गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१८- नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरनेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति
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विधान क्यों है ? दसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लिये स्नान क्यों किया जाता है ? दसवें दिन तेल एवं उबटनका प्रयोग क्यों किया जाता है। उस तेल और उबटनका प्रयोग भी एक विशाल जलाशयके तटपर होना अपेक्षित है, इसका क्या कारण है ? दसवें दिन पिण्डदान क्यों करना चाहिये ? एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग आदिके सहित पिण्डदान करनेका क्या प्रयोजन है ? पात्र, पादुका, छत्र, वस्त्र तथा अंगूठी आदि वस्तुओंका दान क्यों दिया जाता है ? तेरहवें दिन पददान क्यों दिया जाता है। वर्षपर्यन्त सोलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं तथा तीन सौ साठ सान्नोदक घट क्यों दिये जाते हैं। प्रेततृप्तिके लिये प्रतिदिन अन्नसे भरे हुए एक घटका दान क्यों करना चाहिये।
हे प्रभो ! मनुष्य अनित्य है और समय आनेपर ही वह मरता है, किंतु मैं उस छिद्रको नहीं देख पाता हूँ, जिससे जीव निकल जाता है ? प्राणीके शरीरमें स्थित किस छिद्रसे पृथ्वी, जल, मन, तेज, वायु और आकाश निकल जाते हैं ? हे जनार्दन ! इसी शरीरमें स्थित जो पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच वायु हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं। लोभ, मोह, तृष्णा, काम और अहंकाररूपी जो पाँच चोर शरीरमें छिपे रहते हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं।
हे माधव ! प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य अथवा पाप जो कुछ भी कर्म करता है, नाना प्रकारके दान देता है, वे सब शरीरके नष्ट हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं। वर्षके समाप्त हो जानेपर भी मरे हुए प्राणीके लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है ? उस प्रेतकृत्यमें (सपिण्डन) प्रेतपिण्डका मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये, इसे आप बतानेकी कृपा करें।
हे हरे ! मूर्च्छासे अथवा पतनसे जिनकी मृत्यु होती है, उनके लिये क्या होना चाहिये। जो पतित मनुष्य जलाये गये अथवा नहीं जलाये गये तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य प्राणी हैं, उनके मरनेपर अन्तमें क्या होना चाहिये। जो मनुष्य पापी, दुराचारी अथवा हतबुद्धि हैं, मरनेके बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं ? जो पुरुष आत्मघाती, ब्रह्महत्यारा, स्वर्णादिकी चोरी करनेवाला, मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकीका क्या होता है ? हे माधव ! जो शूद्र कपिला गौका दूध पीता है अथवा प्रणव महामन्त्रका जप करता है या ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मृत्युके बाद उसकी क्या गति होती है ? हे संसारके स्वामी ! जब कोई शूद्र किसी ब्राह्मणीको पत्नी बना लेता है तो उस पापीसे मैं भी डरता हूँ। आप बतायें कि उस पापीकी क्या दशा होती है ? साथ ही उस पापकर्मके फलको बतानेकी भी कृपा करें।
