी तो तुम सदा पापकर्ममें लगी रहती हो, अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ या रहो, किंतु यह पुत्र यहीं रहेगा। हे पापिनि! अपने वंशका अन्त करनेवाली ऐसी तुम्हें रखकर भी मैं क्या करूँगा?'॥ ३३–३५॥ |
| अ० ४ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं वदति भूपाले सा गृहीत्वा सुतं शिशुम्।<br>गच्छन्ती वचनं कोपसंयुता तमुवाच ह॥ ३६<br><br>पुत्रकामा सुतं त्वेनं पालयामि वने गता।<br>समयो मे गमिष्यामि वचनं ह्यन्यथाकृतम्॥ ३७<br><br>गङ्गां मां वै विजानीहि देवकार्यार्थमागताम्।<br>वसवस्तु पुरा शप्ता वसिष्ठेन महात्मना॥ ३८<br><br>व्रजन्तु मानुषीं योनिं स्थितां चिन्तातुरास्तु माम्।<br>दृष्ट्वेदं प्रार्थयामासुर्जननी नो भवानघे॥ ३९<br><br>तेभ्यो दत्त्वा वरं जाता पत्नी ते नृपसत्तम।<br>देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं जानीहि सम्भवो मम॥ ४० | राजाके ऐसा कहनेपर उस नवजात शिशुको लेकर जाती हुई गंगाने क्रोधपूर्वक उनसे कहा—पुत्रकी कामनावाली मैं भी इस पुत्रको वनमें ले जाकर पालूंगी। शर्तके अनुसार अब मैं चली जाऊँगी; क्योंकि आपने अपना वचन तोड़ा है। [हे राजन्!] मुझे आप गंगा जानिये; देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही मैं यहाँ आयी थी। महात्मा वसिष्ठने प्राचीन कालमें आठों वसुओंको शाप दिया था कि तुम सब मनुष्ययोनिमें जाकर जन्म लो। तब चिन्तासे व्याकुल होकर आठों वसु मुझे वहाँ स्थित देखकर कहने लगे—हे अनघे! आप हमारी माता बनें। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उन्हें वरदान देकर मैं आपकी पत्नी बन गयी। आप ऐसा समझ लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही मेरा जन्म हुआ है॥ ३६—४०॥ |
| सप्त ते वसवः पुत्रा मुक्ताः शापाद्बृहैस्तु ते।<br>कियन्तं कालमेकोऽयं तव पुत्रो भविष्यति॥ ४१<br><br>गङ्गादत्तमिमं पुत्रं गृहाण शन्तनो स्वयम्।<br>वसुं देवं विदित्वैनं सुखं भुंक्ष्व सुतोद्भवम्॥ ४२<br><br>गाङ्गेयोऽयं महाभाग भविष्यति बलाधिकः।<br>अद्य तत्र नयाम्येनं यत्र त्वं वै मया वृतः॥ ४३ | वे सातों वसु तो आपके पुत्र बनकर ऋषिके शापसे विमुक्त हो गये। यह आठवाँ वसु कुछ समयतक आपके पुत्ररूपमें विद्यमान रहेगा। अतः हे महाराज शन्तनु! मुझ गंगाके द्वारा दिये हुए पुत्रको आप स्वीकार कीजिये। इसे आठवाँ वसु जानते हुए आप पुत्र-सुखका भोग करें; क्योंकि हे महाभाग! यह 'गांगेय' बड़ा ही बलवान् होगा। अब इसे मैं वहीं ले जा रहीं हूँ, जहाँ मैंने आपका पतिरूपसे वरण किया था॥ ४१—४३॥ |
| दास्यामि यौवनप्राप्तं पालयित्वा महीपते।<br>न मातुरहितः पुत्रो जीवेन्न च सुखी भवेत्॥ ४४ | हे राजन्! इसे पालकर इसके युवा होनेपर मैं पुनः आपको दे दूँगी; क्योंकि मातृहीन बालक न जी पाता है और न सुखी रहता है॥ ४४॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा तं गृहीत्वा च बालकम्।<br>राजा चातीव दुःखार्तः संस्थितो निजमन्दिरे॥ ४५ | ऐसा कहकर उस बालकको लेकर गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। राजा भी अत्यन्त दुःखित होकर अपने राजभवनमें रहने लगे॥ ४५॥ |
| भार्याविरहजं दुःखं तथा पुत्रस्य चाद्भुतम्।<br>सर्वदा चिन्तयन्नास्ते राज्यं कुर्वन्महीपतिः॥ ४६ | महाराज शन्तनु स्त्री तथा पुत्रके वियोगजन्य महान् कष्टका सदा अनुभव करते हुए भी किसी प्रकार राज्यकार्य सँभालने लगे॥ ४६॥ |
