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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१७२- विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन

३४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

किया गया धत्तूरके चूर्णके लेपका उबटन लगानेसे मनुष्यके शरीरमें स्थित ग्रीष्मबाधा दूर हो जाती है। प्रातःकाल गरम दूधकी भापसे शरीर-सेंक करनेपर घर्मदोष (स्वेदाधिक्य) नष्ट हो जाता है। काकजंघाका उबटन शरीरके लिये सुन्दर अनुलेपन द्रव्य है।

मुलेठी, शर्करा, अडूसाका रस और मधुका सेवन करनेसे रक्त-पित्त, कामला और पाण्डु रोगका विनाश होता है। अडूसाका रस और मधु पीनेसे रक्त-पित्त-विकार दूर हो जाता है।

प्रातःकाल मात्र जल पीकर भयंकर पीनस रोगको दूर करना चाहिये। हे महेश्वर! बहेड़ा, पिप्पली और सेंधा नमकका चूर्ण, कांजीके साथ पान करनेसे मनुष्यका स्वरभेद दूर हो जाता है। इस दोषके होनेपर मैनसिल, बलामूल, बेरकी पत्ती, गुग्गुल तथा आँवलेका चूर्ण गोदुग्धमें मिलाकर पान करना चाहिये।

हे परमेश्वर ! चमेलीकी पत्ती, बेरकी पत्ती और मैनसिल—इनकी बत्ती बनाकर उसे बेरकी अग्निमें सेंककर धूम्रपान करनेसे कास रोग दूर हो जाता है। त्रिफला और पिप्पलीका चूर्ण मधुके साथ खाना चाहिये। भोजन करनेके पूर्व मधुके साथ प्रयुक्त यह औषधिक योग प्यास और ज्वरके दोषको शान्त करता है। बिल्वकी जड़ तथा गुडूचीका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे तीनों प्रकारके छर्दि रोग विनष्ट हो जाते हैं। चावलके धोवनमें दूर्वारसको मिलाकर पीनेसे भी छर्दि रोग दूर हो जाता है। (अध्याय १९०)


सर्प, बिच्छू तथा अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे वृषध्वज! पुष्यनक्षत्रमें पुनर्नवाकी श्वेत जड़ लाकर जलके साथ पीनेसे पीनेवालेके आस-पास और घरोंमें सर्प नहीं आ सकते। जो मनुष्य भालूके दाँतमें तार्क्ष्य (गरुड)-की मूर्ति बनाकर धारण करता है, वह सर्पोंके लिये जीवनपर्यन्त अदृश्य हो जाता है। हे रुद्र! जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रमें सेमरकी जड़को जलमें पीसकर पी लेता है, उसके ऊपर किया गया विषैले सर्पोंके दाँतोंका प्रहार व्यर्थ हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पुष्यनक्षत्रमें लाजवन्तीकी जड़ हाथमें बाँधनेसे अथवा उसके लेपको लगाकर भी सर्पोंको पकड़ा जा सकता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। पुष्यनक्षत्रमें लायी गयी सफ़ेद मन्दारकी जड़को शीतल जलमें पीसकर पान करनेसे सर्पदंश तथा करवीर आदिका विष नष्ट हो जाता है। कांजीके साथ महाकालकी जड़ पीसकर उसका लेप दंश-भागपर लगानेसे वोड्र (गोनस) तथा डुंडुभ (पनिहा) सर्पोंका विष दूर होता है।

चौलाईके मूलको चावलके धोवनमें पीसकर घीके साथ पान करनेपर सभी प्रकारके विष नष्ट हो जाते हैं। नीली तथा लाजवन्तीकी जड़ पृथक्-पृथक् अथवा संयुक्त-रूपसे चावलके धोवनमें पीसकर पान करनेपर सभी प्रकारके सर्पोंके दंशका विष नष्ट हो जाता है। गुड़, शर्करा तथा दुग्धमिश्रित कूष्माण्डके रसका पान सर्पदंशके विषको दूर कर देता है। कोदोकी जड़ पीसकर पान करनेसे विषकी मूर्च्छा दूर हो जाती है। मुलेठीके चूर्णसे युक्त शर्करा और दूध तीन राततक पीकर चूहेके विषको दूर किया जा सकता है। तीन चुल्लू शीतल जल पीनेसे ताम्बूल खानेके कारण जलनयुक्त मुँहसे बहनेवाली लार बंद हो जाती है। शर्करासे युक्त घृतका पान करनेसे मद्यका मद नहीं होता।