हे विश्वात्मन् ! आप मेरी दूसरी बातपर भी ध्यान दें। मैं कौतूहलवश वेगपूर्वक लोकोंको देखता हुआ सम्पूर्ण जगत्में जा चुका हूँ, उसमें रहनेवाले लोगोंको मैंने देखा है कि वे सभी दुःखमें ही डूब रहे हैं। उनके अत्यन्त कष्टोंको देखकर मेरा अन्तःकरण पीड़ासे भर गया है। स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय है। पृथ्वीलोकमें मृत्यु और रोगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे लोग दुःखित हैं। पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियोंको मेरे भयसे दुःख बना रहता है*। हे ईश्वर ! आपके इस वैष्णव पद (वैकुण्ठ)-के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी लोकमें ऐसी निर्भयता नहीं दिखायी देती। कालके वशीभूत इस जगत्की स्थिति स्वप्नकी मायाके समान असत्य है। उसमें भी इस भारतवर्षमें
* पाताललोकमें नागोंको गरुडका भय रहता है।
प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४४९
रहनेवाले लोग बहुत-से दुःखोंको भोग रहे हैं। मैंने वहाँ देखा है कि उस देशके मनुष्य राग-द्वेष तथा मोह आदिमें आकण्ठ डूबे हुए हैं। उस देशमें कुछ लोग अन्धे हैं, कुछ टेढ़ी दृष्टिवाले हैं, कुछ दुष्ट वाणीवाले हैं, कुछ लूले हैं, कुछ लँगड़े हैं, कुछ काने हैं, कुछ बहरे हैं, कुछ गूँगे हैं, कुछ कोढ़ी हैं, कुछ लोमश (अधिक रोमवाले) हैं, कुछ नाना रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश-कुसुमकी तरह नितान्त मिथ्या अभिमानसे चूर हैं। उनके विचित्र दोषोंको देखकर तथा उनकी मृत्युको देखकर मेरे मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी है कि यह मृत्यु क्या है? इस भारतवर्षमें यह कैसी विचित्रता है? ऋषियोंसे मैंने पहले ही इस विषयमें सामान्यतः यह सुन रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होती हैं, उसकी दुर्गति होती है। फिर भी हे प्रभो! इसकी विशेष जानकारीके लिये मैं आपसे पूछ रहा हूँ।
हे उपेन्द्र! मनुष्यकी मृत्युके समय उसके कल्याणके लिये क्या करना चाहिये? कैसा दान देना चाहिये। मृत्यु और श्मशान-भूमितक पहुँचनेके बीच कौन-सी विधि अपेक्षित है। चितामें शवको जलानेकी क्या विधि है? तत्काल अथवा विलम्बसे उस जीवको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती है, यमलोक (संयमनी नगरी)-को जानेवालेके लिये वर्षपर्यन्त कौन-सी क्रियाएँ करनी चाहिये। दुर्बुद्धि अर्थात् दुराचारी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है? पञ्चक आदिमें मृत्यु होनेपर पञ्चकशान्तिके लिये क्या करना चाहिये। हे देव! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आप मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। मैंने आपसे यह सब लोकमङ्गलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकी कृपा करें। (अध्याय १)
मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन
श्रीकृष्णने कहा— हे भद्र! आपने मनुष्योंके हितमें बहुत ही अच्छी बात पूछी है। सावधान होकर इस समस्त और्ध्वदेहिक क्रियाको भलीभाँति सुनें।
हे गरुड! जो सम्यक् रूपसे भेदरहित है, जिसका वर्णन श्रुतियों और स्मृतियोंमें हुआ है, जिसको इन्द्रादि देवता, योगीजन और योगमार्गका चिन्तन करनेवाले विद्वान् नहीं देख सके हैं, जो गुह्यातिगुह्य है, ऐसे उस प्रधान तत्त्वको जिसे मैंने अभीतक किसी अन्यसे नहीं कहा है, तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
हे वैनतेय! इस संसारमें पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं है, उसको स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है। अतः शास्त्रानुसार यथायोग्य उपायसे पुत्र उत्पन्न करना ही चाहिये। यदि मनुष्यको मोक्ष नहीं मिलता है तो पुत्र नरकसे उसका उद्धार कर देता है। पुत्र और पौत्रको मरे हुए प्राणीको कन्धा देना चाहिये तथा उसका यथाविधान अग्निदाह करना चाहिये। शवके नीचे पृथ्वीपर तिलके सहित कुश बिछानेसे शवकी आधारभूत भूमि उस ऋतुमती नारीके समान हो जाती है, जो प्रसवकी योग्यता रखती है। मृतकके मुखमें पञ्चरत्न डालना बीजवपनके समान है, जिससे आगे जीवकी शुभगतिका निश्चय होता है। जैसे पुष्प (ऋतुकालमें स्त्रियोंका रजोदर्शन) न होनेपर गर्भधारण सम्भव नहीं है, वैसे ही शवभूमि भी तिल-कुश आदिके बिना जीवकी शुभ योनिमें
