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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१४१- विसर्परोगका निदान

काण्ड ] प्रमेहरोग-निदान २८५

अत्यन्त श्वेत, शीतल, गन्धहीन तथा जलके समान होता है, किंतु जो प्राणी उदकमेहसे ग्रसित है, वह कुछ मटमैले और चिपचिपे मूत्रका क्षरण करता है। इक्षुमेह-रोगीके शरीरसे इक्षुरसके समान अत्यन्त मधुर मूत्र निकलता है। सान्द्रमेहसे प्रभावित रोगी बासी रखे हुए जलके समान मूत्र छोड़ता है। सुरामेही रोगीका मूत्रस्त्राव सुरा (मदिरा)-के सदृश होता है, जो ऊपरसे देखनेमें स्वच्छ तथा सान्द्र प्रतीत होता है, किंतु अंदरसे गाढ़ा रहता है। पिष्टमेहसे ग्रसित रोगीको प्रायः मूत्रस्रावके समय रोमाञ्च हो उठता है। वह तण्डुलमिश्रित जलके समान अत्यन्त श्वेत मूत्रका परित्याग करता है। जो शुक्रमेही है, उसको शुक्रमिश्रित अथवा शुक्रके समान वर्णवाला मूत्र गिरता है। सिकता अर्थात् रेतमेहसे पीड़ित व्यक्तिको रेतके समान ही मूत्र तथा उसके सदृश मल अथवा विकार हो जाता है। शीतमेही रोगीको प्रायः अधिक मात्रामें मधुर और अत्यन्त शीतल मूत्र गिरता है। जो रोगी शनैर्मेही विकारसे संतप्त होता है, वह धीरे-धीरे, बार-बार, मन्द-मन्द गतिसे मूत्र-क्षरण किया करता है। लालामेही रोगी लालातन्तु अर्थात् लारके समान तार बनानेवाले चिपचिपे मूत्रकी धार छोड़ता है। क्षारमेह<sup>१</sup> होनेपर रोगी गन्ध, वर्ण, रस तथा स्पर्शमें समान क्षारयुक्त मूत्र करता है। नीलमेही नीलवर्णके समान और मसी अर्थात् स्याहीके सदृश कृष्णवर्णवाले मूत्रका परित्याग करता है।

संधिस्थान<sup>२</sup>, मर्मस्थल, मांसलभाग तथा कोष्ठ-प्रदेशोंमें जो प्रमेहपिडिका होती है, वह अन्तमें उन्नत, मध्यमें निम्न, आर्द्रतासे रहित और सहन करनेवाली पीड़ासे समन्वित होती है।

जो पिडिका (फुंसी) किनारोंपर ऊँची, बीचमें नीची, श्यामवर्ण, क्लेद और वेदनासे युक्त होती है तथा जिसकी शराव (मिट्टीका कसोरा)-के समान स्थिति और आकृति होती है, उसे शराविका कहते हैं। जो पिडिका कछुएके समान होती है और उसमें जलन रहती है, उस पिडिकाको विद्वान् लोग कच्छपिका नामसे स्वीकार करते हैं। बहुत बड़ी नीलवर्णके समान दिखायी देनेवाली पिडिकाको विनताके नामसे माना गया है। शरीरमें जिस पिडिकाके उभर आनेसे त्वचामें जलन होती और रोगी कष्टका अनुभव करता है, उस पिडिकाको ज्वालिनी कहा जाता है। रक्त-श्वेत तथा स्फोटका रूप धारण करनेवाली कठोर पिडिकाका नाम अलजी है। जो पिडिकाएँ मसूरके समान आकृतिवाली हैं, उन्हें मसूरिकाके नामसे जानना चाहिये। जिह्वामें सरसोंके समान छोटे-छोटे उभरे हुए दानोंको सर्षपिका कहा जाता है, जो रोगीको अत्यधिक कष्ट देते हैं। पुत्रिणी नामक पिडिका बड़ी अथवा छोटी होती है। यह अत्यन्त सूक्ष्म भी हो सकती है। जो पिडिका विदारीकन्दके समान गोल तथा कठोर होती है, उसका नाम विदारिका है। विद्रधिके लक्षणोंसे युक्त अर्थात् पीपसे युक्त पिडिकाको विद्रधिका कहा जाता है।

पुत्रिणी और विदारी नामक प्रमेहजनित पिडिकाएँ अत्यन्त कष्टकारी होती हैं। सद्यः पित्तके प्रकुपित होनेसे मेदको अल्प मात्रामें विकृत करनेवाली अन्य पिडिकाएँ उत्पन्न होती हैं। प्रायः शरीरमें जैसे-जैसे दोषकी अभिवृद्धि होती है, वैसे-ही-वैसे उन सभी पिडिकाओंका आविर्भाव होता है। मेदको विकृत करनेवाली इन पिडिकाओंका जन्म तो बिना प्रमेहके भी हो सकता है। जबतक पिडिका वर्णरहित होती है, तबतक उसके प्रधान लक्षणको निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता। जो हल्दीके समान अथवा रक्तवर्ण या प्रारम्भिक


