गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८५- कर्मविपाक-निरूपण
| १७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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अश्व, पृथ्वी, वायु तथा ओसकी बूँदें पवित्र ही होती हैं।
मनुष्यको स्नान करनेके बाद, जल पीनेके बाद, छींक आनेके बाद, शयनोपरान्त, भोजन करनेपर, मार्गमें चलनेपर तथा वस्त्र बदलनेपर पुनः आचमन करना चाहिये।
जम्हाई लेनेपर, निष्ठीवन (थूकनेपर), शयन करनेपर, वस्त्र-धारण करनेपर और अश्रुपात होनेपर—इन पाँच अवस्थाओंमें आचमन नहीं करे, अपितु दक्षिण कानका स्पर्श कर ले। ब्राह्मणके दक्षिण कानपर अग्नि आदि देवता सदैव विराजमान रहते हैं।
(अध्याय ९७)
दान-धर्मकी महिमा
याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा— हे ऋषियो! अब मैं दान-धर्मकी महिमाका वर्णन करता हूँ, उसे सुनें।
अन्य वर्णोंकी अपेक्षा ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उनमें भी जो सक्रियावान् (कर्मनिष्ठ) ब्राह्मण हैं वे श्रेष्ठ हैं। उन कर्मनिष्ठोंमें भी विद्या तथा तपस्यासे युक्त ब्रह्म-तत्त्ववेत्ता श्रेष्ठ तथा सत्पात्र हैं। गृहस्थके द्वारा गौ, भूमि, धान्य तथा सुवर्ण आदिका दान सत्पात्रको उसका पूजन करके दिया जाना चाहिये।
विद्या एवं तपस्यासे हीन ब्राह्मणको प्रतिग्रह (दान) स्वीकार नहीं करना चाहिये। इस प्रकार दान लेनेपर वह प्रदाता और स्वयंको अधोगामी बना देता है। प्रतिदिन उपयुक्त पात्रको दान देना चाहिये। निमित्त (सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण आदि विशेष अवसर) उपस्थित होनेपर विशेष रूपसे अधिक दान देना चाहिये। किसीके याचना करनेपर भी यथाशक्ति अपनी श्रद्धाके अनुसार दान देना चाहिये। सुवर्णसे अलंकृत सींगोंवाली, चाँदीसे मढ़े हुए खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्राच्छादित, अधिक दूध देनेवाली, सुशील गौका यथाशक्ति दक्षिणाके साथ दान करना चाहिये और दान देते समय साथमें कांस्यपात्र भी देना चाहिये।
सींगमें दस सौवर्णिक (एक सौ साठ माशा) सोना तथा खुरमें सात पल चाँदी लगाना चाहिये एवं दोहन-पात्र पचास पल काँसेका होना चाहिये।
गौका बछड़ा भी अलंकृत होना चाहिये। गौ रोगरहित तथा सवत्सा होनी चाहिये। यदि बछड़ा न हो तो स्वर्ण या पिप्पलकाष्ठका बाछा या बाछी बनाकर देना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रदाता बछड़ेके शरीरमें स्थित रोम-संख्याके अनुसार उतने ही वर्षपर्यन्त स्वर्गका उपभोग करता है। यदि गौ कपिला (भूरे रंगकी) होती है तो वह दाताके सात कुलोंका उद्धार कर देती है।
जबतक प्रसव कर रही गौकी योनिमें बछड़ेके दोनों पैरोंसहित मुख दिखायी देता है और जबतक वह गर्भका प्रसव नहीं कर देती है, तबतक गौको पृथ्वीके समान ही मानना चाहिये।
सामर्थ्यके अभावमें स्वर्णमय सींग आदिसे युक्त गौका दान यदि न किया जा सके तो भी रोगरहित, हृष्ट-पुष्ट, दूध देनेवाली धेनु अथवा दूध न देनेवाली गर्भिणी गौका जो दान करता है, वह स्वर्गलोकमें महिमामण्डित होकर निवास करता है।
