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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

६५- गयाके तीर्थोंका माहात्म्य तथा गयाशीर्षमें पिण्डदानकी महिमामें विशालकी कथा

१२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उस मणिको धारण करनेसे किसी भी प्रकारका भय नहीं रह जाता है। लोग भीष्मकमणिके स्वामीका उपहास नहीं कर पाते हैं।

भीष्मकमणिसे संयुक्त अँगूठीको धारण करके जो व्यक्ति अपने पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितरोंको बहुत वर्षोंतकके लिये संतुष्टि प्राप्त हो जाती है। इस रत्नके प्रभावसे सर्प, आखु (चूहा), बिच्छू आदि अण्डज जीवोंके विष स्वयं शान्त हो जाते हैं। जल, अग्नि, शत्रु और चोरोंके भयंकर भय भी नष्ट हो जाते हैं।

शैवाल एवं मेघकी आभासे युक्त, कठोर, पीत प्रभावाली, मलिन द्युति और विकृत वर्णवाली भीष्मकमणिका विद्वान् व्यक्तिको दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। पण्डितोंको देश-कालके परिज्ञानके अनुसार इन मणियोंके मूल्योंका निर्धारण करना चाहिये; क्योंकि दूर देशमें उत्पन्न हुई मणियोंका मूल्य अधिक तथा निकट देशमें उत्पन्न हुई मणियोंका मूल्य उसकी अपेक्षा कुछ कम होता है। (अध्याय ७६)

पुलकमणिके लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने कहा—**वायुदेवने दानवराज बलासुरके नखसे लेकर भुजापर्यन्त गतिमान् रत्नमयी प्रकाशकी विधिवत् पूजा करके उसको श्रेष्ठ पर्वतों, नदियों तथा उत्तरदेशके अन्य प्रसिद्ध स्थानोंमें स्थापित किया था। अतएव दशार्ण, वागदर, मेकल, कलिङ्ग आदि देशोंमें उस प्रकाशरूपी बीजसे उत्पन्न पुलकमणियाँ गुञ्जाफल, अञ्जन, क्षौद्र (मधु) और कमलनालके समान तथा गन्धर्व एवं अग्निदेशमें उत्पन्न हुई मणियाँ केलेके समान कान्तिवाली होती हैं। इन सभी पुलकमणियोंको प्रशस्त माना गया है।

कुछ पुलकमणियोंकी भंगिमा शंख, पद्म, भ्रमर तथा सूर्यके समान विचित्र होती है। ऐसी परम पवित्र मणियोंको सूत्रोंमें गूँथकर धारण करनेसे सब प्रकारका कल्याण होता है; क्योंकि वे पुलकमणियाँ माङ्गलिक एवं धन-धान्यादि ऐश्वर्यकी अभिवृद्धि करनेवाली होती हैं।

कौआ, घोड़ा, गधा, सियार, भेड़िया तथा भयंकर रूप धारण करनेवाले और मांस-रुधिरादिसे संलिप्त मुखवाले गृध्रोंके समान वर्णवाली जो पुलकमणियाँ होती हैं, वे मृत्युदायक होती हैं। विद्वान् व्यक्तिको उनका परित्याग कर देना चाहिये।

श्रेष्ठ एक पल प्रमाणवाली पुलकमणिका मूल्य पाँच सौ मुद्रा कहा गया है। (अध्याय ७७)

रुधिराक्ष रत्न-परीक्षा

**सूतजीने कहा—**अग्निदेवने दानवराजके अभीष्टरूपको ग्रहणकर कुछ अंश नर्मदा नदीके प्रान्तभागमें तथा कुछ अंश उस देशके निम्न भू-भागोंमें फेंक दिया था। अतः उन स्थानोंपर इन्द्रगोप (वीरबहूटी कीट) तथा शुक पक्षीके मुखकी भाँति वर्णवाली एवं प्रकट पीलु फलके समान वर्णवाली रुधिराक्ष मणियाँ प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त भी यहाँपर नाना प्रकारकी मणियाँ प्राप्त होती हैं, इनका आकार एक समान होता है।

जो मणि मध्यभागमें चन्द्रके सदृश पाण्डुर तथा अत्यन्त विशुद्ध वर्णवाली होती है, तुलनामें वह इन्द्रनीलमणिके समान होती है। इसे ऐश्वर्य, धन-धान्य एवं भृत्यादिकी अभिवृद्धि करनेवाली माना गया है। इस मणिका पाकक्रियासे शोधन होनेपर देववज्रके समान वर्ण होता है।

