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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१०५- शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान

२९४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

प्रमाद और विश्वास नहीं करना चाहिये। मनुष्यको भयसे उसी समयतक भयभीत रहना चाहिये, जिस समयतक उसका आगमन नहीं हो जाता। तीव्र भयके उपस्थित हो जानेपर तो उसे निर्भीक होकर उसका सामना करना चाहिये<sup>१</sup>।

ऋण, अग्नि तथा व्याधिके शेष रहनेपर वे बार-बार बढ़ते जाते हैं। अतः उनका शेष रखना उचित नहीं है—

ऋणशेषं चाग्निशेषं व्याधिशेषं तथैव च।
पुनःपुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न कारयेत्॥
(११५।४६)

परोक्ष-रूपमें कार्यको नष्ट करनेवाले तथा सामने मधुर बोलनेवाले मित्रका, मायावी शत्रुके भाँति परित्याग कर देना चाहिये—

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत् तादृशं मित्रं मायामयमरिं तथा॥
(११५।४८)

दुष्टका साथ करनेसे सज्जन मनुष्य भी विनष्ट हो जाता है, क्योंकि सुन्दर-स्वच्छ पेय जल कीचड़के मिल जानेसे दूषित हो जाता है—

दुर्जनस्य हि संगेन सुजनोऽपि विनश्यति।
प्रसन्नमपि पानीयं कर्दमैः कलुषीकृतम्॥
(११५।४९)

जिस व्यक्तिका धन ब्राह्मणके लिये [समर्पित] होता है, वही [धनका] सम्यक् उपभोग करता है। इसलिये सभी प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक द्विजकी पूजा करनी चाहिये। जो द्विजके उपभोगसे बचे हुए पदार्थोंका उपभोग करता है, वही उत्तम भोजन है। जो पाप नहीं करता, वही बुद्धिमान् है। जो पीठ-पीछे हित-सम्पादन किया जाता है, वही मित्र-भाव है और जो दिखावेके बिना (दम्भरहित) धर्म किया जाता है, वही वास्तविक धर्माचरण है<sup>२</sup>।

वह सभा सभा नहीं होती, जिसमें वृद्ध जन नहीं होते। वे [वृद्ध] वृद्ध नहीं माने जाते, जो धर्मका उपदेश नहीं देते। वह [धर्म] धर्म नहीं है, जिसमें सत्यका वास नहीं होता। वह [सत्य] सत्य नहीं है, जो कपटसे अनुप्राणित रहता है—

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति
नैतत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥
(११५।५२)

मनुष्योंमें ब्राह्मण, तेजमें आदित्य, शरीरमें सिर और व्रतोंमें सत्य ही श्रेष्ठतम व्रत है।

जहाँ मनको प्रसन्नताकी प्राप्ति हो, वहीं प्राणीका मङ्गल है। दूसरेकी सेवामें समर्पित जीवन ही यथार्थ जीवन है। जो उपार्जित धन स्वजनोंके द्वारा उपभोग्य है, वही धन सार्थक है। युद्धभूमिमें शत्रुके सामने की गयी गर्जना ही वास्तविक गर्जना है। स्त्री वही श्रेष्ठ है, जो मदोन्मत्त नहीं हो। तृणारहित व्यक्ति ही सुखी होता है। जिसपर विश्वास किया जाय, वही मित्र है और जो जितेन्द्रिय होता है, वही वास्तविक पुरुष है।

राज्यका ऐश्वर्य क्रुद्ध ब्राह्मणके शापसे विनष्ट हो जाता है, ब्राह्मणका तेज पापाचार करनेसे नष्ट हो जाता है, अशिक्षित गाँवमें निवास करनेसे ब्राह्मणका सदाचार समाप्त हो जाता है और दुष्ट स्त्रियोंके साहचर्यसे कुलका विनाश हो जाता है। सभी संग्रहोंका अन्त क्षय है और सभी उत्कर्षोंका अन्त पतन है। संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है।

मनुष्यको राजासे रहित राज्यमें और बहुत राजाओंवाले राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ स्त्रीका नेतृत्व हो या बालनेतृत्व


<sup>१</sup>तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम्। उत्पन्ने तु भये तीव्रे स्थातव्यं वै ह्यभीतवत्॥ (११५।४५)
<sup>२</sup>तद्भुज्यते यद्द्विजभुक्तशेषं स बुद्धिमान् यो न करोति पापम्। तत्सौहृदं यत्क्रियते परोक्षे दम्भैर्विना यः क्रियते स धर्मः॥ (११५।५१)