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कारण नहीं बन पाती। इसीलिये श्रद्धापूर्वक तिल, कुश, पञ्चरत्न आदिका यथाविधान विनियोग आवश्यक है।
गोबरसे भूमिको सबसे पहले लीपना चाहिये, तदनन्तर उसके ऊपर तिल और कुश बिछाना चाहिये। उसके बाद आतुर व्यक्तिको भूमिपर कुशासनके ऊपर सुला देना चाहिये। ऐसा करनेसे वह प्राणी अपने समस्त पापोंको जला कर पापमुक्त हो जाता है। शवके नीचे बिछाये गये कुशसमूह निश्चित ही मृत्युग्रस्त प्राणीको स्वर्ग ले जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। जहाँ पृथ्वीपर मल-मूत्रादिका लेप (सम्बन्ध) नहीं है वहाँ वह सदा पवित्र है और जहाँ (मल-मूत्रादिका) लेप (सम्बन्ध) है, वहाँ (मल-मूत्रादिका अपसारण करके) गोमयसे लेप करनेपर वह शुद्ध होती है। गोबरसे बिना लिपी हुई भूमिपर सुलाये गये मरणासन्न व्यक्तिमें यक्ष, पिशाच एवं राक्षस-कोटिक क्रूरकर्मी दुष्ट लोग प्रविष्ट हो जाते हैं। मरणासन्नकी मुक्तिके लिये उसे जलसे बनाये गये मण्डलवाली भूमिपर ही सुलाना चाहिये, क्योंकि नित्य-होम, श्राद्ध, पादप्रक्षालन, ब्राह्मणोंकी अर्चा एवं भूमिक मण्डलीकरण मुक्तिके हेतु माने गये हैं। बिना लिपी-पुती मण्डलहीन भूमिपर मरणासन्न व्यक्तिको नहीं सुलाना चाहिये। भूमिपर बनाये गये ऐसे मण्डलमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लक्ष्मी तथा अग्नि आदि देवता विराजमान हो जाते हैं, अतः मण्डलका निर्माण अवश्य करना चाहिये। मण्डलविहीन भूमिपर प्राण-त्याग करनेपर वह चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे जवान हो, उसको अन्य योनि नहीं प्राप्त होती है। हे तार्क्ष्य! उसकी जीवात्मा वायुके साथ भटकती रहती है। उस प्रकारकी वायुभूत जीवात्माके लिये न तो श्राद्धका विधान है और न तो जलतर्पणकी क्रिया ही बतायी गयी है।
हे गरुड! तिल मेरे पसीनेसे उत्पन्न हुए हैं। अतः तिल बहुत ही पवित्र हैं। तिलका प्रयोग करनेपर असुर, दानव और दैत्य भाग जाते हैं। तिल श्वेत, कृष्ण और गोमूत्रवर्णके समान होते हैं। 'वे मेरे शरीरके द्वारा किये गये समस्त पापोंको नष्ट करें।' ऐसी भावना करनी चाहिये। एक ही तिलका दान स्वर्णके बत्तीस सेर तिलके दानके समान है। तर्पण, दान एवं होममें दिया गया तिलका दान अक्षय होता है। कुश मेरे शरीरके रोमोंसे उत्पन्न हुए हैं और तिलकी उत्पत्ति मेरे पसीनेसे हुई है। इसीलिये देवताओंकी तृप्तिके लिये मुख्यरूपसे कुशकी और पितरोंकी तृप्तिके लिये तिलकी आवश्यकता होती है। देवताओं और पितरोंकी तृप्ति विश्वके लिये उपजीव्य (रक्षक) होनेके कारण विश्वकी तृप्तिमें हेतु है। अतः अपसव्य आदि श्राद्धकी जो विधियाँ बतायी गयी हैं, उन्हीं विधियोंके अनुसार मनुष्यको ब्रह्मा, देवदेवेश्वर तथा पितृजनोंको संतृप्त करना चाहिये। अपसव्य आदि होकर [तिलका उपयोग करनेसे] ब्रह्मा, पितर और देवेश्वर तृप्त होते हैं। अपसव्य होकर कर्म करनेसे पितरोंकी संतृप्ति होती है²।
१-यहाँ मण्डलका तात्पर्य है—जलसे प्रोक्षणके बाद जलसे गोलाकार रेखा बना देना और चौक आदि पूरना।
२-मम स्वेदसमुद्भूतास्तिलास्तार्थ्य पवित्रकाः। असुरा दानवा दैत्या विद्रवन्ति तिलैस्तथा ॥
तिलाः श्वेतास्तिला कृष्णास्तिला गोमूत्रसंनिभाः। दहन्तु ते मे पापानि शरीरेण कृतानि वै ॥
