गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७७- वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय
कांड ] * वर्णधर्म-निरूपण * १५५
भगवान् विष्णुका मूर्त ध्यानस्वरूप
भगवान् हरिका मूर्त ध्यानरूप इस प्रकार है— वे विष्णु करोड़ों सूर्यके समान जयशील, अद्वितीय प्रभासम्पन्न, कुन्दपुष्प एवं गोदुग्ध-सदृश धवल-वर्ण हैं। मोक्ष चाहनेवाले मुनियोंको ऐसे श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये। वे अत्यन्त सुन्दर एवं विशाल शंख-समन्वित हैं। हजारों सूर्यके समान प्रचण्ड ज्वालाओंकी मालासे आवेष्टित, उग्ररूप, चक्रसे युक्त, शान्तस्वभाव और सुन्दर मुखमण्डलवाले वे विष्णु अपने हाथमें गदा धारण करते हैं।
वे रत्नोंसे देदीप्यमान बहुमूल्य किरीटसे युक्त सर्वत्रगामी देव कमलको धारण करते हैं। वे वनमालाको धारण करनेवाले तथा शुभ्र हैं, समान स्कन्धोंवाले तथा स्वर्णाभूषणको धारण करते हैं, वे शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाले, विशुद्ध देहवाले और सुन्दर कान्तिवाले हैं तथा कमलपर विराजमान रहते हैं।
वे स्वर्णमय शरीरवाले विष्णु सुन्दर हार, शुभ अंगद (बाजूबंद), केयूर और वनमालासे अलंकृत हैं। वे श्रीवत्स कौस्तुभमणि धारण करनेवाले हैं एवं लक्ष्मीसे वन्दनीय और नेत्रद्वयसे शोभायमान हैं। वे अणिमादिक गुणोंसे समन्वित विष्णु जगत्के सृष्टिकर्ता और संहारक हैं।
वे मुनि, देव तथा दानव सभीके लिये ध्यानगम्य, अत्यन्त सुन्दर हैं। वे ब्रह्मादिसे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणिवर्गके हृदयमें विराजमान हैं। वे सनातन, अव्यय, सभीके ऊपर कृपालु, प्रभु, नारायण, देवाधिदेव तथा चमकते हुए मकराकृत कर्णकुण्डलोंसे सुशोभित हैं। वे दुःखविनाशक, पूजनीय, मङ्गलमय, दुष्टोंके संहारक, सर्वात्मा, सर्वस्वरूप, सर्वत्रगामी और ग्रहदोषोंके निवारक हैं।
वे देदीप्यमान नखोंसे समन्वित तथा सुन्दर-सुन्दर अँगुलियोंसे सम्पन्न, जगत्के शरणस्थल, सभीको सुख देनेवाले सौम्यस्वरूप महेश्वर हैं। वे समस्त अलंकारोंसे अलंकृत, सुन्दर चन्दनसे संलिप्त, सर्वदिवससमन्वित तथा सभी देवताओंका प्रिय करनेवाले हैं।
वे सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी, सर्वेश्वर एवं सभीकी भावनाओंमें विराजमान रहते हैं। वे सूर्यमण्डलसे अधिष्ठित देव, अग्नि और जलमें भी निवास करते हैं। वे वासुदेव जगत्के धाता और मुमुक्षुओंके ध्यान करनेयोग्य हैं। हे हर! इस लोकमें प्राणियोंके द्वारा 'मैं ही वासुदेव हूँ', इस प्रकार चिन्तनीय वे हरि आत्मस्वरूप हैं।
जो मनुष्य इस प्रकारके भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं, वे परमगति प्राप्त करते हैं। प्राचीन कालमें महर्षि याज्ञवल्क्यने ऐसे स्वरूपवाले उन देवेश्वरका ध्यान किया था, जिसके फलस्वरूप धर्मोपदेशकके कर्तृत्वको प्राप्त करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया था। जो मनुष्य इस विष्णु-ध्यान नामक अध्यायका पाठ करता है, उसको भी परमगतिकी प्राप्ति होती है। (अध्याय ९२)
वर्णधर्म-निरूपण
