गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११७- सूर्यवंशवर्णन
| काण्ड ] | प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत | २२९ |
|---|
ॐ महाकर्णाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्।
करन्यासके पश्चात् इसी मन्त्रसे उनका ध्यान करके व्रतीको तिलादिसे उनकी पूजा करके आहुति देनी चाहिये। गणपतिके साथ रहनेवाले गणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। व्रतीको 'ॐ गणाय नमः', 'ॐ गणपतये नमः' तथा 'ॐ कूष्माण्डकाय नमः' इस प्रकार कहकर उनकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद स्वाहान्त शब्दका प्रयोग कर इन्हीं मन्त्रोंसे आहुति दे। इसी प्रकार अमोघोल्क, एकदन्त, त्रिपुरान्तकरूप, श्यामदन्त, विकरालास्य, आह्वेष और पद्मदंष्ट्र गणोंको भी 'नमः' और अन्तमें 'स्वाहा' शब्दसे यथापेक्षित नमन और आहुति प्रदान करनी चाहिये। उसके बाद व्रती गणदेवके लिये मुद्रा-प्रदर्शन, नृत्य, हस्तताल तथा हास्यभाव प्रदर्शित करे। ऐसा करनेसे उसे सौभाग्यादि फलोंकी प्राप्ति होती है।
मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिमें गणकी पूजा करनी चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेसे विद्या, लक्ष्मी, कीर्ति, आयु और संतानकी प्राप्ति होती है। सोमवार, चतुर्थी तिथिको उपवास रखकर व्रतीको विधि-विधानसे गणपतिदेवकी पूजा कर उनका जप, हवन और स्मरण करना चाहिये। इस व्रतको करनेसे उसे विद्या, स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त होता है।
शुक्लपक्षकी चतुर्थीको खांडके लड्डू और मोदकसे विघ्नेश्वरकी पूजा करनेपर व्रतीकी समस्त कामनाओंकी सिद्धि तथा सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। यदि दमनक (श्वेतकमल)-से इनकी पूजा होती है तो साधकको पुत्रादिकका फल प्राप्त होता है, इसीलिये इस चतुर्थीका नाम दमना है।
'ॐ गणपतये नमः' इस मन्त्रसे गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। जिस किसी भी मासमें इन गणपतिदेवकी पूजा करने तथा होम, जप और स्मरण करनेसे व्रतीकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा समस्त विघ्नोंका विनाश हो जाता है। मनुष्यको विभिन्न नामोंका उच्चारण करके भी भगवान् आद्यदेव विनायककी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसको भी सद्गतिकी प्राप्ति होती है। जबतक वह इस लोकमें रहता है, तबतक समस्त सुखोंका उपभोग करता है और अन्त समयमें उसे स्वर्ग और मोक्षकी भी प्राप्ति होती है। विनायकके निम्नलिखित ये बारह नाम हैं—
गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बकः।
<div style="text-align: right;">(१२९। २५-२६)</div>
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्नराजकः॥
धूम्रवर्णो भालचन्द्रो दशमस्तु विनायकः।
गणपतिर्हस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्॥
गणपूज्य, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, त्रियम्बक (त्र्यम्बक), नीलग्रीव, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक और हस्तिमुख—इन बारह नामोंसे गणदेवकी पूजा करनी चाहिये।
पृथक्-पृथक् इन नामोंसे जो बुद्धिमान् प्राणी इनकी पूजा करता है, उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिमें वासुकि, तक्षक, कालीय, मणिभद्रक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक तथा धनञ्जय—इन आठ नागोंकी घृतादिसे स्नान कराकर पूजा करनी चाहिये। ये नाग अपने भक्तको आयु-आरोग्य और स्वर्ग प्रदान करते हैं। अनन्त, वासुकि, शंख, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, धृतराष्ट्र, शंखक, कालीय, तक्षक और पिंगल—इन नागोंकी पूजा प्रत्येक मासमें करनी चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें आठों नागोंकी पूजा करनेसे साधकको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है।
