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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१६४- पटल आदि नेत्ररोग, गुल्म, दन्तकृमि, विविध ज्वर तथा विषदोष-शमनके उपाय

३३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नीमकी पत्तियाँ, पिप्पली, काली मिर्च, विडंगभद्र, मोथा और सोंठ—इन सात औषधियोंको गोमूत्रके साथ पीसकर वटी बना लेना चाहिये। इसकी एक वटी अजीर्ण और दो वटी विषूचिका (हैजा) नामक रोगको दूर करती है। मधुके साथ इसको घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे पटोल अर्थात् परवलके समान आयी हुई सूजन दूर हो जाती है। गोमूत्रके साथ प्रयुक्त होनेपर अर्बुद (कैंसर) नामक रोगका नाश करती है। यह शंकरी वटी नेत्रोंके सभी रोग दूर करती है।

वच, जटामांसी, बिल्व, तगर, पद्मकेसर, नागकेसर और प्रियंगुको समान भागमें लेकर उनका चूर्ण बना लेना चाहिये। इस चूर्णका धूप लेनेसे मनुष्य रूप-सौन्दर्यसे समन्वित हो जाता है।

अर्जुन-वृक्षके फूल, भिलावा, विडंग, बला, राल, सौवीर और सरसोंके योगसे तैयार धूप सर्प, जुएँ, मक्खी तथा मच्छरोंको विनष्ट करता है।

श्रीहरिने पुनः कहा—हे शिव ! ताम्बूल, घृत, मधु तथा नमकको गोदुग्धके साथ ताम्रपात्रमें घिसकर सिद्ध किया गया अञ्जन नेत्रपीड़ाको दूर करनेका उत्तम योग है। खाँसी, श्वास तथा हिचकीका विकार होनेपर हरीतकी, वच, कूट, त्रिकटु अर्थात् विश्वा, उपकल्या, मरिच, हींग और मैनसिल-चूर्णको मधु तथा घृतमें मिलाकर चाटना चाहिये। | पिप्पली और त्रिफलाके चूर्णको मधुके साथ चाटनेसे भयंकर पीनस, खाँसी और श्वासके विकार नष्ट हो जाते हैं। हे वृषध्वज ! मूलसहित चित्रक तथा पिप्पलीके चूर्णको मधुमें मिलाकर चाटना चाहिये। यह श्वास, खाँसी और हिचकीको नष्ट कर देता है।

चावलके जलमें समान भागमें पिसा हुआ नीलकमल, शर्करा, मधु तथा रक्तकमलका योग रक्तविकारको शान्त करता है।

सोंठ, शर्करा और मधु मिलाकर बनायी गयी गुटिका खानेमात्रसे मनुष्यका स्वर कोयलके समान हो जाता है।

हरिताल, शंखचूर्ण, केलेके पत्तेका भस्म—इनका उबटन लगानेसे बाल गिर जाते हैं। लवण, हरिताल, लौकी और लाक्षारससे युक्त उबटन भी रोम गिरानेका उत्तम योग है। सुधा, हरिताल, शंखभस्म तथा मैनसिलको सेंधा नमक एवं बकरेके मूत्रमें मिलाकर पीसकर और उसी क्षण उससे उबटन करनेसे रोम गिर जाते हैं। यह उत्तम औषधि है।

शंख, आँवलेकी पत्तियाँ और धातकीके पुष्पोंको दूधके साथ पीसकर उसे डेढ़ सप्ताहतक मुखमें रखनेसे दाँत चिकने, सफेद तथा स्वच्छ और कान्तिसे युक्त हो जाते हैं। (अध्याय १७८-१८१)


भोज्य पदार्थोंका विहित सेवनकाल, बल-बुद्धिवर्धक औषधियाँ तथा विषदोषशमनके उपाय

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! प्रायः शरद्, ग्रीष्म और वसन्त-ऋतुमें दहीका उपभोग निन्दनीय है तथा हेमन्त, शिशिर एवं वर्षा-ऋतुमें दही प्रशस्त होता है— | शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम्।<br>हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते॥<br>(१८२। १)<br>भोजन करनेके पश्चात् नवनीत (मक्खन)-के

काण्ड ] ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार ३३७


साथ शर्कराका पान करना बुद्धिकारक होता है। हे शिव ! यदि पुरुष एक पल पुराना गुड़ प्रतिदिन (भोजन करनेके पश्चात्) खाता रहे तो वह बलवान् होकर अनेक स्त्रियोंसे सम्पर्क करनेकी क्षमता प्राप्त कर लेता है।