श्रीशिवजीने कहा— हे हरे! हे केशिहन्ता! हे माधव! महर्षि याज्ञवल्क्यजीने जिस धर्मका प्रतिपादन किया था, आप मुझको उसे सुनानेकी कृपा करें।
श्रीहरिने कहा— मिथिलापुरीमें विराजमान महर्षि याज्ञवल्क्यजीके पास पहुँचकर ऋषियोंने उनका अभिवादन किया और उनसे सभी वर्णोंके धर्मादिक कर्तव्योंको जाननेकी अपनी इच्छा प्रकट की। तत्पश्चात् वे जितेन्द्रिय महामुनि सर्वप्रथम
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भगवान् विष्णुका ध्यान करके उन सभी ऋषियोंसे धर्मसम्बन्धित विषयका वर्णन करने लगे।
याज्ञवल्क्यजीने कहा—जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग विचरण करते हैं, मैं उस देशके धर्मादिक विषयोंका वर्णन करता हूँ, आप सब सुनें।
पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द एवं ज्योतिषके सहित चार वेद—ये धर्म तथा चौदह विद्याओंके स्थान हैं। मनु, विष्णु, यम, अङ्गिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम, शंख-लिखित, हारीत और अत्रिके साथ मैं स्वयं—हम सब भगवान् विष्णुका ध्यान करके धर्मोपदेशक हुए।
धर्मका अर्थ है—पुण्य। पुण्यकी उत्पत्तिके हेतु हैं—शास्त्रविहित देशमें, शास्त्रविहित कालमें, शास्त्रविहित उपायसे श्रद्धापूर्वक योग्य पात्र (विद्या एवं तपसे समृद्ध ब्राह्मण)-को दिया गया दान तथा इसके अतिरिक्त अन्य सभी शास्त्रोक्त कर्म। इन्हें अलग-अलग तथा समूहरूपमें धर्म (पुण्य)-का उत्पादक समझना चाहिये। धर्मके उत्पादक इन हेतुओंका मुख्य फल (परम धर्म) योग (चित्तवृत्तिनिरोध)-के द्वारा आत्मदर्शन (आत्माका साक्षात्कार) ही है। इस आत्मदर्शनरूप परम धर्मके लिये देश आदिका कोई नियम नहीं है। चित्तवृत्तिनिरोध (योग) होनेसे यह होता ही है। चित्तवृत्तिनिरोधके लिये विहित उपायोंके अनुष्ठानकी सम्पन्नतामें देश आदिका नियम आवश्यक है। अभी धर्मके उत्पादक जिन हेतुओंका निर्देश किया गया है, उनके बारेमें संदेह होनेपर निर्णय प्राप्त करनेके लिये परिषद् (धर्मसभा)-का सहयोग लेना चाहिये। यह परिषद् वेदों एवं धर्मशास्त्रोंके ज्ञाता चार ब्राह्मणोंकी अथवा तीन ब्राह्मणोंकी होती है। इस परिषद्का निर्णय धर्मके सम्बन्धमें मान्य होता है। ब्रह्मवेत्ता—वेद एवं धर्मशास्त्रका विज्ञ एक ब्राह्मण भी धर्मके विषयमें उत्पन्न संदेहका निराकरण कर सकता है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। इनमें प्रारम्भके तीन वर्ण द्विज कहलाते हैं। गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यन्त ऐसे द्विजोंकी समस्त क्रियाएँ मन्त्रोंके द्वारा होती हैं।
गर्भाधान-संस्कार ऋतुकालमें* होता है। गर्भस्पन्दन होनेसे पूर्व ही पुंसवन-संस्कार किया जाता है। गर्भाधानके छठे अथवा आठवें मासमें सीमन्तोन्नयन-संस्कार होता है। सन्तानोत्पत्तिके बाद जातकर्म और ग्यारहवें दिन नामकरण-संस्कार करनेका विधान है। चतुर्थ मासमें निष्क्रमण तथा छठे मासमें अन्नप्राशन-संस्कार करना चाहिये। उसके बाद कुल-परम्पराके अनुसार चूडाकरण नामक संस्कार करनेका विधान है।