(अध्याय ७८)

काण्ड ] गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा १२९


स्फटिक-परीक्षा

सूतजीने कहा—हलधारी बलरामने उस दैत्यराजके मेदाभागको लेकर कावेरी, विन्ध्य, यवन, चीन तथा नेपाल देशके भूभागोंमें प्रयत्नपूर्वक बिखेरा था। अतः उन स्थानोंपर आकाशके समान निर्मल तैल-स्फटिक नामक मणि उत्पन्न हुई। यह मणि मृणाल एवं शंखके सदृश धवल होती है, किंतु कुछ मणियाँ उक्त वर्णके अतिरिक्त अन्य वर्णोंको भी धारण करती हैं।

रत्नोंमें उस मणिके समान अन्य कोई नहीं है, जो पाप-विनाश करनेमें उसके बराबर क्षमता रखती हो। शिल्पकारके द्वारा संस्कारित होनेपर ही स्फटिकके मूल्यका कुछ आकलन किया जा सकता है।

(अध्याय ७९)


विद्रुममणिकी परीक्षा

सूतजीने पुनः कहा—हे शौनक! शेषनागने उस बलासुरके अन्त्रभागको ग्रहणकर केरल आदि देशोंमें छोड़ा था, अतएव उन स्थानोंपर महागुणसम्पन्न विद्रुममणियोंका जन्म हुआ। उन विद्रुममणियोंमें जो खरगोशके रक्तके समान लोहित होती हैं अथवा गुञ्जाफल या जपापुष्पकी आभाको धारण करती हैं, उन्हें श्रेष्ठ माना गया है। नील देश, देवक तथा रोमक नामक स्थान इन मणियोंकी जन्मभूमि है। उनमें उत्पन्न हुई विद्रुममणि अत्यन्त लाल वर्णकी होती है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त होनेवाली मणियाँ प्रशस्त नहीं मानी गयी हैं। शिल्पकलाके विशेष योग-कौशलपर ही इनके मूल्यका निर्धारण होता है।

जो विद्रुममणि सुन्दर, कोमल, स्निग्ध तथा लाल-लाल वर्णकी होती है, वह निश्चित ही इस संसारमें मनुष्यको धन-धान्यसम्पन्न बनानेवाली तथा उसके विषादिक दुःखोंको दूर करनेवाली होती है।

(अध्याय ८०)


गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा

सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं समस्त तीर्थोंका वर्णन करूँगा। जितने भी तीर्थ हैं, उनमें गङ्गा उत्तमोत्तम तीर्थ है। यद्यपि गङ्गा सर्वत्र सुलभ है, किंतु हरिद्वार, प्रयाग एवं गङ्गासागरके संगम—इन तीन स्थानोंमें वह दुर्लभ है*।

प्रयाग परम श्रेष्ठ तीर्थ है, जो मरनेवालेको मुक्ति और भुक्ति दोनों प्रदान करता है। इस महातीर्थमें स्नान करके जो अपने पितरोंके लिये पिण्डदान करते हैं, वे अपने समस्त पापोंका विनाशकर सभी अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त करते हैं।

वाराणसी परम तीर्थ है। इस तीर्थमें भगवान् विश्वनाथ और केशव सदैव निवास करते हैं। कुरुक्षेत्र भी बहुत बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थमें दानादि करनेसे यह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाला है। प्रभास श्रेष्ठतम तीर्थ है, जहाँपर भगवान् सोमनाथ विराजमान रहते हैं। द्वारका अत्यन्त सुन्दर नगरी है। यह मुक्ति-भुक्ति दोनोंको प्रदान करनेवाली है। पूर्व दिशामें अवस्थित सरस्वती पुण्यदायिनी तीर्थ है। इसी प्रकार सप्तसारस्वत परमतीर्थ है।

केदारतीर्थ समस्त पापोंका विनाशक है। सम्भलग्राम उत्तम तीर्थ है। बदरिकाश्रम भगवान्


* सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा॥ गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे। (८१।१-२)

१३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नर-नारायणका महातीर्थ है, जो मुक्तिप्रदायक है।

