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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२२२- संतसक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा, सत्संगति तथा भगवत्कृपासे पाँच प्रेतों तथा ब्राह्मणका उद्धार ..

४८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

पैर दाबे जाते थे और कहाँ आज इन यमदूतोंके वज्रसदृश कठोर हाथोंसे पैर पकड़कर मुझे निर्दयतापूर्वक घसीटा जा रहा है!

दसवें मासमें वहींपर पिण्ड और जलका उपभोग करके वह (जीव) पुनः आगेकी ओर सरकने लगता है। ग्यारहवाँ मास पूर्ण होते ही वह ‘रौद्रपुर’ पहुँच जाता है। मार्गमें यमदूत जैसे ही उसकी पीठपर प्रहार करते हैं, वह चिल्लाते हुए इस प्रकार विलाप करता है—

क्वाहं सतूलीशयने परिवर्तनं क्षणे क्षणे।
भटहस्तभ्रष्टयष्टिकृष्टपृष्ठः क्व वा पुनः॥

<div style="text-align: right;">(५।१३७)</div>

कहाँ मैं रूईसे बने हुए अत्यन्त कोमल गद्देपर लेटकर प्रतिक्षण करवटें बदलता था और कहाँ आज यमदूतोंके हाथोंसे निर्दयतापूर्वक मारी जा रही लाठियोंके प्रहारसे कटी पीठसे करवट बदल रहा हूँ!

हे द्विज! इसके पश्चात् वह जीव पृथ्वीपर दिये गये जलसहित पिण्डको खाकर ‘पयोवर्षण’ नामक नगरकी ओर प्रस्थान करता है। रास्तेमें यमदूत कुल्हाड़ीसे उसके सिरपर प्रहार करते हैं। हताहत होकर वह इस प्रकारका विलाप करता है—

क्व भृत्यकोमलकरैर्गन्धतैलावसेचनम्॥
क्व कीनाशनुगैः क्रोधात्कुठारैः शिरसि व्यथा।

<div style="text-align: right;">(५।१३९-१४०)</div>

हाय! कहाँ भृत्योंके कोमल-कोमल हाथोंसे मेरे सिरपर सुवासित तेलकी मालिश होती थी और कहाँ आज क्रोधसे परिपूर्ण यमदूतोंके हाथोंसे मेरे इस सिरपर कुल्हाड़ियोंका प्रहार हो रहा है!

इस पयोवर्षण नामक नगरमें वह मृतक ऊनाब्दिक श्राद्धका दुःखपूर्वक उपभोग करता है। तदनन्तर वर्ष बीतते ही वह ‘शीताढ्य’ नगरकी ओर चल देता है। मार्गमें बढ़ते हुए उस मृतककी जिह्वाको यमदूत छूरीसे काट डालते हैं, जिससे दुःखित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

प्रियालापैः क्व च रसमाधुर्यस्य वर्णनम्।
उक्तमात्रेऽसिपत्रादिजिह्वाच्छेदः क्व चैव हि॥

<div style="text-align: right;">(५।१४२)</div>

अरे! कहाँ परस्पर प्रिय वार्तालापोंके द्वारा इस जिह्वाके रसमाधुर्यकी प्रशंसा की जाती थी, कहाँ आज मुँह खोलनेमात्रपर ही तलवारके समान तीक्ष्ण छूरी आदिके द्वारा मेरी उसी जिह्वाको काट दिया जा रहा है!

तदनन्तर उसी नगरमें वह मृतक वार्षिक पिण्डोदक तथा श्राद्धमें दिये गये अन्य पदार्थोंका सेवन कर आगेकी ओर बढ़ता है। पिण्डज शरीरमें प्रविष्ट होकर वह ‘बहुभीति’ नामक नगरमें जाता है। वह मार्गमें अपने पापका प्रकाशन और स्वयंकी निन्दा करता है। यमपुरीके इस मार्गमें स्त्री भी इसी-इसी प्रकारका विलाप करती है।

इसके बाद वह मृतक अत्यन्त निकट ही स्थित यमपुरीमें जाता है। वह याम्यलोक चौवालीस योजनमें विस्तृत है। उसमें श्रवण नामक तेरह प्रतीहार हैं। उन प्रतीहारोंको श्रवणकर्म करनेसे प्रसन्नता होती है। अन्यथा वे क्रुद्ध होते हैं। ऐसे लोकमें पहुँचनेके पश्चात् प्राणी मृत्युकाल तथा अन्तक आदिके मध्यमें

