गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२१- वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति
प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४७५
हे पक्षिश्रेष्ठ! पुत्रादि दस दिनोंतक जो पिण्डदान करते हैं, वे प्रतिदिन चार भागोंमें विभाजित हो जाते हैं। उसमें प्रथम दो भागसे आतिवाहिक शरीर, तीसरे भागसे यमदूत और चौथे भागसे वह मृतक स्वयं तृप्त होता है।
नौ दिन और रात्रिमें वह शरीर अपने अंगोंसे युक्त हो जाता है। प्रथम पिण्डदानसे प्रेतके शिरोभागका निर्माण होता है। दूसरे पिण्डदानसे उसके कान-नेत्र और नाककी सृष्टि होती है। तीसरे पिण्डदानसे क्रमशः—कण्ठ, स्कन्ध, बाहु एवं वक्षःस्थल, चौथे पिण्डदानसे नाभि, लिंग और गुदाभाग तथा पाँचवें पिण्डदानसे जानु, जंघा और पैर बनते हैं। इसी प्रकार छठें पिण्डदानसे सभी मर्मस्थल, सातवें पिण्डदानसे नाड़ीसमूह, आठवें पिण्डदानसे दाँत और लोम तथा नवें पिण्डदानसे वीर्य एवं दसवें पिण्डदानसे उस शरीरमें पूर्णता, तृप्ति और भूख-प्यासका उदय होता है—
अहोरात्रैस्तु नवभिर्देहो निष्पत्तिमाप्नुयात् ।
शिरस्त्वाद्येन पिण्डेन प्रेतस्य क्रियते तथा ॥
द्वितीयेन तु कर्णाक्षिनासिकं तु समासतः ।
गलांसभुजवक्षश्च तृतीयेन तथा क्रमात् ॥
चतुर्थेन च पिण्डेन नाभिलिङ्गगुदं तथा ।
जानुजंघं तथा पादौ पञ्चमेन तु सर्वदा ॥
सर्वमर्माणि षष्ठेन सप्तमेन तु नाडयः ।
दन्तलोमान्यष्टमेन वीर्यन्तु नवमेन च ॥
दशमेन तु पूर्णत्वं तृप्तता क्षुद्विपर्ययः ।
(५।३३—३७)
हे वैनतेय! अब मैं मध्यमषोडशी विधिका वर्णन करता हूँ। उसको सुनो।
विष्णुसे आरम्भ करके विष्णुपर्यन्त एकादश श्राद्ध तथा पाँच देवश्राद्ध इस प्रकार षोडश श्राद्ध किये जाते हैं। इन्हींका नाम मध्यमषोडशी है। यदि प्रेतकल्याणके निमित्त ‘नारायणबलि’ की जाय तो उसको एकादशाहके दिन करना चाहिये और उसी दिन वहींपर वृषोत्सर्ग भी करना चाहिये। जिस जीवका ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग नहीं होता, सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी उस जीवकी प्रेतत्वसे मुक्ति नहीं होती है। वृषोत्सर्ग बिना किये ही जो पिण्डदान किया जाता है, वह पूर्णतया निष्फल होता है। उससे प्रेतका कोई उपकार नहीं होता।* इस पृथ्वीपर वृषोत्सर्गके बिना कोई अन्य उपाय नहीं है, जो प्रेतका कल्याण करनेमें समर्थ हो। अतः पुत्र, पत्नी, दौहित्र (नाती), पिता अथवा पुत्रीको स्वजनकी मृत्युके पश्चात् निश्चित ही वृषोत्सर्ग करना चाहिये। चार बछियोंसे युक्त, विधानपूर्वक अलंकृत वृष, जिसके निमित्त छोड़ा जाता है उसको प्रेतत्वकी प्राप्ति नहीं होती। यदि एकादशाहके दिन यथाविधान साँड़ उत्सर्ग करनेके लिये उपलब्ध नहीं है तो विद्वान् ब्राह्मण कुश या चावलके चूर्णसे साँड़का निर्माण करके उसका उत्सर्ग कर सकता है। यदि बादमें भी वृषोत्सर्गके समय किसी प्रकार साँड़ नहीं मिल रहा है तो मिट्टी या कुशसे ही साँड़का निर्माण करके उसका उत्सर्ग करना चाहिये। जीवनकालमें प्राणीको जो भी पदार्थ प्रिय रहा हो उसका भी दान इसी एकादशाह श्राद्धके दिन करना उचित है। इसी दिन मरे हुए स्वजनको उद्देश्य बनाकर शय्या, गौ आदिका दान भी करना चाहिये। इतना ही नहीं उस प्रेतकी क्षुधा-शान्तिके लिये बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना चाहिये।
