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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

क. वर्तमान कथा

सुहनु ] १७३
क. वर्तमान कथा
उस समय जेतवन में भी एक उद्दण्ड, कठोर, दुस्साहसी भिक्षु था और
एक दूसरा देहात (= जनपद) में भी था ।
एक दिन देहात का भिक्षु किसी काम से जेतवन गया । श्रामणेर और
छोटी आयु के भिक्षु उसके चण्ड-स्वभाव की बात जानते थे । उन्होने दोनो
उद्दण्ड भिक्षुओं का झगडा देखने की इच्छा से कुतूहलवश उस भिक्षु को जेतवन
वासी भिक्षु के परिवेण में भेज दिया ।
दोनो उद्दण्ड भिक्षु एक दूसरे को देखते ही परस्पर एक हो गए, मित्र बन
गए । वह एक दूसरे के हाथ, पैर, पीठ दबाना आदि करने लगे ।
भिक्षुओ ने धर्म सभा मे बात चलाई—"भिक्षुओ ! उद्दण्ड भिक्षु दूसरो
के प्रति तो बड़े उद्दण्ड हैं, कठोर है तथा दुस्साहसी है लेकिन दोनो परस्पर
एक हो गए, मेल कर लिया, प्रेमी बन गए ।"
शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बात चीत कर
रहे हो ?'
"अमुक बातचीत ।"
"भिक्षुओ ! केवल अभी नही पहले भी यह औरो के प्रति तो उद्दण्ड,
कठोर तथा दुस्साहसी थे लेकिन दोनो परस्पर एक हो गए थे, मेल से रहते थे
तथा प्रेमी थे ।
इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उस राजा के सर्वार्थसाधक आमात्य हुए। वे उसे अर्थ तथा धर्म की बातो में
सलाह देते थे । वह राजा थोडा लोभी स्वभाव का था । उसके यहाँ महासोण
नाम का एक दुष्ट घोडा था ।
गान्धार (= उत्तरापथ) देश के घोडो के व्यापारी पाँच सौ घोडे लाए ।
राजा को घोडो के आने की खबर दी गई ।
पहले बोधिसत्त्व घोडो की कीमत लगा उसे कम न कर दिलवाते थे ।

१७४ [ २-१.१५८
राजा को उससे संतोप न होता था। इस लिए उसने दूसरे धामात्य को बुलाकर
कहा—"तात ! तू घोडो की कीमत लगा । लेकिन कीमत लगाने से पहले
महासोण को ऐसा कर कि वह इन घोडो में जाकर उन्हें काट कर जख्मी कर
दे । जब ये दुर्बल हो जायें और उनका मूल्य घट जाए, तब उनकी कीमत
लगाना।"
उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर वैसा ही किया । घोड़ो के व्यापारियो ने,
असन्तुष्ट हो, उसने जो किया वह बोधिसत्त्व से कहा ।
बोधिसत्त्व ने पूछा—"क्या तुम्हारे नगर में दुष्ट घोड़ा नही है ?"
"स्वामी ! सुहनु नाम का दुष्ट, चण्ड, कडे स्वभाव का घोड़ा है।"
"अच्छा तो फिर आते समय उस घोड़े को लेते आना।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । फिर आते समय उस घोड़े को
साथ लिवाकर आए ।
राजा ने सुना कि घोडो के व्यापारी आए । उसने खिडकी खोलकर
घोड़ो को देखा और महासोण को छुड़वा दिया । घोड़ो के व्यापारियो ने भी
महासोण को आते देख सुहनु को छोड़ा । वे दोनो पास आने पर एक दूसरे का
शरीर चाटने लगे । राजा ने बोधिसत्त्व से पूछा—"मित्र ! यह दो घोड़े
दूसरों के प्रति चण्ड हैं, कडे स्वभाव के हैं, दुस्साहसी हैं । दूसरे घोड़ो को
काट कर रोगी कर देते हैं। लेकिन एक दूसरे के शरीर को चाटते हुए आनन्द-
पूर्वक खड़े हैं। यह क्या बात है ?"
बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया, "महाराज ! यह परस्पर विरोधी स्वभाव
के नही हैं, समान स्वभाव के हैं, समान धातु के हैं" और यह दो गाथाएँ कहीँ—
नयिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह,
सुहनूंपि सादिसोयेव यो सोणस्स स गोचरो ॥
पक्खन्दिना पलब्भेन निच्चं सन्दान खादिना,
समेति पापं पापेन समेति असत्ता अस ॥
[ सुहनु और सोण का स्वभाव विरोधी नही है । जैसा सुहनु है, वैसा ही
सोण । उछल-कूद करने वाले, प्रगल्भ तथा हमेशा लगाम खा जाने वाले
इस घोड़े का पापकर्म और असत्कर्म दूसरे के बराबर हैं] ।