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८३


स्थित क्रोधसे लाल-लाल नेत्रोंवाले काले पहाड़के समान भयंकर आकृतिसे युक्त यमराजको देखता है। विशाल दाँतोंसे उनका मुखमण्डल बड़ा ही भयानक लगता है। उनकी भ्रू-भंगिमाएँ तनी रहती हैं, जिससे उनकी आकृति भयानक प्रतीत होती है। अत्यन्त विकृत मुखाकृतियोंसे युक्त सैकड़ों व्याधियाँ उनको चारों ओरसे घेरे रहती हैं। उनके एक हाथमें दण्ड और दूसरे हाथमें भैरव-पाश रहता है।

यमलोकमें पहुँचा हुआ जीव यमके द्वारा बतायी गयी शुभाशुभ गतिको प्राप्त करता है। जैसा मैंने तुमसे पहले कहा है, उसी प्रकारकी पापात्मक गति पापी जीवको प्राप्त होती है। जो लोग छत्र, पादुका और घरका दान देते हैं, जो लोग पुण्यकर्म करते हैं, वे वहाँपर पहुँचकर सौम्य स्वरूपवाले, कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट धारण किये हुए शोभासम्पन्न यमराजका दर्शन करते हैं।

चूँकि वहाँ जीवको बहुत भूख लगती है, इसलिये एकादशाह, द्वादशाह, षण्मास तथा वार्षिक तिथिपर बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। हे खगश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति पुत्र, स्त्री तथा अन्य सगे-सम्बन्धियोंके द्वारा कहे गये उनके स्वार्थको ही जीवनपर्यन्त सिद्ध करता है और अपने परलोकको बनानेके लिये पुण्यकर्म नहीं करता, वही अन्तमें कष्ट प्राप्त करता है।

हे गरुड ! मृत्युके पश्चात् संयमनीपुरको जानेवाले प्राणीकी जो गति होती है और वर्षपर्यन्त जो कृत्य किये जाते हैं, उसको मैंने कहा। अब और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ५)

वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति

गरुडने कहा— हे प्रभो! जो तीर्थ-सेवन और दानमें निरन्तर लगा है तथा अन्य साधनोंसे भी सम्पन्न है, उसे भी वृषोत्सर्ग किये बिना परलोकमें सद्गति नहीं प्राप्त होती। इसलिये मनुष्यको वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये। ऐसा मैंने आपसे सुन लिया। इस वृषोत्सर्गका फल क्या है? प्राचीन समयमें इस यज्ञको किसने किया? इसमें किस प्रकारका वृष होना चाहिये? विशेष रूपसे इस कार्यको किस समय करना चाहिये और इसको करनेकी कौन-सी विधि बतायी गयी है? यह सब बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश्वर! मैं उस महापुण्यशाली इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका वर्णन ब्रह्माके पुत्र महर्षि वसिष्ठने राजा वीरवाहनसे किया था।

प्राचीन समयकी बात है, विराधनगरमें वीरवाहन नामक एक धर्मात्मा, सत्यवादी, दानशील और विप्रोंको संतुष्ट करनेवाले राजा रहते थे। किसी समय वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। कुछ पूछनेकी जिज्ञासासे वे वसिष्ठमुनिके आश्रममें जा पहुँचे। वहाँ आसन ग्रहण कर विनम्रतासे झुके हुए राजाने ऋषियोंकी संसदमें मुनिको नमस्कार करके पूछा।

राजाने कहा— हे मुने! मैंने यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक अनेक धार्मिक कृत्य किये हैं, फिर भी यमराजके कठोर शासनको सुनकर मैं हृदयमें बहुत ही भयभीत

४८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हूँ। हे कृपानिधान! महाभाग! ऋषिवर! मुझे यम, यमदूत और देखनेमें अतिशय भयंकर लगनेवाले नरकलोकोंको न देखना पड़े, ऐसा कोई उपाय बतानेकी कृपा करें।

वसिष्ठने कहा— हे राजन्! शास्त्रवेत्ता अनेक प्रकारके धर्मोंका वर्णन करते हैं, किंतु कर्ममार्गसे विमोहित जन सूक्ष्मतया उनको नहीं जानते। दान, तीर्थ, तपस्या, यज्ञ, संन्यास तथा पितृक्रिया आदि सभी धर्म हैं, उन धर्मोंमें भी वृषोत्सर्गका विशेष महत्त्व है। मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये। यदि उनमेंसे एक भी पुत्र गया-तीर्थमें जाय, अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषभ यथाविधि छोड़े तो जाने-अनजाने किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। यह शुद्धि नील वर्णके वृषभका उत्सर्ग अथवा समुद्रमें स्नान करनेसे भी हो सकती है। हे राजेन्द्र! जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, उसका प्रेतत्व स्थिर ही रहता है। मात्र श्राद्ध करनेसे क्या लाभ होगा ? जिस-किसी भाँति नगर अथवा तीर्थमें वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये।