हे विनतापुत्र गरुड! अब मैं तृतीय षोडशी (उत्तम-षोडशी)-श्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो।
* एकादशाहे प्रेतस्य यस्योत्सृज्येत नो वृषः। प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि॥
अकृत्वा यद्वृषोत्सर्गं कृतं वै पिण्डपातनम्। निष्फलं सकलं विद्यात्प्रमीताय न तद्भवेत्॥ (५।४०-४१)
| ४७६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
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प्रत्येक बारह मासके बारह पिण्ड, ऊनमासिक (आद्य) त्रैपाक्षिक, ऊनषाण्मासिक एवं ऊनाब्दिक—इन्हें मतभेदसे तृतीय अथवा उत्तमषोडशी भी कहा जाता है।
बारहवें दिन, तीन पक्षमें, छः महीनेमें अथवा वर्षके अन्तमें सपिण्डीकरण करना चाहिये। जिस मृतकके निमित्त इन षोडश श्राद्धोंको सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको दान नहीं दिया जाता है, उस प्रेतके लिये अन्य सौ श्राद्ध करनेपर भी मुक्ति प्राप्त नहीं होती। हे खगेश! मृतक व्यक्तिके एकादशाह अथवा द्वादशाह तिथिमें आद्यश्राद्ध करनेका विधान माना गया है। प्रतिमासका श्राद्ध मासके आद्यतिथिमें मृत-तिथिपर होना चाहिये। ऊनश्राद्ध (ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक तथा ऊनाब्दिक)—मास, छठें मास और वर्षमें एक, दो अथवा तीन दिन कम रहनेपर करना चाहिये<sup>१</sup>। सपिण्डीकरण वर्ष पूर्ण होनेके बाद अथवा छः महीने बाद करना चाहिये अथवा आभ्युदयिक (विवाहादि मङ्गल-कार्य अनिवार्य रूपसे उपस्थित होनेपर) कार्य आनेपर तीन पक्ष अथवा बारह दिनके बाद करना चाहिये। मनुष्योंके कुलधर्म असंख्य हैं, उनकी आयु भी क्षरणशील है और शरीर अस्थिर है। अतः बारहवें दिन सपिण्डीकरण करना उत्तम है।
हे पक्षिराज! सपिण्डीकरण श्राद्धोंके सम्पादकीय विधि भी मुझसे सुनो।
हे काश्यप! एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार यह कार्य करना चाहिये<sup>२</sup>। तिल, गन्ध और जलसे परिपूर्ण चार पात्रोंकी व्यवस्था करके एक पात्र प्रेतके निमित्त और शेष तीन पात्र पितृगणोंके लिये निश्चित करना चाहिये। तदनन्तर उन तीन पात्रोंमें प्रेतपात्रके जलका सेचन करे। चार पिण्ड बनाये और प्रेत-पिण्डका उन तीन पिण्डोंमें मेलन कर दे। तबसे वह प्रेत पितरके रूपमें हो जाता है। हे खगेश्वर! उस प्रेतमें पितृत्वभावके आ जानेके बाद उस प्रेत तथा अन्य उसके पितृ-पितामह आदि पितरोंका समस्त श्राद्धकृत्य श्राद्धकी सामान्य विधिके अनुसार ही करना चाहिये। मृत पतिके साथ एक ही चितामें प्रवेश और एक ही दिन दोनोंकी मृत्यु होनेपर स्त्रीका सपिण्डीकरण नहीं होता है। उसके पतिके सपिण्डीकरण श्राद्धसे ही स्त्रीका सपिण्डीकरण श्राद्ध सम्पन्न हो जाता है। हे खगेश! पतिके मरनेके बाद स्त्रीकी मृत्यु होनेपर स्त्रीका सपिण्डन पतिके साथ होगा और सहमृत्युकी दशामें दोनोंके श्राद्धके लिये एक पाक, एक समय तथा एक कर्ता होगा। किंतु श्राद्ध पति-पत्नीका पृथक्-पृथक् ही किया जाना चाहिये। यदि स्त्री पतिके साथ चितामें
