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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२६१- दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना, यमयातनाग्रस्त जीवका सदा सुकृत करनेका उपदेश देना

प्रेतकल्प ]
दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म
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उन्हें पापकर्म करनेवाला कहा गया है।* जो पाखण्डी, वर्णाश्रमधर्मसे रहित, महापातकी तथा व्यभिचारिणी स्त्रियाँ और आरूढपतित (संन्यासाश्रममें जाकर पतित होनेवाले) हैं, उनका दाहसंस्कार, नव श्राद्ध एवं सपिण्डन नहीं करना चाहिये। श्राद्ध सोलह बताये गये हैं, उनको भी ऐसे पापियोंके लिये न करे। यदि अग्निहोत्र करनेवाला ब्राह्मण ऐसा पापकर्म करता है तो घरवाले मरनेपर उसकी जो जीविकावृत्ति है, उसको जलमें फेंक दें और उसके घरकी अग्निको चौराहेपर ले जाकर डाल दें तथा उसके पात्रोंको अग्निमें जला दें।

हे काश्यप! पूर्वोक्त पापियोंकी मृत्युका एक वर्ष पूर्ण हो जाय तो दयावान् परिजनोंको शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको गन्ध-अक्षत-पुष्पादिसे विष्णु और यमकी पूजा करके कुशोंके ऊपर मधुयुक्त और घृतमिश्रित दस पिण्ड देना चाहिये।

मौन होकर तिलके सहित विष्णु और यमका ध्यान करते हुए दक्षिणाभिमुख होकर पूर्वोक्त दस पिण्ड प्रदान करे। उन पिण्डोंको उठाकर और एकमें मिलाकर तीर्थके जलमें डालते हुए मृतकके नाम और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये।

इसके बाद पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे विष्णु और यमकी पुनः पूजा करे। उस दिन उपवास रहकर कुल, विद्या, तप और शीलसे सम्पन्न यथासामर्थ्य नौ अथवा पाँच साधु ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उसके दूसरे दिन मध्याह्न कालमें पूर्वदिनके समान पुनः विष्णु एवं यमकी पूजा करके उत्तराभिमुख उन ब्राह्मणोंको आसनपर बैठाये। उसके बाद यज्ञोपवीती कर्ता आवाहन, अर्घ्य तथा दानादिमें विष्णु और यमसे समन्वित प्रेतके नामका कीर्तन करे तथा प्रेत, यम और विष्णुका स्मरण करते हुए श्राद्ध सम्पन्न करे। उस अवसरपर पिण्डदानके लिये अन्य देवोंका भी आवाहन करना चाहिये। उसके बाद उन्हें क्रमशः दस अथवा पाँच पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। यथा— पहला पिण्ड विष्णुदेव, दूसरा पिण्ड ब्रह्मा, तीसरा पिण्ड शिव, चौथा पिण्ड भृत्यसहित शिव और पाँचवाँ पिण्ड प्रेतके लिये देय है। प्रेतके नाम एवं गोत्रका स्मरण तथा विष्णु शब्दका उच्चारण करना चाहिये। पिण्डदान होनेके बाद सिर झुकाकर नमस्कार करते हुए पाँचवें पिण्डको कुशोंपर स्थापित करे। तदनन्तर यथाशक्ति गौ-भूमि और पिण्डदानादिके द्वारा उस प्रेतका स्मरण करते हुए कुश तथा तिलसे युक्त उन ब्राह्मणोंके कुशयुक्त हाथोंमें तिल-दान दे।

इसके बाद ब्राह्मणोंको अन्न, ताम्बूल और दक्षिणा देकर श्रेष्ठतम ब्राह्मणकी स्वर्णदानसे पूजा करे। यह दान नाम-गोत्रका स्मरण करते हुए 'विष्णु प्रसन्न हों', ऐसा कहकर देना चाहिये।

तदनन्तर ब्राह्मणोंका अनुगमन करके यजमान दक्षिणाभिमुख होकर प्रेतके नाम-गोत्रका कीर्तन करते हुए 'प्रीतोऽस्तु' ऐसा कहकर भूमिपर जल गिरा दे। तत्पश्चात् मित्र एवं बन्धु-बान्धवोंके साथ श्राद्धके अवशिष्ट भोजनको संयत वाक् होकर ग्रहण करे।

तदनन्तर प्रतिवर्ष सांवत्सर श्राद्ध एकोद्दिष्ट विधानसे करना चाहिये। इस प्रकारकी क्रिया करनेसे पापीजन स्वर्ग चले जायँगे। इसके बाद वे सपिण्डीकरण आदिकी क्रियाओंको करनेपर उसे प्राप्त करते हैं।

यदि प्रमादवश किसी मनुष्यकी जल आदिमें डूबकर अपमृत्यु हो जाती है तो उसके पुत्र या सगे-सम्बन्धीको यथाविधि सभी और्ध्वदैहिक कर्म करने आवश्यक हैं। प्रमादवश अथवा इच्छापूर्वक भी प्राणीको सर्पके सामने कदापि नहीं जाना चाहिये। (ऐसी स्थितिमें सर्प-दंशसे मृत्यु होनेपर) प्रतिमास दोनों पक्षोंकी पञ्चमी तिथिको नागदेवताकी पूजा करे। भूमिपर शालिचूर्णसे नागदेवकी आकृति बनावे। श्वेत पुष्प, सुगंध, धूप,


