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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

गरुड़ पुराण अठारह महापुराणों में से एक है। गीताप्रेस के निवेदन के अनुसार इसके अधिष्ठाता देव भगवान् विष्णु हैं, इसलिए यह वैष्णव पुराण माना जाता है। हिन्दू समाज में इसका प्रेतकल्प भाग मृत्यु के बाद के दिनों में सुनाया जाता है, पर पूरा पुराण इससे कहीं अधिक विस्तृत है।

यह गीताप्रेस, गोरखपुर का 'संक्षिप्त गरुडपुराण' है, जो सचित्र, मोटे टाइप में और केवल हिन्दी में है (पुस्तक संख्या ११८९)। इसके दो भाग हैं। पूर्वखण्ड आचारकाण्ड में सृष्टि-वर्णन, ध्रुव-वंश और दक्ष की कन्याओं की सन्तति, विष्णु-पूजा की विधियाँ, विष्णुपञ्जर स्तोत्र, ध्यान-योग, विष्णुसहस्रनाम, मृत्युञ्जय मन्त्र की महिमा, शिव, त्रिपुरा, गणेश, गोपाल, सुदर्शन चक्र और हयग्रीव की पूजा, सर्प-विष दूर करने के मन्त्र तथा गायत्री-न्यास और सन्ध्या-विधि जैसे विषय हैं। उत्तरखण्ड धर्मकाण्ड का प्रेतकल्प मृत्यु, जीव की परलोक-यात्रा और श्राद्ध आदि कर्मों का वर्णन करता है।

स्कैन की गई प्रति संवत् २०७६ का बत्तीसवाँ पुनर्मुद्रण है। ६३४ पृष्ठों और सैकड़ों अध्याय-शीर्षकों वाला यह संस्करण उन पाठकों के लिए है जो संस्कृत के बिना पूरा पुराण सरल हिन्दी में पढ़ना चाहते हैं।

६२४संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्मकाण्ड ]

आनन्दावेशमें वह नाचने लगी। जाम्बवतीके उस नृत्यसे सारा ब्रह्माण्ड रस-विभोर हो उठा। स्वर्गसे अप्सराएँ उतर आयीं और जाम्बवतीके अगल-बगलमें नाचने लगीं। देवताओंने दुंदुभी बजायी और आकाशसे पुष्पकी वृष्टि की।

इसी प्रकार भगवान्‌के प्रेममें आह्लादित होते हुए जाम्बवतीकी तीर्थयात्रा चलती रही। गुरु जैगीषव्यने भगवान् वेंकटेशका माहात्म्य उसे सुनाया। स्वामिपुष्करिणी तीर्थ, जहाँ श्रीनिवास सदा विराजमान रहते हैं*—का इतिहास बतलाया। जिसे सुनकर वह आनन्दसे भर गयी, श्रीनिवासके प्रति उसका अनुराग बढ़ता ही गया। गुरुद्वारा बताये गये वेंकटाद्रिके सभी तीर्थोंका जाम्बवतीने बड़े ही भावसे सेवन किया। अन्तमें वह ऋषितीर्थ पहुँची। सप्तर्षियोंसे सेवित उस पुण्य-पवित्र ऋषितीर्थमें उसका मन रम गया, वह वहीं रुक गयी। दीर्घ समयतक उसने वहाँ तपका अनुष्ठान किया।

हे पक्षिराज! वह कन्या जाम्बवती मेरे कृष्णावतार-धारण करनेतक वहाँ तपस्यामें अनुरक्त रही। उसका शरीर अत्यन्त पवित्र हो चुका था। अन्तमें उसने मुझे पतिरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे योगधारणाद्वारा अपने उस शरीरका परित्याग कर दिया और वह भक्तराज जाम्बवान्‌के घरमें पुनः उत्पन्न हुई। वहाँ उसका नाम भी जाम्बवती ही पड़ा। भक्तिपरायणा जाम्बवती पिताके घरमें धीरे-धीरे बढ़ने लगी, पूर्व-जन्मके समान ही इस जन्ममें भी वह एकमात्र हरिनिष्ठ थी। उसके पिता जाम्बवान् भी महान् भक्त थे। उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवतीको पत्नीरूपमें मुझे समर्पित कर अपनेको धन्य माना।

जाम्बवतीने भगवान् श्रीकृष्णको सदाके लिये अपना पति बना लिया। उसकी भक्ति सफल हो गयी। विश्वके नाथने विधिके साथ जाम्बवतीसे विवाह किया। सब ओर आनन्द-ही-आनन्द छा गया।

जाम्बवतीके विवाहकी पवित्र कथा बताकर श्रीकृष्णने पक्षिराज गरुडको उन कृपालु भगवान् श्रीनिवासकी भक्तिका विस्तारसे माहात्म्य बतलाया और कहा कि हे गरुडजी! भगवान्‌को कभी भूलना नहीं चाहिये, निरन्तर उनके हरि आदि मङ्गलमय नामोंका उच्चारण करते रहना चाहिये—

हरिं हरिं प्रवदेत् सर्वदैव। (२९।६४)

कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि वह अपने शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए प्रत्येक समय वासुदेव हरिका स्मरण करता रहे—

पूर्तिर्यदा क्रियते कर्मणां च
सम्यक् स्मरेद्वासुदेवं हरिं च ॥ (२९।६८)

ऐसा करनेसे नारायण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, इसलिये हे गरुडजी! भगवान् हरिको प्रिय लगनेवाले कार्योंमें ही सदा व्यक्तिको अनुराग रखना चाहिये—

हरिप्रीतिकरे धर्मे प्रीतियुक्तो भवेत् सदा ॥ (२९।७०)
(अध्याय २३—२९)

॥ गरुडपुराणान्तर्गत ब्रह्मकाण्ड सम्पूर्ण ॥

॥ गरुडपुराण सम्पूर्ण ॥


* स्वामिपुष्करिणीमध्ये श्रीनिवासोऽस्ति सर्वदा ॥ (२६।३८)