गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९६- नीतिसार
| २०२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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बढ़ता जाता है, उस विषयवासनाओंसे दूर निवृत्तमार्गवालेके लिये उसका घर ही तपोवन है।<sup>१</sup>
सत्यके पालनसे धर्मकी रक्षा होती है। सदा अभ्यास करनेसे विद्याकी रक्षा होती है। मार्जनके द्वारा पात्रकी रक्षा होती है और शीलसे कुलकी रक्षा होती है—
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते पात्रं कुलं शीलेन रक्ष्यते॥
(११३।१०)
विन्ध्याटवीमें निवास करना मनुष्यके लिये अच्छा है, बिना भोजन किये ही मर जाना श्रेयस्कर है, सर्पसे परिव्याप्त भूमिपर सोना तथा कुएँमें गिरकर मृत्युको प्राप्त करना उचित है, जलके आवर्तयुक्त भयंकर भँवरमें डूब मरना श्रेष्ठ है; किंतु अपने ही पक्षके आत्मीय जनसे 'थोड़ा धन मुझे दे दें' इस प्रकार याचना करना अच्छा नहीं है।<sup>२</sup> भाग्यका ह्रास होनेसे मनुष्यकी सम्पदाओंका विनाश होता है, न कि उपभोग करनेसे। पूर्वजन्ममें यदि पुण्य अर्जित है तो सम्पत्तिका नाश कभी नहीं हो सकता।
ब्राह्मणोंका आभूषण विद्या, पृथिवीका आभूषण राजा, आकाशका आभूषण चन्द्र एवं समस्त चराचरका आभूषण शील है—
विप्राणां भूषणं विद्या पृथिव्या भूषणं नृपः।
नभसो भूषणं चन्द्रः शीलं सर्वस्य भूषणम्॥
(११३।१३)
इतिहासप्रसिद्ध ये जो भीमसेन, अर्जुन आदि राजपुत्र हैं—ये सभी चन्द्रके समान कान्तिसम्पन्न, पराक्रमशील, सत्यप्रतिज्ञ, सूर्यके सदृश प्रतापशाली और स्वयं विष्णुके अवतारस्वरूप भगवान् कृष्णसे अभिरक्षित थे, फिर भी इन लोगोंको कृपण धृतराष्ट्रकी परवशताके कारण भिक्षाटन करना पड़ा। इस संसारमें कौन ऐसा है, जिसमें ऐसी सामर्थ्य है, जिसको भाग्यके वशीभूत होनेके कारण कर्मरेखा नहीं घुमाती ?<sup>३</sup>
जिस पूर्वसंचित कर्मके अधीन होकर ब्रह्मा कुम्भकारके समान ब्रह्माण्डरूपी इस महाभाण्डके उदरमें चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें नियमतः लगे रहते हैं, जिस कर्मसे अभिभूत होकर विष्णु दशावतारके कालमें परिव्याप्त असीमित महासंकटमें अपनेको डाल देते हैं, जिस कर्मके अनुसार ही सदाशिव रुद्र हाथमें कपाल धारणकर भिक्षाटन करते हैं और जिस कर्मसे सूर्य नित्य आकाशमें ही चक्कर काटते हैं—उस कर्मको मैं नमस्कार करता हूँ।<sup>४</sup>
राजा बलि उत्कृष्ट कोटिके दाता थे और याचक स्वयं भगवान् विष्णु थे। विशिष्ट ब्राह्मणोंके समक्ष पृथिवीका दान दिया गया, फिर भी दानका फल बन्धन प्राप्त हुआ। यह सब दैवका खेल है, ऐसे इच्छानुसार फल देनेवाले दैवको नमस्कार है।<sup>५</sup>
यदि प्राणीकी माता स्वयं लक्ष्मी हों, पिता साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु हों, उसके बाद भी प्राणीको यदि कुबुद्धिमें ही विश्वास है तो उसको दण्ड भोगना ही पड़ेगा।
पूर्वजन्ममें प्राणीने जैसा कर्म किया है, उसी कर्मके
