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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१४६- वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा

काण्ड ] कृमि-निदान २९१

कृमि-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! बाह्य और आभ्यन्तर भेदके कारण कृमियोंके दो प्रकार हैं। उनमें बाह्यगत जो कृमि (कीड़े) होते हैं, उनका जन्म बाहरी मल, कफ, रक्त और विष्ठासे होता है। जन्मगत भेदके कारण उनके चार भेद हो जाते हैं, किंतु नाम-भेदसे कृमियोंके बीस प्रकार माने गये हैं। बाह्य कृमि बाह्य मलसे उत्पन्न होते हैं। इनका परिमाण, आकार और वर्ण तिलके समान होता है। इनका निवास प्राणियोंकी केशराशि तथा उनके वस्त्रोंमें होता है। अनेक पैरोंवाले उन कृमियोंकी आकृति सूक्ष्म होती है। नामतः उन्हें जूँ और लीख कहा जाता है। इन दोनों प्रकारवाले कृमियोंके द्वारा प्राणियोंके बाह्य शरीरपर कोष्ठ (चकत्ते), पिडिका (फुंसी), कण्डू (खुजली) तथा गण्ड (गाँठ)नामक रोग कहे जाते हैं।

कुष्ठरोगका एकमात्र कारण शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें उत्पन्न होनेवाला श्लेष्मज कृमि है। यह प्राणीके बाह्य श्लेष्ममें भी उत्पन्न हो सकता है। मधुर अन्न, गुड़, दूध, दही, मछली और नये चावलका भात खानेसे प्राणीके आभ्यन्तरिक भागमें कफ उत्पन्न होता है, उसी कफसे उत्पन्न होकर कृमिवर्ग आमाशयमें पहुँच जाता है। उसीमें इस कृमिवर्गकी अभिवृद्धि होती है और उसीसे निकलकर शरीरमें यह सब ओर फैल जाता है। उनमें कुछ चमड़ेकी मोटी ताँतके समान, कुछ केंचुएके सदृश, कुछ धान्याङ्कुरके समान छोटे-बड़े और कुछ अणुकी भाँति होते हैं। इनका वर्ण श्वेत तथा ताँबे-जैसा होता है। नामतः इन कृमियोंके सात प्रकार हैं—अन्नाद, उदरावेष्ट, हृदयाद, महागुद, च्युरव, दर्भकुसुम और सुगन्ध।

इन कृमियोंके उत्पन्न होनेसे प्राणीके हल्लास, मुखस्राव (लार), अपच, अरुचि, मूर्च्छा, वमन, ज्वर, आनाह, कृशता, शोथ तथा पीनस नामक रोगोंकी उत्पत्ति होती है।

रक्तवाही शिराओंमें स्थित रक्तसे उत्पन्न होनेवाले कृमि अणुरूप, पादविहीन, वृत्ताकार और ताम्रवर्णके होते हैं। अपनी सूक्ष्मताके कारण उनमेंसे कुछ कृमि तो दृष्टिगोचर ही नहीं होते। इनके केशाद, रोमविध्वंस, रोमद्वीप, उदुम्बर, सौरस तथा मातर—ये छः भेद हैं। इन सभी कृमियोंका एकमात्र कार्य कुष्ठरोग उत्पन्न करना है।

पक्वाशयमें गुदा-भागसे बाहर निकलनेवाले विष्ठाजन्य कृमियोंका उद्भव होता है। वहींपर बढ़कर जब ये आमाशयकी ओर उन्मुख होते हैं, तब प्राणियोंके डकार और श्वासमें विष्ठा-सदृश दुर्गन्ध आती है। वे कृमि लम्बे, गोल, छोटे और मोटे होते हैं। उनका वर्ण श्याम, पीत, श्वेत और कृष्ण होता है। उन कृमियोंके ककेरुक, मकेरुक, सौसुराद, शूलाख्य तथा लेलिह—ये पाँच नामभेद हैं। जब ये प्रकुपित हो उठते हैं तो प्राणीके शरीरमें मलभेद, शूल, विष्टम्भ, कृशता, कर्कशता, पाण्डुता, रोमाञ्च, मन्दाग्नि और पाण्डु तथा गुदामें खुजलाहट का दोष उत्पन्न हो जाता है।

(अध्याय १६५)


१-वा० नि० अ० १४। २-सु० उ० तं० अ० ५४ ।

३०० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

वातव्याधि-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपको वातव्याधिका निदान सुना रहा हूँ, उसे आप सुनें।

शरीरमें विशेष रूपसे सर्वथा अनर्थ और विघ्नोंका एकमात्र कारण न दिखायी देनेवाला दुष्ट (प्रकुपित) पवन ही है। वह वायु ही विश्वकर्मा, विश्वात्मा, विश्वरूप, प्रजापति, स्रष्टा, धाता, विभु, विष्णु, संहर्ता, मृत्यु और अन्तक-रूप है। इसलिये उस वायुको सम रखनेके लिये विशेष रूपसे प्रयत्न करना चाहिये।

