गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२६०- यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन, पाप-कर्मोंसे घोर वैतरणीमें निवास, वैतरणीसे पार होनेके लिये वैतरणी-धेनुदान, भगवान् विष्णु, गङ्गा तथा ब्राह्मणकी महिमा
| ५८० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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एवं मनःशिला तथा वीर्यस्थानमें पारद, पुरीष (मल)-के स्थानमें पीतल, सम्पूर्ण शरीरमें मनःशिल, संधिभागोंमें तिलकी पीठी, मांसभागमें यवका आटा, मधु और मोम, केशराशिके स्थानमें बरगदकी बरोह, त्वचाभागमें मृगचर्म, दोनों कर्णप्रदेशमें तालपत्र, दोनों स्तनोंके स्थानमें गुंजाफल, नासिकाभागमें कमलपत्र, नाभिप्रदेशमें कमलपुष्प, दोनों अण्डकोशके स्थानमें बैंगन, लिंगभागमें सुन्दर गाजर एवं नाभिमें घी भरे। कौपीनके स्थानपर त्रपु, दोनों स्तनोंमें मुक्ताफल, सिरमें कुंकुमका लेप, कर्पूर, अगुरु, धूप तथा सुगन्धित पुष्प-मालाओंका अलंकरण, परिधानके स्थानपर पट्टसूत्र और हृदयभागमें रजत-पत्र रखे। उसकी दोनों भुजाओंमें ऋद्धि तथा वृद्धि इन दोनों सिद्धियोंको संकल्पित करके यजमान दोनों नेत्रोंमें एक-एक कौड़ी भरे। तदनन्तर नेत्रोंके कोणभागमें सिन्दूर भरकर उसको ताम्बूलादि विभिन्न उपहारोंसे सुशोभित करे।
इस प्रकार नाना वस्तुओंसे निर्मित और अलंकृत उस प्रेतको सर्वौषधि प्रदान करके जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार उसकी पूजा करनी चाहिये। जो प्रेत अग्निहोत्र करनेवाला हो, उसको यथाविधि यज्ञपात्र भी देना आवश्यक है। उसके बाद ‘शिरोमे श्री०' तथा ‘पुनन्तु वरुण०'—इन मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा शालग्राम शिलाको धोकर यजमान उसीसे प्रेतका पवित्रीकरण करे। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये एक दूध देनेवाली सुशील गौका दान किया जाय। तिल, लौह, स्वर्ण, रूई, नमक, सप्तधान्य, पृथ्वी और गौ एक-से-एक बढ़कर पुण्यदायक होते हैं। अतः गोदान करनेके बाद यजमान तिलपात्र-दान और पद-दान एवं महादान दे। उसके बाद सभी अलंकारोंसे विभूषित वैतरणी धेनुका दान करे।
प्रेतकी मुक्तिके लिये इस अवसरपर आत्मवान्को भगवान् विष्णुके निमित्त श्राद्ध करना चाहिये। तत्पश्चात् हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करके प्रेतमोक्षका कार्य करे। अतएव ‘ॐ विष्णुरिति०'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित उस प्रकल्पित प्रेत-पुतलेकी मृत्यु मानकर उसका दाह-संस्कार करे। तदनन्तर तीन दिन सूतक माने। दशाह कर्म करनेवाला यजमान इस बीच प्रेतमुक्तिके लिये पिण्डदान और सभी वार्षिक क्रियाओंको सम्पन्न करता है तो प्रेत अपनी मुक्तिका अधिकार प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय ४०)
वृषोत्सर्गकी संक्षिप्त विधि
**श्रीविष्णुने कहा—**हे खगेश्वर ! कार्तिक आदि महीनोंकी पूर्णमासी तिथिको पड़नेवाले शुभ दिनपर विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करना चाहिये। नान्दीमुख श्राद्ध करके वत्सतरीके साथ वृषका विवाह और वृषके खुरके पास श्राद्ध करनेके पश्चात् उन दोनोंका उत्सर्ग करे।
वापी और कूपके निर्माणोत्सर्गके समय गोशालामें विधिवत् संस्कारके अनन्तर अग्निकी स्थापना करनी चाहिये।* विवाह-विधिके समान ब्रह्मा-वरण करना चाहिये। यज्ञीय पात्रोंकी क्रमिक स्थापना, पायस-खीरका पाक, उपयमन कुशादिका क्रमशः स्थापन करे। यज्ञीय पात्रोंका सिंचन करनेके बाद होम करना चाहिये। प्रथम दो आहुति आघार और उसके बाद दो आज्य-भाग संज्ञक आहुतियाँ हैं। अतः ‘प्रथमेऽहरिति०' मन्त्रसे यजमानको छः आहुतियाँ देनी चाहिये।
आघार और आज्य-भाग संज्ञक चार आहुतियोंके अनन्तर अङ्गदेवता, अग्नि, रुद्र, शर्व, पशुपति, उग्र, शिव, भव, महादेव, ईशान और यमको आहुति दे। तत्पश्चात् ‘पूषागा०' इस मन्त्रसे एक पिष्टक होम, चरु तथा पायस दोनोंसे स्विष्टकृत् होम करे। तदनन्तर प्रथम व्याहृति होम, प्रायश्चित्त होम,
