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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

८०- श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी, श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल

काण्ड ] वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय १६३


वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय

**याज्ञवल्क्यजीने कहा—**अब मैं संकर जातियोंकी उत्पत्ति एवं गृहस्थादिके श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन करता हूँ।

ब्राह्मण पुरुषसे विवाहिता क्षत्रिय कन्यामें मूर्धावसिक्त, विवाहिता वैश्य कन्यामें अम्बष्ठ और विवाहिता शूद्रामें पारशव निषाद नामक संकरका जन्म होता है¹। क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें माहिष्य तथा शूद्रामें म्लेच्छकी उत्पत्ति होती है। वैश्य पुरुषसे शूद्रवर्णा स्त्रीमें करण नामक संकर जातिकी संतानका जन्म होता है³। क्षत्रिय पुरुषसे ब्राह्मण स्त्रीमें सूत, वैश्य पुरुषसे ब्राह्मणीमें वैदेहक तथा शूद्र पुरुषसे ब्राह्मणीमें सर्ववर्णनिन्दनीय चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। क्षत्रिय स्त्रीमें वैश्यसे मागध और शूद्रसे क्षत्ता नामक संकर संतानका जन्म होता है। इसी प्रकार वैश्य स्त्री शूद्र पुरुषके संसर्गसे आयोगव⁴ नामक वर्णसंकर पुत्रको जन्म देती है। क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें उत्पन्न हुए माहिष्य संकरके द्वारा करणी (वैश्यसे शूद्रामें उत्पन्न) स्त्रीके साथ संसर्ग होनेपर रथकारका जन्म होता है।

जो उच्चवर्णीय पुरुषसे निम्नवर्णा स्त्रीमें संतान उत्पन्न होती है, वह अप्रतिलोमज अथवा अनुलोमज संतान है और जो निम्नवर्गीय पुरुषसे उच्चवर्णा स्त्रीमें संतान जन्म ग्रहण करती है, वह प्रतिलोमज संतान है। प्रतिलोमज असत् हैं और अनुलोमज सत् हैं।

जातिका उत्कर्ष सातवें, पाँचवें अथवा छठे जन्ममें होता है। यहाँ जाति शब्दसे अभी वर्णित मूर्धावसिक्त आदि जातियाँ ली गयी हैं। प्रकृतमें संक्षेपसे यह समझना चाहिये—ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न संतान निषाद कही जाती है। यह संतान यदि कन्या है तो इसे निषादी कहा जाता है। इसका यदि ब्राह्मणसे विवाह हो और उससे उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे विवाह हो, आगे उससे भी उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे ही विवाह हो—इसी क्रमसे उत्पन्न छठी कन्यासे विवाहित ब्राह्मणके द्वारा उत्पादित सातवीं संतान शुद्ध ब्राह्मणवर्णकी होगी। ऐसे ही ब्राह्मणसे वैश्य जातीय कन्यामें उत्पन्न अम्बष्ठ जातिकी पाँचवीं कन्याकी छठी संतान शुद्ध ब्राह्मण होगी। मूर्धावसिक्ता कन्याकी भी इसी क्रमसे उत्पन्न चौथी कन्याकी पाँचवीं संतान शुद्ध ब्राह्मण ही होगी। ठीक यही स्थिति उग्रा और माहिष्याकी है। ये दोनों उग्र एवं माहिष्य जातिकी कन्याएँ यदि क्षत्रियसे ही विवाहित होती गयीं तो इनकी छठी और पाँचवीं संतति शुद्ध क्षत्रिय ही होगी। ऐसे ही करण जातिकी कन्या वैश्यवर्णके पुरुषसे विवाहित होकर यथाक्रम पाँचवें संतानको शुद्ध वैश्यरूपमें ही उत्पन्न करेगी।

इसके अतिरिक्त यह भी जानने योग्य है कि कर्मका व्यत्यय होनेसे भी जिस वर्णका कर्म किया जा रहा है, वही वर्ण सातवें, छठे तथा पाँचवें जन्मकी संतानका हो जाता है। स्पष्टरूपमें इस प्रकार समझा जा सकता है—धर्मशास्त्रके अनुसार ब्राह्मणको अपनी मुख्यवृत्ति याजन तथा अध्यापन आदिसे जीविका चलानी चाहिये। आपत्कालमें अपनी मुख्यवृत्तिसे जीविका न चल पानेपर क्षत्रियवृत्ति,


१-ये अनुलोम संकर कहे जाते हैं।
२-याज्ञवल्क्यस्मृति (४।९२)-के अनुसार क्षत्रियसे शूद्रामें उग्र नामकी संकर जातिकी संतान उत्पन्न होती है।
३-मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ, निषाद, माहिष्य, उग्र एवं करण—ये छः अनुलोमज पुत्र हैं।
४-सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता एवं आयोगव—ये छः प्रतिलोमज पुत्र हैं।

