गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२- भगवान् हयग्रीवके पूजनकी विधि
| ५० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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मन्त्रसे माता दुर्गा और गुरुकी पादुकाओंको नमस्कार करके देवी त्रिपुराके आसन और मूर्तिको प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् वह (साधक) 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि'—इस मन्त्रसे हृदयादिन्यास करे और फिर इसी मन्त्रसे 'रुद्रचण्डा, प्रचण्डदुर्गा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, चण्डिका तथा दुर्गा'—इन नौ शक्तियोंका पूजन करे। तदनन्तर वज्र, खड्ग आदि मुद्राओंका प्रदर्शनकर उसके अग्निकोणमें सदाशिव आदि देवोंकी पूजा करे। अतः साधक पहले 'ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः' कहकर प्रणाम करे। तत्पश्चात् 'ॐ ऐं क्लीं (ह्रीं) सौं त्रिपुरायै नमः' यह मन्त्रोच्चार करते हुए उस त्रिपुराशक्तिको नमस्कार करे।
साधक उसके बाद भगवती त्रिपुराके पद्मासन, मूर्ति और हृदयादि अङ्गोंको प्रणाम करे। तत्पश्चात् उस पद्मपीठपर ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका—इन आठ देवियोंकी पूजा करे। इन देवियोंकी पूजाके बाद 'भैरव' नामक देवोंकी पूजाका विधान है। असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण तथा संहार नामवाले—ये आठ भैरव हैं।
भैरव-पूजाके पश्चात् रति, प्रीति, कामदेव, पञ्चबाण, योगिनी, बटुक, दुर्गा, विघ्नराज, गुरु और क्षेत्रपाल-देवोंका भी पूजन करे।
साधकको पद्मगर्भ-मण्डल या त्रिकोणपीठ बनाकर उसपर और हृदयमें शुक्ल वर्णवाली, वरदायिनी, अक्षमाला, पुस्तक एवं अभयमुद्रासे सुशोभित भगवती सरस्वतीका भी ध्यान करना चाहिये। एक लाख मन्त्रका जप और हवन करनेसे भगवती त्रिपुरेश्वरी साधकके लिये सिद्धिदात्री हो जाती हैं। पूजामें देवोंके आसन तथा पादुकाकी पूजाका भी विधान है। विशेष पूजनमें मन्त्रन्यास तथा मण्डलादि-पूजन भी करना चाहिये।
(अध्याय २४—२६)
सर्पों एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र
सूतजीने कहा—अब मैं सर्पादि विभिन्न विषैले जीव-जन्तुओंके काटनेसे कष्ट पहुँचानेवाले विषको दूर करनेमें समर्थ मन्त्रको कह रहा हूँ, जो इस प्रकार है—
'ॐ कणिचिकीणिक्ववाणी चर्वाणी भूतहारिणि फणिविषिणि विरथनारायणि उमे दह दह हस्ते चण्डे रौद्रे माहेश्वरि महामुखि ज्वालामुखि शङ्कुकर्णि शुकमुण्डे शत्रुं हन हन सर्वनाशिनि स्वेदय सर्वाङ्गशोणितं तन्निरीक्षसि मनसा देवि सम्मोहय सम्मोहय रुद्रस्य हृदये जाता रुद्रस्य हृदये स्थिता। रुद्रो रौद्रेण रूपेण त्वं देवि रक्ष रक्ष मां हूं मां हूं फफफ ठठ स्कन्दमेखलाबालग्रह-शत्रुविषहारी ॐ शाले माले हर हर विष्ठोङ्काररहिविषवेगे हां हां शवरि हुं शवरि आकौलवेगेशे सर्वे विंचमेघमाले सर्वनागादि-विषहरणम्।'
इस मन्त्रका प्रयोग करते समय माहेश्वरी उमादेवीसे प्रार्थना करे कि हे उमे! तुम रुद्रके हृदयमें उत्पन्न हुई हो और उसीमें रहती हो। तुम्हारा रौद्र रूप है। तुम्हें रौद्री भी कहा जाता है। तुम्हारा मुख ज्वालाके समान जाज्वल्यमान है तथा तुमने अपने कटिप्रदेशमें क्षुद्र घण्टिका लगी करधनी पहन रखी है। तुम भूतोंकी प्रिय हो, सर्पोंके लिये विषरूपिणी हो, तुम्हारा नाम विरथनारायणी है तथा तुम शुकमुण्डा हो और कानोंमें शङ्कु पहनी हुई हो। हे विशाल मुखवाली, भयंकर एवं प्रचण्ड स्वभाववाली चण्डादेवी! हाथोंमें ज्वलन-शक्ति पैदा कर, शत्रु्का हनन कर, हनन कर। सब
काण्ड ] श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र ५१
