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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१३१- अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान

२६०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

होता है। मांस और मेदामें ज्वरके संश्रित होनेपर तृष्णा, ग्लानि, कान्तिमन्दता, अन्तर्दाह, भ्रम, अन्धकारदर्शन, दुर्गन्ध, गात्रविक्षेपका दोष उत्पन्न हो जाता है। ज्वरके अस्थिगत होनेपर पसीना, अधिक प्यास, वमन, दुर्गन्धिकी प्रतीति, चिड़चिड़ापन, प्रलाप, ग्लानि तथा अरुचि एवं हड्डियोंमें तोड़ने-जैसी पीड़ा होती है। ज्वरके मज्जागत हो जानेपर उक्त दोष तो होते ही हैं, उसके अतिरिक्त श्वास, अङ्गविक्षेप, अस्पष्ट-ध्वनि, बाह्य शीतलता और हिचकीके दोषकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है। शुक्रमें दोषके संश्रित होनेपर रोगीको दिनमें भी अन्धकार दिखायी देता है, शरीरके मर्मोंमें छेदने-जैसी पीड़ा होती है। जननेन्द्रियके स्तब्ध होनेपर निरन्तर उससे वीर्य बहता रहता है। प्रायः ऐसी अवस्थामें शुक्रगत हो जानेपर रोगीकी मृत्यु होती है। वस्तुतः रस, रक्त, मांस, मेद तथा मज्जागत—ये पाँचों ज्वर उत्तरोत्तर दुःसाध्य होते हैं।

मन्द ज्वर होनेपर सम्पूर्ण शरीर कफद्वारा भारीपनके दोषसे संलिप्त रहता है। रोगी प्रलाप करता है, उसको शीतलताकी अनुभूति होती है तथा उसके सभी अङ्ग शिथिल हो जाते हैं। जब शरीरमें नित्य ही मन्द ज्वर होता है तो शरीरमें सूखापन रहता है, रोगी शीतलताका अनुभव करता है और शरीरमें दुर्बलता आ जाती है तथा श्लेष्माकी अधिकता हो जाती है।

जिस ज्वरमें शरीर हल्दीके वर्णका हो जाता है और पेशाब भी पीला हो जाता है, उसको हरिद्रक ज्वर कहा जाता है, यह यमके समान मारनेवाला होता है।

जिसके शरीरमें कफ और वात समान रूपमें रहते हैं तथा पित्तकी कमी होती है, उसमें यह ज्वर दिनमें मन्द वेगसे एवं रात्रिमें तेज हो जाता है तथा इसे रात्रिज्वर कहते हैं।

व्यायामके कारण दिवाकरके शक्ति संचय न करनेसे जब रोगीका शरीर शुष्क हो जाता है तो वातकी अधिकताके कारण रोगीके शरीरमें सदा रातमें ज्वर रहता है, उसे पौर्वरात्रिक ज्वर कहा जाता है।

इस ज्वरमें श्लेष्मा पित्तके नीचे आमाशयमें स्थित रहनेपर आत्मस्थ होकर रोगीका आधा शरीर शीतल और आधा उष्ण रहता है। ज्वरके समय रोगीके शरीरमें जब पित्त परिव्याप्त रहता है तथा श्लेष्मा अन्तमें स्थित रहता है। इसलिये उसका शरीर उष्ण और हाथ-पैर ठंडे रहते हैं। रस और रक्तमें आश्रित तथा मांस एवं मेदामें स्थित ज्वर साध्य है। हड्डी और मज्जामें स्थित ज्वर कष्ट-साध्य है। ज्वर जिस-जिस अङ्गमें रहता है, उसे कान्तिहीन कर देता है। इस ज्वरमें रोगी संज्ञाहीन, ज्वरके वेगसे आर्त और क्रोधयुक्त रहता है। रोगी सदा दोष-समन्वित उष्ण मलका वेगपूर्वक परित्याग करता है।

ज्वरके* शान्त होनेपर शरीर लघु (हल्का) हो जाता है, थकान, मोह और संताप दूर हो जाता है, मुखमें छाले पड़ जाते हैं, इन्द्रियोंमें निर्मलता आ जाती है, पीड़ा नहीं रहती, शरीरमें उचित पसीना छूटता है, भूख लगती है, मन स्वस्थ तथा प्रसन्न हो जाता है, अन्न-ग्रहणकी इच्छा होने लगती है तथा सिरमें खुजलाहट होती है। (अध्याय १४७)


* अ०हृ० निदान २।७९, सु०उ०अ० ३९।

काण्ड ] रक्त-पित्त-निदान २६१

रक्त-पित्त-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब इसके बाद मैं रक्त¹-पित्तके निदानका विधिवत् वर्णन करता हूँ।