थके हुए प्राणीकी आसनादिक दानके द्वारा थकान दूर करना, रोगीकी सेवा करना, देवपूजन करना, ब्राह्मणका पाद-प्रक्षालन करना तथा ब्राह्मणद्वारा उच्छिष्ट किये गये स्थान और पात्रका मार्जन-कृत्य विधिवत् दिये गये गोदानके समान फलदायक होता है। ब्राह्मणके लिये जो अभीष्ट हो, उसे वह
काण्ड ] * श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल * १७१
वस्तु प्रदानकर प्रदाताको स्वर्ग-लाभ लेना चाहिये।
भूमि, दीप, अन्न, वस्त्र और घृतके दानसे प्रदाता लक्ष्मी प्राप्त कर सकता है। घर, धान्य, छाता, माला, उपयोगी वृक्ष, यान (सवारी), घृत, जल, शय्या, कुंकुम, चन्दन आदि प्रदान करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
सत्पात्रको विद्या प्रदान करनेवाला देवदुर्लभ ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। मूल्य लेकर भी वेदोंके अर्थ, यज्ञोंकी विभिन्न विधियोंको सम्पादित करनेवाले तथा शास्त्र और धर्म-शास्त्रोंको लिखनेवाले ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। वेद-शास्त्र ही संसारके मूल (व्यवस्थापक) हैं। इसी कारण ईश्वरने सबसे पहले इन्हींकी सृष्टि की। अतः सब प्रकारका सत्प्रयत्न करके वेदोंका अर्थ-संग्रह करना चाहिये अर्थात् वेदोंके तात्पर्यको समझनेके लिये भलीभाँति प्रयास करना चाहिये। जो अधिकारी इतिहास अथवा पुराण लिखकर दान देता है, वह ब्रह्मदानके समान प्राप्त पुण्यका द्विगुणित पुण्य प्राप्त करता है।
द्विजको नास्तिकोंके वचन, कुतर्क तथा प्राकृत और म्लेच्छ-भाषा-भाषित वचन नहीं सुनने चाहिये, क्योंकि ये शब्द द्विजको अधोगतिमें ले जाते हैं।
दान ग्रहण करनेका सामर्थ्य रहनेपर भी जो लोग दान ग्रहण नहीं करते, वे लोग उन्हीं लोकोंको प्राप्त करते हैं, जो दान-दाताको प्राप्त होते हैं।
कुश, शाक, दूध, गन्ध तथा जल—ये वस्तुएँ बिना माँगे यदि कुलटा, पतित, नपुंसक एवं शत्रुके अतिरिक्त किसी दुष्कृतीके द्वारा भी दी जा रही हों तो भी इनका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये। यदि कोई सुकृती इन्हें बिना याचनाके दे रहा है, तब तो इनके प्रत्याख्यानका कोई प्रसंग ही नहीं है। देवता तथा अतिथिकी पूजा करनेके लिये, अपने माता-पिता आदिके भरण-पोषणके लिये तथा अपने जीवनकी रक्षाके लिये पतित आदि अत्यन्त कुत्सितको छोड़कर अन्य सभीसे जितना अत्यावश्यक है, उतना प्रतिग्रह लिया जा सकता है।
(अध्याय ९८)
श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल
याज्ञवल्क्यजीने कहा—ऋषिगणो! अब मैं सर्वपाप-विनाशिनी श्राद्ध-विधिका वर्णन करता हूँ।
अमावास्या, अष्टका*, वृद्धि (पुत्रजन्म आदि), कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन, द्रव्य (अन्नादि)-लाभ होना, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणकी प्राप्ति होना, विषुवत्-संक्रान्ति (सूर्यके तुला और मेषराशिपर संक्रमण करनेका समय), मकर-संक्रान्ति, व्यतीपात, गजच्छाया-योग, चन्द्र-सूर्यग्रहण तथा कर्ताकी श्राद्धके प्रति अभिरुचि होना—ये सब श्राद्धके काल (अवसर) कहे गये हैं।