एक एव तिलो दत्तो हेमद्रोणतिलैः समः। तर्पणे दानहोमेषु दत्तो भवति चाक्षयः ॥
दर्भा रोमसमुद्भूतास्तिलाः स्वेदेषु नान्यथा। देवता दानवास्तृप्ताः श्राद्धेन पितरस्तथा ॥
प्रयोगविधिना ब्रह्मा विश्वं चाप्युपजीवनात्। अपसव्यादितो ब्रह्मा पितरो देवदेवताः ॥
तेन ते पितरस्तृप्ता अपसव्ये कृते सति। (२।१६-२१)
प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४५१
कुशके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें विष्णु तथा अग्रभागमें शिवको जानना चाहिये; ये तीनों देव कुशमें प्रतिष्ठित माने गये हैं। हे पक्षिराज ! ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि और तुलसी—ये बार-बार समर्पित होनेपर भी पर्युषित नहीं माने जाते, कभी निर्माल्य अर्थात् बासी नहीं होते। इनका पूजामें बारम्बार प्रयोग किया जा सकता है। हे खगेन्द्र ! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशीव्रत—ये पाँचों संसारसागरमें डूबते हुए लोगोंको नौकाके समान पार कराते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ ! विष्णु, एकादशीव्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ—ये छह इस असार-संसारमें लोगोंको मुक्ति प्रदान करनेके साधन हैं, यह षट्पदी कहलाती है—
दर्भमूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः ॥
दर्भाग्रे शंकरं विद्यात् त्रयो देवाः कुशे स्मृताः।
विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर ॥
नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः।
तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग ॥
पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम्।
विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः ॥
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।
(२। २१—२५)
जैसे तिलकी पवित्रता अतुलनीय होती है, उसी प्रकार कुश और तुलसी भी अत्यन्त पवित्र होते हैं। ये तीनों पदार्थ मरणासन्न व्यक्तिको दुर्गतिसे उबार लेते हैं*। दोनों हाथोंसे कुश उखाड़ना चाहिये और उसे पृथ्वीपर रखकर जलसे प्रोक्षित करना चाहिये तथा मृत्युकालमें मरणासन्नके दोनों हाथोंमें रखना चाहिये। जिसके हाथोंमें कुशाएँ हैं और जो कुशसे परिवेष्टित कर दिया जाता है, वह मन्त्रहीन होनेपर (उसकी समन्त्रक क्रियाएँ न हो पायी हों, तब) भी विष्णुलोकको प्राप्त करता है। इस असार संसारसागरमें भूमिको गोबरसे लीपकर उसपर मृत मनुष्यको सुलानेसे और कुशासनपर स्थित करनेसे तथा विशुद्ध अग्निमें दाह करनेसे उसके समस्त पापोंका नाश हो जाता है।
लवण और उसका रस दिव्य (उत्तम लोकका प्रापक) है, वह प्राणियोंकी समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। लवणके बिना अन्न-रस उत्कट अर्थात् न अभिव्यक्त होते हैं और न सुस्वादु होते हैं। इसीलिये लवण-रस पितरोंको प्रिय होता है और स्वर्गको प्रदान करनेवाला है। यह लवण-रस भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है। इस बातको जाननेवाले योगीजन, लवणके साथ दान करनेको कहते हैं। इस पृथ्वीपर यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री तथा शूद्र वर्णके आतुर व्यक्तिके प्राण न निकलते हों तो उसके लिये स्वर्गका द्वार खोलनेके लिये लवणका दान देना चाहिये।