१-वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः।
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम्॥ (११३।९)
२-वरं विन्ध्याटव्यां निवसनमभुक्तस्य मरणं वरं सर्पकीर्णे शयनमथ कूपे निपतनम्।
वरं भ्रान्तावर्ते सभयजलमध्ये प्रविशनं न तु स्वीये पक्षे हि धनमणु देहीति कथनम्॥ (११३।११)
३-एते ते चन्द्रतुल्याः क्षितिपतितनया भीमसेनार्जुनाद्याः शूराः सत्यप्रतिज्ञा दिनकरवपुषः केशवेनोपगूढाः।
ते वै दुष्टग्रहस्थाः कृपणवशगता भैक्ष्यचर्यां प्रयाताः को वा कस्मिन् समर्थो भवति विधिवशाद्भ्रामयेत् कर्मरेखा॥ (११३।१४)
४-ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥ (११३।१५)
५-दाता बलिर्याचकको मुरारिर्दानं महीं विप्रमुखस्य मध्ये। दत्त्वा फलं बन्धनमेव लब्धं नमोऽस्तु ते दैव यथेष्टकारिणे॥ (११३।१६)
काण्ड ] नीतिसार २०३
अनुसार वह दूसरे जन्ममें फल भोगता है। अतः स्वयमेव प्राणी अपने भोग्य फलका निर्माण करता है, अर्थात् वह कर्मफलका स्वयं ही विधाता है।
हम अपने सुख या दुःखके स्वयं ही हेतु हैं। माताके गर्भाशयमें आकर अपने पूर्वदेहमें किये गये कर्मोंके फल ही हमें भोगने पड़ते हैं। आकाश, समुद्र, पर्वतीय गुफा तथा माताके सिरपर और माताकी गोदमें अवस्थित रहते हुए भी मनुष्य निश्चित ही उन अपने पूर्वसंचित कर्मफलका परित्याग करनेमें समर्थ नहीं होता।
जिसका दुर्ग ही त्रिकूट पर्वत था, जिसकी परिखा समुद्र ही था, राक्षसगणसे जो अभिरक्षित था, स्वयं जो परम विशुद्ध आचरण करनेवाला था, जिसको नीतिशास्त्रकी शिक्षा शुक्राचार्यसे प्राप्त हुई थी, वह रावण भी काल-वश नष्ट हो गया।
जिस अवस्था, जिस समय, जिस दिन, जिस रात्रि, जिस मुहूर्त अथवा जिस क्षण जैसा होना निश्चित है; वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं हो सकता—
यस्मिन् वयसि यत्काले यद्दिवा यच्च वा निशि।
यन्मुहूर्ते क्षणे वापि तत्तथा न तदन्यथा॥
(११३।२२)
सभी अन्तरिक्षमें जा सकते हैं या भूगर्भमें प्रवेश कर सकते हैं अथवा दसों दिशाओंको अपने ऊपर धारण कर सकते हैं, किंतु अप्रदत्त वस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
पूर्वजन्ममें अर्जित की गयी विद्या, दिया गया धन तथा सम्पादित कर्म ही दूसरे जन्ममें आगे-आगे मिलते जाते हैं। अर्थात् प्राणीने पूर्वजन्ममें जैसा कर्म किया है, उसको इस जन्ममें वैसा ही प्राप्त होता है<sup>१</sup>। इस संसारमें कर्म ही प्रधान है। सुन्दर नक्षत्र था, ग्रहोंका योग था, स्वयं वसिष्ठ मुनिके द्वारा निर्धारित लग्नमें विवाह-संस्कार कराये जानेपर भी जानकी—सीताको [पूर्वजन्ममें संचित कर्मके अनुसार] दुःख भोगना पड़ा। विशाल जंघाओंवाले श्रीराम, शब्दकी गतिसे चलनेवाले श्रीलक्ष्मण तथा सघन केशवाली शुभलक्षणा श्रीसीताजी—ये भी तीनों जब अपने कर्मके अनुसार दुःखके भाजन हो गये तो सामान्य जनके विषयमें कुछ कहना ही व्यर्थ है। न पिताके कर्मसे पुत्रको सद्गति मिल सकती है और न पुत्रके कर्मसे पिताको सद्गति मिल सकती है। सभी लोग अपने-अपने कर्मसे ही अच्छी गति प्राप्त करते हैं<sup>२</sup>।