श्वेतद्वीप, मायापुरी (हरिद्वार), नैमिषारण्य, पुष्कर, अयोध्या, चित्रकूट, गोमती, वैनायक, रामगिर्याश्रम, काञ्चीपुरी, तुंगभद्रा, श्रीशैल, सेतुबन्ध-रामेश्वर, कार्तिकेय, भृगुतुंग, कामतीर्थ, अमरकण्टक, महाकालेश्वरकी निवासभूमि उज्जयिनी, श्रीधर हरिका निवासस्थल कुब्जक, कुब्जाम्रक, कालसर्पि, कामद, महाकेशी, कावेरी, चन्द्रभागा, विपाशा, एकाग्र, ब्रह्मेश, देवकोटक, रम्य मथुरापुरी, महानद शोण तथा जम्बूसर नामक स्थानोंको महातीर्थ कहा गया है।

इन तीर्थोंमें सदा सूर्य, शिव, गणपति, महालक्ष्मी एवं भगवान् हरि निवास करते हैं। यहाँ और अन्यान्य पवित्र स्थानोंमें किया गया स्नान, दान, जप, तप, पूजा, श्राद्ध तथा पिण्डदानादि अक्षय होता है। इसी प्रकार शालग्राम तथा पाशुपततीर्थ भी परम पवित्र तीर्थ हैं, जो भक्तोंको सब कुछ प्रदान करते हैं।

कोकामुख, वाराह, भाण्डीर और स्वामि नामक तीर्थ महातीर्थके रूपमें विख्यात हैं। लोहदण्ड नामक तीर्थमें महाविष्णु तथा मन्दारतीर्थमें मधुसूदन निवास करते हैं।

कामरूप महान् तीर्थ है। इस स्थानमें कामाख्यादेवी सदा विराजमान रहती हैं। पुण्ड्रवर्धनतीर्थमें भगवान् कार्तिकेय प्रतिष्ठित रहते हैं। विरज, श्रीपुरुषोत्तम, महेन्द्रपर्वत, कावेरी, गोदावरी, पयोष्णी, वरदा, विन्ध्य और नर्मदाभेद नामक महातीर्थ समस्त पापोंके विनाशक हैं। गोकर्ण, माहिष्मती, कलिंजर एवं श्रेष्ठ शुक्लतीर्थको महातीर्थ माना गया है। यहाँपर स्नान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इस तीर्थमें भगवान् शार्ङ्गधारी हरि निवास करते हैं। भक्तोंको सब कुछ देनेवाले विरज तथा स्वर्णाक्षतीर्थ भी उत्तम तीर्थ हैं।

नन्दितीर्थ मुक्तिदायक और कोटितीर्थोंका फल प्रदान करनेवाला है। नासिक, गोवर्धन, कृष्णा, वेणी, भीमरथी, गण्डकी, इरावती, विंदुसर एवं विष्णुपादोदक महापुण्यप्रदायक परम तीर्थ हैं।

ब्रह्मध्यान और इन्द्रियनिग्रह महान् तीर्थ हैं, दम तथा भावशुद्धि श्रेष्ठ तीर्थ है। ज्ञानरूपी सरोवर और ध्यानरूपी जलमें, राग-द्वेषादि रूप मलका नाश करनेके लिये ऐसे मानस तीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है।

यह तीर्थ है, यह तीर्थ नहीं है—जो लोग इस प्रकारके भेद-ज्ञानको रखते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये तीर्थगमन और उसके उत्तम फलका विधान किया गया है, किंतु जो 'सर्वत्र ब्रह्ममय है' ऐसा स्वीकार करते हैं, उनके लिये कोई भी स्थान अतीर्थ नहीं है। इन सभीमें स्नान, दान, श्राद्ध, पिण्डदान आदि कर्म करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है। समस्त पर्वत, समस्त नदियाँ एवं देवता, ऋषि-मुनि तथा संतों आदिसे सेवित स्थान तीर्थ ही हैं—

इदं तीर्थमिदं नेति ये नरा भेददर्शिनः।
तेषां विधीयते तीर्थगमनं तत्फलं च यत्॥
सर्वं ब्रह्मेति यो वेत्ति नातीर्थं तस्य किञ्चन।
एतेषु स्नानदानानि श्राद्धं पिण्डमथाक्षयम्॥
सर्वा नद्यः सर्वशैलाः तीर्थं देवादिसेवितम्।
(८१।२५-२७)

श्रीरंगपत्तनम् भगवान् हरिका महान् तीर्थ है। ताप्ती एक श्रेष्ठ महानदी है। सप्तगोदावरी एवं कोणगिरि भी महातीर्थ हैं। कोणगिरितीर्थमें महालक्ष्मी नदीके रूपमें स्वयं विराजमान रहती हैं। सह्यपर्वतपर भगवान् देवदेवेश्वर एकवीर तथा महादेवी सुरेश्वरी निवास करती हैं।