जो ब्राह्मण युवा (मध्यम वयस्क) होते हुए सभी वेदोंमें अग्र्य (सतत अस्खलित अध्ययनमें समर्थ), श्रोत्रिय, ब्रह्मवित्, मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदके तात्पर्यके वेत्ता, ज्येष्ठ साम नामक साम-विशेषके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ ज्येष्ठ सामके अध्येता, त्रिमधु नामके ऋग्वेदके एकदेशके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ त्रिमधुके अध्येता तथा ऋक् और यजुके एकदेश त्रिसुपर्णके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ त्रिसुपर्णके अध्येता ब्राह्मण हैं, ये
* हेमन्त-ऋतु एवं शिशिर-ऋतुके महीनोंमें आनेवाली कृष्णपक्षकी अष्टमीमें 'अष्टका' होती है।
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श्राद्धकी सम्पत्ति माने जाते हैं, अर्थात् इन्हें भोजन कराने या दान देनेसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। ऐसे ही भानजा, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणोंके लक्षणोंसे विशिष्ट ऋत्विक्, यजुर्वेदके एकदेश-विशेषके अध्ययनके अङ्ग व्रतके आचरणके साथ उस एकदेशके अध्येता, दौहित्र, शिष्य तथा अन्य सम्बन्धी—बन्धु-बान्धव एवं कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ पञ्चाग्नि¹-विद्याके अध्येता, ब्रह्मचारी, मातृ-पितृभक्त एवं ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति (श्राद्धमें भोजनीय एवं दान देने योग्य) हैं।
जो रोगी (महारोगसे युक्त), अङ्गहीन, अधिकाङ्ग, काण, पौनर्भव² (विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर उत्पन्न पुत्र), अवकीर्णी³ आदि⁴ आचारभ्रष्ट तथा अवैष्णव हैं, वे श्राद्धके योग्य नहीं हैं।
श्राद्धके एक दिन पूर्व ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको उस दिन संयम रखना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके पूर्वाह्नकालमें उपस्थित उन ब्राह्मणोंको आचमन कराकर आसनोंपर बैठा दे। विश्वेदेव अथवा आभ्युदयिक श्राद्धके लिये दो ब्राह्मण तथा पितृपात्रके स्थानपर यथाशक्ति ब्राह्मणको बैठाना चाहिये अथवा इनमें दो ब्राह्मणोंको विश्वेदेवपात्रके आसनपर पूर्वाभिमुख तथा तीन ब्राह्मणोंको पितृपात्रके आसनपर उत्तराभिमुख अथवा दोनों (देव-पितर)-के लिये एक-एक ब्राह्मण आसनपर बैठाना चाहिये। इसी प्रकार मातामहादिके श्राद्धमें व्यवस्था करनी चाहिये और मातामह-श्राद्धमें विश्वेदेव-सम्बन्धी कृत्य अलग-अलग या एक साथ किया जा सकता है।
इसके बाद ब्राह्मणोंको हस्त-प्रक्षालनके लिये जल (हस्तार्घ्य) और आसनके लिये कुश प्रदानकर उन्हींकी अनुज्ञासे 'विश्वे देवास०' इस मन्त्रसे विश्वेदेवका आवाहन करके भोजन-पात्रमें यव विकीर्ण करे। तदनन्तर पवित्रकयुक्त अर्घ्यपात्रमें 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे उसमें जल तथा 'यवोऽसि०' मन्त्रद्वारा यव डालकर 'या दिव्या०' मन्त्रसे ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्योदक प्रदानकर गन्ध, दीपक, माला, हार आदि आभूषण तथा वस्त्र दान करे।
तत्पश्चात् अपसव्य होकर पितरोंको अप्रदक्षिण (वाम)-क्रमसे स्थान (कुशरूपी आसन) प्रदान करे और (आसनके लिये मोटकरूप) द्विगुणित कुश देकर 'उशन्तस्त्वा०' मन्त्रसे उन पितरोंका आवाहन करे। उसके बाद पितृ-स्थानपर विराजमान ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर 'आयन्तु नः पितरः०' इस मन्त्रका जप करे।