पूर्वजन्ममें अर्जित कर्मफलके अनुसार प्राप्त शरीरमें शारीरिक और मानसिक रोग उसी प्रकार आकर अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं, जिस प्रकार कुशल वीर धनुर्धरोंके द्वारा छोड़े गये बाण लक्ष्यको बेधकर कष्ट पहुँचाते हैं। बाल-युवा तथा वृद्ध जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, वह जन्म-जन्मान्तरमें उसी अवस्थाके अनुसार उस फलका भोग करता है। उस पूर्वार्जित फलको न देखनेवाला एवं विदेशमें रहता हुआ भी मनुष्य अपने कर्मरूपी जहाजके संयमित पवन-वेगके द्वारा उस फलतक पहुँचा दिया जाता है<sup>३</sup>।
मनुष्य अपने प्रारब्धका फल प्राप्त करता है। देवता भी उस फलभोगको रोकनेमें समर्थ नहीं हैं।
१-पुराधीता च या विद्या पुरा दत्तञ्च यद्धनम्। पुरा कृतानि कर्माणि ह्यग्रे धावति धावति॥ (११३।२४)
२-कर्माण्यत्र प्रधानानि सम्यगृक्षे शुभग्रहे। वसिष्ठकृतलग्नाऽपि जानकी दुःखभाजनम्॥
स्थूलजंघो यदा रामः शब्दगामी च लक्ष्मणः। घनकेशी यदा सीता त्रयस्ते दुःखभाजनम्॥
न पितुः कर्मणा पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा। स्वयं कृतेन गच्छन्ति स्वयं बद्धाः स्वकर्मणा॥ (११३।२५–२७)
३-बालो युवा च वृद्धश्च यः करोति शुभाशुभम्। तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि॥
अनीक्षमाणोऽपि नरो विदेशस्थोऽपि मानवः। स्वकर्मपोतवातेन नीयते यत्र तत्फलम्॥ (११३।३०-३१)
| २०४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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इसीलिये मैं कर्मफलके विषयमें चिन्ता नहीं करता हूँ और न मुझे आश्चर्य ही है, क्योंकि जो मेरा है, उसे दूसरा कोई नहीं ले सकता—
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो
देवोऽपि तं वारयितुं न शक्तः।
अतो न शोचामि न विस्मयो मे
यदस्मदीयं न तु तत्परेषाम्॥
(११३।३२)
जैसे साँप, हाथी और चूहा—ये शीघ्रतावश क्रमशः कुआँ, अपने वासस्थान तथा बिलतक ही भाग सकते हैं, इससे आगे कहाँतक जा सकते हैं ? इसी तरह अपने कर्म अथवा भाग्यसे कौन भाग सकता है? सब तो उसीके अधीन हैं।
सद्विद्या देनेसे उसी प्रकार बढ़ती रहती है कम नहीं होती, जिस प्रकार कुएँसे जल ग्रहण कर लेनेपर भी कुएँका जल बढ़ता ही रहता है [घटता नहीं]। जो धन धर्मानुसार अर्जित किया जाता है वही [वास्तविक] धन है। अधर्मसे प्राप्त हुआ धन तो मनुष्यके ऐश्वर्यका नाशक होता है। इस संसारमें धर्मार्थी ही महान् होता है। धनकी अपेक्षा करनेवाले मनुष्यको निश्चित ही श्रेष्ठजनोंके दृष्टान्तोंको स्मरण करके धनोपार्जनमें तत्पर होना चाहिये। अन्नार्थी कृपण व्यक्ति जिन दुःखोंको भोगता है, यदि धर्मार्थी होकर वह उन दुःखोंका चिन्तन करे तो पुनः उसको दुःखका पात्र होना ही न पड़े। सभी प्रकारकी शुचितामें अन्नकी शुचिता ही प्रधान है। जो मनुष्य अन्न और अर्थसे पवित्र है [वही शुचि है]। केवल मिट्टी और जलसे शुचिता नहीं आती।*