काण्ड ] नीतिसार २१५


हो वहाँ भी निवास करना अच्छा नहीं होता।

कौमार्य-अवस्थामें स्त्रीकी रक्षा पिता करता है, युवावस्थामें उसकी रक्षाका भार पतिपर होता है, वृद्धावस्थामें उसकी रक्षाका भार पुत्र उठाता है। स्त्री स्वतन्त्र रहने योग्य नहीं है।<sup>१</sup>

अर्थके लिये आतुर मनुष्यका न कोई मित्र है और न कोई बन्धु। कामातुर व्यक्तिके लिये न भय है और न लज्जा ही। चिन्तासे ग्रस्त प्राणीके लिये न सुख है और न नींद ही तथा भूखसे पीड़ित मनुष्यके शरीरमें न बल ही रहता है और न तेज ही रह जाता है—

अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः
कामातुराणां न भयं न लज्जा।
चिन्तातुराणां न सुखं न निद्रा
क्षुधातुराणां न बलं न तेजः॥
(११५।६७)

दरिद्र तथा दूसरेके द्वारा प्रेषित दूत, पर-नारीमें आसक्त तथा दूसरेके धन-अपहरणमें लगे हुए व्यक्तिको नींद कहाँ आती है?<sup>२</sup> जो मनुष्य ऋणरहित और रोगमुक्त होता है, वही सुखपूर्वक निद्राका उपभोग करता है। इनके अतिरिक्त वह व्यक्ति भी निद्राका सुख प्राप्त करनेमें सफल होता है, जो स्त्रियोंके संसर्गसे दूर रहता है।

जलके परिमाणके अनुसार ही कमलनाल भी ऊपरकी ओर उठता जाता है और अपने स्वामीके बलके अनुसार भृत्य भी गर्वोन्नत हो जाता है। अपने स्थान जलाशयमें स्थित रहनेपर वरुणदेव एवं सूर्यनारायण कमलके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हैं, किंतु उस स्थानसे च्युत होनेपर उसी कमलके साथ वे जलासक्त और शोषणका व्यवहार करके कष्ट पहुँचाते हैं। पदासीन रहनेपर जो जिसके मित्र होते हैं, वे पदसे विमुक्त होनेपर वैसे ही शत्रु हो जाते हैं जैसे जलमें कमलके विद्यमान रहनेपर सूर्यकी प्रीति उसके साथ रहती है, किंतु उस जलसे उसको तोड़कर स्थलभागमें लानेपर वही सूर्य उसका शोषण करने लगता है।

अपने स्थान या पदपर अवस्थित रहनेपर ही मनुष्यकी पूजा होती है। स्थान और पदसे च्युत होनेपर उसकी उसी प्रकार पूजा नहीं होती, जिस प्रकार शरीरसे पृथक् होनेपर केश, दाँत और नख शोभित नहीं होते—

स्थानस्थितानि पूज्यन्ते पूज्यन्ते च पदे स्थिताः।
स्थानभ्रष्टा न पूज्यन्ते केशा दन्ता नखा नराः॥
(११५।७३)

आचारको देखकर कुलका ज्ञान होता है। भाषाको सुनकर देशका ज्ञान होता है। सम्भ्रमसे स्नेह प्रकट होता है और शरीरको देखकर भोजनका ज्ञान (अनुमान) होता है।<sup>३</sup>

समुद्रमें वर्षा होना व्यर्थ है। तृप्त हुए प्राणीके लिये भोजनका आग्रह व्यर्थ है। समृद्धको दान देना व्यर्थ है तथा नीचके लिये किया गया सुकृत व्यर्थ है। जो प्राणी जिसके हृदयमें अवस्थित है, वह दूरदेशमें रहते हुए भी उसके संनिकट ही विद्यमान रहता है और जो प्राणी हृदयसे ही निकल चुका है, वह समीपमें ही रहते हुए भी दूरदेशमें निवास करनेवालेके समान है।<sup>४</sup>

मुखकी विकृति, स्वरभंग, दैन्यभाव, पसीनेसे लथपथ शरीर तथा अत्यन्त भयके चिह्न प्राणीमें मृत्युके समय उपस्थित होते हैं, किंतु ये ही चिह्न याचकके जीवित शरीरपर भी दिखायी देते रहते हैं।


१-पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रस्तु स्थविरे काले न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ (११५।६३)
२-कुतो निद्रा दरिद्रस्य परप्रेष्यवरस्य च। परनारीप्रसक्तस्य परद्रव्यहरस्य च॥ (११५।६८)
३-आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषितम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥ (११५।७४)
४-दूरस्थोऽपि समीपस्थो यो यस्य हृदये स्थितः। हृदयादपि निष्क्रान्तः समीपस्थोऽपि दूरतः॥ (११५।७६)