इस प्रकार सन्तानके लिये विहित उक्त संस्कारोंको करनेसे बीज (शुक्र) तथा गर्भ (शोणित)-के कारण उत्पन्न हुए सभी पाप शान्त हो जाते हैं। स्त्रियोंकी ये सभी क्रियाएँ (संस्कार) अमन्त्रक होती हैं और विवाह-संस्कार समन्त्रक होता है। (अध्याय ९३)
* स्त्रियोंका वह कालविशेष ऋतुकाल है, जो गर्भ धारणके योग्य अवस्थाविशेषसे युक्त है। यह विशेष काल रजोदर्शनके दिनसे सोलह अहोरात्रका होता है। इन सोलह अहोरात्रोंमें प्रथम चार रात्रियाँ गर्भाधानके लिये वर्जित हैं; अतः इन चार रात्रियोंके बादकी बारह रात्रियाँ ही गर्भाधानके लिये विहित हैं।
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वर्णधर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा—गर्भधारण अथवा जन्म-ग्रहणके आठवें वर्षमें ब्राह्मण, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय तथा बारहवें वर्षमें वैश्यका उपनयन-संस्कार गुरु करे अथवा कुल-परम्पराके अनुसार करे। गुरु इस उपनीत शिष्यको महाव्याहृतियोंके सहित वेद पढ़ाये और शौचाचारकी शिक्षा प्रदान करे।
द्विजोंको दिन और संध्याकालमें उत्तराभिमुख तथा रात्रिके समय दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका परित्याग करना चाहिये। तदनन्तर मिट्टीसे एवं जलसे* मल-मूत्रके गन्ध एवं लेपका निवारण जबतक न हो तबतक इन्द्रियोंका परिमार्जन करे।
तत्पश्चात् शुद्ध स्थानमें जाकर दोनों पाँवोंको भलीभाँति धोकर दोनों जानुओंके मध्य अपने हाथोंको अवस्थित करके उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख बैठे और दाहिने हाथमें स्थित ब्राह्मतीर्थ (अर्थात् अंगुष्ठका मूल स्थान)-से आचमन करे। कनिष्ठा, तर्जनी एवं अंगुष्ठ अंगुलिके मूल स्थान तथा हाथके अग्रभागमें क्रमशः प्रजापतितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और देवतीर्थका अधिष्ठान होता है।
कूप एवं तड़ागादिके शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करके अंगुष्ठमूलसे दो बार ओठोंका मार्जन करना चाहिये। द्विजातियोंको चाहिये कि वे फेन और बुद्बुदोंसे रहित प्रकृतिद्वारा प्रदत्त शुद्ध-स्वाभाविक जलसे अपनी इन्द्रियोंका स्पर्श यथाविधि करें। हृदय, कण्ठ एवं तालुतक पहुँचनेवाले जलसे ही क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य आचमन करके शुद्ध होते हैं। स्त्री एवं शूद्रकी तालुतक पहुँचनेवाले शुद्ध जलसे एक बार आचमन करनेसे ही शुद्धि हो जाती है। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, उनके लिये भी इसी प्रकार आचमनकी व्यवस्था है।
प्रातःस्नान, जलदैवत 'ॐ आपो हि ष्ठा०' आदि मन्त्रोंसे मार्जन, प्राणायाम, सूर्योपस्थान एवं गायत्रीमन्त्रका जप प्रतिदिन अपने अधिकारके अनुसार यथाविधि करना चाहिये।
'ॐ आपो ज्योती०' आदि मन्त्र ही गायत्रीमन्त्रका शिरोभाग हैं। इस शिरोभागसे युक्त प्रतिमहाव्याहृति एक-एक बार प्रणव जोड़कर तीनों महाव्याहृतियोंके साथ गायत्रीमन्त्रका मानस-जप करते हुए मुख एवं नासिकामें संचरणशील वायुका नियमन करना ही प्राणायाम है।
