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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

३२- वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण

७४

संक्षिप्त गरुडपुराण

[ आचार-

प्रासाद-लक्षण

श्रीसूतजीने पुनः कहा - हे शौनक ! अब मैं

प्रासाद-निर्माण एवं उसके लक्षणोंके विषयमें कह

रहा हूँ। आप सुनें।

सर्वप्रथम कुशल वास्तुविद्की देख-रेखमें

चारों दिशाओंमें चौंसठ-चौंसठ पद परिमापका

एक चतुष्कोण भूखण्ड तैयार करना चाहिये।

जिसमें अड़तालीस पद-परिमाण-भूमिमें दीवालका

निर्माण करे। साथ ही चारों दिशाओंमें कुल बारह

द्वार (वारादरी) बनाये जायँ।

प्रासादकी ऊँचाईके परिमाणको अर्थात्

पृथ्वीतलपर प्रासादका बनाया गया ऊँचा जो

धरातल है, उसको प्रासादिक जंघा (कुर्सी) कहते

हैं। भवनकी यह जंघा मानव-जंघाकी अपेक्षा ढाई

गुना अधिक होनी चाहिये। उसके ऊपर निर्मित

होनेवाले गर्भभागके विस्तार-परिमापको शुक्रांघ्रि

कहते हैं। गर्भभागको पुनः तीन अथवा पाँच

भागोंमें विभक्त करना चाहिये और शुक्रांघ्रिके

द्वारकी ऊँचाई शिखर-भागकी आधी करनी

चाहिये। चार शिखर बनाकर उसके तीसरे भागपर

वेदि-बन्धन करे। उसके चतुर्थ भागपर पुनः प्रासादके

कण्ठ-भागका निर्माण करना चाहिये।* अथवा

भवनका निर्माण करनेके लिये भूमिखण्डको समान

सोलह भागोंमें विभक्त करके उस सोलहवें भागके

चतुर्थ भागके मध्यमें गर्भगृहका निर्माण करवाये।

बचे हुए बारह भागमें भित्ति (दीवाल) - का निर्माण

करे। चतुर्थ भागकी ऊँचाईके अनुसार ही अन्य

भित्तियोंकी ऊँचाईका परिमाण निश्चित करना चाहिये।

भित्तिकी ऊँचाईके मानकी अपेक्षा शिखरकी ऊँचाई

दो गुनी हो। मन्दिरके चारों ओर बननेवाले

प्रदक्षिणा-भागका विस्तार शिखर-भागकी ऊँचाईके

मानका चतुर्थांश होना चाहिये।

बुद्धिमानोंको चाहिये कि वे उस देवप्रासादमें

चारों दिशाओंमें निर्गम (बाहर निकलनेके) द्वार

रखें। गर्भगृहकी चतुर्दिक् भित्तियोंमें प्रत्येक भित्तिका

पाँच भाग करके उसके मध्यके पाँचवें भागमें द्वार

लगाना चाहिये। ऐसा ही गर्भगृहके प्रत्येक द्वारका

मान वास्तुविद् विद्वानोंने निर्धारित किया है।

गर्भगृहके समान ही उसके अग्रभागमें मुखमण्डप

बनाना चाहिये। यह प्रासादका सामान्य लक्षण

कहा गया है। अब मैं लिङ्गनिर्माणके परिमाणको

कह रहा हूँ।

हे शौनक ! लिङ्गके परिमाणके अनुसार उसकी

पीठका निर्माण होना चाहिये। पीठभागका दुगुना

चारों ओर पीठका गर्भभाग हो। पीठगर्भके अनुसार

ही उसकी भित्ति तथा उसके विस्तारके अर्धपरिमाणमें

उस लिङ्गपीठका जंघाभाग निर्मित करे।

हे शौनक ! जंघाभागके परिमाणकी अपेक्षा

द्विगुणित ऊँचा शिखर होना चाहिये। पीठ और

गर्भभागके मध्य जो परिमाण हो, उस परिमाणके

अनुसार शुक्रांघ्रिभाग निर्मित होता है। द्वारनिर्माणके

समय पहले जैसा कहा जा चुका है, शेष कार्य

वैसे ही होगा। लिङ्गका परिमाण बताया जा चुका

है। अब द्वारका परिमाण कहते हैं। चार हाथ (छः

फुट) - का द्वार बनाया जाय, जो वास्तुसे आठवाँ

हिस्सा होता है। स्वेच्छानुसार इसका दुगुना विस्तार

हो सकता है।

द्वारके सदृश पीठके मध्यभागको छिद्रयुक्त ही

रखना चाहिये। पादिक, शेषिक तथा भित्तिद्वार

परिमाणके अनुसार ही उसके अर्ध-अर्ध परिमाणकी

दूरीपर निर्मित करे। उस गर्भभागके विस्तारके

समान ही मण्डपके जंघाभागका निर्माण करके उस

जंघाभागके द्विगुणके परिमाणमें ऊँचे शिखरभागको

  • चारों शिखरोंके मध्यमें ऊपरके हिस्सेको कण्ठभाग कहते हैं।

काण्ड ]