१६४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वैश्यवृत्ति या शूद्रवृत्ति भी ब्राह्मण स्वीकार कर सकता है। यही क्षत्रिय एवं वैश्यके बारेमें भी व्यवस्था है। जब कोई वर्ण अपनी मुख्यवृत्तिका परित्याग कर अन्य द्वितीय, तृतीय वर्णकी वृत्ति स्वीकार करता है तो यह हीनवर्णकी वृत्ति मानी जाती है और यह हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार करना ही ‘कर्म-व्यत्यय' है। इस प्रकारके कर्म-व्यत्यय होनेपर आपत्तिकालके अभावमें भी यदि कोई हीनवर्णकी वृत्तिका परित्याग नहीं करता है तो उसकी सातवीं, छठी, पाँचवीं कुल-परम्परामें उत्पन्न संतति उस हीनवर्णकी ही होगी जिस हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार कर जीविका निर्वाह किया जा रहा है। दृष्टान्तके रूपमें यह कहा जा सकता है—यदि कोई ब्राह्मण शूद्रवृत्तिसे जीविका चला रहा है और उसका परित्याग बिना किये पुत्र उत्पन्न कर रहा है तथा यह पुत्र भी शूद्रवृत्तिसे अपना जीवन चलाता हुआ अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है एवं यह तीसरा पुत्र भी शूद्र-वृत्तिमें रहकर ही अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है तो ऐसी परम्परामें सातवें जन्ममें शूद्र ही उत्पन्न होगा। वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी दशामें छठे जन्ममें वैश्य ही उत्पन्न होगा। क्षत्रियवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी स्थितिमें पाँचवें जन्ममें क्षत्रिय ही उत्पन्न होगा। क्षत्रिय भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर छठे वंशमें शूद्रवर्णकी एवं वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर पाँचवें वंशमें वैश्यवर्णकी संतान उत्पन्न करेगा। ऐसे ही वैश्य भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करते हुए अपनी पुत्र-परम्पराके पाँचवें जन्ममें शूद्रको ही उत्पन्न करेगा।

इसी प्रसंगसे यह भी ज्ञातव्य है—तीन प्रकारकी जातियाँ हैं—१-संकर जाति, २-संकीर्ण संकर जाति तथा ३-वर्ण संकीर्ण संकर जाति। संकर जातिके मूर्धावसिक्त अम्बष्ठ आदि छः भेद ऊपर बताये गये हैं। इन्हें अनुलोमज कहा जाता है। ऐसे ही सूत, वैदेहक आदि भी छः संकर जातिके भेद पहले ही कहे जा चुके हैं। ये प्रतिलोमज हैं। संकीर्ण संकर जातिके जो लोग होते हैं, उनका निर्देश पहले रथकारकी उत्पत्ति बताकर किया गया है। अब वर्ण संकीर्ण संकर जातिके लोगोंको इस प्रकार समझनी चाहिये—मूर्धावसिक्ता स्त्रीमें क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रसे जो उत्पादित हैं, ऐसे ही अम्बष्ठ जातिकी स्त्रीमें वैश्य अथवा शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं और पारशव निषाद जातिकी स्त्रीमें शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं, वे वर्ण संकीर्ण संकर जातिके होते हैं। इन्हें, अधर प्रतिलोमज कहते हैं। इसी प्रकार मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ एवं पारशव निषाद जातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मणके द्वारा जो उत्पादित हैं, माहिष्य एवं उग्रजातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मण अथवा क्षत्रियसे जो उत्पादित हैं और करणजातिकी स्त्रीमें ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यसे जो उत्पादित हैं, उन्हें उत्तर अनुलोमज कहते हैं। उनमें अधर प्रतिलोमज असत् तथा उत्तर प्रतिलोमज सत् माने जाते हैं।

गृहस्थाश्रमीको प्रतिदिन विवाहाग्निमें अथवा सम्पत्ति विभागके समय स्वयं लायी गयी संस्कृत-अग्निमें स्मार्तकर्म वैश्वदेव आदि सम्पन्न करना चाहिये। श्रौतकर्मानुष्ठान अग्निहोत्र आदि वैतानाग्नि (आहवनीय आदि अग्नियों)-में करना चाहिये। शरीर चिंता (प्रातः-सायं अवश्य करणीय मल-मूत्र विसर्जन)-को शास्त्रीय विधिसे सम्पन्न कर, गन्ध-लेपनिवृत्तिपर्यन्त शुद्धि प्राप्तकर दन्तधावन एवं स्नानकर द्विजको प्रातःकाल संध्योपासन करना चाहिये तथा अनन्तर अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करके समाहितचित्तसे सूर्यदेवताके मन्त्रोंका* जप