प्राणायाम करनेके पश्चात् तीन बार जल देवताके मन्त्रसे प्रोक्षणकर प्रतिदिन सायंकाल नक्षत्रदर्शनतक पश्चिममुख बैठकर गायत्रीमन्त्रका जप करे। इसी प्रकार प्रातःकालकी संध्या करके पूर्वमुख होकर गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए सूर्यदर्शनके समयतक स्थिर रहे। उन दोनों संध्याओंमें अपने गृह्यसूत्रके अनुसार अग्निहोत्र करे।
तदनन्तर 'मैं अमुक हूँ' इस प्रकार कहते हुए वृद्धजनों (गुरु आदि बड़े लोगों)-को प्रणाम करे। इसके बाद संयमी ब्रह्मचारी स्वाध्यायके लिये एकाग्रचित्त होकर गुरुकी सेवामें उनके अधीन सदा रहे। तत्पश्चात् गुरुके द्वारा बुलानेपर उनके पास जाकर अध्ययन करे (गुरुको स्वयं अध्यापनके लिये प्रेरित न करे) और भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, उसे गुरुके चरणोंमें समर्पित करे। मन, वाणी और शरीरके द्वारा गुरुके हितकारी कार्योंमें सदा संलग्न रहे।
ब्रह्मचारीको दण्ड, मृगचर्म, यज्ञोपवीत और मूँजमेखलाका धारण यथाशीघ्र करना चाहिये तथा
* कूप आदिसे बाहर निकाले गये जलके द्वारा शुद्धिका विधान है। जलके मध्य शौच आदि क्रिया निषिद्ध है।
१५८ [ आचार-
संक्षिप्त गरुडपुराण
अपनी जीविकाके लिये अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। भिक्षा ग्रहण करते समय ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य-वर्णके ब्रह्मचारीको क्रमशः आदिमें, मध्यमें तथा अन्तमें 'भवति' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। इसके अनुसार 'भवति भिक्षां देहि', 'भिक्षां भवति देहि' और 'भिक्षां देहि भवति'—इस प्रकार वाक्यप्रयोग यथाक्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य ब्रह्मचारीको करना विहित है। इस वाक्यका अर्थ है—आप भिक्षा दें। 'भवति' यह माताओंके लिये सम्बोधन है।
अग्निकार्य (अग्निहोत्र) करके गुरुकी आज्ञासे विनयपूर्वक आपोऽशान¹-क्रिया करके सम्मानके सहित उस भिक्षासे प्राप्त भोज्यान्नको बिना निन्दा किये ही मौन होकर ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए आपित्तरहित कालमें, रोग आदिके अभावमें अनेकका अन्न ग्रहण करे (एक घरका अन्न न ग्रहण करे)। अपने व्रतका संयमपूर्वक पालन करता हुआ ब्राह्मण ब्रह्मचारी श्राद्धमें आदरपूर्वक आहूत होनेपर इच्छानुसार भोजन कर सकता है, किंतु उसे श्राद्धकाल या अन्य अवसरोंमें मधु, मद्य, मांस अथवा उच्छिष्ट अन्न भोजनके रूपमें ग्रहण नहीं करना चाहिये।
जो विधि-विहित क्रियाओंको सम्पन्न कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा प्रदान करता है, वही 'गुरु' है। जो केवल यज्ञोपवीत-संस्कार कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा देता है, वह 'आचार्य' कहा गया है। जो वेदके एक देशका² अध्ययन कराता है, वह 'उपाध्याय' है। जो वरण लेकर यजमानके यज्ञको सम्पन्न करता है, उसे 'ऋत्विक्' कहा जाता है। यथाक्रम ये सभी—गुरु, आचार्य, उपाध्याय और ऋत्विक् ब्रह्मचारीके लिये मान्य हैं, किंतु इन सभीसे माता श्रेष्ठ है।