प्रासाद-लक्षण

७५

निर्मित करे। शुक्रांघ्रिभागको पहलेकी ही भाँति

बनवाकर निर्गम अर्थात् द्वारभागको ऊँचा ही बनवावें—

ऐसा मण्डपनिर्माणका मान है। इसके अतिरिक्त शेष

प्रासाद-भागके स्वरूपको कह रहा हूँ, सुनें—

प्रासाद-मण्डपके अग्रभागमें त्रेवेद अर्थात्

त्रिद्वारीका निर्माण करवाना चाहिये, जिसके क्षेत्रभागमें

देवगण विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार प्रासादके

मानका अवधारण करके बाह्य भागका निर्माण

करे।

इस निर्माणकार्यमें प्रासादके चारों ओर एक

पाद परिमाणवाली नेमि या नींवका निर्माण करना

चाहिये। वैसे संसारमें गर्भगृहके परिमाणके अनुसार

नेमिका मान उसका द्विगुण है। भित्तिकी चौड़ाईसे

दो गुणा ऊँचा उसका शिखर भाग होना चाहिये।

लक्षणों एवं स्वरूपकी भिन्नताके कारण प्रासाद

अनेक प्रकारके होते हैं। यथा—वैराज, पुष्पक,

कैलास, मालिका (माणिक) तथा त्रिविष्टप—ये

पाँच प्रकारके प्रासाद हैं। इनमें प्रथम प्रकारका

वैराज नामक प्रासाद सब प्रकारसे चौकोर और

समतल होता है। द्वितीय प्रकारका पुष्पक प्रासाद

आयताकार होता है। तृतीय प्रकारका कैलास

नामक प्रासाद वृत्ताकार, चौथा मालिका नामक

प्रासाद वृत्तायत और पाँचवाँ त्रिविष्टप नामक

प्रासाद अष्टकोणाकार होता है। इस प्रकारसे बने

हुए ये प्रासाद बड़े ही मनोहारी होते हैं। इन

प्रासादोंसे ही अन्य प्रकारके प्रासादोंका स्वरूप

निर्मित हुआ है।

यथा—मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, सर्वतोभद्र,

रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स—ये नौ

प्रकारके चौकोर प्रासाद वैराज नामक प्रासाद

निर्माणकी कलासे ही उत्पन्न हुए हैं।

वलभी, गृहराज, शालागृह, मन्दिर, विमान,

ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम्भ और शिविकावेश्म—ये

नौ प्रासाद पुष्पक नामक प्रासादकलासे उत्पन्न हुए

हैं।

वलय, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, मुकुली, उष्णीषी,

शंख, कलश, गुवावृक्ष तथा अन्य वृत्ताकार प्रासाद

कैलास प्रासादसे निकले हैं। गज, वृषभ, हंस,

गरुड, सिंह, सम्मुख, भूमुख, भूधर, श्रीजय तथा

पृथिवीधर—इन प्रासादोंका उद्भव 'मालिका'

(मणिक) नामक वृत्तायत प्रासादसे हुआ है।

वज्र, चक्र, मुष्टिकवधु, वक्रस्वस्तिक, खड्ग,

गदा, श्रीवृक्ष, विजय तथा श्वेत—इन नौ प्रासादोंका

प्रादुर्भाव त्रिविष्टप नामक प्रासादसे हुआ है।

इसके अतिरिक्त त्रिकोण, पद्माकार,

अर्धचन्द्राकार, चतुष्कोण तथा षोडशकोणीय प्रकारसे

भी मण्डपके संस्थानका निर्माण जहाँ-तहाँ किया

जा सकता है, जो क्रमशः—राज्य, ऐश्वर्य, आयुवर्धन,

पुत्रलाभ और स्त्रीप्राप्ति करानेवाले होते हैं।

मुख्यद्वारके स्थानमें ही ध्वजा आदि तथा

गर्भगृहका निर्माण कराना चाहिये। सूत्रके द्वारा सम

संख्याओंसे गुणित मण्डपका निर्माण करके उस

मण्डपके चतुर्थांश अर्थात् चौथाई परिमाणका एक

भद्रगृह निर्मित करवाये। भद्रगृहको समानान्तर

वातायन (रोशनदान)—से अथवा वातायनसे रहित

बनाना चाहिये। कहीं मण्डपकी दीवालके बराबर

अथवा कहीं उससे डेढ़ गुना अथवा कहीं दुगुने

मापके मण्डप बनाये जाने चाहिये। प्रासादके

लतामण्डपकी भूमि विषम तथा चित्र-विचित्र

(रंग-बिरंगी) वर्णकी बनानी चाहिये। परिमाण-

विरोध रहनेपर उसे विषम रेखाओंसे अलंकृत

किया जा सकता है।

प्रासादकी आधारभूमि प्रत्येक दिशाओंमें

अवस्थित चार द्वारों और चार मण्डपोंसे सुशोभित

होनी चाहिये। जो प्रासाद सौ शृंगोंवाला अर्थात् सौ

मीनारोंसे युक्त रहता है, उसे मेरु-संज्ञासे अभिहित