१-(क) एकद्वित्रिदिनैरूने त्रिभागेनोने एव वा। श्राद्धान्यूनाब्दिकादीनि कुर्यादित्याह गौतमः॥
नन्दायां भार्गवदिने चतुर्दश्यां त्रिपुष्करे। ऊनश्राद्धं न कुर्वीत गृही पुत्रधनक्षयात्॥ (गार्ग्य)
द्विपुष्करे च नन्दायां सिनीवाल्यां भृगोर्दिने। चतुर्दश्यां च नो तानि कृतिकासु त्रिपुष्करे॥
एक, दो, तीन अथवा दस दिन कम रहनेपर, नन्दा तिथिको, शुक्रवारको, चतुर्दशी तिथि, त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग, अमावास्या तिथि, कृत्तिका, रोहिणी तथा मृगशिरा तिथियोंमें ऊनश्राद्ध (ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक, ऊनाब्दिक) नहीं करना चाहिये।
(ख) 'सपिण्डीकरणं चैव' इस वाक्यसे तृतीय षोडशीके अन्तर्गत सपिण्डीमें किये जानेवाले प्रेतश्राद्धकी गणना करनेपर 'शताद्धेन तु मेलयेत्' इस वाक्यसे विरोध होता है। सपिण्डीकरणमें किये जानेवाले प्रेतश्राद्धको तृतीय षोडशीके अन्तर्गत कात्यायनने माना है। इसका 'शतार्धेन तु मेलयेत्' से विरोध है।
श्राद्धकल्पलतामें तथा आचार्य गोभिल, लौगाक्षि पैठिनसिके मतमें सपिण्डन श्राद्ध तृतीय षोडशीके बाहर है।
(ग) 'द्वादशप्रतिमास्यानि' इस पदसे प्रथम मासिका बोध हो जानेके कारण आद्य पदके अर्थमें ऊनमासिक उपलक्षण है। इसी प्रकार 'षाण्मासिक' पदका ऊनषाण्मासिक और ऊनाब्दिक अर्थमें लाक्षणिक प्रयोग है।
२-सपिण्डीकरणके अन्तर्गत किये जानेवाले केवल प्रेतश्राद्धके उद्देश्यसे एकोद्दिष्ट विधिका उल्लेख है। इस श्राद्धके अन्तर्गत किया जानेवाला प्रेतके पिता आदिका श्राद्ध सदैव पार्वण-विधिसे किया जाना चाहिये।
प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४७७
सती न होकर अन्य किसी दिन सती होती है तो उस स्त्रीकी मृत तिथिके आनेपर उसके लिये पृथक् रूपसे पिण्डदान करना चाहिये।
हे गरुड! सहमृत्युकी दशामें प्रत्येक वर्ष नवश्राद्ध एक साथ करना चाहिये। जिस मृतकका वार्षिक श्राद्धसे पूर्व सपिण्डीकरण हो जाता है, उसके लिये भी वर्षभर मासिक श्राद्ध और जलकुम्भ दान करना चाहिये<sup>१</sup>। धनका बँटवारा हो जानेपर भी नवश्राद्ध, सपिण्डन श्राद्ध और षोडश श्राद्ध करनेका अधिकार एक ही व्यक्तिको है।
हे कश्यपपुत्र! अब मैं तुम्हें नवश्राद्ध करनेका काल बताऊँगा। उसको सुनो।
हे पक्षिन्! मृत्युके दिन मृतस्थानपर पहला श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद दूसरा श्राद्ध मार्गमें उस स्थानपर करना चाहिये जहाँपर शव रखा गया था। तदनन्तर तीसरा श्राद्ध अस्थिसंचयनके स्थानपर होता है। इसके बाद पाँचवें, सातवें, आठवें, नवें, दसवें और ग्यारहवें दिन श्राद्ध होता है। इसलिये इन्हें नवश्राद्ध कहा जाता है। ये नवश्राद्ध तृतीया षोडशी कहे जाते हैं। इनको एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार ही करना चाहिये। पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें और ग्यारहवें दिन होनेवाले श्राद्धोंको नवश्राद्ध कहा जाता है। दिनकी संख्या छः ही है पर छः दिनमें ही नवश्राद्ध हो जाते हैं। इस विषयमें ऋषियोंके बीच मतभेद हैं, इसी कारण मैंने उनको भी तुम्हें बता दिया।