हे खगेश! वृष-यज्ञके द्वारा प्रेतत्वसे मुक्ति प्राप्त होती है, अन्य साधनोंसे नहीं। जो वृषभ शुभ लक्षणोंसे समन्वित युवा तथा कृष्ण गल-कम्बलवाला हो और सदैव जो गायोंके झुंडमें घूमनेवाला हो, उस वृषभको विधि-विधानसे चार अथवा दो या एक बछियाके साथ पहले उसका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्यों एवं मन्त्रोंके साथ उन सबका उत्सर्ग किया जाय। 'इहरतीति०* इन छः मन्त्रोंसे अग्निदेवको आहुति देनी चाहिये। कार्तिक, माघ और वैशाखकी पूर्णिमा, संक्रान्ति, अन्य पुण्यकाल, व्यतिपात तथा तीर्थमें और पिताकी क्षयतिथि वृषोत्सर्गके लिये विशेष रूपसे प्रशस्त मानी जाती है। 'जो वृषभ लाल वर्णका हो और उसका मुँह-पूँछ पाण्डु (श्वेत-पीतमिश्रित) हो, खुर और सींगोंका वर्ण पीत हो, वह नीलवृषभ कहा जाता है'—

लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डुरः॥
पीतः खुरविषाणेषु स नीलो वृष उच्यते।

<p align="right">(६। १९-२०)</p>

जो वृषभ श्वेत वर्णका होता है वह ब्राह्मण है, जो लोहित वर्णका है वह क्षत्रिय है, जो पीत वर्णका है वह वैश्य है और जो कृष्ण वर्णका है वह शूद्र है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णको अपने वर्णके अनुसार वृषोत्सर्ग करना चाहिये अथवा रक्तवर्णका ही वृषभ सबके लिये कल्याणप्रद है।

पिता, पितामह तथा प्रपितामह पुत्रके उत्पन्न होनेपर यही आशा करते हैं कि यह मेरे लिये वृषोत्सर्ग करेगा। वृषोत्सर्गके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्ददायकः॥
अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।
गङ्गायमुनयोः पेयमन्तर्वेदि तृणं चर॥
धर्मराजस्य पुरतो वाच्यं मे सुकृतं वृष।

<p align="right">(६। २३—२५)</p>

हे धर्म! आप इस वृषभरूपमें संसारको आनन्द प्रदान करनेवाले देव हैं। आप ही अष्टमूर्ति शिवके अधिष्ठान हैं। अतः मुझे शान्ति प्रदान करें। आप गङ्गा-यमुनाका जल पियें। अन्तर्वेदीमें घास चरें और हे वृष! धर्मराजके सामने मेरे पुण्यकर्मकी चर्चा करें।

इस प्रकारका निवेदन करते हुए संस्कार्ताको चाहिये कि वृषभके दाहिने कन्धेपर त्रिशूल और


* ॐ इह रतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह रमध्वं स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह धृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह स्वधृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन् स्वाहा इदमग्नये। ॐ रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा इदमग्नये। (यजु० ८। ५१)

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८५


बायें ऊरुभागमें चक्रका चिह्न अंकित करके गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिसे बछियाके सहित उस वृषभकी पूजा करके विधिवत् बन्धनमुक्त कर दे।

