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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

५१- मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि

काण्ड ] | स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण | १०९

पौत्रादिसे परिपूर्ण होता है, किंतु विरल अँगुलियोंवाला व्यक्ति निर्धन होता है। सघन अँगुलियोंके होनेसे मनुष्य धन-सम्पन्न होता है। मणिबन्धसे निकलकर तीन रेखाएँ जिसके करतल भागको पार कर जाती हैं, वह राजा होता है।

दो मत्स्याङ्कित करतलभागवाला पुरुष यज्ञकर्ता एवं दानी होता है। वज्राकार चिह्नवाले करतल धनीजनोंके होते हैं। विद्वान्‌का करतलभाग मीन-पुच्छके चिह्नसे अङ्कित होता है।

राजाके करतलमें शङ्ख, छत्र, शिविका (डोली), गज और पद्माकार चिह्न रहते हैं। अतुलनीय ऐश्वर्यसम्पन्न राजाके करतलमें कुम्भ, अङ्कुश, पताका तथा मृणालके समान चिह्न रहते हैं। गोधनके स्वामीजनोंके करतलोंमें रस्सीके चिह्न होते हैं। जिसके हाथमें स्वस्तिकका चिह्न होता है, वह सम्राट् होता है। राजाके हाथमें चक्र, कृपाण, तोमर, धनुष और भालेके आकारके चिह्न होते हैं।

ओखलीके चिह्नसे युक्त व्यक्ति यज्ञादिक कर्मकाण्डोंमें निष्णात होता है। जिनके हाथोंमें वेदिकाकार रेखा होती है, वे अग्निहोत्री होते हैं। वापी, देवकुल्या तथा त्रिकोण रेखाओंके रहनेपर मनुष्य धार्मिक होता है।

अंगुष्ठ-मूलतक रेखाके होनेसे व्यक्ति पुत्रवान् होते हैं। यदि वे रेखाएँ सूक्ष्म होती हैं तो उन्हें कन्याएँ होती हैं। कनिष्ठिकाके मूलसे निकलकर तर्जनीके मूलतक रेखाका विस्तार होनेपर मनुष्य शतायु होता है, किंतु किसी स्थानपर उसके विच्छिन्न होनेपर प्राणीको वृक्षसे गिरकर मृत्युका भय बना रहता है। बहुत-सी रेखाओंके होनेसे मनुष्य दरिद्र होते हैं। चिबुक (ठुड्डी)-के कृश होनेपर भी मनुष्योंको धनहीन समझना चाहिये, किंतु जिनकी ठुड्डियाँ मांसल होती हैं, वे धन-सम्पदाओंसे परिपूर्ण होते हैं। अरुणाभ, बिम्बाफलके समान सुन्दर अधरोंसे सुशोभित मुख राजाओंका माना गया है; किंतु जिसके ओष्ठ रूखे, खण्डित, फटे हुए तथा विषम होते हैं, वे निर्धन होते हैं।

स्निग्ध (चिकने), चमकते हुए, सघन एवं समान भागवाले सुन्दर तीक्ष्ण दाँतोंका होना शुभ है। रक्तवर्णकी समतल, चिकनी एवं दीर्घ जिह्वा श्रेष्ठ होती है। राजाओंका मुख कठोर, सम, सौम्य, गोल, मलरहित तथा स्निग्ध होता है। दुःख भोगनेवाले लोगोंमें इन लक्षणोंके विपरीत लक्षण होते हैं। कुत्सित एवं भाग्यहीनोंको स्त्रीमुखी पुत्र प्राप्त होता है। धनी लोगोंका मुख गोलाकार तथा निर्धनोंका मुख लम्बा होता है। पापकर्मका मुख भयाक्रान्त होता है। धूर्तोके मुख चौकोर, पुत्रहीनोंके निम्न एवं कंजूसोंके छोटे मुख होते हैं। भोगीजनोंका मुख सुन्दर, आभामय, मूँछोंसे युक्त, स्निग्ध, शुभ तथा कोमल होता है।