श्राद्धोंका जो योग रूढिगत रूपसे है, वही मुझे भी अभीष्ट है। किसीको नव शब्दका यौगिक अर्थ अभीष्ट है। आद्य और द्वितीय श्राद्धमें एक ही पवित्रक देना चाहिये। जब ब्राह्मण भोजन कर चुके हों तो उसके बाद प्रेतको पिण्डदान देना उचित होता है<sup>२</sup>। वहाँपर यजमान और ब्राह्मणके बीच प्रश्नोत्तर भी होना चाहिये। जिसमें यजमान ब्राह्मणसे यह प्रश्न करे कि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं? उसका उत्तर ब्राह्मण दे कि हाँ हम आपपर प्रसन्न हैं। आपके उस मृत स्वजनको अक्षय लोककी प्राप्ति हो।
हे पक्षिराज! अब तुम मुझसे एकोद्दिष्ट श्राद्धके विषयमें भी सुनो, जिसको वर्षपर्यन्त करना चाहिये।
सपिण्डीकरणके बादमें किये जानेवाले षोडश श्राद्धोंका सम्पादन एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार ही होना चाहिये, किंतु पार्वण-श्राद्धमें उक्त नियमका प्रयोग नहीं होता है। जिस प्रकारसे प्रत्येक वर्षमें होनेवाला प्रत्यब्द श्राद्ध<sup>३</sup> होता है, उसी प्रकार उन षोडश श्राद्धोंको भी करना चाहिये। एकादशाह और द्वादशाहमें जो श्राद्ध किया जाता है उन दिनोंमें स्वयं प्रेत भी भोजन करता है। अतः स्त्री और पुरुषके लिये जो पिण्डदान इन दिनोंमें दिया जाय उसको अमुक प्रेतके निमित्त दिया जा रहा है, ऐसा कहकर पिण्डदान देना चाहिये। सपिण्डीकरण श्राद्ध होनेके पश्चात् प्रेत शब्दका प्रयोग नहीं होता है। एक वर्षतक घरके बाहर प्रतिदिन दीपक जलाना चाहिये। अन्न, दीप, जल, वस्त्र और अन्य जो कुछ भी वस्तुएँ दानमें दी जाती हैं, वे सभी सपिण्डीकरणतक प्रेत शब्दके सम्बोधनसे संकल्पित होनेपर ही प्रेतको तृप्ति प्रदान करती हैं।
हे वैनतेय! संक्षिप्त रूपमें मैंने वार्षिक कृत्य कह दिया। अब तुम विवस्वान् पुत्र यमराजके घर जिस प्रकार जीवका गमन होता है, उसका वर्णन सुनो।
हे अरुणानुज! त्रयोदशाह अर्थात् तेरहवें दिन
१-यस्य संवत्सरादर्वाक् सपिण्डीकरणं भवेत्। मासिकञ्चोदकुम्भञ्च देयं तस्यापि वत्सरम्॥ (५।६४)
२-यह प्रायः सपाक्षिकश्राद्धकी विधि है।
३-वार्षिक तिथिपर होनेवाला श्राद्ध।
| ४७८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
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श्राद्धकृत्य एवं गरुडपुराणके श्रवणके अनन्तर वह जीव, तुम्हारे द्वारा पकड़े गये सर्पके समान यमदूतोंके द्वारा पकड़ लिया जाता है और पकड़े गये बन्दरके समान अकेला ही उस यमलोकके मार्गमें चलता जाता है। उसके बाद वायुके द्वारा अग्रसारित वह जीव दूसरे शरीरमें प्रविष्ट होता है, दूसरे शरीरमें जानेके पूर्वका जो शरीर है वह पिण्डज (दिये गये पिण्डोंसे निर्मित) है। दूसरी योनियोंका शरीर तो पितृसम्भव (माता-पिताके रज-वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला) होता