सुहनु ] १७५
यदपिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह, यह जो सुहनु दुष्ट घोडा सोण
के साथ प्रेम करता है, यह अपने विरुद्ध स्वभाव वाले के साथ नहीं। यह अपने
समान शील वाल के ही साथ करता है। यह दोनो दुष्ट स्वभाव वाले होने से
समान स्वभाव वाले या समान धातु वाले हैं। सुहनू'पि तादिसोयेव यो
सोणस्स सगोचरो, जैसा सोण सुहनु भी वैसा ही। यो सोणस्स सगोचरो, जो
सोण की चरने की जगह है, वही उसकी भी। जैसे सोण अश्व-गोचर है अश्वो
को काटता हुआ ही चरता है, उसी तरह सुहनु भी। इस प्रकार उनकी समान
गोचरता प्रदर्शित की गई है। उनके आचरण की एकता दिखाने के लिए
पक्खन्दिना आदि कहा गया है।
पक्खन्दिना, अश्वो के ऊपर कूद पडने के स्वभाव वाला। पगलब्भेन, काय-
प्रगल्भता आदि दुश्शीलता से युक्त। निच्च संदानखादिना, हमेशा अपनी लगाम
खा जाने की आदत वाले से। समेति पाप पापेन, इन दोनो में से एक का पाप,
दुष्टता दूसरे के बराबर है। असन्ता अस इन दोनो मे से एक दुष्ट दुराचारी
के साथ दूसरे का अस बुरा काम बराबरी करता है। जैसे गूंह आदि के साथ
गूंह आदि मिल जाता है, कोई अन्तर नही रहता, वैसा ही।
इतना कहकर बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया—'महाराज !
राजा को अधिक लोभी नही होना चाहिए। दूसरो का धन नष्ट करना उचित
नही।' फिर घोडो की कीमत लगवा उचित मूल्य दिलवाया।
घोडो के व्यापारी यथोचित मूल्य पाकर सतुष्ट लौटे। राजा भी बोधि-
सत्त्व के उपदेशानुसार रह कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय दो घोड यह दो दुष्ट भिक्षु थे। राजा आनन्द था। पण्डित
थामात्य तो में ही था।