चौर-वृत्तिवाले व्यक्ति निस्तेज, मुरझायी हुई लालवर्णकी दाढ़ी और मूँछोंवाले होते हैं। रक्तवर्णके थोड़े तथा कड़े बालयुक्त दाढ़ीवाले और छोटे-छोटे कानोंवाले मनुष्योंकी मृत्यु पापकर्म करनेसे होती है। मांसरहित, चिपटे कानोंवाले लोग भोगी और अत्यन्त छोटे-छोटे कानोंसे युक्त मनुष्य कंजूस होते हैं। शङ्खाकार कानोंके होनेपर मनुष्य राजा होता है तथा रोमराशिसे भरे होनेपर उसे क्षीण आयुकी प्राप्ति होती है। बड़े कानोंवाले धनी अथवा राजा माने जाते हैं। स्निग्ध, विस्तृत, मांसल तथा दीर्घ कानोंवाले राजा होते हैं। निम्न गण्डस्थलवाला भोगी और पूर्ण सुडौल एवं सुन्दर होनेपर मनुष्य मन्त्री होता है।

सुग्गेकी नासिकाके समान सुन्दर नासिकावाला व्यक्ति सुखी और शुष्क नासिकावाला दीर्घजीवी होता है। नासिकाका अग्रभाग छिन्न तथा कूपके समान नासिकाके होनेपर मनुष्य अगम्या स्त्रीके

११० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

साथ सहवास करता है। दीर्घ नासिकाके रहनेपर
सौभाग्यवान् एवं आकुंचित अर्थात् टेढ़ी नासिका
होनेसे व्यक्ति चौरकार्यमें प्रवृत्त होता है। नासिकाके
चिपटी होनेपर मनुष्यकी अकालमृत्यु होती है।
भाग्यवान्‌की नासिका छोटी होती है। चक्रवर्ती
सम्राट्‌की नासिकामें छोटे-छोटे गोल और सीधे
छिद्र होते हैं। दक्षिणभागकी ओर नासिकाके वक्र
होनेपर मनुष्योंमें क्रूर-स्वभाव होता है।

वक्र उपान्तभागोंसे युक्त तथा पद्म-पत्रके समान
सुन्दर नेत्र सुखी लोगोंके होते हैं। बिल्लीके सदृश
नेत्रोंके होनेपर मनुष्य पापात्मा तथा मधु-
पिंगलवर्णवाले नेत्रोंके होनेपर वह दुरात्मा होता
है। केकड़ेके नेत्रोंकी भाँति नेत्र होनेसे व्यक्ति क्रूर
और हरितवर्णके नेत्रवाले पापकर्ममें अनुरक्त होते
हैं। वक्र नेत्र बलवान् पुरुषोंका लक्षण है। हाथीके
समान नेत्रोंवाले मनुष्य सेनानी होते हैं। गम्भीर
नेत्रोंवाला पुरुष राजा तथा स्थूल नेत्रोंवाला मन्त्री
होता है। नीलकमलके सदृश नेत्रोंके होनेपर
व्यक्ति विद्वान् तथा श्यामवर्णके नेत्रवाले सौभाग्यशाली
होते हैं। कृष्णवर्णके तारक विन्दुओंसे युक्त नेत्रोंवाले
पुरुषोंमें उत्पाटन-क्षमता होती है। मण्डलाकार
नेत्रोंके होनेपर व्यक्ति पापी तथा दैन्यभावयुक्त
नेत्रवाले मनुष्य दरिद्र होते हैं। सुन्दर एवं विशाल
नेत्रोंवाले संसारमें विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग
करते हैं। जिनके नेत्र अधिक उन्नत अर्थात् ऊपरकी
ओर अधिक उठे होते हैं, वे अल्पायु होते हैं।
विशाल और उन्नत नेत्रोंके होनेपर मनुष्य सुखी
होते हैं।