उस वातबाधित शरीरसे सम्बद्ध, कहे गये दोष-विज्ञानमें कर्म दो प्रकारका माना गया है। उनमें एक है प्राकृत कर्म और दूसरा है वैकृत कर्म। संक्षेपमें प्रतिपादित दोष-भेदोंका विचार करके प्रत्येक कर्मके पाँच-पाँच दोष सिद्ध किये गये हैं। इनमें वैकृत कर्म-दोष प्राकृतकी अपेक्षा शक्तिशाली और गतिमान् होता है। अब यहाँ यथाविभाग लक्षणसहित उसके निदानको कहा जा रहा है।

शरीरकी धातुओंको क्षीण करनेवाले द्रव्य-पदार्थोंके उपभोग तथा आचार-विचारसे क्रुद्ध वायु अत्यधिक समरूपमें प्रवहमान नहीं रहता। वह रस आदिके चारों स्रोतोंसे प्रवाहित होकर पुनः उनमें तज्जनित दोषोंको परिपूर्ण कर देता है। उसके बाद उन दोषपूर्ण स्रोतोंसे निकलकर वह संक्षुब्ध वायु उसके मुखको विधिवत् आच्छादित करके रोगीके शरीरमें शूल, आनाह, आन्त्रकूजन, मलावरोध, स्वरभंग, दृष्टिभेद, पीठ तथा कटि-प्रदेशमें पीड़ादायक उपद्रवोंको जन्म देता है। उसीके प्रभावसे रोगीके शरीरमें अन्य ऐसे उपद्रवोंका जन्म होता है, जो कष्टसाध्य हैं।

आमाशयमें वात-दोष होनेपर वमन, श्वास, खाँसी, विषूचिका, कण्ठावरोध तथा नाभिके ऊपरके भागमें अनेक व्याधियोंका जन्म होता है। कुपित वायु नेत्र-कान आदि इन्द्रियोंमें विघ्न तथा त्वचा-भागमें प्रविष्ट होकर पककर फूटनेवाले फोड़े और रूक्षताका कारण बन जाती है। रक्तमें वायुके प्रविष्ट होनेसे रोगीको अत्यन्त कष्टदायक पीड़ा होती है, श्वास तथा गलेमें जलन और स्वरभेदका रोग होता है। आँतके मध्य प्रदूषित वायुके पहुँचनेपर विष्टम्भ, अरुचि, कृशता और भ्रमके रोगोंकी उत्पत्ति होती है। मांस और मेदामें प्रकुपित हुआ वायु शरीरमें ग्रन्थि, कर्कशता, भारीपन, लाठी एवं मुष्टि-प्रहारसे होनेवाली पीड़ाके समान पीड़ा उत्पन्नकर रोगीको अत्यधिक कष्ट देता है। अस्थियोंमें प्रविष्ट हुए संक्षुब्ध वायुसे सक्थि तथा संधि-स्थानोंमें रहनेवाली अस्थियोंके अन्तर्गत तीव्र शूल उठनेसे रोगीको कष्ट होता है।

मज्जागत कुपित वायु रोगीकी अस्थियोंमें क्षरण एवं अनिद्रा उत्पन्न करता है, जिससे रोगीको पीड़ा होती है। शुक्रगत कुपित वायु वीर्य और गर्भका शीघ्र पतन करता है अथवा वह विकृत हो जाता है। शिरागत वायु सिरमें पीड़ा और रिक्तताका अनुभव कराता है। स्नायु-स्थित क्रुद्ध वायु रोगीके शरीरमें शोथ उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण उसको अधिक कष्ट होता है।

शरीरके संधि-स्थानोंमें प्रवहमान प्रकुपित वायुके कारण रोगी जलसे परिपूर्ण दृति (गलगण्ड), स्पर्श तथा शुष्कताके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है। शरीरके समस्त अङ्गोंमें कुपित वायुके प्रविष्ट हो जानेपर पीड़ा, टूटन और स्फुरणका दोष होता है। स्वप्नावस्थामें विकार होनेसे वायु-स्तम्भन, आक्षेपण, संधिभंग तथा कम्पनका दोष प्राणीके शरीरमें उत्पन्न कर

काण्ड ] वातव्याधि-निदान ३०१


देता है। जब क्रुद्ध वायु शरीरकी सम्पूर्ण धमनियोंमें बारम्बार प्रवाहित होने लगता है तो उस समय शरीरके अङ्ग विक्षिप्त हो उठते हैं। इस व्याधिको आक्षेपण नामसे कहा गया है।