* काम्य और नैमित्तिक दो प्रकारका वृषोत्सर्ग होता है। काम्यमें गणेशपूजन, नान्दीश्राद्ध आदि करके ही वृषोत्सर्ग किया जाता है। मरणाशौचके ग्यारहवें दिन किया जानेवाला वृषोत्सर्ग नैमित्तिक वृषोत्सर्ग है। इसमें नान्दीश्राद्ध नहीं किया जाता।
| प्रेतकल्प ] | भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य | ५८१ |
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प्रजापति होम, संस्रव (अवशिष्ट जल) प्राशन करे। इसके बाद प्रणीताका परिमोक्षण करे। पवित्र-प्रतिपत्ति (परित्याग) करके ब्राह्मणको दक्षिणा दे। षडङ्ग रुद्रसूक्तका पाठ करनेसे प्रेतको मोक्षकी प्राप्ति होती है।
एक रंगके वृष और एक वत्सतरीको स्नान कराकर सभी अलंकारोंसे विभूषित करके उन दोनोंको प्रतिष्ठापित करनेसे प्रेतको मोक्ष प्राप्त होता है। इस कर्मके बाद वृषभकी पूँछसे गिरे हुए जलके द्वारा मन्त्रपूर्वक तर्पण-कार्य करना चाहिये। उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त करके दक्षिणासे संतुष्ट करे।
तदनन्तर यथाविधि एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेका विधान है। उसे करके प्रेतके उद्धार-हेतु ब्राह्मणको जल और अन्नका दान दिया जाता है। उसके बाद द्वादशाह श्राद्ध और मासिक श्राद्ध पृथक्-पृथक् करने चाहिये।
इस विधिका सम्यक् पालन करनेवाला प्रेतको उस योनिसे मुक्त कर देता है। (अध्याय ४१)
भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य और ब्रह्मस्वहरणका दोष
श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! जिस प्रकार एक वत्स हजार गायोंके बीच स्थित अपनी माताको प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार पूर्वजन्ममें किया गया कर्म अपने कर्ताका अनुगमन करता है—
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्।
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥
(४२।१)
भूमिदान करनेवाले प्राणीका अभिनन्दन सूर्य-चन्द्र, वरुण, अग्नि, ब्रह्मा, विष्णु और भगवान् त्रिशूलधारी शिव करते हैं। इस संसारमें भूमिके समान दान नहीं है। भूमिके समान दूसरी निधि नहीं है। सत्यके समान धर्म नहीं है और असत्यके समान पातक नहीं है—
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति भूमिसमो निधिः।
नास्ति सत्यसमो धर्मो नानृतात्पातकं परम् ॥
(४२।३)
अग्निका प्रथम पुत्र सुवर्ण है, पृथ्वी वैष्णवी कहलाती है तथा गाय सूर्यकी पुत्री है। अतः जो व्यक्ति स्वर्ण, गौ एवं पृथ्वीका दान देता है, उसने मानो त्रैलोक्यका दान कर दिया। गौ, पृथ्वी और विद्या इन तीनोंको अतिदान<sup>१</sup> कहा गया है। जप-पूजन तथा होम करके दिये गये ये तीनों दान नरकसे उद्धार करते हैं। बहुत-से पाप तथा क्रूर कर्म करके भी मनुष्य गोचर्म<sup>२</sup>भूमिका दान करनेसे शुद्ध हो जाता है। इस दानमें दी हुई वस्तुको लोभवश हरण करनेवालेको हरण करनेसे रोकना चाहिये। जो उसका परिरक्षण नहीं करता है, वह घोर नरकमें जाता है।
प्राण भले ही कण्ठमें आ जायें तो भी निषिद्ध कर्म नहीं करना चाहिये, कर्तव्य कर्म ही करना चाहिये ऐसा धर्माचार्योंने कहा है। किसीकी आजीविकाको नष्ट करनेपर हजार गौओंके वधके समान पाप लगता है तथा किसी जीविकारहितको आजीविका प्रदान करनेपर लक्ष धेनुके दानका फल प्राप्त होता है। गो-हत्यारे आदिसे एक गायको छुड़ा लेना श्रेष्ठ है, उसकी तुलनामें सौ गो-दान करना श्रेष्ठ नहीं है। सौ गो-दान करना गो-हत्यारेसे एक गायको बचा लेनेकी समता नहीं कर सकता।<sup>३</sup> जो व्यक्ति स्वयं दान देकर स्वयं ही उसमें बाधक बन जाता है, वह प्रलयकालतक नरकका भोग करता है।
जीविकारहित निर्धन ब्राह्मणकी रक्षा करनेपर जैसा पुण्य मनुष्यको प्राप्त होता है, वैसा पुण्य विधिवत् दक्षिणासहित अश्वमेध-यज्ञ करनेपर भी सम्भव नहीं है। दुर्बल, त्रस्त ब्राह्मणकी रक्षा करनेमें जो पुण्य है,
