गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९१- नीतिसार
काण्ड ] महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण १८७
क्षत्रिय दस दिन, वैश्य बारह दिन और शूद्र एक मासके पश्चात् शुद्ध होता है। ब्राह्मण दस दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पंद्रह दिन तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होते हैं। जो सपिण्ड-कुल-परम्परासे प्राप्त होनेवाली भू-सम्पत्ति आदिके हिस्सेदार हैं। और पृथक् आवास बनाकर रहनेवाले बन्धु-बान्धव हैं, उन्हें जन्म तथा मृत्यु आदिकी विपत्तिमें अशौच होता है। चौथी पीढ़ीतक दस दिन, पाँचवीं पीढ़ीमें छः दिन, छठीं पीढ़ीमें चार दिन, सातवीं पीढ़ीमें तीन दिन मरणाशौच होता है। देशान्तरमें बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नानमात्रसे शुद्धि होती है।
जो बालक जन्म होनेके पश्चात् दाँत निकलनेके पूर्व ही मर जाते हैं या जिनकी मृत्यु गर्भसे बाहर होनेके समय हो जाती है, उन सबका अग्नि-संस्कार, पिण्डदान तथा जल-संतर्पण-कार्य नहीं होता है। यदि स्त्रीका गर्भस्राव हो जाता है अथवा गर्भपात हो जाता है तो जितने मासका वह गर्भ होता है, उतने दिनतक सूतक मानना चाहिये। जन्मसे लेकर नामकरणतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। यदि नामकरणके पश्चात् चूडाकरण-संस्कारके मध्य बालककी मृत्यु होती है तो एक दिन और एक रात्रिका अशौच होता है। यदि उपनयन-संस्कारके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो तीन रात्रियोंतक और तत्पश्चात् उसकी मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है।
चार मासतकके गर्भके नष्ट होनेपर गर्भस्राव तथा पाँच और छः मासके गर्भके गिरनेको गर्भपात कहा जाता है।
जो ब्रह्मचर्यव्रतके अग्निहोत्रकी दीक्षामें है अथवा अनासक्त-भावसे जीवन व्यतीत करनेवाले हैं, उनके लिये जन्म एवं मृत्युका अशौच नहीं होता। शिल्पकार, कारुकर्म करनेवाला (चटाई बनानेवाला), वैद्य, दास-दासी-भृत्य-अग्निहोत्री तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण और राजा—ये सद्यः शौचवाले कहे गये हैं।
जन्मका अशौच होनेपर माता दस दिनमें तथा पिता स्नान करनेके बाद शुद्ध हो जाता है। सूतिका-गृहमें प्रसूता स्त्रीके स्पर्शसे पिताको अशौच हो जाता है। आचमनसे पिता इस अशौचसे शुद्ध हो जाता है।
यदि विवाहोत्सव तथा यज्ञादिक कार्योंके सम्पादन-कालमें ही मृत्यु या जन्मका अशौच हो जाता है तो पूर्वसंकल्पित कार्यसे अन्य कार्यके निषेधका विधान है। अर्थात् पूर्वसंकल्पित कार्यके लिये अशौच नहीं होता। बादके कार्यमें अशौच होगा।
अनाथ व्यक्तिके शवको वहन करनेपर प्राणायाममात्रसे ही मनुष्यकी शुद्धि हो जाती है, किंतु शूद्रका शव उठानेपर तीन रात्रियोंके पश्चात् शुद्धि होती है।
आत्मघात, विषपान, फाँसी तथा कृमिदंशसे मृत्यु होनेपर उसका संस्कार यथाविधान विशेष प्रायश्चित्तके बिना नहीं होता है। गौके द्वारा आहत होनेसे अथवा कृमिदंशके कारण मरे हुए व्यक्तिका स्पर्श करनेपर कृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है, यह शुद्धि अशौच-निमित्तक है।
जो पत्नी यौवनावस्थामें अपने निर्दुष्ट एवं सच्चरित्रवान् पतिका परित्याग कर देती है, वह सात जन्मोंतक स्त्रीयोनिको प्राप्त कर बार-बार विधवा होती है। ऋतुकालमें पत्नीके साथ संसर्ग न करनेके कारण पुरुषको बालहत्याका पाप लगता है। जो स्त्री अन्न-पानादिकी दृष्टिसे भ्रष्ट होती है, वह अगम्या होती है तथा जन्मान्तरमें सूकरयोनि प्राप्त करती है।
औरस और क्षेत्रज पुत्र एक ही पिताके पुत्र