वसिष्ठजीने कहा—हे राजन्! आप भी विधिवत् वृषोत्सर्ग करें, अन्यथा सभी साधनोंसे सम्पन्न होनेपर भी आपको सद्गति नहीं प्राप्त हो सकती है। राजन्! पहले त्रेतायुगमें विदेहनगरमें धर्मवत्स नामका एक ब्राह्मण था, जो अपने वर्णानुसार कर्ममें अहर्निश निरत, विद्वान्, विष्णुभक्त, अत्यन्त तेजस्वी और यथालाभसे संतुष्ट रहता था। एक बार पितृपर्वके आनेपर वह कुश लेनेके लिये वनमें गया। वहाँ इधर-उधर घूमता हुआ वह कुश और पलाशके पत्तोंको एकत्र करने लगा। एकाएक वहाँपर देखनेमें अत्यन्त सुन्दर चार पुरुष आये और उस ब्राह्मणको पकड़कर आकाशमार्गसे लेकर चले गये। वे चारों पुरुष उस दीन, व्यथित ब्राह्मणको पकड़कर बहुत-से वृक्षोंवाले घनघोर वन, पर्वतोंके दुर्गोंको पार कराते हुए एक वनसे दूसरे वनके मध्य ले गये। हे राजन्! वहाँपर उस ब्राह्मणने एक बहुत बड़ा नगर देखा। वह नगर मुख्यद्वारसे समन्वित तथा अनेक प्रासादोंसे सुशोभित हो रहा था। चबूतरा, बाजार, खरीदी-बेची जानेवाली वस्तुओं और नर-नारीसे युक्त उस नगरमें तुरहियोंकी ध्वनि हो रही थी। वीणा और नगाड़े बज रहे थे। वहाँ कुछ भूखसे पीड़ित, दीन-हीन, पुरुषार्थसे रहित लोगोंको भी उसने देखा। उसके बाद अत्यन्त मैले-कुचैले, फटे-पुराने वस्त्रोंको पहने हुए लोग दिखायी पड़े। आगे हृष्ट-पुष्ट स्वर्णाभूषणसे अलंकृत सुन्दर-सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए कुछ ऐसे लोग थे, जो देवताओंके समान शोभासम्पन्न थे; जिनको देखकर वह विस्मयाभिभूत हो उठा। वह सोचने लगा कि क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? अथवा यह कोई माया है? या मेरे मनका यह विभ्रम है? वह ब्राह्मण इस प्रकारकी शंका कर ही रहा था कि वे चारों पुरुष उसको लेकर राजाके पास गये। स्वर्णजटित उस राजप्रासादके बीच स्थित राजाको वह ब्राह्मण एकटक देखता ही रह गया। वहाँपर एक महादिव्य सिंहासन था, जहाँ छत्र और चँवर डुलाये जा रहे थे। उसके ऊपर स्वर्णनिर्मित मुकुट धारण किया हुआ महान् शोभा-सम्पन्न राजा बैठा हुआ था। वन्दीजन उसका गुणगान कर रहे थे।

राजा उस ब्राह्मणको देखकर खड़ा हो गया और उसने मधुपर्क तथा आसनादि प्रदान कर उनकी विधिवत् पूजा की। तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर वह राजा उन विप्रदेवसे इस प्रकार कहने लगा—हे प्रभो! आज आप-जैसे धर्मपरायण विष्णुभक्तका दर्शन हुआ है, इससे मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा यह कुल भी पवित्र हो उठा। तदनन्तर राजाने उस ब्राह्मणको प्रणाम किया और बहुत प्रकारसे उनको संतुष्ट करके अपने दूतोंसे कहा—हे दूतो! ये ब्राह्मणदेव जहाँसे आये हुए हैं, पुनः तुम सब इन्हें वहीं ले जाकर पहुँचा आओ। ऐसा सुनकर उन ब्राह्मणश्रेष्ठने राजासे पूछा—

हे राजन्! यह कौन-सा देश है? यहाँपर ये उत्तम, मध्यम और अधम चरित्रवाले लोग कहाँसे आये हुए हैं? आप किस पुण्यके प्रभावसे यहाँ इन सबके बीच प्रधान पदपर विराजमान हैं? मुझको यहाँ किसलिये लाया गया और फिर क्यों वापस भेजा जा रहा है? यह सब स्वप्नके समान मुझे अनोखा दिखायी दे रहा है!

इसपर राजाने कहा—हे विप्रदेव! अपने धर्मका पालन करते हुए जो मनुष्य सदैव भगवान् हरिकी भक्तिमें अनुरक्त और इन्द्रियोंके विषयसे परे रहता है, वह मेरे लिये निश्चित ही पूज्य है। नित्य जो

४८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड -

प्राणी तीर्थोंकी यात्रा करनेमें ही लगा रहता है, जो वृषोत्सर्गके माहात्म्यको भलीभाँति जानता है और जो सत्य एवं दान-धर्मका पालक है, वह व्यक्ति देवताओंके लिये भी प्रणम्य है। हे परंतप ! हे पूजार्ह ! आपका दर्शन हम सभी प्राप्त कर सकें, इसलिये आपको यहाँ लाया गया था। हे देव ! आप मुझपर प्रसन्न हों और मुझे इस साहसके लिये क्षमा करें। मैं स्वयं अपने सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। इस वृत्तान्तका वर्णन मेरा यह विपश्चित् नामवाला मन्त्री करेगा। राजाका वह मन्त्री सब वेदोंको जाननेवाला विद्वान् व्यक्ति था। अतः अपने स्वामीकी हार्दिक इच्छाको जानकर वह कहने लगा—