२३० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
श्रावणमासके शुक्लपक्षमें पञ्चमीको द्वारके दोनों ओर इन नागोंका चित्र बनाकर पूजन करना चाहिये। इसी दिन अनन्त आदि महानागोंकी पूजा करके नैवेद्यमें दूध तथा घी देना चाहिये, इससे सभी विषदोष दूर हो जाते हैं। नाग अभय वरदान देनेवाले होते हैं और यह पञ्चमी सर्पदंष्ट्री प्राणीको मुक्ति देनेवाली होती हैं। इसलिये दंष्ट्रोद्धार पञ्चमी कहलाती है। (अध्याय १२९)
षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत
ब्रह्माजीने कहा— भाद्रपदमासमें भगवान् कार्तिकेयकी पूजा करनी चाहिये<sup>१</sup>। इसमें स्नानादि जो कृत्य किये जाते हैं, वे सभी अक्षय फल प्रदान करनेवाले हो जाते हैं।
व्रती (षष्ठी तिथिको उपवासकर) सप्तमी तिथिको ब्राह्मणभोजन कराकर 'ॐ खखोल्काय नमः' इस मन्त्रसे सूर्यदेवकी पूजा करे और अष्टमी तिथिको मरिचका भोजनकर पारणा करे। इससे व्रती अन्तमें स्वर्ग प्राप्त करता है। मरिच-प्राशनके कारण इस व्रतका नाम मरिचसप्तमी है। इस व्रतको करनेसे प्रियजनोंसे मिलन होता है, उनसे वियोग नहीं होता। सप्तमी तिथिको संयमपूर्वक स्नानादि करके सूर्यकी पूजा करे। 'मार्तण्डः प्रीयताम्'— 'सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए ब्राह्मणोंके लिये फलोंका दान करे और खजूर, नारियल, बिजौरा नींबू आदि फलोंको प्रदान करे। यह प्रार्थना करे कि हे देव! मेरे सभी अभीष्ट चारों ओरसे सफल हों। फलदान एवं प्राशनके कारण इस सप्तमीका नाम 'फलसप्तमीव्रत' है।
सप्तमीको सूर्यदेवकी पूजा कर यदि ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित पायसका भोजन कराया जाय, तदनन्तर व्रती स्वयं पयका पानकर व्रत समाप्त करे तो पुण्य-लाभ होता है। ओदन, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य पदार्थ इस व्रतमें ग्राह्य नहीं है। धन-पुत्रकी कामना करनेवाला ओदनका परित्याग कर इस व्रतको करे। इसी वैशिष्ट्यके कारण इसे अनौदक सप्तमी कहा गया है।
विजयकी कामना करनेवालेको वायुमात्र पान कर विजयसप्तमीव्रत करना चाहिये। जो कामेच्छुक हैं, वे मात्र अर्कका प्राशनकर इस व्रतको करें। इस प्रकार व्रतकर वे कामपर विजय प्राप्त कर लेते हैं।
इस सप्तमीव्रतमें गेहूँ, उड़द, यव, साठी धान, तिल, कांस्यपात्र, पाषाणपात्र, पिसी हुई वस्तु, मधु, मैथुन, मद्य, मांस, तैल-मर्दन और अञ्जन त्याज्य है। जो मनुष्य इनका परित्याग कर व्रत करता है, उसकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इसीलिये इसे विजयसप्तमी कहा गया है। (अध्याय १३०)
दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णमाष्टमीव्रत
ब्रह्माजीने कहा—हे ब्रह्मन्! भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको दूर्वाष्टमीव्रत होता है। इस दिन उपवास रहकर दूर्वासे गौरी-गणेशकी और शिवकी फल-पुष्प आदिसे पूजा करनी चाहिये। फल, धान्य आदि सभी प्रयोज्य वस्तुओंसे 'शम्भवे नमः, शिवाय नमः' कहकर शिवका पूजन करे। तदनन्तर 'त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि<sup>२</sup> इस मन्त्रसे दूर्वाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे
१- कार्तिकेयकी तिथि षष्ठी कही गयी है।
२- त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुरासुरैः। सौभाग्यं संततिं कृत्वा सर्वकार्यकरी भव॥
यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृतासि महीतले। तथा ममापि संतानं देहि त्वमजरामरे॥