कुष्ठ (कूट)-को भलीभाँति चूर्ण करके घृत और मधुके साथ सोनेके समय खानेसे बलीपलित दूर हो जाता है। अलसी, उड़द, गेहूँ तथा पिप्पलीका चूर्ण घृतके साथ शरीरमें लगानेसे मनुष्य कामदेवके सदृश सौन्दर्यसम्पन्न हो जाता है।

यव, तिल, अश्वगन्धा, मूसली, सरला (काली तुलसी) और गुड़को परस्पर मिलाकर बनायी गयी वटी खानेसे मनुष्य तरुण तथा बलवान् हो जाता है। हींग, काला नमक और सोंठका काढ़ा बनाकर पीनेसे परिणाम नामक शूल और अजीर्ण रोग विनष्ट हो जाता है। धातकी (धवका फूल) तथा सोमराजी (औषधि) गोदुग्धके साथ पीसकर पान करनेसे दुर्बल मनुष्य भी मोटा हो जाता है। शक्ति चाहनेवाले प्राणीको शर्करा तथा मधुके साथ मक्खन खाना चाहिये। क्षयरोगसे पीड़ित व्यक्तिको दुग्धपान पुष्ट तथा बुद्धिको अत्यधिक प्रखर बना सकता है। गोदुग्धके साथ पान किया गया कुलीरका चूर्ण क्षयरोगको विनष्ट करता है।

भिलावा, विडंग, यवक्षार, सेंधा नमक, मैनसिल तथा शंखचूर्णको तेलमें पकाकर अनपेक्षित रोमसामूहोंको हटानेके लिये उसका प्रयोग करना चाहिये।

मुण्डीत्वक् (गोरखमुण्डी), वच, मोथा, काली मिर्च तथा तगरको एक साथ चबाकर मनुष्य तत्काल ही जिह्वासे अग्निको चाट सकता है। गोरोचन, भृंगराजका चूर्ण एवं घृत समान मात्रामें मिलाकर जलस्तम्भन किया जा सकता है।

हे महेश्वर! यष्टि-मधु (मुलेठी) एक पल, उष्ण जलके साथ पान करनेसे विष्टम्भिका तथा हृदयशूल नामक रोग नष्ट हो जाता है।

हे रुद्र! ‘ॐ हूं जः’ यह मन्त्र सभी प्रकारके बिच्छुओंका विष नष्ट करता है। पिप्पली, मक्खन, शृंगवेर, सेंधा नमक, कालीमिर्च, दही और कूटका नस्य लेने तथा उसका पान करनेपर वह विषदोषको दूर करता है। हे शिव ! त्रिफला, अदरक, कूट और चन्दनको घृतमें मिलाकर पान करने और लेप करनेसे बिच्छूका विष विनष्ट होता है। हे वृषभध्वज ! सेंधा नमक और त्रिकटुके चूर्णको दही, मधु तथा घृतमें मिलाकर लेप करनेसे यह बिच्छूके विषको दूर कर देता है।

हे रुद्र! ब्रह्मदण्डी और तिलका क्वाथ बनाकर उसके साथ त्रिकटु (सोंठ, पिप्पली तथा काली मिर्च) का चूर्ण पान करना चाहिये। यह सभी प्रकारके गुल्म एवं ऋतुकालीन अवरुद्ध रक्त-विकारका विनाशक है। मधु मिलाकर दूधका पान करनेसे रक्तस्रावके विकारको दूर किया जा सकता है। जंगली अडूसेकी जड़को पीसकर प्रसवकालमें स्त्रीके नाभि एवं गुह्यभागमें लेप करनेसे स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है।

हे वृषध्वज ! चावलके पानीमें शर्करा और मधु मिलाकर पान करनेसे रक्तातिसार नामक रोग शान्त हो जाता है।
(अध्याय १८२)


ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार

श्रीहरिने कहा— हे चन्द्रचूड! काली मिर्च, शृंगवेर और कुटजकी छालका पान करनेसे ग्रहणीरोग नष्ट होता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, काली मिर्च,तगर, वच, देवदारुका रस और पाठाको दूधके साथ पीसकर सेवन करनेसे निश्चित ही अतिसाररोग विनष्ट हो जाता है।