विषम भौंहोंवाले दरिद्र होते हैं तथा दीर्घ,
सघन, एक-दूसरेसे संयुक्त, बालचन्द्रके सदृश
पतले, वक्र एवं उन्नत सुन्दर भौंहोंसे सुशोभित
प्राणी धन-वैभवसे सम्पन्न होते हैं। मध्यभागमें
कटी हुई भौंहोंके होनेपर मनुष्य निर्धन तथा झुकी
हुई भौंहोंके होनेसे अगम्या स्त्रियोंमें रत रहनेवाले
और पुत्रसे रहित होते हैं।

उन्नत, विशाल, शङ्खाकार एवं विषम मस्तक
होनेपर पुरुषोंमें निर्धनता और अर्द्धचन्द्राकार ललाटके
होनेपर वे धनसम्पन्नतासे परिपूर्ण रहते हैं। सीपके
समान आभावाले तथा विशाल मस्तकवाले आचार्यके
पदको सुशोभित करते हैं, जिनके मस्तकोंपर
शिराएँ स्पष्ट प्रतीत होती रहती हैं, वे पापकर्ममें
लगे रहते हैं। उन्नत शिराओंसे युक्त स्वस्तिकाकार,
सुन्दर ललाटके होनेपर मनुष्य धनवान् तथा निम्न
ललाटके होनेपर बन्दी बनाये जानेयोग्य होते हैं
और क्रूर कर्मोंको करते हैं। गोल ललाटवाले
कृपण और उन्नत भालवाले राजा होते हैं।

लोगोंका अश्रुरहित, दीनतारहित, स्निग्ध रुदन
मङ्गलकारी होता है तथा अविरल अश्रुधारवाला,
दैन्यभावको प्रकट करता हुआ रूखा रुदन सुखकारी
होता है।

कम्पनरहित हँसी श्रेष्ठ होती है। आँख मूँदकर
हँसनेवाला व्यक्ति पापी होता है। बार-बार हँसनेवाला
दुष्ट होता है और उन्मत्तकी हँसी अनेक प्रकारकी
होती है।

सौ वर्षतक जीवन प्राप्त करनेवाले लोगोंके
मस्तकपर तीन रेखाएँ होती हैं। मस्तकपर चार
रेखाओंके होनेपर मनुष्य राजा होता है और उसकी
आयु पंचानबे वर्षतक होती है। रेखारहित ललाटवाला
व्यक्ति नब्बे वर्ष जीवित रहता है। विच्छिन्न
रेखाओंसे व्याप्त मस्तकवाले पुरुष लम्पट होते हैं।
मस्तकपर केशपर्यन्त रेखाओंके होनेसे मनुष्यकी
आयु अस्सी वर्षकी होती है। पाँच, छः अथवा
सात रेखाओंके होनेसे प्राणीकी आयु पचास वर्ष
तथा सातसे अधिक रेखाओंके होनेपर चालीस
वर्षकी आयु माननी चाहिये। मस्तकपर रेखाओंकी
वक्रता एवं भौंहपर्यन्त स्थिति होनेसे पुरुष तीस

काण्ड ]
स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण
१११


वर्ष तथा बाँयी ओर वक्र होनेपर बीस वर्षकी अल्पायुको प्राप्त करते हैं। रेखाओंके क्षुद्र होनेपर मनुष्य अल्पायु होता है।

छत्राकार सिरवाले मनुष्य राजा और निम्न सिरवाले धनी होते हैं। चिपटे सिरसे युक्त पुरुषोंके पिताकी मृत्यु शीघ्र होती है। मण्डलाकार सिर होनेपर व्यक्ति गौ आदि प्राणियोंसे सम्पन्न होते हैं। घटाकार मूर्द्धाभागके होनेपर मनुष्य पापमें अभिरुचि रखनेवाला तथा धनहीन होता है।

काले-काले घुँघराले, स्निग्ध, एक छिद्रमें एक-एक उत्पन्न, अभिन्न अग्रभागवाले, अत्यधिक, न छोटे न बड़े, सुन्दर केशोंवाले राजा होते हैं। एक छिद्रमें अनेक बालवाले, विषम, स्थूलाग्र तथा कपिलवर्णके केशोंसे युक्त पुरुष निर्धन होते हैं। अत्यन्त कुटिल, सघन एवं काले बालवाले भी निर्धन होते हैं।