है। इन शरीरोंके प्रमाण, वय, अवस्था एवं संस्थान (आकृतिविशेष) आदि श्राद्ध करनेवालेकी श्रद्धा एवं देह प्राप्त करनेवालेके कर्मानुसार होते हैं। प्रमाणतः यम और मर्त्यलोकके बीच छियासी हजार योजनका अन्तराल है। वह जीव प्रतिदिन अधिक-से-अधिक दो सौ सैंतालीस योजन और आधा कोसका मार्ग तय करता है। इस प्रकार उस जीवकी यात्रा तीन सौ अड़तालीस दिनोंमें पूरी होती है। इस यमलोककी यात्रामें जीवको यमदूत खींचते हुए ले जाते हैं। जो प्राणी अपने जीवनभर पापमें अनुरक्त थे, उनको इस मार्गमें जो कष्ट भोगना पड़ता है, उसको विस्तारपूर्वक सुनो—
मृत्युके तेरहवें दिन वह पापी यमदूतोंके कठोर पाशोंमें बाँध लिया जाता है। हाथमें अंकुश लिये हुए क्रोधावेशमें तनी हुई भौंहोंसे युक्त दण्डप्रहार करते हुए यमदूत उसको खींचते हुए दक्षिण दिशामें स्थित अपने लोकको ले जाते हैं। यह मार्ग कुश, काँटों, बाँबियों, कीलों और कठोर पत्थरोंसे परिव्याप्त रहता है। कहीं-कहीं उस मार्गमें अग्नि जलती रहती है और कहीं-कहीं सैकड़ों दरारोंसे दुर्गम भूमि होती है। प्रचंड सूर्यकी गर्मी और मच्छरोंसे परिव्याप्त उस मार्गमें प्राणी सियारोंके समान वीभत्स चीत्कार करते हुए यमदूतोंके द्वारा खींचे जाते हैं। यमलोकके दारुण मार्गमें पापी जाता है और शरीरके जलनेके कारण अत्यन्त क्षीणताको प्राप्त होता है। अपने कर्मानुसार विभिन्न जंतुओंके द्वारा अङ्गोंके खाये जाने, भेदन एवं छेदन किये जानेके कारण जीव अत्यधिक दारुण दुःख प्राप्त करता है।
हे तार्क्ष्य! जीव अपने कर्मानुसार दूसरे शरीरको प्राप्त करके यमलोकमें नाना प्रकारका कष्ट भोगता है। यमलोकके इस मार्गमें सोलह पुर पड़ते हैं। उनके विषयमें भी सुनो—याम्य, सौरिपुर, नगेन्द्रभवन, गन्धर्वपुर, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापद, दुःखद, नानाक्रन्दपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीताढ्य और बहुभीति—ये सोलह पुर हैं, भयंकर होनेसे ये दुर्दर्शन हैं। याम्यपुरके मार्गमें प्रविष्ट होकर जीव 'हे पुत्र! हे पुत्र! मेरी रक्षा करो' ऐसा करुणक्रन्दन करता हुआ अपने द्वारा किये गये पापोंका स्मरण करता है और अठारहवें दिन वह यमराजके उस नगरमें पहुँच जाता है। वहाँ पुष्पभद्रा नामक नदी प्रवाहित होती है। वहाँ देखनेमें अत्यन्त सुन्दर वटवृक्ष है जहाँपर जीव विश्राम करना चाहता है, किंतु यमदूत उसको वहाँ विश्राम
प्रेतकल्प ]
आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि
४७९
नहीं करने देते। उसके पुत्रोंके द्वारा स्नेहपूर्वक अथवा अन्य किसीके द्वारा कृपापूर्वक पृथ्वीपर जो मासिक पिण्डदान दिया जाता है, उसीको वह वहाँपर खाता है।
तदनन्तर वहाँसे उसकी यात्रा सौरिपुरके लिये होती है। चलता हुआ वह मार्गमें यमदूतोंके द्वारा मुद्गरोंसे पीटा जाता है। उस दुःखसे अत्यधिक पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
जलाशयो नैव कृतो मया तदा
मनुष्यतृप्त्यै पशुपक्षितृप्तये।
गोतृप्तिहेतोर्न च गोचरः कृतः
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१००)