प्रकारके विषोंका नाश करनेवाली हे देवि ! मेरे सर्वाङ्गमें फैले हुए विषको प्रभावहीन कर दे । उस विषको तुम देख रही हो । [उस काटनेवाले जन्तुको] सम्मोहित करो, सम्मोहित करो । हे देवि ! तुम मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। इस प्रकार प्रार्थना एवं चिन्तन करके 'हूँ मां हूं फफफ ठः' इसका उच्चारण करे तथा 'स्कन्दकी मेखलारूपी बालग्रहों, शत्रुओं और विषोंका हरण करनेवाली हे शाला-माला ! नाना प्रकारके विषोंके वेगका हरण कर, हरण कर।' ऐसा उच्चारण करे और 'हां हां शवरि हुं' शवरि कहकर वेगपूर्ण गतिशीलोंमें अतिगतिशील सर्वत्र व्यापिनी मेघमालारूपिणी देवि ! मेरे सभी नागादि विषजन्तुओंसे उत्पन्न विषका हरण करो।
[इस प्रकार चिन्तन और प्रार्थना करते हुए रोगीके प्रति स्पर्शादि करते हुए मन्त्रपाठ करे।]
(अध्याय २७)
श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजनविधि
श्रीसूतजीने कहा—हे ऋषियो! मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली श्रीगोपालजी तथा भगवान् श्रीधर विष्णुकी पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, इसे सुनें। पूजा प्रारम्भ करनेसे पहले पूजा-मण्डलके द्वारदेशमें गङ्गा और यमुनाके साथ धाता और विधाताकी, श्रीके साथ शङ्ख, पद्मनिधि एवं शार्ङ्गधनुष और शरभकी पूजा करनी चाहिये तथा पूर्व दिशामें भद्र और सुभद्रकी, दक्षिण दिशामें चण्ड और प्रचण्डकी, पश्चिम दिशामें बल और प्रबलकी, उत्तर दिशामें जय और विजयकी तथा चारों दरवाजोंपर श्री, गण, दुर्गा और सरस्वतीकी पूजा करनी चाहिये।
मण्डलके अग्नि आदि कोणोंमें और दिशाओंमें परम भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल-कूबरका पूजन करे। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुतपा तथा विष्णुशक्तिकी अर्चना करे। इसके बाद विष्णुके परिवारकी अर्चना करे। मण्डलके मध्यमें शक्तिकी और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान तथा वैराग्यकी अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करे। वायव्य-कोणके साथ उत्तर दिशामें प्रकाशात्मक एवं ऐश्वर्यकी पूजा करे। 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'—यह गोपालमन्त्र है। मण्डलकी पूर्व दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें जाम्बवती और सुशीलाके साथ रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, नाग्रजिती, लक्ष्मणा और मित्रविन्दाकी पूजा करनी चाहिये।
साथ ही श्रीगोपालके शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, मुसल, खड्ग, पाश, अङ्कुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, मुकुट, वनमाला, इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका पूजन करके श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णकी भी अर्चना करनी चाहिये।
गोपीजनवल्लभके मन्त्र जपनेसे तथा उनका ध्यान करनेसे एवं उनकी (साङ्गोपाङ्ग) पूजा करनेसे साधक सभी कामनाओंको पूर्ण कर लेता है।
त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं—
'ॐ श्रीं (श्रीः) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।
—ये मन्त्र समस्त प्रयोजनोंको पूर्ण करनेवाले हैं।
श्रीसूतजी पुनः बोले— अब मैं श्रीधरभगवान् (विष्णु)-की मङ्गलमयी पूजाका वर्णन करता हूँ।