जब नीचेसे ताड़ित वायु कुपित होकर ऊपर चढ़ता है और फिर ऊर्ध्वभागकी ओर प्रवाहित होने लगता है, तब वह रोगीके हृदयको पीड़ितकर सिर और मस्तककी अस्थिमें पीड़ा उत्पन्न कर देता है। वह चारों ओरसे शरीरपर प्रहार करता है, जिससे शरीर विक्षिप्त हो उठता है। वह हनु और मुखकी शक्तिको भी क्षीण करके रोगीको व्यथित करनेका प्रयास करता है। रोगी बड़े ही कष्टसे श्वास लेता और उसका परित्याग करता है। उसके दोनों नेत्र बंद होने लगते हैं। कण्ठसे कबूतरके समान ध्वनि होने लगती है और रोगी ज्ञानशून्य होने लगता है। चिकित्सा-क्षेत्रमें इसका नाम अपतन्त्रक रोग है। हृदयमें स्थित दोषपूर्ण वायुके द्वारा प्रेरित वह रोग जब रोगीकी वाम नासिकाके छिद्रमें जाकर आश्रय लेता है, तब उसके कारण रोगी बार-बार स्वस्थता और बार-बार अस्वस्थताका अनुभव करता है।

अभिघातजन्य वातव्याधि (अपतानक रोग) अत्यन्त दुश्चिकित्स्य है।

जब कुपित वायु ग्रीवा और पार्श्वमें स्थित मन्या नामवाली दोनों शिराओंको जकड़कर और सम्पूर्ण धमनियोंका आश्रय लेकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाती है, जिससे गर्दन तथा कक्षकी संधियाँ टेढ़ी पड़ जाती हैं और शरीर भीतरकी ओर धनुषकी तरह झुक जाता है, रोगीके नेत्र स्तम्भित हो जाते हैं, वह जँभाई लेने लगता है, दाँतोंको चबाने लगता है, कफयुक्त वमन करता है, दोनों पसलियोंमें वेदना होती है, वाणी रुक जाती है तथा हनु, पृष्ठ और मस्तक जकड़ जाते हैं, तब इसको अन्तरायाम वातरोग कहते हैं।

बहिरायाम रोगमें शरीर बाहरकी ओर धनुषके सदृश झुक जाता है। वक्षःस्थल ऊँचा हो जाता है और सिर तथा कंधा पीछेकी ओर झुक जाता है। दाँतों तथा मुखका रंग बदल जाता है, पसीना अधिक आता है, शरीर शिथिल हो जाता है। इस वातव्याधिको बाह्यायाम या धनुस्तम्भ कहा जाता है।

रोगीके मल, मूत्र और रक्तमें प्रविष्ट हुआ वात-दोष सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर शरीरमें अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न करता है। इस रोगको व्रणायाम कहते हैं। जिस व्रणायाम रोगमें रोगीको अत्यन्त तृषा हो और उसका शरीर पीला पड़ गया हो, वह असाध्य होनेसे वर्जित है। सभी प्रकारके आक्षेपक रोगोंमें वायुका वेग शान्त हो जानेपर रोगी स्वस्थ हो जाता है।

जिह्वाको* अत्यधिक रगड़ने और उष्ण भोजन करनेसे हनु अर्थात् ठोड़ीमें स्थित वायु कुपित होकर हनुभागमें स्तम्भन-दोष उत्पन्न करके मुखको खोल देता है अथवा बंद कर देता है। इसीको वातव्याधिमें हनुस्तम्भ-व्याधि कहते हैं। इसके कारण रोगीको खाने-चबाने तथा बोलनेमें अधिक कठिनाई होती है।

कुपित वायु वाग्वाहिनी शिरामें स्थित होकर जिह्वाको स्तम्भित कर देता है। यह जिह्वास्तम्भ नामक वातव्याधिका भेद माना गया है। इसके दुष्प्रभावसे रोगीके मुखमें खाने-पीने तथा बोलने-चालनेकी सामर्थ्य नहीं रह जाती। सिरके द्वारा भार ढोने, अत्यन्त हँसने और बोलने, ऊबड़-खाबड़ स्थानपर सोने तथा कठोर पदार्थोंके चबानेसे वायु विकारयुक्त होकर शरीरमें बढ़ता है और ऊर्ध्वभागमें पहुँचकर आश्रित हो जाता है। इससे रोगीका मुख


