जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
'२४३. गुत्तिल जातक
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'२४३. गुत्तिल जातक
"सत्ततन्ति सुमधुरं..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय भिक्षुओं ने देवदत्त से पूछा—आयुष्मान् देवदत्त ! सम्यक्
सम्बुद्ध तेरे आचार्य हैं। तूने सम्यक् सम्बुद्ध के कारण तीनो पिटक सीखे,
चारो ध्यान प्राप्त किए, अब आचार्य का विरोधी बनना उचित नहीं। देवदत्त
ने आचार्य का प्रत्याख्यान करते हुए कहा—आयुष्मान श्रमण गौतम मेरे कैसे
आचार्य हैं ? क्या मैंने अपनी सामर्थ्य से ही तीनो पिटक नहीं सीखे हैं तथा
चारो ध्यान नहीं प्राप्त किए हैं ?
भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! देवदत्त अपने
आचार्य का प्रत्याख्यान कर सम्यक् सम्बुद्ध का विरोधी बन महाविनाश
को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल
अभी देवदत्त आचार्य का प्रत्याख्यान कर मेरा शत्रु बन नष्ट होता है, पहले भी
विनष्ट हुआ ही है।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य-करने के समय बोधिसत्त्व
गन्धर्व कुल में पैदा हुआ। उसका नाम हुआ गुत्तिल कुमार। यह बड़े होने पर
गन्धर्व-शिल्प में ऐसा पारङ्गत हुआ कि सारे जम्बूद्वीप में गुत्तिल गन्धर्व ही
सब गन्धर्वों से बढ़ गया। वह स्त्री का पालन न कर अपने अन्धे मातापिता
का पालन करता था।
गुत्तिल ] ४३६
उस समय वाराणसी निवासी बनियो ने व्यापार के लिए उज्जैनि जाकर
उत्सव घोषित होने पर चन्दा करके बहुत सा माला गन्ध विलेपन आदि तथा
खाद्य भोज्य ले क्रीडा-स्थान पर इकट्ठे हो कहा—कि वेतन देकर एक गन्धर्व
को लाओ । उस समय उज्जैनि मे मूसिल नामक ज्येष्ठ गन्धर्व था । उन्होने
उसे बुलवाकर अपना गन्धर्व बनाया ।
मूसिल वीणा भी बजाता था । उसने वीणा को स्वर चढ़ा कर बजाया ।
गुत्तिल गन्धर्व के गन्धर्व से परिचित उन लोगो को मूसिल का बजाना चटाई
खुजलाने जैसा प्रतीत हुआ । कोई भी कुछ न बोला । उन्होने अपनी प्रसन्नता
न प्रकट की । मूसिल ने उनकी प्रसन्नता न देखी तो सोचा—मालूम होता है
मै बहुत तीखा बजाता हूँ । उसने मध्यम स्वर चढा मध्यम स्वर से बजाया ।
वे तब भी उपेक्षावान् ही रहे । उसने सोचा—मालूम होता है यह कुछ नही
जानते । स्वय भी कुछ न जानने वाला बन उसने वीणा के तारों को ढीला
र बजाया । उन्होने तब भी कुछ न कहा ।
मूसिल बोला—भो व्यापारियो ! क्या आप लोग मेरे वीणा-वादन से
सन्न नही होते ?
"क्या तू वीणा बजाता था ? हम तो समझते रहे कि तू वीणा को कस
रहा है ।"
"क्या तुम मुझसे बढ़कर आचार्य को जानते हो ? अथवा अपने अज्ञान
के कारण प्रसन्न नही होते हो ?"
“वाराणसी मे जिन्होने गुत्तिल गन्धर्व का वीणा-वादन सुना है उन्हें
तुम्हारा वीणा बजाना ऐसा ही लगता है जैस स्त्रियाँ बच्चो को सन्तुष्ट कर
रही हों।"
"अच्छा, तो आपने जो खर्चा दिया है उसे वापिस ले । मुझे यह नही
चाहिए । लेकिन हाँ, वाराणसी जाते समय मुझे साथ लेकर जाएँ ।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । जाते समय उसे साथ वाराणसी
ले गए । वहीं 'यह गुत्तिल का निवासस्थान है' बताकर अपने अपने घर
चले गए ।
मूसिल ने बोधिसत्व के घर में प्रवेश कर वहाँ टँगी हुई बोधिसत्व की
बहुत ही अच्छी वीणा देख उतारकर बजाई । बोधिसत्व के माता पिता
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अन्धे होने के कारण उसे न देख सके। वे समझे चूहे वीणा खा रहे हैं।
इसलिए उन्होंने कहा—सू सू चूहे वीणा खा रहे हैं।
उस समय मूसिल ने वीणा रखकर बोधिसत्त्व के माता पिता को प्रणाम
किया। उन्होंने पूछा—कहाँ से आया ?