| ५२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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साधकको सर्वप्रथम ‘ॐ श्रां हृदयाय नमः, ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ श्रूं शिखायै वषट्, ॐ श्रैं कवचाय हुम्, ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ श्रः अस्त्राय फट्’—इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये। तदनन्तर भगवान्को शङ्ख, चक्र, गदास्वरूपिणी मुद्रा प्रदर्शितकर शङ्ख, चक्र तथा गदा-पद्मसे सुशोभित आत्मस्वरूप श्रीधर-भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्र-मण्डलमें श्रीधरदेवकी पूजा करनी चाहिये।
सर्वप्रथम शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करनी चाहिये।
‘ॐ श्रीधरासनदेवता आगच्छत’ इस मन्त्रसे आवाहन करके ‘ॐ समस्तपरिवारायाच्युतासनाय नमः’, ‘ॐ धात्रे नमः’, ‘ॐ विधात्रे नमः’, ‘ॐ गङ्गायै नमः’, ‘ॐ यमुनायै नमः’, ‘ॐ आधारशक्त्यै नमः’, ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ पृथिव्यै नमः’, ‘ॐ धर्माय नमः’, ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, ‘ॐ वैराग्याय नमः’, ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, ‘ॐ अधर्माय नमः’, ‘ॐ अज्ञानाय नमः’, ‘ॐ अवैराग्याय नमः’, ‘ॐ अनैश्वर्याय नमः’, ‘ॐ कन्दाय नमः’, ‘ॐ नालाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ विमलायै नमः’, ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ‘ॐ क्रियायै नमः’, ‘ॐ योगायै नमः’, ‘ॐ प्रह्व्यै नमः’, ‘ॐ सत्यायै नमः’, ‘ॐ ईशानायै नमः’, ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’—इन मन्त्रोंसे श्रीधरके आसनका पूजन करके (हे रुद्र!) पूर्वोक्त धाता, विधाता, गङ्गा आदि देवोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हरिका आवाहन करके पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ ह्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः आगच्छ।’—इस मन्त्रसे श्रीधरदेवका आवाहन तथा पूजन करना चाहिये।
इस पूजाके पश्चात् ‘ॐ श्रियै नमः’—इस मन्त्रसे लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। ‘ॐ श्रां हृदयाय नमः’ ‘ॐ श्रीं शिरसे नमः’, ‘ॐ श्रूं शिखायै नमः’, ‘ॐ श्रैं कवचाय नमः’, ‘ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय नमः’, ‘ॐ श्रः अस्त्राय नमः’, ‘ॐ शङ्खाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ गदायै नमः’, ‘ॐ श्रीवत्साय नमः’, ‘ॐ कौस्तुभाय नमः’, ‘ॐ वनमालायै नमः’, ‘ॐ पीताम्बराय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ नारदाय नमः’, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’, ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ सत्त्वाय नमः’, ‘ॐ रजसे नमः’, ‘ॐ तमसे नमः’, ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’—इत्यादि मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास, अस्त्र-पूजा तथा उक्त देव-परिवारकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर सपरिकर भगवान् विष्णुका अभिषेक करके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके प्रदक्षिणा करे। मूल मन्त्रका जप १०८ बार करे और किया हुआ जप अभीष्ट देव भगवान् श्रीधरको समर्पित कर दे।
तत्पश्चात् विद्वान् साधकको चाहिये कि मुहूर्तभर अपने हृदयदेशमें स्थित विशुद्ध स्फटिक मणिके समान कान्तिमान्, करोड़ों सूर्यके सदृश प्रभाववाले, प्रसन्नमुख, सौम्य मुद्रावाले, चमचमाते हुए धवल-मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित, सिरपर मुकुटको धारण किये हुए, शुभलक्षणसम्पन्न अङ्गोंवाले तथा वनमालासे अलंकृत परब्रह्मस्वरूप श्रीधरदेवका ध्यान करे।
उसके बाद इन स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति करनी चाहिये—