प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये बारह-बारह वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये। अशक्तावस्थामें प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये पाँच-पाँच वर्षतक भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया जा सकता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि वेदाध्ययन पूर्ण होनेतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन होना चाहिये। केशान्त³-संस्कार गर्भसे सोलहवें वर्षमें ब्राह्मणका, गर्भसे बाईसवें वर्षमें क्षत्रियका तथा गर्भसे चौबीसवें वर्षमें वैश्यका होना चाहिये।
ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णके लिये क्रमशः सोलह, बाईस और चौबीस वर्षतक उपनयनकाल रहता है। इस कालतक उपनयन न होनेपर ये सभी पतित हो जाते हैं, सर्वधर्मच्युत हो जाते हैं। उनका किसी भी धर्मकार्यमें अधिकार नहीं रहता। व्रात्यस्तोम नामके क्रतुका अनुष्ठान करके ही ये यज्ञोपवीत-संस्कारके लिये योग्य होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सबसे पहले माताके उदरसे उत्पन्न होते हैं, उसके बाद पुनः मौञ्जीबन्धन अर्थात् यज्ञोपवीत-संस्कारसे उनका द्वितीय जन्म होता है। अतः ये द्विजाति कहलाते हैं।
श्रौत-स्मार्त यज्ञ, तपस्या (चान्द्रायण आदि व्रत) और शुभकर्मों (उपनयन आदि संस्कारों)-का बोधक एकमात्र वेद है। अतः द्विजातियोंके लिये वेद ही परम कल्याणका साधन है। इससे वेदमूलक स्मृतियोंका भी उपयोग स्पष्ट है।
जो द्विज प्रतिदिन ऋग्वेदका अध्ययन करता है, वह देवताओंको मधु एवं दुग्धसे तथा पितरोंको
१-भोजनके पूर्व तथा अन्तमें एक बार जलसे आचमन करना 'आपोऽशान-क्रिया' है। इसमें 'अमृतोपस्तरणमसि' इस वाक्यका प्रयोग विहित है।
२-मन्त्र एवं ब्राह्मणरूपमें वेदके दो भाग हैं। इनमेंसे केवल एक भागका अध्यापन अथवा वेदके अङ्गमात्रका अध्यापन वेदके एक देशका अध्यापन है।
३-केशान्त-संस्कारसे ही श्मश्रु (दाढ़ी) बनवानेका आरम्भ होता है।
काण्ड ] गृहस्थधर्म-निरूपण [ १५९
मधु एवं घृतसे प्रतिदिन तृप्त करता है। जो द्विज प्रतिदिन यजुर्वेद, सामवेद अथवा अथर्ववेदका अध्ययन करता है, वह घृत एवं अमृतसे पितरों तथा देवताओंको प्रतिदिन तृप्त करता है। ऐसे ही जो द्विज प्रतिदिन वाकोवाक्य<sup>१</sup>, पुराण, नाराशंसी<sup>२</sup>, गाथिका<sup>३</sup>, इतिहास<sup>४</sup> तथा विद्याका<sup>५</sup> अध्ययन करता है, वह पितरों एवं देवताओंको मांस (फल), दूध और ओदन (भात)-से प्रतिदिन तृप्त करता है। संतृप्त ये देवता और पितृजन भी इस स्वाध्यायशील द्विजको समस्त अभीष्ट शुभ फलोंसे संतुष्ट करते हैं। द्विज जिस-जिस यज्ञके प्रतिपादक वेद-भागका अध्ययन करता है, उस-उस यज्ञके फलको प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त भूमिदान, तपस्या और स्वाध्यायके फलका भी भागी होता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचारीको अपने आचार्यके सांनिध्यमें रहना चाहिये। आचार्यके अभावमें आचार्यपुत्र और उसके अभावमें आचार्य-पत्नी तथा उसके भी अभावमें वैश्वानर-अग्निके आश्रयमें (अपनेद्वारा उपास्य अग्निकी शरणमें) रहना चाहिये। इस प्रकार अपने देहको क्षीण करता हुआ जितेन्द्रिय द्विज ब्रह्मचारी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय ९४)