सत्यपालनमें शुचिता, मनःशुद्धि, इन्द्रियनिग्रह, सभी प्राणियोंमें दया और जलसे प्रक्षालन—ये पाँच प्रकारके शौच माने गये हैं। जिसमें सत्यपालनकी शुचिता है, उसके लिये स्वर्गकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। जो मनुष्य सत्य ही सम्भाषण करता है, वह अश्वमेधयज्ञ करनेवाले व्यक्तिसे भी बढ़कर है—
सत्यं शौचं मनःशौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूते दया शौचं जलशौचं च पञ्चमम्॥
यस्य सत्यं हि शौचं च तस्य स्वर्गो न दुर्लभः।
सत्यं हि वचनं यस्य सोऽश्वमेधाद्विशिष्यते॥
(११३।३८-३९)
दुष्ट स्वभावसे अपनी आत्माको दबाकर रखनेवाला दुराचारी पुरुष हजारों बार मिट्टीके लेप तथा सैकड़ों बार जलके प्रक्षालनसे पवित्र नहीं हो सकता। जिसके हाथ-पैर एवं मन सुसंयत हैं, जिसे अध्यात्म-विद्या प्राप्त है, जो धर्मपालनके लिये कष्ट सहन करता है तथा जिसने सत्कीर्ति अर्जित की है, वही तीर्थोंका यथार्थ फल भी भोगता है—
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्।
विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते॥
(११३।४१)
जो मनुष्य सम्मानसे प्रसन्न नहीं होता, अपमानसे क्रुद्ध नहीं होता एवं क्रोधके आनेपर मुँहसे कठोर वाक्य नहीं निकालता, ऐसे ही मनुष्यको साधुपुरुष समझना चाहिये—
न प्रहृष्यति सम्मानैर्नावमानैः प्रकुप्यति।
न क्रुद्धः परुषं ब्रूयादेतत् साधोस्तु लक्षणम्॥
(११३।४२)
विद्वान्, मधुरभाषी भी कोई व्यक्ति यदि दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचनको सुनकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता है। यदि कोई मनुष्य
* येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण गताः श्रियः। धर्मार्थी च महाँल्लोके तत् स्मृत्वा ह्यर्थकारणात्॥
अन्नार्थी यानि दुःखानि करोति कृपणो जनः। तान्येव यदि धर्मार्थी न भूयः क्लेशभाजनम्॥
सर्वेषामेव शौचानामन्नशौचं विशिष्यते। योऽन्नार्थैः शुचिः शौचान्न मृदा वारिणा शुचिः॥ (११३।३५-३७)
काण्ड ] नीतिसार २०५
मन्त्र या बलके प्रभावसे अथवा बुद्धि और पौरुषके बलपर अलभ्य-अदृष्ट वस्तुको प्राप्त नहीं कर पा रहा है तो उस विषयमें मनुष्यको किसी प्रकारका खेद नहीं करना चाहिये।
अयाचित कोई वस्तु मुझे प्राप्त हो और पुनः वह मेरे पाससे चली जाय तो कष्ट होता है, किंतु जो जहाँसे आयी थी वह पुनः वहीं चली गयी तो उसमें कैसा दुःख? दुःख करनेका कोई औचित्य ही नहीं है। रात्रिमें सदैव एक ही वृक्षपर नाना प्रकारके पक्षियोंका समूह शरण लेता है, किंतु प्रातःकाल होते ही वे सभी भिन्न-भिन्न दिशाओंमें चले जाते हैं। उस आश्रयके विषयमें उन लोगोंको कौन-सा दुःख होता है? इसी दृष्टान्तको ध्यानमें रखकर मनुष्योंको वियोगजन्य दुःखमें खिन्न नहीं होना चाहिये। एक साथ सामूहिक रूपमें चलनेवालोंमें यदि कोई एक त्वरित गतिसे चल रहा है तो उससे ईर्ष्या क्यों की जाय?