१-मा०नि०प्र० ३३-१३, १४। २-वा०नि० १०, अ०हृ०नि०अ० १०, सु०नि० ६।

२८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

स्वरूपका परित्याग करनेवाले रक्त मूत्रका क्षरण करता है, उसको प्रमेहरोगके बिना रक्तपित्तरोग जानना चाहिये। रक्तपित्तरोगके प्रभावसे ही मूत्रका रंग हरिद्रा एवं रक्तवर्णका हो जाता है।

प्रमेहरोगोंके पूर्वरूपमें स्वेद, अङ्ग-विशेषमें अप्रिय गन्ध और अङ्गोंमें शिथिलता, शय्या, भोजन, निद्रा तथा सुखकी आसक्ति, हृदय, नेत्र, जिह्वा एवं कानोंमें असाधारण या साधारण भारीपन, जलन, बाल और नाखूनोंमें अभिवृद्धि, शीतल पदार्थोंके प्रति प्रेम, कण्ठ तथा तालुमें शोथ, मुखपर माधुर्यभाव और हाथ-पैरमें जलनके लक्षण दिखायी देते हैं। प्रायः इन सभी प्रमेहरोगोंके रोगीके द्वारा किये गये मूत्रपर चीटियाँ दौड़ने लगती हैं।

प्रमेहरोगमें तृष्णा, मधुरता तथा चिकनाहट का लक्षण तो सामान्य है, किंतु मधुमेह होनेपर अनेक प्रकारके विकारोंका जन्म हो जाता है। शरीरमें इस रोगके परिव्याप्त होनेपर इसकी उत्पत्तिका कारण कफजन्य मानना चाहिये अथवा सभी दोषोंके क्षीण हो जानेपर यदि प्रमेहका कोई विकार दिखायी देता है तो वह वायुजन्य होता है। प्रमेहके ये सभी प्रकार तो कफ और पित्तसे युक्त होते हैं, यथाक्रम जिनकी उत्पत्ति रति-प्रसंगकी आसक्तिके कारण रोगीके मूत्र-भागमें होती है। जो प्रमेह पित्तदोषके कारण उत्पन्न होते हैं, वे याप्य हैं। साध्य वही प्रमेय होता है जो अपने सम्पूर्ण लक्षणोंसे समन्वित होकर रोगीके शरीरमें दिखायी नहीं देता। यदि वह सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है तो उसका निवारण असम्भव ही है। (अध्याय १४९)

विद्रधि एवं गुल्म-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं विद्रधि और गुल्मका निदान कहता हूँ, उसे आप सुनें।

बासी एवं अत्यन्त उष्ण, रूक्ष, शुष्क तथा विदाहकारी भोजन करनेसे, टेढ़ी-मेढ़ी शय्यापर टेढ़ा-मेढ़ा शयन करनेसे तथा रक्तको दूषित करनेवाले विरुद्ध आहार-विहारसे रक्त दूषित होकर चमड़ा (त्वक्), मांस, मेदा, अस्थि, स्नायु एवं मज्जाको दूषितकर यह उदरका आश्रयण करता है। दुष्ट रक्त जब उदरका आश्रयण करता है तो अङ्ग-विशेषमें (बाहरकी ओर मुँहवाला अतिशय शूलके साथ और अतिशय पीड़ासे युक्त वृत्ताकार अथवा भीतरकी ओर मुँहवाला आयताकार) जो शोथ उत्पन्न हो जाता है, आयुर्वेदवेत्ता वैद्यगण उसे विद्रधिरोग कहते हैं।

दोषोंके द्वारा (वायु, पित्त आदिके) भिन्न-भिन्न रूपमें या मिश्रितरूपमें रक्त एवं स्रावके तत्तत् अङ्गमें ग्रन्थिके आकारका विद्रधिरोग अतिशय दारुण, गम्भीर और गुल्मको बढ़ानेवाला होता है। वह वल्मीक अर्थात् दीमकके घरके समान सच्छिद्र होता है और सभी छिद्रोंसे सदा रक्त आदि बहता रहता है, इससे जठराग्नि मन्द हो जाती है। नाभिवृत्ति, यकृत, प्लीहा, क्लोम (वृक्क), कुक्षि, गुद एवं वंक्षण आदि स्थानोंमें विद्रधिरोग उत्पन्न होनेपर रोगीका हृदय सदा काँपता रहता है और विद्रधि-स्थानमें तीव्र वेदनाकी अनुभूति होती है।

विद्रधिका शोथ श्यामवर्ण अथवा रक्तवर्णका होता है। इसका ऊपरी भाग उन्नत रहता है। कालान्तरमें पाक हो जानेसे यह विषम आकारका हो जाता है। विद्रधिरोगमें संज्ञा-नाश, भ्रम, अनाह, रक्तस्राव और अव्यक्त शब्द होता है। पित्तज विद्रधि रक्त (लाल), ताम्र अथवा कृष्णवर्णका शीघ्रपाकी होता है। इसमें तृषा, दाह, मोह, ज्वर,


१-वा०नि० १०। २-च०सू०अ० १७, सु०नि०अ० ९।