मोर ] १७७
पर्वत-शृंखला में एक दण्डक-हिरण्य पर्वत के नीचे रहना शुरू किया। रात्रि का
प्रभात होने पर वह पर्वत के शिखर पर बैठ, उगते सूर्य्य को देख अपने घूमने
फिरने की जगह को सुरक्षित करने के लिए ब्रह्म (महान्-) मन्त्र बनाता हुआ
यह कहता—
उदेतयं चक्खुमा एकराजा
हरिस्सवण्णो पठविप्पभासो
तं तं नमस्सामि हरिस्सवण्णं पठविप्पभासं
तयज्ज गुत्ता विहरेमु दिवसं ॥
[ यह चक्षुमान एक राजा जिसका रंग सुनहरी है और जो पृथ्वी को प्रका-
शित करता है उदय हो रहा है। मैं इस पृथ्वी को प्रकाशित करने वाले, सुवर्ण
वर्ण को नमस्कार करता हूँ। आज इसके द्वारा रक्षित होकर दिन में घूमें।]
उदेति, प्राचीन लोकधातु से ऊपर उठता है। चक्खुमा, सारे ब्रह्माण्ड
के निवासियो के अन्धकार को दूर कर आँख प्राप्त कराने से वह जिस आँख
का देने वाला हुआ उसी आँख वाला होने से चक्खुमा। एकराजा, सारे चक्रवाल
में प्रकाश फैलाने वालो में सर्वश्रेष्ठ होने से एकराजा। हरिसवण्णो, हरि जैसा
रंग, अर्थात् स्वर्ण वर्ण। पठवि को प्रकाशित करता है, इस लिए पठविप्प-
भासो। तं तं नमस्सामि, इसलिए ऐसे उन्हें नमस्कार करता हूँ, वन्दना करता
हूँ। तयज्जगुत्ता विहरेमु दिवस, उससे सुरक्षित होकर, उसकी हिफाजत में
हम आज का दिन सुखपूर्वक उठ बैठ चल फिर कर गुजारें।
इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से सूर्य्य को नमस्कार कर इस दूसरी
गाथा से अतीत काल के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्धो तथा बुद्ध-गुणो को
स्मरण करते—
ये ब्राह्मणा वेदगु सब्ब धम्मे
ते मे नमो ते च मं पालयन्तु
नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया
नमो विमुत्तानं नमो विमुत्तिया
इमं सो परित्तं कत्वा मोरो चरति एसना ॥
१२

१७८ [ २-१.१५६
[ जो ब्राह्मण सब धर्मों के जानने वाले हैं, उन्हें मेरा नमस्कार है। वे
मेरी रक्षा करें। बुद्धो को नमस्कार है। बोधि को नमस्कार है। विमुक्तो
को नमस्कार है। विमुक्ति को नमस्कार है—वह मोर इसे अपनी रक्षा
(का साधन) बना खोजता रहता था।]
ये ब्राह्मणा, जिन्होंने पापो को बहा दिया हैं, जो विशुद्ध होने से ब्राह्मण
कहे गए हैं। वेदगु, जो वेद के पार गए वह भी वेदगु और वेद द्वारा जो पार
गए वह भी वेदगु। यहाँ मतलब है कि जितने सस्कृत असस्कृत धर्म हैं उन सभी
को प्रकट करके गए इस लिए वेदगु। तभी कहा गया है—सब्ब धम्मे।
सब स्कन्ध, आयतन, धातु, धर्मों को स्वलक्षण तथा सामान्य लक्षण की दृष्टि
से अपने ज्ञान को प्रकट करके गए अथवा तीनो मारो के मस्तक को मर्दित कर
दस सहस्र लोकधातु को उन्नादित कर बोधि-वृक्ष के नीचे सम्यक् सम्बुद्धत्व
प्राप्त कर ससार के पार पहुँचे। ते मे नमो, वे मेरे इस नमस्कार को स्वीकार
करें। ते च म पालयन्तु इस प्रकार मुझसे नमस्कृत वे भगवान् मेरी पालना
करें, रक्षा करें, हिफाजत करें। नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया नमो विमुत्तानं
नमो विमुत्तिया, यह मेरा नमस्कार अतीत में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्धो
को पहुँचे, उन्ही की चार मार्गो तथा चार फलो का ज्ञान स्वरूप जो बोधि है
उस बोधि को पहुँचे, उन्हीं की अर्हत्व-फल रूपी विमुक्ति को प्राप्त करने वाले
विमुक्तो को पहुंचे, जो उनकी पाँच प्रकार की विमुक्ति है अर्थात् तदङ्ग विमुक्ति
विक्खम्भन विमुक्ति, समुच्छेद विमुक्ति, पटिप्पस्सद्ध विमुक्ति, तथा निस्सरण
विमुक्ति; उस विमुक्ति को भी पहुँचे। इम सो परित्तं कत्वा मोरो चरति
एसना, यह दो पद शास्ता ने बुद्धत्व प्राप्त करके कहे। इनका अर्थ है 'भिक्षुओ
वह मोर इसे परित्राण बना, उसे रक्षा का साधन बना अपनी गोचर-भूमि में
फल-फूल के लिए नाना प्रकार से खोजता फिरता था।'
इस प्रकार दिन भर घूम कर शाम को पर्वत के शिखर पर बैठ डूबते हुए
सूर्य्य को देख बुद्धगुणो का ध्यान कर निवास-स्थान की रक्षा के लिए फिर ब्रह्म-
मन्त्र बाँधता हुआ 'अपेतय' आदि कहता—

