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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

४२- ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण

काण्ड ] नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन ९३

तिथिमें उपवास रखकर सप्तमी तिथिको सूर्यदेवकी पूजा करनेसे भी सभी प्रकारके पापोंसे मुक्ति हो जाती है।

शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें निराहार रहकर जो द्वादशी तिथिमें जनार्दन भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह समस्त महापापोंसे मुक्त हो जाता है।

सूर्य-चन्द्र-ग्रहण आदि समयोंमें मन्त्रका जप, तपस्या, तीर्थसेवन, देवार्चन तथा ब्राह्मण-पूजन—ये सभी कृत्य भी महापातकोंको नष्ट करनेवाले होते हैं। समस्त पापोंसे युक्त मनुष्य भी पुण्य-तीर्थोंमें जाकर नियमपूर्वक अपने प्राणोंका परित्यागकर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

पतिव्रता नारी पतिके देहावसानके बाद पतिका वियोग असह्य होनेके कारण पति-धर्मके अनुसार पतिके शरीरके साथ शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए अग्निमें प्रवेश करती है तो ब्रह्महत्या, कृतघ्नता आदि बड़े-बड़े पातकोंसे दूषित भी अपने पतिका उद्धार कर देती है।

जो स्त्री पतिव्रता है, अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें दत्तचित्त रहती है, उसको इस लोक तथा परलोकमें कोई पाप नहीं लगता। वह वैसे ही निर्दोष रहती है, जैसे दशरथपुत्र श्रीरामकी पत्नी जगद्विख्यात भगवती सीतादेवी लङ्कामें रहकर भी निर्दोष रहीं तथा (अपने पातिव्रतके प्रभावसे) उन्होंने राक्षसराज रावणपर विजय प्राप्त की।

हे यतव्रत! संयतचित्त होकर विविध शास्त्रीय व्रतका अनुष्ठान करनेवाले! भगवान् विष्णुने मुझसे बहुत पहले ही यह बताया था कि गयामें स्थित फल्गु (नदी) आदि तीर्थोंमें यथाविधि श्रद्धाके साथ स्नान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके पातकोंसे मुक्त हो जाता है और समस्त सदाचरणका फल भी प्राप्त करता है। (अध्याय ५२)

नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन

सूतजीने कहा—भगवान् विष्णुसे अष्टनिधियोंके विषयमें सुनकर ब्रह्माजीने उनका वर्णन इस प्रकार किया था कि 'पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द (नन्द), नील और शङ्ख नामकी अष्टनिधियाँ हैं। नवीं निधि मिश्र कहलाती है। अब मैं उनके स्वरूपका वर्णन करता हूँ।

पद्मनिधिके लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य सात्त्विक और दाक्षिण्य गुणसे सम्पन्न होता है। वह सुवर्ण-चाँदी आदि मूल्यवान् धातुओंका संग्रह करके यतियों, देवताओं और याज्ञिकोंको दान करता है। महापद्म-चिह्नसे लक्षित व्यक्ति भी अपने संग्रहीत धन आदिका दान धार्मिक जनोंको करता रहता है। पद्म तथा महापद्मनिधिसम्पन्न पुरुष सात्त्विक स्वभाववाले कहे गये हैं।

मकरनिधिके चिह्नसे चिह्नित मनुष्य खड्ग, बाण एवं कुन्त (भाला) आदि अस्त्रोंका संग्रह करनेवाला होता है। वह नित्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान देता है और राजाओंके साथ उसकी सदैव मित्रता बनी रहती है। द्रव्यादिका आहरण करनेके लिये वह शत्रुओंका विनाश करता है और युद्धके लिये सदा तत्पर रहता है। कच्छपनिधि-लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाले होते हैं। कच्छप-चिह्नसे युक्त व्यक्ति किसीपर विश्वास नहीं करता है। वह न अपनी सम्पत्तिका स्वयं उपभोग करता है और न तो उसमेंसे वह किसीको कुछ देता ही है। वह एकान्तमें जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिको पृथिवीमें गाड़कर छिपा देता है। उसकी सम्पत्ति एक पीढ़ीतक रहती है।