| एवं गच्छति कालेऽथ नृपतिर्मृगयां गतः।<br>निघ्नन्मृगगणान्बाणैर्महिषान्सूकरानपि ॥ ४७<br><br>गङ्गातीरमनुप्राप्तः स राजा शन्तनुस्तदा।<br>नदीं स्तोकजलां दृष्ट्वा विस्मितः स महीपतिः॥ ४८ | कुछ समय बीतनेपर महाराज आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ अनेक प्रकारके मृगगणों, भैंसों तथा सूकरोंको अपने बाणोंसे मारते हुए वे गंगाजीके तटपर जा पहुँचे। उस नदीमें बहुत थोड़ा जल देखकर वे राजा शन्तनु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४७-४८॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 A
| १९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्रापश्यत्कुमारं तं मुञ्चन्तं विशिखान्बहून्।<br>आकृष्य च महाचापं क्रीडन्तं सरितस्तटे ॥ ४९<br><br>तं वीक्ष्य विस्मितो राजा न स्म जानाति किञ्चन।<br>नोपलेभे स्मृतिं भूपः पुत्रोऽयं मम वा न वा॥ ५० | उन्होंने वहाँ नदीके किनारे खेलते हुए एक बालकको महान् धनुषको खींचकर बहुतसे बाणोंको छोड़ते हुए देखा। उसे देखकर राजा शन्तनु बड़े विस्मित हुए और कुछ भी नहीं जान पाये। उन्हें यह भी स्मरण न हो पाया कि यह मेरा पुत्र है या नहीं॥ ४९-५०॥ |
| दृष्ट्वाप्यमानुषं कर्म बाणेषु लघुहस्तताम्।<br>विद्यां वाप्रतिमां रूपं तस्य वै स्मरसन्निभम् ॥ ५१<br><br>पप्रच्छ विस्मितो राजा कस्य पुत्रोऽसि चानघ।<br>नोवाच किञ्चिद्वीरोऽसौ मुञ्चञ्छिलीमुखानथ ॥ ५२<br><br>अन्तर्धानं गतः सोऽथ राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>कोऽयं मम सुतो बालः किं करोमि व्रजामि कम् ॥ ५३ | उस बालकके अतिमानवीय कृत्य, बाण चलानेके हस्तलाघव, असाधारण विद्या और कामदेवके समान सुन्दर रूपको देखकर अत्यन्त विस्मित राजाने उससे पूछा—‘हे निर्दोष बालक! तुम किसके पुत्र हो?’ किंतु उस वीर बालकने कोई उत्तर नहीं दिया और वह बाण चलाता हुआ अन्तर्धान हो गया। तब राजा शन्तनु चिन्तित होकर यह सोचने लगे कि कहीं यह मेरा ही पुत्र तो नहीं है? अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ?॥ ५१—५३॥ |
| गङ्गां तुष्टाव भूपालः स्थितस्तत्र समाहितः।<br>दर्शनं सा ददौ चाथ चारुरूपा यथा पुरा ॥ ५४ | जब उन्होंने वहीं खड़े होकर समाहितचित्तसे गंगाजीकी स्तुति की तब गंगाजीने प्रसन्न होकर पहलेके ही समान एक रूपवती स्त्रीके रूपमें उन्हें दर्शन दिया॥ ५४॥ |
| दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं बभाषे नृपतिः स्वयम्।<br>कोऽयं गङ्गे गतो बालो मम त्वं दर्शयाधुना ॥ ५५ | सर्वांगसुन्दरी गंगाजीको देखकर राजा शन्तनु बोले—हे गंगे! यह बालक कौन था और कहाँ चला गया? आप उसे मुझको दिखा दीजिये॥ ५५॥ |
| गङ्गोवाच<br>पुत्रोऽयं तव राजेन्द्र रक्षितश्चाष्टमो वसुः।<br>ददामि तव हस्ते तु गाङ्गेयोऽयं महातपाः॥ ५६ | गंगाजी बोलीं—हे राजेन्द्र! यह आपका ही पुत्र आठवाँ वसु है, जिसे मैंने पाला है। इस महातपस्वी गांगेयको मैं आपको सौंपती हूँ॥ ५६॥ |
| कीर्तिकर्ता कुलस्यास्य भविता तव सुव्रत।<br>पाठितस्त्वखिलान्वेदान्धनुर्वेदं च शाश्वतम् ॥ ५७ | हे सुव्रत! यह बालक आपके इस कुलकी कीर्तिको बढ़ानेवाला होगा। इसे सभी वेदशास्त्र एवं शाश्वत धनुर्वेदकी शिक्षा दी गयी है॥ ५७॥ |
| वसिष्ठस्याश्रमे दिव्ये संस्थितोऽयं सुतस्तव।<br>सर्वविद्याविधानज्ञः सर्वार्थकुशलः शुचिः॥ ५८ | आपका यह पुत्र वसिष्ठजीके दिव्य आश्रममें रहा है और सब विद्याओंमें पारंगत, कार्यकुशल एवं सदाचारी है॥ ५८॥ |