हे पक्षीन्द्र ! अब मृत्युके स्वरूपको विस्तारपूर्वक सुनें। मृत्यु ही काल है, उसका समय आ जानेपर जीवात्मासे प्राण और देहका वियोग हो जाता है। मृत्यु अपने समयपर आती है। मृत्युकष्टके प्रभावसे प्राणी अपने किये कर्मोंको एकदम भूल जाता है। हे गरुड ! जिस प्रकार वायु मेघमण्डलोंको इधर-उधर खींचता है, उसी प्रकार प्राणी कालके वशमें रहता है। सात्त्विक, राजस और तामस—ये सभी भाव कालके वशमें हैं। प्राणियोंमें वे कालके अनुसार अपने-अपने प्रभावका विस्तार करते हैं। हे सर्पहन्ता गरुड ! सूर्य, चन्द्र, शिव, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, औषधि, आठों वसु, नदी, सागर और भाव-अभाव—ये सभी कालके अनुसार यथासमय उद्भूत होते हैं, बढ़ते हैं, घटते
* तिलाः पवित्रमतुलं दर्भाश्चापि तुलस्यथ ॥
निवारयन्ति चैतानि दुर्गतिं यान्तमातुरम् ॥ (२। २५-२६)
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[बायाँ स्तम्भ]
हैं और मृत्युके उपस्थित होनेपर कालके प्रभावसे विनष्ट हो जाते हैं।
हे पक्षिन्! जब मृत्यु आ जाती है तो उसके कुछ समय पूर्व दैवयोगसे कोई रोग प्राणीके शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं और बल, ओज तथा वेग शिथिल हो जाता है। हे खग! प्राणियोंको करोड़ों बिच्छुओंके एक साथ काटनेका जो अनुभव होता है, उससे मृत्युजनित पीड़ाका अनुमान करना चाहिये। उसके बाद ही चेतनता समाप्त हो जाती है, जड़ता आ जाती है। तदनन्तर यमदूत उसके समीप आकर खड़े हो जाते हैं और उसके प्राणोंको बलात् अपनी ओर खींचना शुरू कर देते हैं। उस समय प्राण कण्ठमें आ जाते हैं। मृत्युके पूर्व मृतकका रूप बीभत्स हो उठता है। वह फेन उगलने लगता है। उसका मुँह लारसे भर जाता है। उसके बाद शरीरके भीतर विद्यमान रहनेवाला वह अङ्गुष्ठ-परिमाणका पुरुष हाहाकार करता हुआ तथा अपने घरको देखता हुआ यमदूतोंके द्वारा यमलोक ले जाया जाता है।
मृत्युके समय शरीरमें प्रवाहित वायु प्रकुपित होकर तीव्र गतिको प्राप्त करता है और उसीकी शक्तिसे अग्नितत्त्व भी प्रकुपित हो उठता है। बिना ईंधनके प्रदीप्त ऊष्मा प्राणीके मर्मस्थानोंका भेदन करने लगती है, जिसके कारण प्राणीको अत्यन्त कष्टकी अनुभूति होती है। परंतु भक्तजनों एवं भोगमें अनासक्त जनोंकी अधोगतिका निरोध करनेवाला उदान नामक वायु ऊर्ध्वगतिवाला हो जाता है।
जो लोग झूठ नहीं बोलते, जो प्रीतिका भेदन नहीं करते, आस्तिक और श्रद्धावान् हैं, उन्हें सुखपूर्वक मृत्यु प्राप्त होती है। जो काम, ईर्ष्या और द्वेषके कारण स्वधर्मका परित्याग न करे,
[दायाँ स्तम्भ]
सदाचारी और सौम्य हो, वे सब निश्चित ही सुखपूर्वक मरते हैं।
जो लोग मोह और अज्ञानका उपदेश देते हैं, वे मृत्युके समय महान्धकारमें फँस जाते हैं। जो झूठी गवाही देनेवाले, असत्यभाषी, विश्वासघाती और वेदनिन्दक हैं, वे मूर्च्छारूपी मृत्युको प्राप्त करते हैं। उनको ले जानेके लिये लाठी एवं मुद्गरसे युक्त दुर्गन्धसे भरपूर एवं भयभीत करनेवाले दुरात्मा यमदूत आते हैं। ऐसी भयंकर परिस्थिति देखकर प्राणीके शरीरमें भयवश कम्पन होने लगता है। उस समय वह अपनी रक्षाके लिये अनवरत माता-पिता और पुत्रको यादकर करुण-क्रन्दन करता है। उस क्षण प्रयास करनेपर भी ऐसे जीवके कण्ठसे एक शब्द भी स्पष्ट नहीं निकलता। भयवश प्राणीकी आँखें नाचने लगती हैं। उसकी साँस बढ़ जाती है और मुँह सूखने लगता है। उसके बाद वेदनासे आविष्ट होकर वह अपने शरीरका परित्याग करता है और उसके बाद ही वह सबके लिये अस्पृश्य एवं घृणायोग्य हो जाता है।
हे गरुड! इस प्रकार मैंने यथाप्रसंग मृत्युका
प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४५३