“उज्जेनी से आचार्य के पास शिल्प सीखने आया हूँ।”
“अच्छा।”
“आचार्य कहाँ हैं ?”
“तात ! बाहर गया है। आज आ जाएगा।”
यह सुन मूसिल वहीं बैठ गया। बोधिसत्त्व के आने पर, उसके द्वारा
कुशल समाचार पूछे जा चुकने पर उसने अपने आने का कारण कहा। बोधि-
सत्त्व अङ्गविद्या के जानकार थे। वे जान गए कि यह सत्पुरुष नहीं है।
उन्होंने अस्वीकार किया—तात ! जा तेरे लिए शिल्प नहीं है।
मूसिल ने बोधिसत्त्व के माता पिता के चरण पकड़े। उन्हें अपनी सेवा
से सन्तुष्ट कर उसने उनसे याचना की कि मुझे शिल्प सिखलवा दें। बोधिसत्त्व
ने माता पिता के बारबार कहने पर उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन न कर सकने
के कारण उसे शिल्प सिखा दिया।
वह बोधिसत्त्व के साथ राजदरबार जाता। राजा ने उसे देखकर पूछा—
आचार्य ! यह कौन है ?
“महाराज !• मेरा शिष्य है।”
वह शनै शनै राजा का विश्वासी हो गया। बोधिसत्त्व ने बिना कुछ
छिपाए अपना जाना सारा शिल्प सिखाकर कहा—तात ! शिल्प समाप्त
हो गया। उसने सोचा—मैंने शिल्प सीख लिया। यह वाराणसी नगर सारे
जम्बूद्वीप में श्रेष्ठ नगर है। और आचार्य भी बूढ़े हो गए हैं। मुझे यहीं
रहना चाहिए। उसने आचार्य से कहा—आचार्य ! मैं राजा की सेवा
करूँगा। आचार्य बोला—अच्छा तात ! मैं राजा से कहूँगा। उसने राजा
से जाकर कहा—“महाराज ! हमारा शिष्य देव की सेवा में रहना चाहता है।
उसको जो देना हो, जान।”
राजा बोला—‘आपको जितना मिलता है, आपके शिष्य को उसका
आधा मिलेगा।’ उसने मूसिल को वह बात कही। मूसिल बोला—“मुझे
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"आचार्य्य ! जगल में क्यो दाखिल हुए हो ?"
"तू कौन है ?"
"मै शक्र हूँ।"
बोधिसत्त्व ने उसे 'देवराज ! मैं शिष्य के भय से जगल में दाखिल हुआ
हूँ' यह पहली गाथा कही—
सत्ततन्ति सुमधुर रामणेय्य अवाचायि,
सो म रङ्गमन्हि अव्हेति सरणम्मे होहि कोसिय ॥
अर्थ—हे देवराज ! मैने मूसिल नाम के शिष्य को सात तारो वाली सुमधुर
रमणीक वीणा जितनी मै जानता था उतनी सिखाई । अब वह मुझे रङ्गमंच
पर ललवारता है। हे कोसिय गोत्र (इन्द्र) ! तू मुझे शरण में ले।
शक्र उसकी बात सुन बोला—डरे मत । मै तुम्हारा त्राण करूँगा । मैं तुम्हें
शरण दूंगा। यह कह उसने दूसरी गाथा कही—
अह त सरण सम्म अहमाचरियपूजको,
न त जयिस्सति सिस्सो सिस्समाचरिय जेस्सति ॥
[ सौम्य ! मै तेरा शरणदाता हूँ। मै आचार्य्य की पूजा करने वाला हूँ।
शिष्य तुझे नही जीतेगा। आचार्य्य ही शिष्य को जीतेगा।]
अह त सरण मै शरण (-दाता हूँ), सहायक होकर, प्रतिष्ठा देकर त्राण
करूंगा। सम्म प्रिय वचन है। सिस्समाचरिय जेस्सति आचार्य्य ! तू वीणा
बजाता हुआ शिष्य को जीतेगा।
शक्र ने और भी कहा—"तुम वीणा बजाते हुए एक तार तोडकर छ ,
बजाना। वीणा से स्वाभाविक स्वर निकलेगा। मूसिल भी तार तोड देगा।