पितृकार्यमें यवके स्थानपर तिलोंका प्रयोग करना चाहिये और तिलके साथ उन पितृगणोंको पूर्ववत् अर्घ्यादि प्रदान करे। उन अर्घ्यों (अर्घ्यपात्रों)-के संस्रव (ब्राह्मणके हाथमें दिये गये अर्घ्योदकका नीचे गिरा हुआ जल)-को पितृपात्रमें रखकर और दक्षिणाग्र कुशस्तम्बको भूमिपर रखकर उसके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि०' इस मन्त्रके द्वारा उक्त अर्घ्यपात्र (पितरोंके वामभागमें) भूमिपर उलटकर रख दे। उसके बाद घृत-सम्मिश्रित अन्नको अग्निमें प्रदान करनेके लिये आचार्यसे श्राद्धकर्ता अग्नौकरणकी आज्ञा प्राप्त करे। जब आचार्य 'ऐसा ही करो' यह
१-पञ्चाग्नि—सभ्य, आवसथ्य, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये पाँच अग्नियाँ हैं।
२-पौनर्भव—पुनर्भूसे उत्पन्न। पुनर्भू उस स्त्रीको कहते हैं, जो विवाहके पहले किसी दूसरे पुरुषसे विवाहित हो चुकी है अथवा किसी दूसरे पुरुषके संसर्गसे दूषित हो चुकी है।
३-अवकीर्णी—ब्रह्मचर्याश्रममें रहते हुए जिसका वीर्य स्खलित हो गया है।
४-आदिसे कुण्ड, गोलक, कुनखी एवं काले दाँतवाले ब्राह्मण समझे जाने चाहिये। पति जीवित रहते हुए दूसरे पुरुषसे उत्पन्न कुण्ड एवं पतिके निधनके बाद दूसरे पुरुषसे उत्पन्न गोलक होता है।
काण्ड ] श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल १७३
कह दें तो उन्हें पितृयज्ञके समान ही उस अग्निमें युक्त घृताक्त हव्यका हवन करके आहुति करनेसे शेष बचे हुए अन्नको समाहित मनसे पितरोंके भोजन-पात्रोंमें रख दे। पितरोंके भोजन-पात्रोंके रूपमें यथाशक्ति चाँदीके पात्रोंका प्रयोग करना चाहिये।
‘पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रसे पात्रको अभिमन्त्रित करे। ‘इदं विष्णुः’ मन्त्रका पाठ करे और ब्राह्मणके अंगुष्ठको पितरोंके लिये परिवेशित अन्नमें प्रवेशित करे। व्याहृतियोंके सहित ‘गायत्री’ एवं ‘मधुवाता०’ मन्त्रका जप करके सुखपूर्वक भोजन करें, इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे और ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें। श्राद्धकर्ता क्रोधादिसे रहित होकर बड़े ही श्रद्धा-भावसे उन ब्राह्मणोंको बिना शीघ्रता किये उनका अभीष्ट अन्न तथा हविष्यान्न उन्हें प्रदान करे और ब्राह्मणोंकी तृप्तितक ‘पुरुषसूक्त’ तथा ‘पवमानसूक्त’ आदिका जप करता रहे। उसके बाद पुनः पहलेके समान ‘मधुवाता०’ मन्त्रका पाठ करे और शेषान्नको लेकर उन संतृप्त ब्राह्मणोंके द्वारा ‘हम तृप्त हो गये’, इस प्रकार कहनेपर उन ब्राह्मणोंकी अनुज्ञासे श्राद्धकर्ता दक्षिणाभिमुख होकर तिलसहित उस शेषान्नको ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट पात्रोंके समीपमें ही भूमिपर जलके साथ रख दे और प्रत्येक ब्राह्मणको मुख-प्रक्षालनके लिये अलग-अलग जल प्रदान करे।
