जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२१४. पुण्णनदी जातक
पुण्णनदी ] ३४७
मैं उस समय में ज्येष्ठ ऋषि था।
राजा ने तथागत के भोजन करके चले जाने पर आदमियों को भेज कर
तैर्थिकों का आश्रम विध्वंस करा दिया। तैर्थिक अप्रतिष्ठित हो गए।
२१४. पुण्णनदी जातक
"पुण्णं नदि...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय प्रज्ञा
पारमिता के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन धर्मसभा में भिक्षुओं ने तथागत की प्रज्ञा के बारे में बातचीत
चलाई—आयुष्मन्तो ! सम्यक् सम्बुद्ध महाप्रज्ञा हैं, विस्तृतप्रज्ञा हैं, प्रसन्न-
प्रज्ञा हैं, क्षिप्र-प्रज्ञा हैं, तीक्ष्ण प्रज्ञा हैं, उनकी प्रज्ञा बींधने वाली है, वे उपाय-
कुशल हैं। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ ! यहाँ बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, तथागत केवल अभी प्रज्ञावान्
तथा उपायकुशल नहीं हैं, पहले भी थे' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
पुरोहित-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा सब शिल्प सीख पिता
के मरने पर पुरोहित का पद पा राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए।
आगे चलकर राजा ने चुगली करने वालों की बात का विश्वास कर
क्रोधित हो बोधिसत्त्व को 'मेरे पास मत रह' कह निकाल दिया। बोधिसत्त्व
स्त्री-बच्चों को ले काशी के एक गामड़े में रहने लगे। फिर राजा को बोधि-
३४८ [ २.७.२१४
सत्य के गुणो की याद आई। उसने सोचा कि किसीको भेजकर मेरे लिए
आचाय्यं को बुलाना ठीक नही। एक गाथा रच, पत्र लिख, कौवे का मास
पकवा, सफेद वस्त्र से लपेट, राजकीय मोहर लगाकर भेजूंगा। यदि पण्डित
होगा, पत्र पढ कर कौवे के मास का भाव समझ कर चला आएगा। नहीं,
तो नही आएगा। उसने यह गाथा पत्र में लिखी—
पुण्णं नदि येन च पेय्यमाहु,
जातं यवं येन च गुह्यमाहु ॥
दूरं गतं येन च अब्भपन्ति,
सो त्यागतो हन्द च भुञ्ज ब्राह्मण ॥
[ जिसके पीने योग्य होने से नदी पूर्ण समझी जाती है, जिसको छिपा
रखने योग्य होने से जौ उत्पन्न हुए समझे जाते हैं; जिसके बोलने से दूर गए
आने वाले समझे जाते हैं; वह तेरे लिए आया है। ब्राह्मण ! इसे खा।]
पुण्ण नदि येन च पेय्यामाहु, 'काकपेय्य नदी' कहते हुए पूर्ण नदी को ही
पेय्य कहते है। अपूर्ण नदी काकपेय्य नदी नही कहलाती; जब नदी किनारे
खड़े हो गरदन पसार कर कौआ पी सकता है, तभी उसे काकपेय्य कहते हैं।
जातं यवं येन च गुह्यमाहु, जो शीर्षक मात्र है। यहाँ सभी पैदा हुई, उत्पन्न
हुई, तरुण खेती से मतलब है। वह जब अन्दर दाखिल हुए कौवे को छिपा
सकती है तभी गोपन करने वाली होने से गुह्य कहलाती है। किसे छिपाती
है ? कौवे को। इस प्रकार कौवे को छिपाने से काकगुह्य। काक-गुह्य कहने
वाले (लोग) गुह्य-वचन का कारण कौवा होता है इसलिए काक-गुह्य कहते हैं।
इसीलिए कहा है—येन च गुह्यमाहु । दूरं गतं येन च अब्भहन्ति दूर गया हुआ
प्रवासी प्रिय जन होने पर; जिसके आकर बैठने पर (लोग) कहते हैं कि यदि
अमुक नाम का व्यक्ति आने वाला है तो कौवे बोल अथवा जिसके बोलने पर
लोग समझते हे क्योकि कौवा बोलता है, इसलिए अमुक नाम का व्यक्ति
आएगा; इस तरह कहने वाले जिसके कारण कहते हैं, विचार करते हैं,
व्यक्त करते हैं। सो त्यागतो वह तेरे लिए लाया गया है। हन्द च भुञ्ज
ब्राह्मण, ब्राह्मण ग्रहण कर, खा ! मतलब इस कौवे के मास को खा।
कच्छप ] : ३४५
इस प्रकार राजा ने दूसरे पत्र में लिख बोधिसत्व के पास भेजा। उसने
पत्र बाँच 'राजा मुझे देखना चाहता है' यह दूसरी गाथा लिखी—
यतो मं सरती राजा वायसम्पित पेहेतवे,
हंसा क्रोञ्चा मयूरा च असतिम्येव पापिया ॥
[ जब राजा कौवे का मांस पाकर भी मुझे भेजना याद रखता है, तो हंस,
क्रोञ्च और मयूर की तो बात ही क्या ? याद न आना ही बुरा है। ]
यतो मं सरति राजा वायसम्पित पहेतवे जब राजा कौवे का मास पाकर
भी मुझे उसे भेजना याद रखता है। हंसा क्रोञ्चामयूरा च, जब इसके लिए
इस आदि लाए जाएँगे, यह हंसमांस आदि पाएगा, तब मुझे क्यो न याद करेगा ?
अट्ठकथा मे हंसारोञ्चमयूरानं पाठ है। यह सुन्दरतर है। अर्थ यही है कि
इन हंस आदि का मास पाकर मुझे क्यो न याद करेगा ? असतिम्येव पापिया
यह या वह मिलने पर याद आना ही अच्छा है। दुनिया मे याद न आना ही
बुरा है, याद न करना ही हीन है, खराब है। यह हमारे राजा में नहीं है।
राजा मुझे याद करता है। मेरे आने की प्रतीक्षा करता है। इसलिए जाऊँगा।
गाड़ी जुड़वा, जाकर राजा को देखा। राजा ने सन्तुष्ट हो पुरोहित का
ही पद दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा
आनन्द था। पुरोहित मैं ही था।
२१५. कच्छप जातक
"अवधी वत अत्तानं.." यह शास्ता ने जेतवन मे रहने समय कोकालिय
के बारे में कही।