उसकी वीणा से स्वर न निकलेगा। उसी क्षण पराजित हो जाएगा। उसका
पराजित होना जान दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छटी और सातवी तार
भी तोड कर केवल वीणा-दण्ड ही बजाना। तार रहित खूंटियो से स्वर निकल
कर सारी बारह योजन की वाराणसी नगरी को ढक लेगा।" इतना कहकर
गुत्तिल ] ४४३
शक्र ने बोधिसत्त्व को तीन गोटियाँ दी और कहा—"सारे नगर पर वीणा
शब्द के छा जाने पर इनमें से एक गोटी आकाश में फेंकना। तुम्हारे सामने
तीनसौ अप्सराएं उतर कर नाचने लगेगी। उनके नाचने के समय दूसरी
फेंकना। दूसरी तीन सौ उतर कर वीणा के सिरे पर नाचने लगेगी। तब
तीसरी भी फेंकना। और तीन सौ उतर कर रङ्गमण्डप में नाचेंगी। मैं भी
तुम्हारे पास आऊँगा। जाएँ। डरे मत।"
बोधिसत्त्व पूर्वाह्ण समय घर गए। राजदरबार में भी मण्डप बनाकर
राजासन तैयार कर दिया गया। राजा प्रासाद से उतर सजे मण्डप में आसन
के बीच में बैठा। दस हजार अलङ्कृत स्त्रियो तथा अमात्य ब्राह्मण राष्ट्रिक
आदि ने राजा को घेर लिया। सभी नगरवासी इकट्ठे हो गए। राजाङ्गण
में चवको के साथ चक्के तथा मञ्चो के साथ मञ्च बँध गए। बोधिसत्त्व भी
स्नान करके, लेप कर, नाना प्रकार के श्रेष्ठ भोजन खा वीणा ले, अपने लिए
बिछे आसन पर बैठे। शक्र गुप्त रूप से आकाश में आकर ठहरा। केवल
बोधिसत्त्व ही उसे देख सकते थे। मूसिल भी आकर अपने आसन पर बैठा।
जनता घेर कर खडी हुई। आरम्भ में दोनो ने बराबर बराबर बजाया।
जनता ने दोनो के बजाने से सन्तुष्ट हो हजारो हर्ष-नाद किए।
शक्र ने आकाश में ठहर कर बोधिसत्त्व को ही सुनाते हुए कहा—एक
तार तोड दें। बोधिसत्त्व ने भ्रमर-तार तोड दी। वह टूटने पर भी टूटे हुए
सिरे से स्वर देती थी। देवगन्धर्व का सा स्वर निकलता था। मूसिल ने भी
तार तोड दी। उसमे से स्वर न निकला। आचार्य ने दूसरी—तीसरी करके
सातो तारे तोड दी। केवल दण्डे को बजाने से जो स्वर निकला उसने सारे
नगर को छा लिया। हजारो वस्त्र फेंके गए तथा हजारो हर्षनाद हुए। बोधि-
सत्त्व ने एक गोटी आकाश में फेंकी। तीन सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने
लगी। इस प्रकार दूसरी और तीसरी गोटी के फेंकने पर जैसे कहा गया उसी
तरह नौ सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगीं।
उस समय राजा ने जनता को इशारा किया। जनता ने उठकर 'तू
आचार्य से विरोध कर उसकी बराबरी का प्रयत्न करता है। अपनी सामर्थ्य
नही देखता' कहते हुए मूसिल को डरा, जो जो हाथ में आया पत्थर डण्डे आदि
से चूर चूर कर, जान मार पैरो से पकड कूडे के ढेर पर फेक दिया। राजा
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ने सन्तुष्ट हो घनी वर्षा बरसाते हुए की तरह बोधिसत्त्व को बहुत धन दिया।
नगरवासियो ने भी वैसे ही किया।
शक्र ने भी उससे विदा लेते हुए कहा—"पण्डित ! मैं सहस्र घोड़ो वाले