उस जन्ममें मनुष्य और पशु-पक्षियोंकी संतुष्टिके लिये मैंने जलाशय नहीं खुदवाया। गौओंकी क्षुधा-शान्तिके लिये गोचरभूमिका दान भी मैंने नहीं दिया। अतः हे शरीर! जैसा तुमने किया है, उसीके अनुसार अब तुम अपना निस्तार करो।
उस सौरिपुरमें कामरूपधारी इच्छानुसार स्थितिशील एवं गतिशील राजा राज्य करता है। उसका दर्शनमात्र करनेसे जीव भयसे काँप उठता है और अपने अनिष्टकी शंकासे ग्रस्त होकर त्रिपक्षमें पुत्रादिक स्वजनोंके द्वारा पृथ्वीपर दिये गये जलयुक्त पिण्डको खाकर आगे बढ़ता है। वहाँसे वह आगे बढ़ता हुआ मार्गमें यमदूतोंके खड्गप्रहारसे अत्यन्त पीड़ित होकर इस प्रकार प्रलाप करता है—
न नित्यदानं न गवाह्निकं कृतं
पुस्तं च दत्तं न हि वेदशास्त्रयोः।
पुराणदृष्टो न हि सेवितोऽध्वा
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१०३)
हे शरीर! मैंने जलादिका सदा दान नहीं दिया है, न तो नियमसे प्रतिदिन गायके लिये अपेक्षित गोग्रास आदि कृत्य किया है और न तो वेदशास्त्रकी पुस्तकका ही दान किया है। पुराणमें देखे हुए मार्ग (तीर्थयात्रा आदि)-का मैंने सेवन नहीं किया है, इसलिये जैसा तुमने किया है, उसीमें अपना निस्तार करो।
इसके बाद जीव 'नगेन्द्रनगर'में जाता है। वहाँपर वह अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा दूसरे महीनेमें दिये गये अन्नको खाकर आगेकी ओर प्रस्थान करता है। चलते हुए उसके ऊपर यमदूतोंद्वारा कृपाणकी मुठियोंसे प्रहार किये जानेपर वह इस प्रकार प्रलाप करता है—
पराधीनमभूत् सर्वं मम मूर्खशिरोमणेः॥
महता पुण्ययोगेन मानुष्यं लब्धवानहम्।
(५।१०५-१०६)
बहुत बड़े पुण्योंको करनेके पश्चात् मुझे मनुष्य-योनि प्राप्त हुई थी, किंतु मुझ मूर्खाधिराजका सब कुछ पराधीन हो गया अर्थात् मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी मैं कुछ सत्कर्म न कर सका।
इस प्रकार विलाप करता हुआ जीव तीसरे मासके पूरा होते ही गन्धर्वनगरमें पहुँच जाता है। तदनन्तर समर्पित किये गये तृतीय मासिक पिण्डको वहाँ खाकर वह पुनः आगेकी ओर चल देता है। मार्गमें यमदूत उसको कृपाणके अग्रभागसे मारते हैं, जिससे आहत होकर वह पुनः इस प्रकार विलाप करता है—
मया न दत्तं न हुतं हुताशने
तपो न तप्तं हिमशैलगाह्वरे।
न सेवितं गाङ्गमहो महाजलं
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१०८)
मैंने कोई दान नहीं दिया, अग्निमें आहुति नहीं डाली और न तो हिमालयकी गुफामें जाकर तप
| ४८० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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[बायाँ स्तम्भ]
ही किया है। अरे! मैं तो इतना नीच हूँ कि गङ्गाके परम पवित्र जलका भी सेवन नहीं किया, इसलिये हे शरीर! जैसा तुमने कर्म किया है, उसीके अनुसार अपना निस्तार करो।
हे पक्षिन्! चौथे मासमें जीव शैलागमपुर पहुँच जाता है। वहाँ उसके ऊपर निरन्तर पत्थरोंकी वर्षा होती है। पुत्रके द्वारा दिये गये चतुर्थ मासिक श्राद्धको प्राप्तकर वह जीव सरकते हुए चलता है किंतु पत्थरोंके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित होकर वह गिर पड़ता है और रोते हुए यह कहता है—