* सु०शा०अ० ९।

३०२ संक्षिप्त गरुड़पुराण [ आचार-

टेढ़ा हो जाता है। वह ऊँचे स्वरमें अट्टहास करता
है तथा किसी ओर अपने नेत्रोंको एकटक लगाकर
ध्यानमग्न होकर देखता है। उसके बाद उसी
दोषसे रोगीकी वाक्शक्ति शिथिल पड़ जाती है,
नेत्रोंमें स्तब्धता छा जाती है, दाँत किटकिटाते हैं,
स्वरभंग हो जाता है, बहरापन तथा अन्धत्वका
दोष आ जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त गन्धकी
अज्ञानता, स्मृतिध्वंस, भय, श्वास, थूक, पार्श्वभेद,
एक नेत्रकी शक्तिका ह्रास, दाढ़के ऊर्ध्वभागमें,
शरीरके आधे भागमें या नीचेके भागमें प्रबल
वेदना होती है। कुछ लोग इसे अर्दित और कुछ
एकाङ्गदोष कहते हैं।

जब प्रकुपित वायु रक्तका आश्रय लेकर
मूर्धमें स्थित शिराओंको रूक्ष, शूलयुक्त और
कृष्णवर्णका कर देता है, तब उसे शिरोग्रह दोष
कहते हैं और यह असाध्य है।

जब प्रकुपित वायु शरीरको अपने अधिकारमें
करके उसमें निहित शिराओं तथा स्नायु-तन्त्रिकाओंको
अपने अधिकारमें कर लेता है और उनमें अवरोध
उत्पन्न करके वह रोगीके शरीरके एक पक्ष अथवा
अन्य किसी विशेष भागपर प्रहार करता है, जिससे
वह भाग चेतना-शून्य अथवा अकर्मण्य हो जाता
है, तब उस दोषको लोग पक्षाघात कहते हैं। कुछ
लोगोंने तो उसको एकाङ्ग या अर्धाङ्ग रोग और
कुछ अन्य लोगोंने कक्षव्याधिके नामसे स्वीकार
किया है। परंतु सम्पूर्ण शरीरमें प्रकुपित वायुका
आश्रय होनेपर सर्वाङ्गरोध (सर्वाङ्ग-पक्षाघात)
और जकड़न नामक रोग होता है।

जो पक्षाघातरोग केवल वातके कारण होता है,
वह अत्यन्त कष्ट-साध्य है। जब वह वातरोग
पित्तादि अन्य दोषोंके संयोगसे होता है, तब कष्ट-
साध्य तथा जो वातरोग धातुओंके क्षय हो जानेसे
होता है, वह असाध्य होनेसे वर्ज्य है।

कफसे युक्त वात जब आमाशयमें अवरुद्ध हो
जाता है, तब उस समय रोगीके शरीरको वह
जकड़ देता है। उसके कारण रोगीका शरीर डंडेके
समान सीधा हो जाता है। इसीलिये इसको
दण्डापतानक कहा जाता है। यह सम्पूर्ण दोषोंसे
समन्वित होनेपर निश्चित ही असाध्य बन जाता है।

स्कन्ध-प्रदेशके मूलभागसे उठा हुआ प्रकुपित
वायु उसकी शिराओंको संकुचित करके बाहुओंकी
स्पन्दन-शक्तिको नष्ट कर देता है, उसे अवबाहुक
रोग कहते हैं। भुजाओंके पृष्ठभागसे होकर प्रत्येक
अँगुलीके तलप्रदेशतक जो एक मोटी नाड़ी जाती
है, उसका नाम कण्डरा है। उसमें कुपित हुआ
वात उसके कर्म-सामर्थ्यको समाप्त कर देता है,
उसको विषूची कहा जाता है। रोगीके कटिप्रदेशमें
रहनेवाला वायु जब जंघाप्रदेशतक जाता है, तो
अपनी उस मोटी कण्डरा नाड़ीको आक्षिप्त कर
देता है अर्थात् उसे जकड़ लेता है, इससे रोगी खञ्ज
(लँगड़ा) हो जाता है। जब दोनों जंघाओंकी
नसोंको जकड़कर दोनों पैरोंकी कण्डराएँ आक्षिप्त
हो उठती हैं, तब उस रोगको पङ्गु कहा जाता है।
जब रोगी चलनेमें काँपने लगता है और खञ्जन
पक्षीकी भाँति लँगड़ाते हुए चलता है, उसके
संधि-बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं तो उस दोषको
कलायखञ्ज नामक रोग मानना चाहिये।

जीर्ण या अजीर्ण-अवस्थामें शीतल, उष्ण,
द्रव-पदार्थ, शुष्क, गुरु, स्निग्ध भोज्य-पदार्थका
सेवन, अधिक परिश्रम, संक्षोभ, शैथिल्य तथा
अधिक जागरण करनेसे वात-कफयुक्त मेद अत्यधिक
मात्रामें संचित होकर पित्तका पराभव करके
शरीरको परिव्याप्त कर लेता है।

अन्तःश्लेष्मके द्वारा जंघाप्रदेशकी हड्डियोंके
दोष-समन्वित होनेपर स्तम्भन-रोग उन्हें ग्रसित
करता है। उस समय शीत-वात-दोषके प्रभावसे