आजानीय रथ के साथ मातली को भेजूंगा। तू सहस्र घोड़ो वाले श्रेष्ठ वैजयन्त
रथ पर चढ़कर देवलोक आना।" उसके वहाँ जाकर पाण्डुकम्बलशिलातल
पर बैठने पर देवकन्याओ ने पूछा—महाराज ! वहाँ गए थे ? शक्र ने उनको
यह बात विस्तार से बनाई और बोधिसत्त्व के सदाचार तथा प्रज्ञा की प्रशंसा
की। देवकन्याएँ बोली—महाराज ! हम आचार्य्य को देखना चाहती हैं।
उसे यहाँ लाएं।
शक्र ने मातली को बुला कर कहा—तात ! देवप्सराएँ गुत्तिल गन्धर्व
को देखना चाहती हैं। जा उसे वैजयन्त रथ में बिठाकर ला। उसने 'अच्छा'
कहा और जाकर बोधिसत्त्व को ले आया। शक्र ने बोधिसत्त्व का कुशल क्षेम
पूछ कहा—आचार्य्य ! देवकन्याएँ तुम्हारा गन्धर्व सुनना चाहती है।
"महाराज ! हम गन्धर्व लोग शिल्प से ही जीविका चलाते हैं। मूल्य
मिले तो गाऊँगा।"
"बजाएँ। मै तुम्हे मूल्य दूंगा।"
"मुझे और मूल्य की जरूरत नहीं। यह देवकन्याएँ अपना अपना सुकृत
कहें। ऐसा होने से मैं बजाऊँगा।"
देवकन्याएँ बोली—"आचार्य्य ! हम अपने किए सुकृत पीछे सन्तुष्ट
होकर कहेंगी। गन्धर्व करे।"
बोधिसत्व ने सप्ताह पर्य्यन्त देवताओ को गन्धर्व सुनाया। वह दिव्य-
वाद्य से भी बढ़ गया। सातवे दिन आरम्भ से देवकन्याओ का सुकृत पूछा।
काश्यप बुद्ध के समय एक भिक्षु को उत्तम वस्त्र देकर शक्र की परिचारिका
होकर उत्पन्न हुई, हजारो अप्सराओ से घिरी एक उत्तम देवकन्या से पूछा—
तू पूर्व जन्म में क्या कर्म करके (यहाँ) उत्पन्न हुई ?
उससे पूछा गया प्रश्न तथा उसका उत्तर विमानवत्थु¹ में आया है।
वहाँ कहा है—
¹खुद्दक निकाय का एक ग्रन्थ।
गुत्तित ] ४४५
"अभिक्कन्तेन वण्णेन या त्वं तिट्ठसि देवते,
ओभासेन्ती दिसा सब्बा ओसधी विय तारका ॥
केन ते तादिसो वण्णो केन ते इध मिज्झति,
उप्पज्जन्ति च ते भोगा ये केचि मनसो पिया ॥
पुच्छामि तं देवि महानुभावे
मनुस्सभूता किमकासि पुञ्ञं,
येनासि एवं जलितानुभावा
वण्णो च ते सब्बदिसा पभासति ॥"
[ हे देवते ! यह जो तेरा कान्तिपूर्ण वर्ण है, यह जो सारी दिशाएँ इस
प्रकार प्रकाशित है जैसे ओषधी तारा हो, सो यह तेरा ऐसा वर्ण किस कारण से
है ? तू किस कारण से यहाँ ऋद्धिमान् है ? जो भोग तुझे प्यारे लगते हों, वह
किस कारण से प्राप्त होते हैं ? हे महानुभाव देवि ! मैं तुझसे पूछता हूँ कि
मनुष्य योनि में तूने क्या पुण्य कर्म किया ? जिस कर्म के प्रभाव से तू प्रज्वलित
अनुभाव की है ? और तेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है । ]
"वत्थुत्तमदायिका नारी पवरा होति नरेसु नारिसु,
एवं पियरूपदायिका मनापं दिब्बं सा लभते उपेच्च ठानं ॥
पस्स मे पस्स विमानं अच्छरा कामवण्णिनीहमस्मि,
अच्छरासहस्सानं पवरा पस्स पुञ्ञानं विपाकं ॥
तेन मेतादिसो वण्णो तेन मे इध मिज्झति,
उप्पज्जन्ति च मे भोगा ये केचि मनसो पिया,
तेनम्हि एवं जलितानुभावा
वण्णो च मे सब्बदिसा पभासति ॥