हे शौनक! सभी प्राणियों या पदार्थोंकी उत्पत्तिके पूर्वमें स्थिति नहीं थी और निधनके अन्तमें भी उनकी स्थिति नहीं रहेगी। सभी पदार्थ मध्यमें ही विद्यमान रहते हैं। इसमें दुःख करनेकी क्या बात है—
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि शौनक।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
(११३।४८)
समय प्राप्त न होनेसे पहले प्राणी सैकड़ों बाण लगनेपर भी नहीं मरता और समयके आ जानेपर कुशकी नोंक लग जानेसे भी वह जीवित नहीं रहता¹। प्राप्त होने योग्य वस्तु ही प्राप्त होती है, गन्तव्य स्थानपर ही व्यक्ति जाता है। अतः प्राणीको जो दुःख-सुख प्राप्त होने योग्य है वही उसको प्राप्त होता है।
मनुष्य प्राप्त होने योग्य अमुक-अमुक वस्तुको ही प्राप्त करता है तो वह अभिलषित वस्तुके लिये नाना प्रकारसे प्रयास करके क्या प्राप्त कर लेगा? उसका तो अपनेको अभावग्रस्त समझकर प्रलाप करना व्यर्थ ही है।
जिस प्रकार प्रार्थना आदिके बिना ही यथासमय वृक्षके द्वारा प्राणीको अपने समयपर ही फल-फूलकी प्राप्ति हो जाती है, उसी प्रकार पूर्वजन्मकृत कर्म भी अपने समयके अनुसार यथोचित फल देता है। व्यक्तिमें अवस्थित शील, कुल, विद्या, ज्ञान, गुण तथा कुल-शुद्धि उसको कुछ देनेमें समर्थ नहीं हैं। पूर्वजन्मकृत तपसे प्राप्त हुआ उसका भाग्य ही समयके अनुसार वृक्षकी भाँति उसे फल देता है²।
प्राणीकी मृत्यु वहाँ होती है, जहाँ उसका हन्ता विद्यमान रहता है। लक्ष्मी वहीं निवास करती है, जहाँ सम्पत्तियाँ रहती हैं। ऐसे ही अपने कर्मसे प्रेरित होकर प्राणी स्वयं ही उन-उन स्थानोंपर पहुँच जाता है। पूर्वजन्ममें किया गया कर्म कर्ताके पीछे-पीछे वैसे ही रहता है, जैसे गोष्ठमें हजार गायोंके रहनेपर भी बछड़ा अपनी माताको प्राप्त कर लेता है—
तत्र मृत्युर्यत्र हन्ता तत्र श्रीर्यत्र सम्पदः।
तत्र तत्र स्वयं याति प्रेर्यमाणः स्वकर्मभिः॥
भूतपूर्वं कृतं कर्म कर्तारमनुतिष्ठति।
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥
(११३।५३-५४)
हे मूर्ख प्राणी! इस प्रकार जब पूर्वजन्मकृत कर्म कर्तामें ही अवस्थित रहता है तो अपने
१-नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि। कुशाग्रेण तु संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति॥
२-आचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च। स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम्॥ (११३।४९)
शीलं कुलं नैव च चैव विद्या ज्ञानं गुणा नैव न बीजशुद्धिः।
भाग्यानि पूर्वं तपसार्जितानि काले फलन्त्यस्य यथैव वृक्षाः॥ (११३।५१-५२)
| २०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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पुण्यका फल भोगो। तुम क्यों संतप्त हो रहे हो ? जैसा पूर्वजन्ममें शुभ अथवा अशुभ कर्म किया गया है, वैसा ही फल जन्मान्तरमें कर्ताका अनुसरण करता है, उसके पीछे-पीछे चलता है।