| १८८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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होते हैं। अतः ये दोनों पुत्र अपने पिताके लिये पिण्डदान कर सकते हैं।
परिवेत्ता<sup>१</sup> एवं परिवित्ति (बड़े भाईद्वारा अपने विवाहकी अस्वीकृति देनेवाला)-को अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। इसी प्रकार कन्याको भी कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। ऐसी कन्याके दान देनेवालेको अतिकृच्छ्रव्रत तथा विवाह-विधि सम्पन्न करानेवालेको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये।
यदि बड़ा भाई कुबड़ा, बौना, नपुंसक, हकलाने-वाला, मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा तथा गूँगा हो तो छोटे भाईके द्वारा विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं होता।
जिसे वाग्दानमात्र किया गया है ऐसा भावी पति यदि परदेश चला जाय, मर जाय, संन्यास-धर्मका अवलम्बन कर ले, नपुंसक हो अथवा पतित हो गया हो तो इन पाँच आपदाओंमें वाग्दत्ता कन्या दूसरे पतिका वरण कर सकती है। अपने पतिके साथ सतीधर्मके अनुसार अग्निमें प्रवेश करनेवाली स्त्री शरीरमें स्थित रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करती है।
कुत्ता आदिके काटनेपर मनुष्यको गायत्री-मन्त्रके जपसे शुद्धि करनी चाहिये। जिसे स्वयं गायत्री-जपका अधिकार नहीं है, उसे ब्राह्मणद्वारा गायत्री-जप कराना चाहिये। चाण्डाल आदिके द्वारा मारा गया अग्निहोत्री ब्राह्मण लौकिक अग्निसे जलाने योग्य होता है। [उस अग्निसे जलाये गये] ब्राह्मणकी अस्थियोंको दूधमें प्रक्षालित करके पुनः विधिवत् मन्त्रपूर्वक अपने अग्निहोत्रशालाकी अग्निसे प्रदग्ध करना चाहिये। यदि मृत्यु प्रवासकालमें होती है तो परिजनको अपने घरपर उस मृत व्यक्तिका कुशसे शरीर बनाकर पुनः अग्निदाह करना चाहिये।
कृष्णमृगचर्मपर छः सौ पलाशपत्रोंको (मृतककी आकृतिके समान) बिछाकर अथवा कुशमय शरीरका निर्माण करके शिश्न-भागपर शमी तथा वृषण-भागपर अरणिके काष्ठको स्थापित करे। उसके दायें हाथके स्थानपर कुण्ड (स्थाली) और बायें हाथके स्थानपर उपभृत [यज्ञियपात्र], पार्श्वभागमें उलूखल तथा पीठकी ओर मूसल रखे। तत्पश्चात् उस शवके वक्षःस्थलपर [सोमरस तैयार करनेके लिये प्रयोगमें आनेवाले] पत्थरको रखकर उसके मुखभागमें घृत-तण्डुल और तिल डालना चाहिये। कानके पास प्रोक्षणीपात्र और नेत्रोंके संनिकट आज्यस्थाली रखे। कान, नेत्र, मुख तथा नासिका-भागमें स्वर्ण-खण्ड रखनेका विधान है। इस प्रकार अग्निहोत्रके समस्त उपकरणोंके सहित उस अग्निहोत्रीका शवदाह करनेसे वह (मृत अग्निहोत्री) ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' इस मन्त्रसे घृतकी एक आहुति देनी चाहिये।
हंस, सारस, क्रौँच, चक्रवाक, कुक्कुट, मयूर और मेषका वध करनेवाला मनुष्य एक दिन तथा एक रात्रिके उपवासके पश्चात् पापसे शुद्ध हो जाता है। अन्य सभी पक्षियोंका वध करनेपर एक अहोरात्रमें शुद्धि होती है।
सभी प्रकारके चतुष्पद पशुओंका वध करनेपर जो पाप मनुष्यको लगता है, उसका अवमोचन खड़े होकर एक अहोरात्र उपवास कर [गायत्री] मन्त्रका जप करनेसे होता है।
शूद्रका वध करनेपर कृच्छ्रव्रत, वैश्यकी हत्या करनेपर अतिकृच्छ्रव्रत, क्षत्रियका वध करनेपर बाईस चान्द्रायणव्रत एवं ब्राह्मणकी हत्या करनेपर तीस चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। (अध्याय १०७)
१-ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए अपना विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई 'परिवेत्ता' कहा जाता है और परिवेत्ताका अविवाहित बड़ा भाई 'परिवित्त' कहा जाता है।