* स्वेच्छया तार्क्ष्य मरणं शृङ्गिदंष्ट्रिसरीसृपैः। चाण्डालाद्यात्मघातैश्च विषाद्यैस्ताडनैस्तथा ॥
जलाग्निपातवातैश्च निराहारादिभिस्तथा। येषामेव भवेन्मृत्युः प्रोक्तास्ते पापकर्मिणः॥ (४४। १-२)

५८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

दीप और सफेद अक्षतसे उसकी पूजा करके कच्चा पीसा हुआ अन्न तथा दूध अर्पित करे। उसके बाद उठकर द्रव्य और वस्त्र छोड़ते हुए 'नागराज प्रसन्न हों'—ऐसा कहे।

उस दिन श्राद्ध सम्पन्न करनेके पश्चात् मधुर अन्नका भोजन करे। यथाशक्ति वह उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्णकी बनी हुई नाग-प्रतिमाका दान दे। तदनन्तर उसे गौका दान देकर पुनः 'नागराज प्रीयताम्'—हे नागराज! आप अब मेरे ऊपर प्रसन्न हों—ऐसा कहे। इसके बाद सामर्थ्यानुसार पूर्ववत् उन कर्मोंको भी निर्देशानुसार करे।

जो मनुष्य अपनी वैदिक शाखाकी विधिके द्वारा ऐसे कर्मको यथावत् करता है, वह उन अपमृत्यु-प्राप्त प्राणियोंको प्रेतत्वसे विमुक्त करके स्वर्गलोकको ले जाता है।

(अध्याय ४४)


पार्वण आदि श्राद्धोंके अधिकारी; एकसे अधिककी मृत्युपर पिण्डदान आदिकी व्यवस्था; मृत्युतिथि-मासके अज्ञात होनेपर तथा प्रवासकालमें मृत्यु होनेपर श्राद्ध आदिकी व्यवस्था; नित्य एवं दैव तथा वृद्धि आदि श्राद्धोंकी कर्तव्यताका प्रतिपादन

श्रीविष्णुने कहा— हे खगेश्वर! अब मैं प्रतिवर्ष होनेवाले पार्वण श्राद्धका वर्णन तुमसे कर रहा हूँ। मृत व्यक्तिके औरस और क्षेत्रज पुत्रको प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। औरस एवं क्षेत्रज पुत्रोंके अतिरिक्त अन्यको एकोद्दिष्ट-विधिसे श्राद्ध करना चाहिये, पार्वण श्राद्ध नहीं।

अग्निहोत्र न करनेवाले मृत ब्राह्मणके क्षेत्रज तथा औरस दोनों पुत्र यदि अग्निहोत्री नहीं हैं तो उन्हें एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं करना चाहिये। प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। यदि पुत्र अथवा पितामेंसे कोई एक साग्निक हो तो प्रतिवर्ष क्षेत्रज और औरसको पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। किंतु कुछ लोगोंका कहना है कि पुत्र अग्निहोत्री हों या न हों, पितृगण भी अग्निहोत्री रहे हों या न रहे हों, फिर भी एकोद्दिष्ट श्राद्ध पुत्रोंको अपने पिताकी मृत्यु-तिथिपर करना चाहिये। जिसकी मृत्यु दर्शकाल अथवा प्रेतपक्षमें होती है, उसके सभी पुत्र प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध करें।

एकोद्दिष्ट श्राद्ध पुत्रहीन पुरुष और स्त्रीका भी हो सकता है। एकोद्दिष्ट यज्ञकर्ममें समूल कुशका प्रयोग करना चाहिये। बाहरसे कटे हुए अथवा एक बार काटे गये कुश ही श्राद्धमें वृद्धिकारक होते हैं। यदि किये जानेवाले पार्वण श्राद्धके बीच अशौच हो जाता है तो यजमान उस अशौचके समाप्त होनेके बाद श्राद्ध करे। एकोद्दिष्ट श्राद्धका काल आ जानेपर यदि किसी प्रकारका विघ्न आ जाता है तो दूसरे मास उसी तिथिपर वही एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जा सकता है। शूद्र तथा उसकी पत्नी और उसके पुत्रका श्राद्ध मौन अर्थात् मन्त्रोच्चार-रहित होना चाहिये। इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य—इन तीनों द्विजातियोंकी कन्या और यज्ञोपवीत-संस्कारसे हीन ब्राह्मणका भी श्राद्ध तूष्णीं (मौन) होकर ही करना धर्म-विहित है। एक ही समयमें एक ही घरके बहुत-से लोगोंकी अथवा दो व्यक्तियोंकी मृत्यु हो गयी हो तो उनके श्राद्धका पाक एक साथ और श्राद्ध पृथक्-पृथक्