हे विप्र ! यह राजा पूर्वजन्ममें द्विज और देवताओंसे सुशोभित विराधनगरमें विश्वम्भर नामका एक वैश्य था। ऐसा मैंने सुना है। वैश्य-वृत्तिसे जीवनयापन करते हुए वह अपने परिवारका पालन करता था। नित्य गायोंकी सेवा तथा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करता था। सत्पात्रको दान, अतिथिसेवा तथा अग्निहोत्र करना उसका नित्य धर्म था। सत्यमेधा नामकी पत्नीके साथ उसने विधिवत् गृहस्थाश्रमका संचालन किया। उसने स्मार्त कर्मके अनुष्ठानसे सभी लोकों तथा श्रौत कर्मोंसे देवताओंको जीत लिया था।

किसी समय जब वह वैश्य अपने भाइयोंके साथ बहुत-से तीर्थोंकी यात्रा कर अपने घर लौट रहा था, तब मार्गमें ही उसे लोमश ऋषिका दर्शन हो गया। उसने महर्षिके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। हाथ जोड़कर विनयावनत खड़े उस वैश्यसे करुणाके सागर महर्षि लोमशने पूछा—

हे भद्रपुरुष ! ब्राह्मणों और अपने भाई-बन्धुओंके साथ आप कहाँसे आ रहे हैं? धर्मप्राण ! आपको देखकर मेरा मन आर्द्र हो उठा है।

इसपर विश्वम्भर वैश्यने उत्तर दिया— मुनिवर ! यह शरीर नश्वर है। मृत्यु प्राणीके सामने ही खड़ी रहती है—ऐसा जानकर अपनी धर्मपरायणा पत्नीके साथ मैं तीर्थयात्रामें गया था। तीर्थोंका विधिवत् दर्शन एवं प्रचुर धन-दान कर मैं अपने घरकी ओर वापस जा रहा था कि सौभाग्यवश आपका दर्शन हो गया।

लोमशने कहा—इस भारतवर्षकी पावन भूमिमें बहुत-से तीर्थ हैं। आपने जिन तीर्थोंकी यात्रा की है, उनका वर्णन मुझसे करें।

वैश्यने कहा—हे ऋषिवर ! जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती नामक पवित्रतम नदियाँ एक साथ मिलकर प्रवाहित होती हैं, जहाँ ब्रह्मा तथा देवराज इन्द्रने दशाश्वमेध-यज्ञ किया था उस तीर्थराज प्रयाग; जहाँ करुणानिधान देवदेवेश्वर शिव प्राणियोंके कानमें 'तारकमन्त्र' का उपदेश देते हैं उस मोक्षदायिनी काशी; पुलहाश्रम, फल्गुतीर्थ, गण्डकी, चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य, शिवतीर्थ, अनन्तक, गोप्रतारक, नागेश्वर, विन्दुसरोवर, मोक्षदायक राजीवलोचन भगवान् रामसे सुशोभित अयोध्या; अग्नितीर्थ, वायुतीर्थ, कुबेरतीर्थ, कुमारतीर्थ, सूकरक्षेत्र, भगवान् कृष्णसे अलंकृत मथुरा; पुष्कर, सत्यतीर्थ, ज्वालातीर्थ, दिनेश्वरतीर्थ, इन्द्रतीर्थ, पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा कुरुक्षेत्र जाकर मैंने दर्शन किया। उसके बाद मैं ताप्ती, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, मलय, कृष्णवेणी, गोदावरी, दण्डकवन, ताम्रचूड, सदोदक और द्यावाभूमीश्वर तीर्थको देखकर पर्वतराज श्रीशैल पहुँचा। तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् हरि स्वयं जहाँ श्रीरङ्ग नामसे निवास करते हैं, जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा वेंकटी नामसे पुकारी जाती हैं, उस वेंकटाचलकी यात्रा मेरे द्वारा की गयी। तत्पश्चात् चन्द्रतीर्थ, भद्रवट, कावेरी, कुटिलाचल, अवटोदा, ताम्रपर्णी, त्रिकूट, कोल्लकगिरि, वसिष्ठतीर्थ,