उच्छिष्टके समीपमें पितर आदिके लिये पिण्डदान करके उसी प्रकार मातामहादिके लिये भी पिण्डदान करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको आचमन कराये। तदनन्तर ब्राह्मणोंके ‘स्वस्ति’ ऐसा कहनेपर श्राद्धकर्ता ‘अक्षय्यमस्तु’ कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल प्रदानकर यथासामर्थ्य दक्षिणा दे और ‘स्वधां वाचयिष्ये’ ऐसा कहे। ‘वाच्यताम्’ के द्वारा ब्राह्मण श्राद्धकर्ताको आज्ञा प्रदान करें। उनकी अनुज्ञा प्राप्तकर श्राद्धकर्ता पितृजनोंके लिये ‘स्वधा’ इस वाक्यका प्रयोग करे। पुनः उन ब्राह्मणोंके द्वारा ‘स्वधा’ ऐसा कह देनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता पृथ्वीपर जलसिञ्चन करे।
‘विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्’ यह कहकर श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंको जल अर्पितकर उन्हें विसर्जित करे। तदनन्तर पितरोंसे इस प्रकारकी प्रार्थना करे—
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।
(९९। २६-२७)
पितृगण! हमारे यहाँ दाताओं, वेदों और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास बहुत सम्पत्ति हो। तदनन्तर ‘वाजे वाजे०’ इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए श्राद्धकर्ता प्रसन्नताके साथ यथाक्रम पितरोंका विसर्जन करे। जिस अर्घ्यपात्रमें पहले संस्रव-जल रखा गया था, उस पितृपात्र (अर्घ्यपात्र)-को सीधा कर दे तथा श्राद्धकर्ता उन आमन्त्रित ब्राह्मणोंका प्रदक्षिणाके साथ अनुगमन करते हुए उन्हें विदा करे। इसके पश्चात् श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन करके उस रात्रिमें सपत्नीक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे।
विवाहादिक माङ्गलिक अवसरोंपर पितरोंका नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिये। उनके लिये दधि, कर्कन्धू (बदरी फल)-मिश्रित यवान्नका पिण्डदान करना चाहिये।
एकोद्दिष्ट* श्राद्ध विश्वेदेवसे रहित एकान्न और एक पवित्रकसे युक्त होता है। इस श्राद्धमें आवाहन और अग्नौकरण नहीं किया जाता। इस श्राद्धका सम्पूर्ण कृत्य अपसव्य अर्थात् दक्षिण कन्धेपर यज्ञोपवीत धारण करके करना चाहिये। श्राद्धकर्ता इस श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंको पवित्र भूमिपर रखे हुए आसनपर ‘उपतिष्ठताम्’ कहकर बैठनेके लिये निवेदन करे। उसी प्रकार ‘अभिरम्यताम्’ कहकर विसर्जन करे। ब्राह्मणोंको भी ‘अभिरताः स्म’ यह वचन कहना चाहिये।
सपिण्डीकरण श्राद्धमें श्राद्धकर्ता तिल एवं
*एक व्यक्ति (पिता)-के उद्देश्यसे किया जानेवाला श्राद्ध एकोद्दिष्ट है।
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गन्धमिश्रित जलसे चार पात्रोंको परिपूर्ण करे। उन पितृपात्रोंमेंसे एक पात्रको अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रेतपात्रके रूपमें कल्पित करे। तदनन्तर श्राद्धकर्ता प्रेतपात्रमें रखे हुए अर्घ्य-जलके कुछ भागको पिता आदिके तीन पात्रोंमें मिलाकर पूर्ववत् अर्घ्यादि क्रियाका सम्पादन करे। 'ये समाना०' इन दो मन्त्रोंके द्वारा प्रेतपिण्डको तीन भागोंमें विभक्तकर पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे। इसके अनन्तर विहित एकोद्दिष्ट श्राद्ध स्त्री (माता)-का भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरण एक वर्षसे पूर्व होता है, उसके उद्देश्यसे भी एक वर्षपर्यन्त सान्नोदक कुम्भ प्रतिदिन, प्रतिमाह यथाशक्ति ब्राह्मणको देना चाहिये। पितरोंको समर्पित पिण्डोंको गौ, अज, ब्राह्मण, अग्नि अथवा जलको अर्पित कर दे।