न ज्ञानमार्गो न च योगमार्गो
न कर्ममार्गो न च भक्तिमार्गः।
न साधुसङ्गात् किमपि श्रुतं मया
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१११)
मैंने न तो ज्ञानमार्गका सेवन किया न योगमार्गका, न कर्ममार्ग और न ही भक्तिमार्गको अपनाया और न साधु-सन्तोंका साथ करके उनसे कुछ हितैषी बातें ही सुनी हैं। अतः हे शरीर! तब जैसा तुमने किया है, उसीके अनुसार अपना निस्तार करो।
मृत्युके पाँचवें मासमें कुछ कम दिनोंमें वह 'क्रौंचपुर' पहुँच जाता है, उस समय पुत्रादिके द्वारा दिये गये ऊनषाण्मासिक श्राद्धके पिण्ड और जलका सेवन करके वहाँ एक घड़ी विश्राम करता है।
हे कश्यपपुत्र! इसके बाद छठे मासमें जीव 'क्रूरपुर'की ओर चल देता है। मार्गमें वह पृथ्वीपर दिये गये पञ्चम मासिक पिण्डको खाकर जलपान करता है। तत्पश्चात् वह क्रूरपुरकी ओर फिर बढ़ता है, किंतु यमदूत मार्गमें उसको पट्टिशों (अस्त्रविशेष)-द्वारा मारते हैं, जिससे वह गिर पड़ता है और इस प्रकार विलाप करता है—
हा मातर्हा पितर्भ्रातः
सुता हा हा मम स्त्रियः॥
[दायाँ स्तम्भ]
युष्माभिर्नोपदिष्टोऽह-
मवस्थां प्राप्त ईदृशीम्।
(५।११३-११४)
हे मेरे माता-पिता और भाई-बन्धु! हे मेरे पुत्र! हे मेरी स्त्रियो! आप लोगोंने मुझे कोई ऐसा उपदेश नहीं दिया, जिससे मैं उन दुष्कृत्योंसे बच सकता, जिनके कारण मेरी इस प्रकारकी अवस्था हो गयी।
इस प्रकारका विलाप करते हुए उस जीवसे यमदूत कहते हैं—अरे मूर्ख! तेरी कहाँ माता है, कहाँ पिता है, कहाँ स्त्री है, कहाँ पुत्र है और कहाँ मित्र है? तू अकेला ही चलते हुए इस मार्गमें अपने द्वारा किये गये दुष्कृत्योंके फलका उपभोग कर। हे मूर्ख! तू जान ले इस मार्गमें चलनेवाले लोगोंको दूसरेकी शक्तिका आश्रय करना व्यर्थ है। परलोकमें जानेके लिये पराये आश्रयकी आवश्यकता नहीं होती है। वहाँ (स्वकर्मार्जित) पुण्य ही साथ देता है। तुम्हारा तो उसी मार्गसे गमन निश्चित है, जिस मार्गमें किसी क्रय-विक्रयके द्वारा भी अपेक्षित सुख-साधनका संग्रह नहीं किया जा सकता।
इसके बाद वह जीव 'विचित्रनगर'के लिये चल देता है। रास्तेमें यमदूत उसको शूलके प्रहारसे आहत कर देते हैं, जिसके कारण वह दुखित होकर इस प्रकारका विलाप करता है—
कुत्र यामि न हि गामि जीवितं हा मृतस्य मरणं पुनर्न वै।
(५।११९)
हाय! मैं कहाँ चल रहा हूँ, मैं तो निश्चित ही अब जीवित नहीं रहना चाहता, फिर भी जीवित हूँ। मरे हुए प्राणीकी मृत्यु पुनः नहीं होती।
इस प्रकारका विलाप करता हुआ वह जीव यातना-शरीरको धारण करके 'विचित्रनगर'में जाता है। जहाँपर विचित्र नामका राजा राज्य करता है। वहाँपर वह षाण्मासिक पिण्डसे अपनी क्षुधाको
प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४८१
शान्त कर आगे आनेवाले नगरकी ओर चल देता है। मार्गमें यमदूत भालेसे प्रहार करते हैं, जिससे संत्रस्त होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
माता भ्राता पिता पुत्रः कोऽपि मे वर्तते न वा।