हे महेश्वर! कृष्णा (काली तुलसी) और अंकोलकी जड़के क्वाथको तीन राततक पीनेसे

काण्ड ] विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार ३४७


सामान्य अथवा कृत्रिम विषका प्रभाव नष्ट हो जाता है। सेंधा नमकके साथ गरम गोघृतका पान बिच्छूके डंक मारनेसे शरीरमें उत्पन्न विषकी वेदनाको दूर करता है। हे शिव ! कुसुम्भ (कुसुम), कुंकुम, हरिताल, मैनसिल, कंजा और मन्दार-वृक्षकी जड़ पीसकर पान करनेसे मनुष्योंमें चढ़ा हुआ सर्प या बिच्छूका विष नष्ट हो जाता है। हे हर ! दीपकका तेल लगानेसे सामान्य ततैया आदि कीटोंका विष दूर हो जाता है। इससे कनखजूरेका भी विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। बिच्छूके डंक लगे हुए स्थानपर सोंठ तथा तगरका लेप लगानेसे विष नष्ट हो जाता है। इसी लेपसे मधुमक्खीके डंकका भी विष दूर किया जा सकता है तथा सोया, सेंधा नमक और घृतका मिश्रित लेप लगानेसे भी वह विष दूर हो जाता है। हे महादेव ! शिरीषके बीजोंको गरम दूधमें घिसकर उसका लेप लगानेसे कुत्तेका विष नष्ट हो जाता है। प्रज्वलित अग्नि और उष्ण जलसे सेंकनेपर मेढकका विष दूर हो जाता है। हे चन्द्रचूड ! धत्तूरके रससे मिश्रित दूध, घी और गुड़का पान कुत्तेके विषको नष्ट कर देता है।

बरगद, नीम और शमी वृक्षकी छालके क्वाथसे सेंक करनेपर मुख और दाँतकी विष-वेदना नष्ट हो जाती है। देवदारु और गैरिकके चूर्णका लेप करनेसे भी इस विषको शान्त किया जा सकता है। हे हर ! नागेश्वर, दारुहल्दी, हल्दी तथा मजीठके मिश्रित लेपसे लूता (मकड़ी)-के काटनेका विष दूर होता है। कंजेके बीज, वरुण-वृक्षके पत्ते, तिल और सरसोंका पिसा हुआ लेप भी विषको दूर कर देता है, इसमें संदेह नहीं है।

हे हर ! नमक और घृतसे युक्त घृतकुमारीके पत्तेका लेप करनेसे घोड़ेके शरीरकी खुजली दस दिनमें दूर हो जाती है। (अध्याय १९१)


विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मी-घृतादिके निर्माणकी विधि

श्रीहरिने कहा— [हे हर !] चित्रक आठ भाग, शूरण (सूरन) सोलह भाग, सोंठ चार भाग, काली मिर्च दो भाग, पिप्पलीमूल तीन भाग, विडंग चार भाग, मुशली आठ भाग और त्रिफला चार भाग लेकर इनके दुगुने गुड़के साथ मोदक बनाना चाहिये। इसके सेवनसे अजीर्ण, पाण्डु, कामला, अतिसार, मन्दाग्नि और प्लीहा नामक रोगोंको दूर किया जा सकता है।

बिल्व (बेल), अग्निमन्थ (गनियारी), श्योनाक (सोना पाढ़ा), पाटला (पाढर), पारिभद्रक (नीम), प्रसारिणी (गन्धप्रसारिणी), अश्वगन्धा, बृहती, कण्टकारी, बला, अतिबला, रास्ना (सर्पसुगन्धा), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), पुनर्नवा, एरण्ड, शारिवा (अनन्तमूल), पर्णी (शालपर्णी), गुडूची, कपिकच्छुका (केवाँच) नामक इन औषधियोंको दस-दस पलकी मात्रामें एकत्र करके शुद्ध जलमें पकाना चाहिये। जब उस जलका चौथाई भाग शेष रह जाय तो उससे तेलको सिद्ध करे। यदि बकरीका दूध अथवा गौका दूध हो तो उसको उस तैलपाकमें चौगुना मिलाकर तेलकी मात्राके समान शतावरी और सेंधा नमक भी मिलाये। इस प्रकार तैलपाकको सिद्ध करनेके पश्चात् उस तेलमें शतपुष्पा (सोया), देवदारु, बला, पर्णी, वचा (वच), अगुरु, कुष्ठ (कूट), जटामांसी, सेंधा नमक और पुनर्नवा एक-एक पल पीसकर मिलाना चाहिये। इस तेलका प्रयोग पीने, नस्य लेने तथा शरीरमें