मनुष्यके जो अङ्ग अतिशय रूक्ष, शिराओंसे व्याप्त तथा मांसरहित होते हैं, वे सभी अशुभ हैं। यदि वे अङ्ग इसके विपरीत होते हैं तो उन्हें शुभ मानना चाहिये।

मानव-शरीरमें तीन अङ्ग विशाल और तीन अङ्ग गम्भीर, पाँच अङ्ग दीर्घ तथा सूक्ष्म, छः अङ्ग उन्नत, चार ह्रस्व एवं सात अङ्ग रक्तवर्णके होनेपर वह राजा होता है।

नाभि, स्वर तथा सत्त्व (स्वभाव)*—ये तीन गम्भीर होने चाहिये। ललाट, मुख तथा वक्षःस्थल विशाल, नेत्र, कक्षा (काँख), नासिका तथा कृकाटिका अर्थात् गरदनका उठा हुआ भाग, सिर और गरदनका जोड़—इन छःको उन्नत होना चाहिये, ऐसा होनेपर मनुष्य राजा होता है। जंघा, ग्रीवा, लिङ्ग तथा पृष्ठभाग—ये चार अङ्ग ह्रस्व होने चाहिये। करतल, तालु, अधर और नख—ये चार रक्ताभ होने चाहिये। नेत्रान्तभाग, चरणतल, जिह्वा और दोनों ओष्ठ—ये पाँच सूक्ष्म होने चाहिये। दाँत, अँगुली, पर्व, नख, केश और त्वचा—ये पाँच अङ्ग दीर्घ होनेपर शुभकारी हैं। दोनों स्तनोंका मध्यभाग, दोनों भुजाएँ, दाँत, नेत्र और नासिकाका भी दीर्घ होना शुभ है।

इस प्रकार मनुष्योंका लक्षण कहकर अब स्त्रियोंका लक्षण कह रहा हूँ।

रानीके दोनों चरण स्निग्ध, समान पदतलवाले, ताम्रवर्णकी आभासे सुशोभित नखोंसे युक्त, सघन अँगुलियोंवाले तथा उन्नत अग्रभागवाले होते हैं। ऐसी स्त्रीको प्राप्तकर मनुष्य राजा बन जाता है।

गूढ गुल्फ-प्रदेशसे युक्त पद्मपत्रके समान चरणतल शुभ होते हैं। जिसके चरणतलोंमें पसीना नहीं छूटता है और वे कोमल होते हैं, उनमें मत्स्य, अंकुश, ध्वज, वज्र, पद्म तथा हलका चिह्न हो तो वह रानी होती है। इन लक्षणोंसे रहित चरणवाली स्त्री दासी होती है। स्त्रियोंकी रोमरहित, सुन्दर, शिराविहीन, गोल-गोल जंघाएँ शुभ हैं। सन्धिस्थान तथा दोनों जानु समान होने चाहिये, ऐसा शुभ होता है। गजशुण्डके सदृश, रोमरहित तथा समान भागवाले दोनों ऊरु श्रेष्ठ माने जाते हैं।

विस्तीर्ण, मांसल, गम्भीर, विशाल तथा दक्षिणावर्त नाभि तथा मध्यभागमें त्रिवलियाँ श्रेष्ठ होती हैं। स्त्रियोंके रोमरहित, विशाल, भरे हुए, सघन एवं समान भागवाले कठोर स्तन-प्रदेश शुभ हैं। रोमरहित, शङ्खके आकारवाली सुन्दर ग्रीवा प्रशस्त होती है। अरुणाभ अधरोष्ठवाला तथा वर्तुलाकार मांसल भरा हुआ मुख श्रेष्ठ होता है। कुन्द-पुष्पके समान दन्तपंक्ति तथा कोयलकी भाँति वाणी शुभ होती है, जो सदैव दाक्षिण्य भावसे परिपूर्ण रहती है, उसमें शठता नहीं होती, अपितु हंसोंके समान


* किरातार्जुनीय १२। ३९ के अनुसार 'सत्त्व' का अर्थ स्वभाव भी होता है।