[ उत्तम वस्त्र देने वाली नारी नरों में और नारियों में श्रेष्ठ होती है।
इस प्रकार प्रिय रूप देने वाली वह (नारी) मरकर सुन्दर दिव्य स्थान को
प्राप्त करती है। मेरे विमान को देखो। मैं इच्छित रूप धारण करने वाली
अप्सरा हूँ। मैं हजार अप्सराओं में श्रेष्ठ हूँ। यह पुण्य का फल है, देखो।
इसीसे मेरा ऐसा वर्ण है। इसीसे मैं ऋद्धिमान् हूँ। इसीसे मन को जो प्यारे
लगते हैं ऐसे भोग मुझे प्राप्त होते हैं। उसीसे मैं प्रज्वलित अनुभाव वाली हूँ।
उसीसे मेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है।]
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दूसरी ने भिक्षा मांगते हुए भिक्षु को पूजने के लिए पुष्प दिए। दूसरी
ने चैत्य में पञ्चाङ्गुलि चिह्न लगाने के लिए सुगन्धि दी। दूसरी ने मधुर
फलमूल दिए। दूसरी ने उत्तम रस दिया। दूसरी ने काश्यप बुद्ध के चैत्य पर
सुगन्धित पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाया। दूसरी ने रास्ते चलते भिक्षुओं तथा
भिक्षुणियों के घर में वास ग्रहण करने पर धर्म सुना। दूसरी ने नौका में बैठ
भोजन किए भिक्षु को पानी में खड़े हो पानी दिया। दूसरी ने गृहस्थ में रह
क्रोधरहित चित्त से सास ससुर की सेवा की। दूसरी ने अपने को मिले हिस्से
में से भी बाँट कर ही खाया और शीलवान् रही। दूसरी ने पराए घर में दासी
होकर क्रोध रहित मान रहित रह अपने हिस्से को बाँट कर खाया। इसीसे
वह देवराज की परिचारिका होकर पैदा हुई।
इस प्रकार गुत्तिलविमानवत्थु में आई सैंतीस देवकन्याओं ने जो जो कर्म
करके वहाँ जन्म ग्रहण किया वह सब बोधिसत्त्व ने पूछा। उन सब ने भी अपना
कर्म गाथाओं में ही कहा। यह सुन बोधिसत्त्व ने कहा—"मुझे बड़ा लाभ
हुआ। मुझे बड़ी प्राप्ति हुई। मैंने यह जो यहाँ आकर अल्पमात्र कर्म से भी
प्राप्त सम्पत्तियों की बात सुनी। अब यहाँ से मैं मनुष्यलोक जाकर दानादि
कुशल कर्म ही करूँगा।" यह कह उसने यह हर्ष वाक्य कहा—
स्वागतं वत मे अज्ज सुप्पभात सुवुद्वितं,
य अद्दसासि देवतार्यो अच्छरा कामवण्णियो ॥
इमासाह धम्म सुत्वान काहामि कुसलं बहुं,
दानेन समचरियाय सञ्जमेन दमेन च;
सोहं तत्थ गमिस्सामि यत्थ गन्त्वा न सोचरे ॥
[आज मेरा आना शुभ है। आज का प्रभात शुभ है। आज का उठना
शुभ है। आज मैंने इच्छित रूप धारण कर सकने वाली अप्सरा देवियों को देख
लिया। इनसे धर्म सुनकर मैं बहुत कुशल कर्म करूँगा। दान से, समचर्या
से तथा संयम के प्रताप से मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ जाकर आदमी सोचता नहीं है।]
सप्ताह के बाद देवराज ने मातली सारथी को आज्ञा दे बोधिसत्त्व को
रथ पर बिठा बाराणसी ही भेज दिया। उसने बाराणसी पहुँच देवलोक में
जो देखा था वह मनुष्यों को बताया। उस समय से मनुष्यों ने उत्साहपूर्वक
पुण्य-कर्म करना स्वीकार किया।