मोर ] १७६
अपेतयं चक्खुमा एकराजा
हरिस्सवण्णो पठविप्पभासो
तं तं नमस्सामि हरिस्सवण्णं पठविप्पभास
तयज्ज गुत्ता विहरेमु रत्तिं ॥
ये ब्राह्मणा वेदगु सब्ब धम्मे
ते मे नमो ते च मं पालयन्तु
नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया
नमो विमुत्तानं नमो विमुत्तिया
इमं सो परित्तं कत्वा मोरो वासमकप्पयि ॥
[ये ....अस्त हो रहा है। इसे रक्षा (का साधन) बना वह मोर
रहने को गया]।
अपेति, जाता है, अस्त को प्राप्त होता है। इमं सो परित्तं कत्वा मोरो
वासमकप्पयि, यह भी बुद्धत्व प्राप्त करने पर कहा। इसका अर्थ है—
भिक्षुओ ! वह मोर इसे परित्राण बना, इसे रक्षा (का साधन) बना, अपने
निवासस्थान पर रहने लगा। इस परित्राण के प्रताप से उसे न दिन में डर
लगा न रात में, न रोमान्च हुआ।
उस समय बाराणसी से कुछ ही दूर पर शिकारियों का एक गांव था।
वहाँ के निवासी एक शिकारी ने हिमालय-प्रदेश में घूमते हुए उस दण्डक-हिरण्य
पर्वत पर बैठे हुए बोधिसत्व को देख आकर पुत्र को कहा।
बाराणसी-नरेश की खेमा नामक देवी ने स्वप्न में देखा कि सुनहरी रंग का
मोर धर्मोपदेश कर रहा है। उसने राजा से कहा—"देव ! मैं सुनहरी रंग
के मोर से धर्मोपदेश सुनना चाहती हूँ।"
राजा ने आमात्यों से पूछा। आमात्य बोले—ब्राह्मण जानते होंगे।
ब्राह्मणों ने कहा—सुनहरी रंग के मोर होते हैं। "कहाँ होते हैं" ? पूछने
पर बोले—"शिकारी जानते होंगे।"
राजा ने शिकारियों को इकट्ठा कर पूछा। वह शिकारी-पुत्र बोला—

१८० [ २.१.१५६
"महाराज ! हाँ । दण्डक हिरण्य नाम का पर्वत है । वहाँ सुनहरी रंग का
मोर रहता है ।"
"तो उसे बिना मारे, जीवित ही बांध कर लाओ ।"
शिकारी ने जाकर उसके घूमने की भूमि पर जाल फैलाया । मोर के
आने की जगह पर भी जाल न फसा । शिकारी उसे न पकड़ सका । सात साल
घूमते रह कर वह वही मर गया ।
खेमा देवी की भी इच्छा पूरी न हुई । वह भी मर गई ।
राजा को क्रोध आया कि मोर के कारण मेरी रानी की जान गई । उसने
एक सोने के पट्टे पर लिखाया—"हिमालय प्रदेश मे दण्डक-हिरण्य नाम का
पर्वत है । वहाँ सुनहरी रंग का मोर रहता है । जो उसका मांस खाते हैं वह
अजर अमर हो जाते हैं।" उस सोने के पट्टे को उसने एक सन्दूकची में रखवा
दिया ।
उसके मरने पर दूसरे राजा ने उस स्वर्ण-पट्टे को पढकर अजर अमर होने
को इच्छा से दूसरे शिकारी को भेजा । वह भी जाकर बोधिसत्व को न पकड़
सका । वही मर गया । इस प्रकार छह राज-पीडियां गई ।
सातवें राजा ने राज्य पाकर एक शिकारी को भेजा । उसने जाकर देखा
कि बोधिसत्त्व की चलने फिरन की जगह पर भी फंदा नही लगता । वह
समझ गया कि अपनी रक्षा करके ही मोर चरने आता है । वह देहात में आया
और वहाँ से एक मोरनी ले, उसे ऐसी शिक्षा दी कि वह ताली बजाने पर
नाचने लगती और चुटकी बजाने पर आवाज लगाती । ऐसा सिखा कर वह
मोरनी को लेकर गया । प्रात काल ही जब अभी मोर ने परित्राण द्वारा अपने
को रक्षित नही किया था उसने फंदे के खूंटे गाड फंदा फैला मोरनी से आवाज
लगवाई । मोर ने जब मोरनी का असाधारण शब्द सुना तो कामासक्त हो
परित्राण न कर सकने के कारण जाकर फंदे में फँस गया ।
शिकारी ने उसे पकड ले जाकर वाराणसी के राजा को दिया । राजा ने
उसका सौंदर्य देख प्रसन्न हो उसे आसन दिलाया ।
बोधिसत्व ने बिछे आसन पर बैठ, पूछा—"महाराज ! मुझे क्यो
पकड़वाया ?"
"जो तेरा मांस खाते हैं, वह अजर अमर हो जाते है । मैंने तेरा मांस