नीच व्यक्ति दूसरेमें सरसोंके बराबर भी स्थित दोष-छिद्रोंको देखता है, किंतु अपनेमें बेल (फल)-के समान अवस्थित दोषोंको देखते हुए भी नहीं देखता<sup>१</sup>। हे द्विज! राग-द्वेषादिक दोषोंसे युक्त प्राणियोंको कहींपर भी सुख नहीं है। मैं भली प्रकारसे विचार करके यह देखता हूँ कि जहाँ संतोष है, वहाँ सुख है। जहाँ स्नेह है, वहीं भय है। अतः स्नेह ही दुःखका कारण है। प्राणियोंमें स्नेह उत्पन्न करनेके जो मूल हैं, वे ही दुःखके कारण हैं। अतः उनका परित्याग कर देनेपर अर्थात् उनके प्रति अपनी आसक्तिको समाप्त कर देनेसे प्राणीको महान् सुखकी प्राप्ति होती है<sup>२</sup>। यह शरीर ही दुःख और सुखका घर है। उत्पन्न हुए शरीरके साथ ही वह दुःख-सुख भी उत्पन्न होता है।
पराधीनता ही दुःख है और स्वाधीनता ही सुख है। संक्षेपमें यही सुख-दुःखका लक्षण समझना चाहिये। प्राणीको सुखभोगके पश्चात् दुःख और दुःखके बाद सुखका भोग प्राप्त होता है। इस तरह मनुष्योंके सुख-दुःख चक्रके समान परिवर्तित होते रहते हैं। जो मनुष्य भूतकालिक विषयवस्तुको समाप्त हुआ मान लेता है और भविष्यमें होनेवालेको बहुत दूर समझता है एवं वर्तमानमें अनासक्त-भावसे रहता है, वह किसी भी प्रकारके शोकसे दुःखी नहीं होता<sup>३</sup>।
(अध्याय ११३)
नीतिसार
श्रीसूतजीने पुनः कहा— न कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु। कारणविशेषसे ही लोग एक-दूसरेके मित्र और शत्रु होते हैं। यह दो अक्षरोंवाला रत्नरूपी 'मित्र' शब्द किसने बनाया? यह दुःख एवं भयसे प्राणियोंका अभिरक्षक है तथा प्राणिमात्रमें प्रेम और विश्वासको उत्पन्न करनेवाला है।
जिस व्यक्तिने एक बार भी 'हरि' इस दो अक्षरसे युक्त शब्दका उच्चारण कर लिया है, वह अपने कटिप्रदेशमें परिकर (फेंटा) बाँधकर मुक्ति प्राप्त करनेके लिये तैयार रहता है। अर्थात् ऐसा मनुष्य मोक्षका अधिकारी हो जाता है—
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥
(११९।३)
माता, पत्नी, सहोदर बन्धु तथा पुत्रमें पुरुषोंको वैसा विश्वास नहीं होता है, जैसा विश्वास उन्हें स्वाभाविक मित्रमें होता है। यदि मनुष्य किसीके साथ शाश्वत प्रेम करना चाहता है तो उसे उसके साथ द्यूत, अर्थ-व्यवहार (धनका लेन-देन) एवं परोक्षरूपमें उसकी स्त्रीका दर्शन—इन तीन दोषोंका परित्याग कर देना चाहिये। माता, भगिनी अथवा पुत्रीके साथ एकान्तमें एक साथ नहीं बैठना
१-नीचः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति । आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥ (११३।५७)
२-रागद्वेषादियुक्तानां न सुखं कुत्रचिद् द्विज । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ॥
यत्र स्नेहो भयं तत्र स्नेहो दुःखस्य भाजनम् । स्नेहमूलानि दुःखानि तस्मिंस्त्यक्ते महत्सुखम् ॥ (११३।५८-५९)
३-सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । सुखं दुःखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते ॥
यदगतं तदतिक्रान्तं यदि स्यात् तच्च दूरतः । वर्तमानेन वर्तेत न स शोकेन बाध्यते ॥ (११३।६१–६३)
काण्ड ] नीतिसार २०७
चाहिये, क्योंकि इन्द्रियोंका समूह बलवान् होता है, वह विद्वान्को भी [दुराचरणकी ओर] खींच लेता है—