| यद्वेद जामदग्न्योऽसौ तद्वेदायं सुतस्तव।<br>गृहाण गच्छ राजेन्द्र सुखी भव नराधिप ॥ ५९ | जिस विद्याको जमदग्निपुत्र परशुराम जानते हैं, उसे आपका यह पुत्र जानता है। हे राजेन्द्र! हे नराधिप! आप इसे ग्रहण कीजिये, जाइये और सुखपूर्वक रहिये॥ ५९॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा दत्त्वा पुत्रं नृपाय वै।<br>नृपतिस्तु मुदा युक्तो बभूवातिसुखान्वितः ॥ ६० | ऐसा कहकर तथा वह पुत्र राजाको देकर गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं। उसे पाकर राजा शन्तनु बहुत आनन्दित और सुखी हुए॥ ६०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 B
| अ० ५ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९५ |
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| समालिङ्ग्य सुतं राजा समाघ्राय च मस्तकम्।<br>समारोप्य रथे पुत्रं स्वपुरं स प्रचक्रमे॥ ६१ | राजा शन्तनु पुत्रका आलिंगन करके तथा उसका मस्तक सूँघकर और उसे अपने रथपर बैठाकर अपने नगरकी ओर चल पड़े॥ ६१॥ |
| गत्वा गजाह्वयं राजा चकारोत्सवमुत्तमम्।<br>दैवज्ञं च समाहूय पप्रच्छ च शुभं दिनम्॥ ६२ | राजाने हस्तिनापुर जाकर महान् उत्सव किया और दैवज्ञको बुलाकर शुभ मुहूर्त पूछा॥ ६२॥ |
| समाहूय प्रजाः सर्वाः सचिवान्सर्वशः शुभान्।<br>यौवराज्येऽथ गाङ्गेयं स्थापयामास पार्थिवः॥ ६३ | राजा शन्तनुने सब प्रजाजनों तथा सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंको बुलाकर गंगापुत्रको युवराज पदपर बैठा दिया॥ ६३॥ |
| कृत्वा तं युवराजानं पुत्रं सर्वगुणान्वितम्।<br>सुखमास स धर्मात्मा न सस्मार च जाह्नवीम्॥ ६४ | उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको युवराज बनाकर वे धर्मात्मा शन्तनु सुखपूर्वक रहने लगे। अब उन्हें गंगाजीकी भी सुधि नहीं रही॥ ६४॥ |
| सूत उवाच<br>एतद्वः कथितं सर्वं कारणं वसुशापजम्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिं जाह्नव्याः सम्भवं तथा॥ ६५ | सूतजी बोले— इस प्रकार मैंने आप सबको वसुओंके शापका कारण, गंगाके प्राकट्य तथा भीष्मकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह दिया॥ ६५॥ |
| गङ्गावतरणं पुण्यं वसूनां सम्भवं तथा।<br>यः शृणोति नरः पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥ ६६ | जो मनुष्य गंगावतरण तथा वसुओंके उद्भवकी इस पवित्र कथाको सुनता है, वह सब प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६६॥ |
| पुण्यं पवित्रमाख्यानं कथितं मुनिसत्तमाः।<br>यथा मया श्रुतं व्यासात्पुराणं वेदसम्मितम्॥ ६७ | हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा वेद-सम्मत पौराणिक आख्यान जैसा व्यासजीके मुखारविन्दसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया॥ ६७॥ |
| श्रीमद्भागवतं पुण्यं नानाख्यानकथान्वितम्।<br>द्वैपायनमुखोद्भूतं पञ्चलक्षणसंयुतम्॥ ६८ | द्वैपायन व्यासजीके मुखसे निःसृत यह श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराण बड़ा ही पवित्र, अनेकानेक कथाओंसे परिपूर्ण तथा सर्ग-प्रतिसर्ग आदि पाँच पुराण-लक्षणोंसे युक्त है॥ ६८॥ |
| शृण्वतां सर्वपापघ्नं शुभदं सुखदं तथा।<br>इतिहासमिमं पुण्यं कीर्तितं मुनिसत्तमाः॥ ६९ | हे मुनिश्रेष्ठो! सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले, कल्याणकारी, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस इतिहासका मैंने आपलोगोंसे वर्णन कर दिया॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
मत्स्यगन्धा (सत्यवती)-को देखकर राजा शन्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शन्तनुका सत्यवतीसे विवाह