<p align="right">(५। १२२)</p>
यो मामुद्धरते पापं पतन्तं दुःखसागरे॥
मेरे माता-पिता, भाई, पुत्र कोई है अथवा नहीं है, जो इस दुःखके सागरमें गिरे हुए मुझ पापीका उद्धार कर सके।
ऐसा विलाप करता हुआ वह जीव मार्गमें चलता रहता है। उसी मार्गमें ‘वैतरणी’ नामकी एक नदी पड़ती है, जो सौ योजन चौड़ी है और रक्त तथा पीबसे भरी हुई है। जैसे ही मृतक उस नदीके तटपर पहुँचता है, वैसे ही वहाँपर नाववाले—मल्लाह आदि उसको देखकर यह कहते हैं कि यदि तुमने वैतरणी गौका दान दिया है तो इस नावपर सवार हो जाओ और सुखपूर्वक इस नदीको पार कर लो। जिसने वैतरणी नामक गौका दान दिया है, वही सुखपूर्वक इस नदीको पार कर सकता है। जिस व्यक्तिने वैतरणी गौका दान नहीं दिया है, उसको नाविक हाथ पकड़कर घसीटते हुए ले जाते हैं। तेज और नुकीली चोंचसे कौआ, बगुला तथा उलूक नामक पक्षी अपने प्रहारसे उसे अत्यन्त व्यथित करते हैं। हे पक्षिन्! अन्त समय आनेपर मनुष्योंके लिये वैतरणीका दान ही हितकारी है। यदि प्राणी अपने जीवनकालमें वैतरणी नामक गौका दान देता है तो वह गौ समस्त पापोंको विनष्ट कर देती है और उसको यमलोक न ले जाकर विष्णुलोकको पहुँचा देती है*।
सातवाँ मास आ जानेपर मृतक ‘बहापद’ नामक पुरमें आ जाता है। वहाँपर सप्तमासिक सोदक पिण्डका सेवन करके आगे बढ़ते हुए परिघके आघातसे पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
न दत्तं न हुतं तप्तं न स्नातं न कृतं हितम्।
<p align="right">(५। १२९)</p>
यादृशं चरितं कर्म मूढात्मन् भुंक्ष्व तादृशम्॥
हे शरीर! मैंने दान, आहुति, तप, तीर्थस्नान तथा परोपकार आदि सत्कृत्य जीवनपर्यन्त नहीं किया है। हे मूर्ख! अब जैसा तुमने कर्म किया है, वैसा ही भोग करो।
हे तार्क्ष्य! इसके बाद वह जीव आठवें मासमें ‘दुःखदपुर’ पहुँचता है। वहाँ स्वजनोंके द्वारा दिये गये अष्टमासिक पिण्ड और जलका सेवन करके ‘नानाक्रन्द’ नामक पुरकी ओर प्रस्थान कर देता है। मार्गमें चलते हुए मुसलाघातसे पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
क्व जायाचटुलैश्चाटुपटुभिर्वचनैर्मम॥
<p align="right">(५। १३१-१३२)</p>
भोजनं भल्लभाल्लीभिर्मुसलैश्च क्व मारणम्।
हाय! कहाँ चंचल नेत्रोंवाली पत्नीके चापलूसी भरे वचनोंके द्वारा किये गये मनोविनोदोंके बीच मेरा भोजन होता था और कहाँ भाला-बछियों तथा मुसलोंके द्वारा मुझे मारा जा रहा है!
इस प्रकार विलाप करता हुआ वह जीव नवें मासमें ‘नानाक्रन्दपुर’ पहुँच जाता है। तदनन्तर नवें मासमें पुत्रद्वारा दिये गये पिण्डका भोजन करके वह नाना प्रकारका विलाप करता है। तत्पश्चात् यमदूत दसवें मासमें उसको ‘सुतप्तभवन’ ले जाते हैं। मार्गमें वे उसको हलसे मारते-पीटते हैं, जिससे आहत होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
क्व सूनुपेशलकरैः पादसंवाहनं मम॥
<p align="right">(५। १३४-१३५)</p>
क्व दूतवज्रप्रतिमकरैर्मत्यदकर्षणम्।
हाय! कहाँ पुत्रोंके कोमल-कोमल हाथोंसे मेरे
* मनुजानां हितं दानमन्ते वैतरणी खग। दत्ता पापं दहेत् सर्वं मम लोकं तु सा नयेत्॥ (५। १२६-१२७)