गृहस्थधर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे यतव्रत मुनियो! आप सभी अब गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन सुनें।
(विद्याध्ययनकी समाप्तिके पश्चात्) गुरुको दक्षिणा प्रदान करके उन्हींकी अनुज्ञासे स्नानकर शिष्यको ब्रह्मचर्यव्रतकी समाप्ति करनी चाहिये। तदनन्तर वह सुलक्षणा, अत्यन्त सुन्दर मनोरमा, असपिण्डा, अवस्थामें छोटी, अरोगा, भ्रातृमती, भिन्न प्रवर एवं गोत्रवाली कन्यासे विवाह करे।
सभी असपिण्डा कन्याको विवाहयोग्य बताया गया है। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि सपिण्डा कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। महर्षि याज्ञवल्क्यने यहाँ सपिण्डाके बारेमें यह बताया है—मातासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें पाँचवीं परम्परात्तक तथा पितासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें सातवीं परम्परात्तक सपिण्ड्य समझना चाहिये। इसके मध्यमें आनेवाली कन्या सपिण्ड्य तथा इसके मध्यमें न आनेवाली कन्या असपिण्डा होगी। इसके अनुसार विवाहके लिये असपिण्डा कन्याका चयन होना चाहिये। ऐसे ही उसी कन्यासे विवाह उचित है, जिसका मातृकुल तथा पितृकुलमें पाँच-पाँच परम्परात्तक सदाचार, अध्ययन एवं पुत्र-पौत्रादिकी समृद्धिकी दृष्टिसे विख्यात हो। ऐसे ही कन्याके लिये समानवर्णमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं विद्वान् पुरुष श्रेष्ठ होता है। अन्य विद्वानोंने जो यह कहा है कि द्विजातियोंके लिये शूद्रकुलमें उत्पन्न हुई कन्या भी ग्रहण करने योग्य होती है, यह मेरा अभिमत नहीं है, क्योंकि उस कन्यामें उससे विवाह करनेवाला उसका पति ही स्वयं उत्पन्न होता है<sup>६</sup>। तीनों वर्ण तीन, दो, एक इस क्रमसे वर्णोंमें विवाह कर सकते हैं। शूद्र-वर्णको अपने ही वर्णसे कन्या प्राप्त करनी चाहिये।
अपने घरपर वरको बुलाकर उसे यथाशक्ति अलंकृत अपनी कन्या प्रदान करना 'ब्राह्मविवाह'
<sup>१</sup>-वाकोवाक्य—प्रश्नोत्तररूप वेद-वाक्य। <sup>२</sup>-नाराशंसी—रुद्रदैवत्य मन्त्र। <sup>३</sup>-गाथिका—यज्ञ-सम्बन्धी इन्द्र आदिकी गाथाएँ। <sup>४</sup>-इतिहास—महाभारत आदि। <sup>५</sup>-विद्या—वारुणी आदि विभिन्न विद्याएँ। <sup>६</sup>-'आत्मा वै जायते पुत्रः' के अनुसार पिता ही पुत्रके रूपमें जन्म लेता है।
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है। इस विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न होनेवाली संतान दोनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको पवित्र करती है। यज्ञदीक्षित ऋत्विक् ब्राह्मणको अपनी कन्या देना 'दैवविवाह' है तथा वरसे एक जोड़ा गौ (स्त्री गौ एवं पुरुष गौ) लेकर उसको कन्या प्रदान करना 'आर्षविवाह' कहा जाता है। इस प्रथम (ब्राह्मविवाह) विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न पुत्र अपनी प्रथमकी सात तथा बादकी सात—इस तरह चौदह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। आर्षविधिके विवाहसे उत्पन्न पुत्र तीन पूर्व तथा तीन बादकी—इस तरह छः पीढ़ियोंको पवित्र करता है।