अत्यन्त उष्ण, तिक्त, कटु, अम्ल, नमक आदि जो पेटमें विशेष प्रकारका दाह उत्पन्न करनेवाले पदार्थ हैं और कोदो, उद्दालक आदि गरिष्ठ अन्नसे बने भोजन हैं तथा अन्य पित्तवर्धक शाक-पात हैं, उन सभीका अधिक सेवन करनेसे शरीरमें पूर्वसे स्थित पित्तात्मक द्रव कुपित हो उठता है और परस्परमें मिलकर वह रक्तपर दूषित प्रभाव डालता है। जिससे शरीरका रक्त दूषित हो जाता है, उन्हीं भोज्य एवं पेय पदार्थोंके प्रभावसे पित्त और रक्त एक-सा रूप धारण करके सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लेते हैं। संसर्ग-दोषके कारण विकृत हुए रक्त-पित्त-गन्ध-वर्ण तथा दोष-प्रवृत्तिमें एक अनुरूपता होनेपर भी उसको रक्त² नामसे ही जाना जाता है। वह दूषित रक्त प्लीहा तथा यकृत भागवाले कोष्ठसे उत्पन्न होता है। इस कारण उसका नाम रक्त-पित्त है।

रक्त-पित्तका दोष निम्नलिखित उपद्रवोंसे जाना जा सकता है। मस्तिष्कमें भारीपन, अरुचि, शीतल पदार्थके सेवनकी इच्छा, कण्ठसे धूम निकलनेका आभास तथा अम्लतायुक्त डकारोंका आना, वमन, वमनमें दुर्गन्ध, खाँसी, श्वास, भ्रम, थकान, लोहा, रक्त तथा मछलीकी-सी गन्ध, स्वरमें क्षीणता, नयनादि अङ्गोंमें लाली, हल्दीकी तरह पीलापन अथवा हरापन होना, नीले, लाल और पीले रंगमें भेदका न मालूम होना और स्वप्नमें भी लाल रंग दिखायी देना—ये लक्षण रक्त-पित्तरोग होनेवालेमें पाये जाते हैं।

रक्त-पित्त तीन प्रकारका होता है—ऊर्ध्वगामी, अधोगामी और उभयगामी। इनमेंसे ऊर्ध्वगामी रक्त-पित्त दोनों नाकके छिद्रों तथा आँखों, कानों और मुख—इन सात द्वारोंसे निकलता है, अधोगामी कुपित रक्त मूत्रेन्द्रिय, योनि और गुदासे निकलता है और उभयगामी रक्त-पित्त समस्त रोमकूपों एवं पूर्वोक्त दसों द्वारोंसे निकलता है। ऊर्ध्वगामी साध्य रक्त-पित्त-कफकी अधिकतासे निकलता है। इसलिये इसका साधन विरेचन है। पित्तशान्तिकी बहुत-सी औषधियाँ हैं, उनमें सबसे प्रधान विरेचन है तथा रक्त-पित्तका अनुबन्धी कफ होता है और कफकी औषधि भी विरेचन ही है। फान्ट आदि कषाय, मधुर रसयुक्त होनेपर भी रोगनाशक होनेके कारण वातादिके दोषसे रहित कफवाले रोगीके लिये हितकारी होते हैं। ऐसी स्थितिमें कटु, तिक्त और कषाय द्रव्य जो स्वभावसे ही कफका नाश करनेवाले हैं, ये अत्यन्त लाभप्रद होते हैं। अधोगामी रक्त-पित्त-वातसे उत्पन्न होनेके कारण याप्य (साध्य) होता है। इसकी चिकित्सा वमन है। पित्तकी चिकित्सा अल्प होनेके कारण वमनसे श्रेष्ठ औषधि नहीं है। रक्त-पित्तका अनुबन्धी वात है। इसीलिये वमन वातका शमन नहीं करता। इसलिये रक्त-पित्त दोषमें मधुर कषाय ही हितकारी होता है।

शरीरमें कफ तथा वायुके संसृष्ट होनेपर रक्त-पित्तजनित उभयगामी रक्त-पित्त असाध्य हो जाता है। प्रतिलोम होने और औषधिसे असाध्य होनेके कारण यह रोग असह्य होता है। प्रतिलोम होनेके कारण इस दोषका कोई प्रतिकार नहीं है। रक्त-पित्त रोगमें शोध प्रतिलोम (रोगका उल्टा) उपाय ही बतलाया गया है। रोगका इसी तरहसे संशोधन और उपशमन सम्भव है।

वात³-पित्त तथा कफ आदि दोषोंके एक-


१-च०चि०अ० २, सु०उ० ४५–५२। २-च०चि०अ० ४, अ०हृ०अ० ३। ३-सु०उ०अ० ४५, च०चि०अ० २, सु०चि०अ० ३४।