गङ्गाद्वार, कुशावर्त, विन्ध्यपर्वत, नीलगिरि और कनखल—इन महातीर्थोंमें जो व्यक्ति स्नान करता है, वह पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता—

गङ्गाद्वारे कुशावर्ते विन्ध्यके नीलपर्वते॥
स्नात्वा कनखले तीर्थे स भवेन्न पुनर्भवे।
(८१।२९-३०)

काण्ड ] गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल १३१


सूतजीने (आगे) कहा कि उपर्युक्त वर्णित और अन्य जो अवर्णित तीर्थ हैं, सभी स्नानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेपर सदैव सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं।
इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे तीर्थोंका माहात्म्य सुनकर ब्रह्माने दक्षप्रजापति आदिके साथ महामुनि व्यासको उनका श्रवण कराया और पुनः तीर्थोत्तम एवं अक्षय फल देनेवाले तथा ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले 'गया' नामक तीर्थका वर्णन किया।
(अध्याय ८१)


गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल

ब्रह्माजीने कहा—हे व्यासजी! मैं भुक्ति और मुक्ति प्राप्त करानेवाले परम सार-स्वरूप उत्तम गया-माहात्म्यको संक्षेपमें कहूँगा, आप सुनें।

पूर्वकालमें गय नामक परम वीर्यवान् एक असुर हुआ। उसने सभी प्राणियोंको संतप्त करनेवाली महान् दारुण तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतप्त देवगण उसके वधकी इच्छासे भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। श्रीहरिने उनसे कहा—आप लोगोंका कल्याण होगा, इसका महादेह गिराया जायगा। देवताओंने 'बहुत अच्छा' इस प्रकार कहा। एक समय शिवजीकी पूजाके लिये क्षीरसमुद्रसे कमल लाकर गय नामका वह बलवान् असुर विष्णुमायासे विमोहित होकर कीकटदेशमें शयन करने लगा और उसी स्थितिमें वह विष्णुकी गदाके द्वारा मारा गया।

भगवान् विष्णु मुक्ति देनेके लिये 'गदाधर'के रूपमें गयामें स्थित हैं। गयासुरके विशुद्ध देहमें ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह स्थित हैं, विष्णुने वहाँकी मर्यादा स्थापित करते हुए कहा कि इसका देह पुण्यक्षेत्रके रूपमें होगा। यहाँ जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान अथवा स्नानादि करेगा, वह स्वर्ग तथा ब्रह्मलोकमें जायगा, नरकगामी नहीं होगा। पितामह ब्रह्माने गयातीर्थको श्रेष्ठ जानकर वहाँ यज्ञ किया और ऋत्विक्-रूपमें आये हुए ब्राह्मणोंकी पूजा की।

ब्रह्माने वहाँ रसवती अर्थात् जलसे परिपूर्ण एक विशाल नदी, वापी, जलाशय आदि तथा विविध भक्ष्य, भोज्य, फल आदि और कामधेनुकी सृष्टि की। तदनन्तर ब्रह्माने इन सब साधनोंसे सम्पन्न पाँच कोशके परिक्षेत्रमें फैले हुए उस गया तीर्थका दान उन ब्राह्मणोंको कर दिया।

ब्राह्मणोंने उस धर्मयज्ञमें दिये गये धनादिक दानको लोभवश ही स्वीकार किया था। अतः उसी कालसे वहाँके ब्राह्मणोंके लिये यह शाप हो गया कि 'तुम्हारे द्वारा अर्जित विद्या और धन तीन पुरुषपर्यन्त अर्थात् तीन पीढ़ियोंतक स्थायी नहीं रहेगा। तुम्हारे इस गया परिक्षेत्रमें प्रवाहित होनेवाली रसवती नदी जल एवं पत्थरोंके पर्वतमात्रके रूपमें ही अवस्थित रहेगी।

संतप्त ब्राह्मणोंके द्वारा प्रार्थना करनेपर प्रभु ब्रह्माने अनुग्रह किया और कहा—गयामें जिन पुण्यशाली लोगोंका श्राद्ध होगा, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य यहाँ आकर आप सभीका पूजन करेंगे, उनके द्वारा मैं भी अपनेको पूजित स्वीकार करूँगा।

'ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—ये चारों मुक्तिके साधन हैं'—

ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा।
वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥
(८२।१५)