'तुम इस कन्याके साथ धर्मका आचरण करो'—यह कहकर विवाहकी इच्छा रखनेवाले वरको पिताके द्वारा जब कन्या प्रदान की जाती है, तब ऐसे विवाहको 'काय (प्राजापत्य)-विवाह' कहते हैं। इस विवाह-विधिसे उत्पन्न पुत्र अपनेसहित पूर्वकी छः तथा बादकी छः पीढ़ियों—इस तरह कुल तेरह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। कन्याके पिता या बन्धु-बान्धव अथवा कन्याको ही यथाशक्ति धन देकर यदि कोई वर उससे विवाह करता है तो इस विवाहको 'असुरविवाह' और वर एवं कन्याके बीच पहले ही पारस्परिक सहमति हो जानेके बाद जो विवाह होता है, उसको 'गान्धर्वविवाह' कहते हैं। कन्याकी इच्छा नहीं है, तब भी बलात् युद्ध आदिके द्वारा अपहृत उस कन्याके साथ विवाह करना 'राक्षसविवाह' है। स्वाप (शयन) आदि अवस्थामें अपहरणकर उसके साथ जो विवाह किया जाता है, उसको 'पैशाचविवाह' कहते हैं।
इन उपर्युक्त आठ विवाहोंमें प्रथम चार प्रकारके विवाह अर्थात् ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्यविवाह ब्राह्मणवर्णके लिये उपयुक्त हैं। गान्धर्वविवाह तथा राक्षसविवाह क्षत्रियवर्णके लिये उचित है। असुरविवाह वैश्यवर्ण और अन्तिम गर्हित पैशाच नामक विवाह शूद्रवर्णके लिये (उचित) माना गया है।
समान वर्णवाले वर-कन्याके विवाहमें कन्याओंके द्वारा गृह्यसूत्रकी विधिके अनुसार वरका पाणिग्रहण अर्थात् हाथ पकड़ना चाहिये। क्षत्रियकन्या ब्राह्मणवरसे विवाह करते समय ब्राह्मणवरके दाहिने हाथमें विद्यमान शर (बाण)-के एकदेशको ग्रहण करे। वैश्यकन्या ब्राह्मण अथवा क्षत्रियवरसे विवाह करते समय वरके हाथमें विद्यमान चाबुकके एकदेशको ग्रहण करे। ऐसे ही शूद्रकन्या ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यवरसे विवाह करते समय वरके उत्तरीय वस्त्र (ऊपर ओढ़े हुए चादर)-के किनारेको ग्रहण करे^२।
पिता, पितामह, भ्राता, सकुल्य^३ (बन्धु-बान्धव) अथवा माता कन्यादान करनेके अधिकारी हैं। पूर्वके अभावमें उत्तरोत्तर कन्यादानके अधिकारी हैं, यदि उन्माद आदि दोषसे ग्रस्त नहीं हैं। यदि कन्यादानका अधिकारी समयपर कन्यादान न करे तो कन्याके ऋतुमती हो जानेपर कन्यादानके अधिकारीको कन्याके प्रति ऋतुकालमें एक-एक भ्रूणहत्याका पाप लगता है। कन्यादानके दाताके अभावमें कन्याको स्वयं उपयुक्त वरका वरण कर लेना चाहिये।
कन्या एक बार दी जाती है, इसलिये कन्या एक बार देकर पुनः उसका अपहरण करनेवाला
^१-कन्याका पिता वरसे गौका जोड़ा मूल्यके रूपमें नहीं लेता, आवश्यकतावश धर्मकार्य (याग आदि) सम्पन्न करनेके लिये होता है। इसीलिये मनुस्मृति (३। २९)-के अनुसार जितनासे धर्मकार्य हो सके, उतना ही (एक ही गौ या गौका जोड़ा) कन्या-पिताको वरसे लेना चाहिये।
^२-दूसरे वर्णसे विवाह करनेकी यह व्यवस्था कलियुगके लिये नहीं है।
^३-सकुल्य—आठवीं पीढ़ीसे दसवीं पीढ़ीतक 'सकुल्य' कहा जाता है।