मोर ] १८१
खाकर अजर अमर होने की इच्छा से तुझे पकड़वाया है ?"
"महाराज ! मेरा मास खाने वाले तो अमर हो, और मुझे मरना होगा ?"
"हाँ, मरना होगा ।"
"जब मैं मरूँगा, तो मेरा मास खाने वाले किस लिए नहीं मरेंगे ?"
"तू सुनहरी रंग का है, इसलिए तेरा मास खाने वाले अजर अमर होंगे।"
"महाराज ! मैं यूँ ही सुनहरी रंग का पैदा नहीं हुआ हूँ । पहले मैं
इसी नगर में चक्रवर्ती राजा था । मैने अपने आप भी पांच शीलो की रक्षा की
और सारे चक्रवाल के निवासियो से भी करवाई । मर कर मैं त्रयोत्रिंश लोक
म पैदा हुआ । वहाँ आयु भर रह कर एक दूसरे पापकर्म के फलस्वरूप मोर
होकर पैदा हुआ, लेकिन पुराने सदाचार के प्रताप से सुनहरी रंग का
हुआ ।"
"तू चक्रवर्ती होकर (पच-) शील की रक्षा कर उसी के फलस्वरूप सुन-
हरी रंग का हुआ, इस बात पर हम कैसे विश्वास करें ? तेरा कोई साक्षी है ?"
"महाराज ! है ।"
"कौन है ?"
"महाराज ! जब मैं चक्रवर्ती था, तो रत्नमय रथ में बैठ कर आकाश
में विचरता था । वह मेरा रथ मङ्गल-पुष्करिणी के अन्दर जमीन में गड़वाया
हुआ है । उसे मङ्गल पुष्करिणी से निकलवाये । वह रथ मेरे कथन का साक्षी
होगा ।"
राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार कर पुष्करिणी मे से पानी निकलवा रथ
को बाहर करवाया । तब उसे बोधिसत्त्व की बात पर विश्वास हुआ ।
बोधिसत्त्व ने राजा को धर्म उपदेश दिया—"महाराज ! अमृत महा
निर्वाण को छोड़ शेष जितने भी सस्कृत धर्म हैं, वे सब पैदा होकर अभाव को
प्राप्त होते हैं, अनित्य हैं, क्षय होने वाले हैं, व्यय होने वाले हैं।" फिर राजा
को पच-शील में प्रतिष्ठित किया ।
राजा ने प्रसन्न हो बोधिसत्त्व की राज्य से पूजा की और बड़ा सत्कार
किया । उसने राज्य राजा को ही वापिस लौटा कुछ दिन रह कर राजा को
उपदेश दिया कि महाराज ! अप्रमादी रह ।
फिर आकाश में उड़कर दण्डक हिरण्य नाम के पर्वत को ही चला गया।