* 'उदु त्यं जातवेदसं०' आदि।

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करना चाहिये। उसके बाद गृहस्थाश्रमी वेदार्थ (निरुक्त, व्याकरण आदि) तथा अन्य विविध प्रकारके शास्त्रोंका अध्ययन करे। योगक्षेम आदिकी सिद्धिके लिये उसको ईश्वरकी उपासना करनी चाहिये।

वह स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा पूजन करे। तदनन्तर उसको वेद, पुराण तथा इतिहासका यथाशक्ति अध्ययन एवं आध्यात्मिकी विद्याका जप (चिन्तन) करना चाहिये। तत्पश्चात् भूत, पितर, देव, ब्रह्म और मनुष्य जातिके लिये गृहस्थ बलिकर्म*, स्वधा, होम, स्वाध्याय तथा अतिथि-सत्कार करे। देवताओंके लिये अग्निमें हवन करना चाहिये। भूतबलि, श्वान (कुत्ता), चाण्डाल एवं काक आदिके लिये पका हुआ अन्न भूमिपर दे। पितृगण एवं मनुष्योंको अन्नके सहित जल भी प्रतिदिन प्रदान करना चाहिये। प्रतिदिन स्वाध्याय करे, केवल अपने लिये अन्नपाक न करे। स्ववासिनी (अपने पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता स्त्री), वृद्ध, गर्भिणी, व्याधिपीड़ित, कन्या, अतिथि तथा भृत्योंको भोजन प्रदानकर गृहस्वामिनी और उसका पति शेष बचे हुए अन्नका भोजन करे। अग्निमें पञ्चप्राणाहुति देकर अन्नकी निन्दा न करते हुए भोजन करना चाहिये।

भोजनके आदि और अन्तमें आपोऽशान-विधिसे आचमन करे तथा सम्यक् प्रकारसे पका हुआ, हितकारी, स्वल्प भोजन बालकोंके साथ करना चाहिये।

पात्रादिसे आच्छादित अमृततुल्य भोजन द्विजको कराना चाहिये। यथाशक्ति अतिथि एवं अन्य वर्णोंको क्रमशः भोजन देना चाहिये। सायंकाल भी आये हुए अतिथिको लौटाना नहीं चाहिये। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। सुव्रत! (ब्रह्मचारी एवं संन्यासी) भिक्षुकको सत्कारपूर्वक भिक्षा प्रदान करनी चाहिये। द्वारपर पधारे सभीको भोजन कराना चाहिये। प्रतिवर्ष स्नातक, आचार्य एवं राजाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसे ही मित्र, जामाता एवं ऋत्विक् प्रतिवर्ष पूजनीय हैं। पथिकको अतिथि तथा वेदपारंगतको श्रोत्रिय कहा जाता है। ब्रह्मलोककी कामना करनेवाले गृहस्थजनोंके लिये ये दोनों मान्य हैं।

ससम्मान आमन्त्रणके बिना ब्राह्मणको दूसरेके यहाँ बने हुए पक्वान्नको प्राप्त करनेकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। गृहस्थको वाणी, हाथ, पैरकी चञ्चलता एवं अतिभोजन करनेसे बचना चाहिये। संतुष्ट श्रोत्रिय तथा अतिथिको विदा करते समय ग्रामकी सीमातक उनका अनुगमन करना चाहिये।

गृहस्थ अपने इष्ट-मित्र एवं बन्धुओंके साथ दिनका शेष भाग व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकालीन संध्योपासना करके वह पुनः अग्निहोत्रकर भोजन ग्रहण करे। इसके बाद उसको अपने सुबुद्ध भृत्योंके साथ बैठकर अपने हितका विचार करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्यागकर वह धनादिसे ब्राह्मणको संतुष्ट करे तथा वृद्ध, दुःखी एवं भार ढोनेवाले पथिकोंको भलीभाँति मार्ग दिखाकर प्रसन्न करे।

यज्ञानुष्ठान, अध्ययन और दान वैश्य तथा क्षत्रियका कर्म माना गया है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये याजन, अध्यापन तथा प्रतिग्रह—ये तीन कर्म अधिक बताये गये हैं।

क्षत्रियका प्रधान कर्म प्रजापालन है। वैश्यवर्णके लिये कुसीद (सूद), कृषि, वाणिज्य और पशुपालन मुख्य कर्म कहा गया है। शूद्रवर्णका प्रधान कर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यकी सेवा करना है। द्विजोंको यज्ञादि कर्तव्योंमें प्रमाद नहीं करना चाहिये। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियसंयम,


* बलिकर्म—भूतयज्ञ, स्वधा—पितृयज्ञ, होम—देवयज्ञ, स्वाध्याय—ब्रह्मयज्ञ, अतिथि-सत्कार—मनुष्य-यज्ञ।