मुकुन्दनिधिके चिह्नसे अंकित पुरुष रजोगुण-सम्पन्न होता है। वह राज्य-संग्रहमें लगा रहता है,

९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वह भोगोंका उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदिको धन देता है।

नन्दनिधिसे युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है। वही कुलका आधार बनता है। वह स्तुति करनेपर प्रसन्न होता है तथा बहुत-सी स्त्रियोंका पति होता है। पूर्वकालके मित्रोंमें उसकी प्रीति शिथिल होती है और वह अन्य नये मित्रोंके साथ प्रेम करने लगता है।

नीलनिधिके चिह्नसे सुशोभित मानव सात्त्विक तेजसे संयुक्त होता है। वह वस्त्र-धान्यादिका संग्रह तथा तडागादिका निर्माण करता है। उसके द्वारा (जनहितमें) आम्रादिके उद्यान भी लगवाये जाते हैं। उसकी सम्पत्ति तीन पीढ़ी तक रहती है।

शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पीढ़ी)-के लिये होती है। इससे समन्वित मनुष्य धनादिका स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उसके परिजन कुत्सित अन्नका भोजन तथा अच्छे न लगनेवाले मैले-कुचैले वस्त्रोंसे जीवनयापन करते हैं। वह स्वयंके भरण-पोषणमें सदैव तत्पर रहता है। यदि वह किसीको कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थकी वस्तु होती है (जिसका कोई उपयोग नहीं होता)।

मिश्र (मिली-जुली)-निधिके चिह्नसे युक्त होनेपर मनुष्यके स्वभावमें मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।

भगवान् विष्णुने भी निधियोंके ऐसे ही स्वरूपका वर्णन शिव आदि देवोंसे किया था (उसको मैंने आप सभीको सुना दिया)। अब हरिने भुवनकोशादिका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। (अध्याय ५३)


भुवनकोशवर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका निरूपण

श्रीहरिने कहा— राजा प्रियव्रतके आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, शबल, पुत्र और ज्योतिष्मान् नामके दस पुत्र हुए थे।

इन पुत्रोंमेंसे मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र नामक तीन पुत्र योगपरायण (योगी), जातिस्मर (इन्हें पूर्वजन्मका वृत्तान्त विस्मृत नहीं हुआ था) तथा महासौभाग्यशाली थे। इन लोगोंने राज्यके प्रति अपनी कोई अभिरुचि प्रकट नहीं की, अतः राजाने सप्तद्वीपा पृथिवीको अपने अन्य सात पुत्रोंमें विभक्त कर दिया।

पचास करोड़ योजनमें विस्तृत सम्पूर्ण पृथिवी नदीकी जलराशिमें तैरती हुई नौकाके समान चारों ओर अवस्थित अथाह जलके ऊपर स्थित है।

हे शिव! जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर नामक ये सात द्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। उन सात समुद्रोंके नाम लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलके सागररूपमें प्रसिद्ध हैं। हे वृषभध्वज! ये सभी द्वीप तथा समुद्र उक्त क्रममें एक-दूसरेसे द्विगुण परिमाणमें अवस्थित हैं।

जम्बूद्वीपमें मेरु नामक पर्वत है, जो एक लाख योजनके परिमाणमें फैला हुआ है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। इसका अधोभाग पृथिवीमें सोलह हजार योजन धँसा हुआ है और शिखरदेश बत्तीस हजार योजन विस्तृत है। इसका अधोभाग जो पृथिवीके ऊपर सन्निहित है, वह भी सोलह हजार योजनके विस्तारमें कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमालय, हेमकूट तथा निषध, उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं।

हे रुद्र! प्लक्ष आदि द्वीपोंके निवासी मरणादिसे मुक्त हैं। उनमें युग या अवस्थाके आधारपर कोई विषमता नहीं है।

जम्बूद्वीपके राजा आग्नीध्रके नौ पुत्र उत्पन्न हुए। उन सभीका नाम क्रमशः—नाभि, किम्पुरुष,