हविष्यान्न (तिल, व्रीहि, यव आदि)-से श्राद्ध करनेपर पितृगणोंको एक मास तथा पायससे श्राद्ध करनेपर उन्हें एक वर्षपर्यन्त संतुष्टि प्राप्त होती है।
मृत व्यक्तियोंके लिये कृष्ण चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा करनेपर श्राद्धकर्ताको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग तो प्राप्त होता ही है, जीवनकालमें भी उन (श्राद्धकर्ता)-को उत्साह, शौर्य, क्षेत्र तथा शक्तिकी प्राप्ति होती है।
जो विधिवत् अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध करता है, वह पुत्र, सर्वजनश्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रमुखता, माङ्गलिक दक्षता, अभीष्ट कामना-पूर्ति, वाणिज्यमें लाभ, निरोगता, यश, शोकराहित्य, परम गति, धन, विद्या, वाक्-सिद्धि, पात्र, गौ, अज, आविक (भेंड़), अश्व और दीर्घायु प्राप्तकर अन्तकालमें मोक्ष-लाभ प्राप्त करता है। कृत्तिकादिसे भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिको भी इन सभी सुखोंकी प्राप्ति होती है। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र तथा भवन आदि सुख-साधन स्वयं ही श्राद्धकर्ताको सुलभ होते हैं अर्थात् इस प्रकारका श्राद्धकर्ता भोजन, वस्त्र तथा भवन आदिसे परिपूर्ण रहता है।
पिता-पितामहादि पितर संतुष्ट होकर श्राद्धकर्ताको नित्य आयु, संतति, धन, विद्या, राज्य, सभी प्रकारके सुख, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।
(अध्याय ९९)
विनायकशान्ति-स्नान
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे ऋषियो! अब आप सभी विनायककी अप्रसन्नतासे ग्रस्त (आविष्ट) पुरुषके लक्षणोंका श्रवण करें।
विनायकसे ग्रस्त व्यक्ति स्वप्नावस्थामें बहुत अधिक स्नान करता है। उसे स्वप्नमें मरे हुए प्राणियोंके सिरोंका दर्शन होता है। वह उद्विग्नमन रहता है। उसके सारे प्रयत्न निष्फल रहते हैं। बिना कारण उसे पीड़ा होती है। विनायककी अप्रसन्नतासे युक्त होनेपर राजा राज्यसे वञ्चित रहता है, कुमारी पतिसे वञ्चित रहती है तथा गर्भिणी स्त्री पुत्र-लाभसे वञ्चित रहती है। अतएव विनायककी शान्तिके लिये किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें उसे विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। स्नानकी विधि संक्षेपमें इस प्रकार है— भद्रासनपर बिठाकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचनपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घृत-मिश्रित करके उबटन बनाये और उस व्यक्तिके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। सर्वौषधियुक्त चार कलशोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। सरोवर
१-ये चार पात्र पितरोंके लिये अलग-अलग विहित हैं। इनके अतिरिक्त विश्वेदेवके दो पात्र तो होते ही हैं।
२-इस एकोदिष्टका तात्पर्य यह है कि पार्वण श्राद्धमें माताका श्राद्ध अलगसे करना चाहिये (या० मिताक्षरा, श्रा० प्र० अ० श्लोक २५४)।