१-त्रीण्याहुरतिदानानि गावः पृथ्वी सरस्वती। नरकादुद्धरन्त्येते जपपूजनहोमतः॥ (४२।५)
२-गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम्। तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्मपरिकीर्तितम्॥ (पराशरस्मृति १२।४३)
अर्थात् जितने स्थानपर एक हजार गौएँ और दस बैल स्वतन्त्ररूपसे घूम-फिर सकते हैं, उतना भूमिभाग गोचर्म कहलाता है।
३-वरमेकाप्यपहता न तु दत्तं गवां शतम्। एकां हृत्वा शतं दत्त्वा न तेन समता भवेत्॥ (४२।१०)
| ५८२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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वह वेदाध्ययन और प्रचुर दक्षिणासे युक्त यज्ञ करनेपर नहीं है। बलात् अपहरण किये गये ब्राह्मणोंके धनसे पाले-पोसे तथा समृद्ध बनाये गये वाहन और सैन्य शक्तियाँ युद्धकालमें वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे बालूके द्वारा बनाये गये पुल विनष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति स्वयं अथवा दूसरेके द्वारा दी हुई भूमिका अपहरण करता है, वह साठ हजार वर्षतक विष्ठामें कृमि होकर जन्म लेता है। प्रेमसे जो ब्राह्मणका धन खाता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ीको भस्म कर देता है। उसी ब्रह्मस्वका उपयोग यदि चोरी करके किया जाय तो जबतक चन्द्रमा और तारागणोंकी स्थिति रहती है, तबतक उसकी कुल-परम्परा भस्म हो जाती है। पुरुष कदाचित् लोहे और पत्थरके चूर्णको खाकर पचा सके, किंतु तीनों लोकमें कौन ऐसा व्यक्ति है जो ब्राह्मणके धनको पचानेमें समर्थ हो सकेगा ?
देव-द्रव्यका विनाश करनेसे, ब्राह्मणके धनका हरण करनेसे और उसकी मर्यादाका उल्लंघन करनेसे प्राणियोंके कुल निर्मूल हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण विद्यासे विवर्जित है तो आचार्यत्वादिके लिये वरण करनेके सन्दर्भमें उसका परित्याग करना ब्राह्मणातिक्रमण नहीं है। जलती हुई आगको छोड़कर राखमें हवन नहीं किया जाता है।
संक्रान्तिकालमें जो दान और हव्य-कव्य दिये जाते हैं, वह सब सात कल्पोंतक बार-बार सूर्य दानदाताको प्रदान करता है। प्रतिग्रह, अध्यापन और यज्ञ करवानेके कार्योंमें विद्वान् प्रतिग्रहको ही अपना अभीष्टतम कहते हैं। प्रतिग्रहसे जप-होम और कर्म शुद्ध होते हैं, याजन-कर्मको वेद पवित्र नहीं करते। निरन्तर जप एवं होम करनेवाला तथा इसके द्वारा बनाये गये भोजनको न करनेवाला ब्राह्मण रत्नोंसे परिव्याप्त पृथ्वीका प्रतिग्रह करके भी प्रतिग्रहके दोषसे निर्लिप्त रहता है।* (अध्याय ४२)
शुद्धि-विधान
श्रीविष्णुने कहा— जो जल, अग्नि तथा अन्य किसी बन्धनके भयसे धर्मपथसे विचलित हो गये हैं और जो संन्यास-धर्मका परित्याग करके पतित हो चुके हैं, वे गौ और वृषभका दान देकर दो चान्द्रायणव्रतसे शुद्धि प्राप्त करते हैं। बारह वर्षसे कम और चार वर्षसे अधिक आयुके बालकके पापका प्रायश्चित्त माता-पिता अथवा अन्य बान्धवको करना चाहिये। चार वर्षसे कम आयुवाले बालकका न कोई अपराध है और न कोई पाप। उसके लिये न तो राजदण्ड है और न कोई प्रायश्चित्तका विधान ही है।
यदि रजोदर्शन होनेपर स्त्री रोगग्रस्त हो जाय तो वह चौथे दिन वस्त्रादिका परित्याग करके स्नानसे शुद्ध हो सकती है। आतुरकालमें जननाशौचप्रयुक्त स्नान होनेपर कोई जो रुग्ण न हो ऐसा व्यक्ति दस बार स्नान करके प्रत्येक स्नानके बाद यदि उस आतुर व्यक्तिका स्पर्श करता जाय तो वह आतुर शुद्ध हो जाता है। (अध्याय ४३)
दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म और सर्पदंशसे मृत्युपर विहित क्रिया-विधान
श्रीविष्णुने कहा— हे तार्क्ष्य! जिनकी मृत्यु स्वेच्छासे आत्महत्याके द्वारा होती है, जो सींग और दाँतवाले पशु, सरकनेवाले जीव, चाण्डालादि निम्न जातीय पुरुष, आत्मघात—विषादि अहितकर पेय पदार्थ, आघात-प्रतिघात, जल-अग्निपात और वायु तथा निराहारादिके द्वारा जिनकी मृत्यु होती है,
* सदा जापी सदा होमी परपाकविवर्जितः। रत्नपूर्णामपि महीं प्रतिगृह्णन्न लिप्यते ॥ (४२। २२)