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो वसेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ (११४।६)
हे शौनक ! उपयुक्त अवसर न होनेसे, एकान्त स्थान न होनेसे तथा प्रार्थयिता व्यक्तिके सुलभ न होनेसे ही स्त्रियोंमें सतीत्व पाया जाता है।
जो मधुर पदार्थोंसे बालकको, विनम्रभावसे सज्जन पुरुषको, धनसे स्त्रीको, तपस्यासे देवताको और सद्व्यवहारसे समस्त लोकको अपने वशमें कर लेता है, वही पण्डित है। जो लोग कपटसे मित्र बनाना चाहते हैं, पापसे धर्म कमाना चाहते हैं, दूसरेको संतप्त करके धन-संग्रह करना चाहते हैं, बिना परिश्रमके ही सुखपूर्वक विद्या-अर्जन करना चाहते हैं और कठोर व्यवहारके द्वारा स्त्रियोंको वशमें रखनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे पण्डित (कुशल) नहीं हैं।
फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य यदि फल-समन्वित वृक्षका ही मूलोच्छेद कर डालता है तो वह दुर्बुद्धि है। उसे फल कभी नहीं प्राप्त हो सकता। अविश्वसनीय व्यक्तिका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। मित्रका भी [अधिक] विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि कदाचित् क्रुद्ध होनेपर मित्र भी समस्त गोपनीयताको प्रकट कर सकता है—
न विश्वसेदविश्वस्ते मित्रस्यापि न विश्वसेत्।
कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्॥ (११४।२२)
सभी प्राणियोंमें विश्वास करना, सभी प्राणियोंके प्रति सात्त्विक भाव रखना एवं अपने सत्-स्वभावकी रक्षा करना—ये सज्जन पुरुषके लक्षण हैं।
दरिद्रके लिये गोष्ठी* विषके समान है और वृद्ध व्यक्तिके लिये युवती विषके समान है। भलीभाँति आत्मसात् न की गयी विद्या विष है तथा अजीर्ण-दशामें किया गया भोजन विषके समान (अनिष्टकारी) है। अकुण्ठित व्यक्तिको गायन, नीच व्यक्तिको उच्च आसनकी प्राप्ति, दरिद्रको दान तथा युवकको तरुणी प्रिय होती है।
अधिक मात्रामें जलका पीना, गरिष्ठ भोजन, धातुकी क्षीणता, मल-मूत्रका वेग रोकना, दिनमें सोना एवं रात्रिमें जागरण करना—इन छः कारणोंसे मनुष्योंके शरीरमें रोग निवास करने लगते हैं—
अत्यम्बुपानं कठिनाशनं च
धातुक्षयो वेगविधारणं च।
दिवाशयो जागरणं च रात्रौ
षड्भिर्नराणां निवसन्ति रोगाः॥ (११४।२८)
प्रातःकालीन धूप, अतिशय मैथुन, श्मशान-धूमका सेवन, अग्निमें हाथ सेंकना और रजस्वला स्त्रीका मुख-दर्शन—ये दीर्घ आयुका विनाश करनेवाले हैं। शुष्क मांस, वृद्धा स्त्री, बालसूर्य, रात्रिमें दहीका प्रयोग, प्रभातकालमें मैथुन एवं [प्रभातकालीन] निद्रा—ये छः सद्यः प्राणविनाशक होते हैं।
तत्काल पकाया गया घृत (ताजा घी), द्राक्षाफल, बाला स्त्री, दुग्ध-सेवन, गरम जल तथा वृक्षोंकी छाया—ये शीघ्र ही प्राण (शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं। कुएँका जल और वटवृक्षकी छाया शीतकालमें गरम तथा गर्मीमें शीतल होते हैं। तैलमर्दन और सुन्दर भोजनकी प्राप्ति—ये सद्यः शरीरमें शक्तिका संचार करते हैं, किंतु
* मित्रोंको आमन्त्रित कर उनके साथ भोजन-जलपानादिकी व्यवस्था वहन कर मनोरंजन करना आदि।