स्वरूप सुना दिया। अब आपके उस दूसरे प्रश्नका उत्तर जो बड़ा ही विचित्र है, उसे सुना रहा हूँ। हे पक्षिराज! पूर्वजन्ममें किये गये भाँति-भाँतिके भोगोंको भोगता हुआ प्राणी यहाँ भ्रमण करता रहता है। देव, असुर और यक्ष आदि योनियाँ भी प्राणीके लिये सुखप्रदायिनी हैं। मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियाँ अत्यन्त दुःखदायिनी हैं। हे खगेश्वर! प्राणीको कर्मका फल तारतम्यसे इन योनियोंमें प्राप्त होता है। अब मैं इसी प्रसंगमें आपसे कर्मविपाकका वर्णन भी करूँगा।
हे गरुड! प्राणी अपने सत्कर्म एवं दुष्कर्मके फलोंकी विविधताका अनुभव करनेके लिये इस संसारमें जन्म लेता है। जो महापातकी ब्रह्महत्यादि महापातकजन्य अत्यन्त कष्टकारी रौरवादि नरकलोकोंका भोग भोगकर कर्मक्षयके बाद पुनः इस पृथ्वीपर जिन लक्षणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं, उन लक्षणोंको आप मुझसे सुनें।
हे खगेन्द्र! ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले महापातकीको मृग, अश्व, सूकर और ऊँटकी योनि प्राप्त होती है। स्वर्णकी चोरी करनेवाला कृमि, कीट और पतंग-योनिमें जाता है, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवालेका जन्म क्रमशः—तृण, लता और गुल्म-योनिमें होता है। ब्रह्मघाती क्षयरोगका रोगी, मद्यपी विकृतदन्त, स्वर्णचोर कुनखी और गुरुपत्नीगामी चर्मरोगी होता है। जो मनुष्य जिस प्रकारके महापातकियोंका साथ करता है, उसे भी उसी प्रकारका रोग होता है। प्राणी एक वर्षपर्यन्त पतित व्यक्तिका साथ करनेसे स्वयं पतित हो जाता है। परस्पर वार्तालाप करने तथा स्पर्श, निःश्वास, सहयान, सहभोज, सहआसन, याजन, अध्यापन तथा योनि-सम्बन्धसे मनुष्योंके शरीरमें पाप संक्रमित हो जाते हैं*। दूसरेकी स्त्रीके साथ सहवास करने और ब्राह्मणका धन चुरानेसे मनुष्यको दूसरे जन्ममें अरण्य तथा निर्जन देशमें रहनेवाले ब्रह्मराक्षसकी योनि प्राप्त होती है। रत्नकी चोरी करनेवाला निकृष्ट योनिमें जन्म लेता है। जो मनुष्य वृक्षके पत्तोंकी और गन्धकी चोरी करता है, उसे छछुंदरकी योनिमें जाना पड़ता है। धान्यकी चोरी करनेवाला चूहा, यान चुरानेवाला ऊँट तथा फलकी चोरी करनेवाला बंदरकी योनिमें जाता है। बिना मन्त्रोच्चारके भोजन करनेपर कौआ, घरका सामान चुरानेवाला गिद्ध, मधुकी चोरी करनेपर मधुमक्खी, फलकी चोरी करनेपर गिद्ध, गायकी चोरी करनेपर गोह और अग्निकी चोरी करनेपर बगुलेकी योनि प्राप्त होती है। स्त्रियोंका वस्त्र चुरानेपर श्वेत कुष्ठ और रसका अपहरण करनेपर भोजन आदिमें अरुचि हो जाती है। काँसेकी चोरी करनेवाला हंस, दूसरेके धनका हरण करनेवाला अपस्मार रोगसे ग्रस्त होता है तथा गुरुहन्ता क्रूरकर्मा बौना और धर्मपत्नीका परित्याग करनेवाला शब्दवेधी होता है। देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाला, दूसरेका मांस खानेवाला पाण्डुरोगी होता है। भक्ष्य और अभक्ष्यका विचार न रखनेवाला अगले जन्ममें गण्डमाला नामक महारोगसे पीड़ित होता है। जो दूसरेकी धरोहरका अपहरण करता है, वह काना होता है। जो स्त्रीके बलपर इस संसारमें जीवन-यापन करता है, वह दूसरे जन्ममें लँगड़ा होता है। जो मनुष्य पतिपरायणा अपनी पत्नीका परित्याग करता है, वह दूसरे जन्ममें दुर्भाग्यशाली होता है। अकेला मिष्टान्न खानेवाला वातगुल्मका रोगी होता है। कोई व्यक्ति यदि किसी ब्राह्मणपत्नीके साथ सहवास करे तो शृगाल, शय्याका हरण करनेवाला दरिद्र, वस्त्रका हरण करनेवाला पतंग होता है। मात्सर्य-दोषसे युक्त होनेपर प्राणी जन्मान्ध, दीपक
* संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानाशनासनात्। याजनाध्यापनाद्यौनात् पापं संक्रमते नृणाम्॥ (२।६५)
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किये हुए अशुभ कर्मोंका फल