प्रेतकल्प ] पार्वण आदि श्राद्धोंके अधिकारी ५८५

करना चाहिये। साथमें मरनेपर विधि इस प्रकार है—पहले पूर्वमृतको, तदनन्तर द्वितीय और तृतीयको क्रमशः पिण्डदान करना चाहिये।

जो आलस्यरहित होकर इस विधानके अनुसार अपने माता-पिताका प्रत्येक वर्ष श्राद्ध करता है, वह उनका उद्धार करके स्वयं भी परम गतिको प्राप्त करता है। यदि किसी प्राणीकी मृत्यु और प्रस्थान-कालका दिन स्मरण नहीं है, किंतु वह मास ज्ञात है तो उसी मासकी अमावास्या-तिथिमें उस मृतककी मृत्यु-तिथि माननी चाहिये। यदि किसीकी मृत्युका मास ज्ञात नहीं है, किंतु दिनकी जानकारी है तो मार्गशीर्ष (अगहन) अथवा माघमासमें उसी दिन उसका श्राद्ध किया जा सकता है। जब अपने सम्बन्धीकी मृत्युका दिन एवं मास दोनों अज्ञात हों तो श्राद्ध-कर्मके लिये यात्राके दिन और मास ग्रहण करने चाहिये। जब मृतकके प्रस्थानका भी दिन और मास न ज्ञात हो तो जिस दिन एवं मासमें मृत्युकी बात सुनी गयी हो, उसे ही श्राद्धके लिये उपयुक्त मान ले। बिना प्रवासके भी मृत्यु होनेपर दिन तथा मास दोनों विस्मृत हो गया हो तो पूर्ववत् मृत-तिथिका निर्णय करना चाहिये।

यदि कोई गृहस्थ प्रवासमें है और उसके प्रवासके ही दिनोंमें उसके घरमें किसीकी मृत्यु हुई हो तथा मृत्युके बाद अशौचके दिन बीत चुके हों और अशौचके अनन्तर जो एकादशाह-द्वादशाह आदि श्राद्ध विहित हैं वे चल रहे हों, इसी बीच प्रवासमें रहनेवाला वह गृहस्थ घर आ जाता हो और आनेके बाद ही मृत्युकी जानकारी उसे मिलती हो तो केवल वह गृहस्थ ही अशौचसे ग्रस्त होगा और तत्काल यथाशास्त्र अपनी अशौचकी निवृत्तिके लिये अपेक्षित विधि अपनायेगा। उसके द्रव्यादिपर अशौच नहीं होगा। उसके घर आनेमात्रसे उसकी अशुचिताका प्रभाव श्राद्धके उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंपर नहीं पड़ेगा। इसके अतिरिक्त यह भी ज्ञातव्य है कि यदि श्राद्धका मुख्य अधिकारी सुदूर देशमें है और उसके घर आकर यथाधिकार श्राद्ध करनेकी सम्भावना नहीं बनती है, ऐसी स्थितिमें अन्य अधिकारी पुत्रादिद्वारा यदि श्राद्धकर्म प्रारम्भ कर दिया गया है तो उसे भी श्राद्धप्रक्रिया पूर्ण करनी चाहिये। दाता और भोक्ता दोनोंको जननाशौच अथवा मरणाशौच ज्ञात न हो तो उन दोनोंमें किसीको भी दोष नहीं लगता। जननाशौच और मरणाशौचका ज्ञान भोक्ताको हो जाय और दाताको न हो तो उस समय भोक्ताको ही पाप लगता है, उसमें वह दाता दोषी नहीं होगा।

जिस मृत व्यक्तिकी तिथि ज्ञात नहीं है, उसकी मृत-तिथिका निर्धारण पूर्वोक्त प्रकारसे करके जो श्राद्धादि करता है, वह मृत व्यक्तिको तार देता है।

नित्य-श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी सभी पितरोंके साथ भक्तिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य तथा गन्धादिके द्वारा पूजा करके पितरोंके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको यथाविधि भोजन कराना चाहिये। आवाहन, स्वधाकार, पिण्डदान, अग्नौकरण, ब्रह्मचर्यादि नियम और विश्वेदेवकृत्य—ये कर्म नित्य-श्राद्धमें त्याज्य हैं। इस श्राद्धमें ब्राह्मणोंको भोजन करानेके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर प्रणाम निवेदन करते हुए बिदा करे।

विश्वेदेव आदिके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको नित्य-श्राद्धकी भाँति जो भोजन कराया जाता है, वह ‘देवश्राद्ध’ कहा जाता है।

यदि अग्रिम दिन कोई शुभ कार्य—विवाह अथवा यज्ञोपवीत आदि करने हैं तो उसके पूर्व-दिन मातृश्राद्ध और पितृश्राद्ध एवं मातामहश्राद्ध (श्राद्धत्रय) करने चाहिये। इन तीनों श्राद्धोंके लिये अपेक्षित विश्वेदेव-कार्य एक ही बार करना चाहिये। अर्थात् तीनों श्राद्धोंके लिये तीन बार विश्वेदेव कार्य नहीं करने चाहिये। पहले मातृपितामही तथा प्रपितामहीके लिये, तदनन्तर पितृपितामह और