| ऋषय ऊचुः<br>वसूनां सम्भवः सूत कथितः शापकारणात्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिः कथिता लोमहर्षणे॥ १ | ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षणतनय सूतजी! आपने शापवश अष्टवसुओंके जन्म तथा गंगाजीकी उत्पत्तिका वर्णन किया। हे धर्मज्ञ! व्यासजीकी सत्यवती |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 C
| १९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| माता व्यासस्य धर्मज्ञ नाम्ना सत्यवती सती।<br>कथं शन्तनुना प्राप्ता भार्या गन्धवती शुभा॥ २<br>तन्ममाचक्ष्व विस्तारं दाशपुत्री कथं वृता।<br>राज्ञा धर्मवरिष्ठेन संशयं छिन्धि सुव्रत॥ ३ | नामकी साध्वी माता जो पवित्र गन्धवाली थीं, वे राजा शन्तनुको पत्नीरूपसे कैसे प्राप्त हुईं? यह हमें विस्तारके साथ बताइये। महान् धर्मनिष्ठ राजा शन्तनुने निषादपुत्रीके साथ विवाह क्यों किया? हे सुव्रत! यह बताकर आप हमारे सन्देहका निवारण कीजिये॥ १-३॥ |
| सूत उवाच<br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्मृगयानिरतः सदा।<br>वनं जगाम निघ्नन्वौ मृगांश्च महिषान् रुरून्॥ ४ | सूतजी बोले— राजर्षि शन्तनु सदा आखेट करनेमें तत्पर रहते थे। वे वनमें जाकर मृग, महिष तथा रुरुमृगोंका वध किया करते थे॥ ४॥ |
| चत्वार्येव तु वर्षाणि पुत्रेण सह भूपतिः।<br>रममाणः सुखं प्राप कुमारेण यथा हरः॥ ५ | राजा शन्तनु केवल चार वर्षतक भीष्मके साथ उसी प्रकार सुखसे रहे, जिस प्रकार भगवान् शंकर कार्तिकेयके साथ आनन्दपूर्वक रहते थे॥ ५॥ |
| एकदा विक्षिपन्बाणान्विनिघ्नन्खड्गसूकरान्।<br>स कदाचिद्वनं प्राप्तः कालिन्दीं सरितां वराम्॥ ६ | एक बार वे महाराज शन्तनु वनमें बाण छोड़ते हुए बहुतसे गैंडों तथा सूकरोंका वध करते हुए किसी समय नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके किनारे जा पहुँचे॥ ६॥ |
| महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम्।<br>तस्य प्रभवमन्विच्छन्सञ्चचार वनं तदा॥ ७ | राजाने वहाँपर कहींसे आती हुई उत्तम गन्धको सूँघा। तब उस सुगन्धिके उद्गमका पता लगानेके लिये वे वनमें विचरने लगे॥ ७॥ |
| न मन्दारस्य गन्धोऽयं मृगनाभिमदस्य न।<br>चम्पकस्य न मालत्या न केतक्या मनोहरः॥ ८ | वे बड़े असमंजसमें पड़ गये कि यह मनोहर सुगन्धि न मन्दारपुष्पकी है, न कस्तूरीकी है, न मालतीकी है, न चम्पाकी है और न तो केतकीकी ही है!॥ ८॥ |
| न चानुभूतपूर्वोऽयं वाति गन्धवहः शुभः।<br>कुतोऽयमेति वायुर्वै मम घ्राणविमोहनः॥ ९ | मैंने ऐसी अनुपम सुगन्धिका पूर्वमें कभी नहीं अनुभव किया था। [इस दिव्य सुगन्धिको लेकर] सुन्दर वायु बह रही है। मेरी घ्राणेन्द्रियको मुग्ध कर देनेवाली यह वायु कहाँसे आ रही है?॥ ९॥ |
| इति सञ्चिन्त्यमानोऽसौ बभ्राम वनमण्डलम्।<br>मोहितो गन्धलोभेन शन्तनुः पवनानुगः॥ १० | इस प्रकार सोचते-विचारते राजा शन्तनु गन्धके लोभसे मोहित सुगन्धित वायुका अनुसरण करते हुए वनप्रदेशमें विचरण करने लगे॥ १०॥ |
| स ददर्श नदीतीरे संस्थितां चारुदर्शनाम्।<br>शृङ्गाररहितां कान्तां सुस्थितां मलिनाम्बराम्॥ ११ | उन्होंने यमुनानदीके तटपर बैठी हुई एक दिव्यदर्शनवाली स्त्रीको देखा, जो मलिन वस्त्र धारण करने और शृंगार न करनेपर भी मनोहर दीख रही थी॥ ११॥ |
| दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मितः स महीपतिः।<br>अस्या देहस्य गन्धोऽयमिति सञ्जातनिश्चयः॥ १२ | उस श्याम नयनोंवाली स्त्रीको देखकर राजा आश्चर्यमें पड़ गये और उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि यह सुगन्धि इसी स्त्रीके शरीरकी है॥ १२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 7 D