गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०९- ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग
| ४२६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्त्रांशुहरिक्रम।
सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत॥
सहस्ररुद्रसंजप्य सहस्राक्षनिरीक्षण।
सहस्रजन्ममथन सहस्रबन्धमोचन॥
सहस्रवायुवेगाक्ष सहस्त्राज्ञकृपाकर।
(२३१। १२-१६ १/२)
हे समस्त संसारके स्वामी ! हे नृसिंहरूपधारिन् ! हे दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले ! शुक्तियोंके समान चमकीले नाखूनोंसे सुशोभित देव ! आपको नमस्कार है। हे नखमण्डलकी कान्तिसे मिश्रित सुवर्णके समान देदीप्यमान शरीरवाले ! हे जगद्वन्द्य ! हे शोभासम्पन्न भगवान् पद्मनाभ ! प्रलयकालीन मेघके सदृश गर्जना करनेवाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रभासम्पन्न देव ! आपको नमन है। दुष्ट पापियोंको हजारों यमराजके समान भयभीत करनेवाले ! हजारों इन्द्रकी शक्ति अपनेमें संनिहित रखनेवाले ! हजारों कुबेरके सदृश धनसम्पन्न ! हजारों चरणसे युक्त हे देव ! आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रके समान शीतल कान्तिवाले ! हजारों सूर्यके सदृश पराक्रमशाली ! हजारों रुद्रकी भाँति तेजस्वी ! हजारों ब्रह्मासे स्तुत्य हे देव ! आपको मेरा नमन है। हजारों रुद्र देवताओंके द्वारा मन्त्ररूपमें जप करने योग्य महामहिम ! इन्द्रके हजारों नेत्रोंसे देखे जानेवाले ! हजारों जन्मके पाप-पुण्योंका मन्थन करनेवाले ! संसारके हजारों जीवोंका बन्धन काटकर उन्हें मुक्त करनेवाले ! हजारों वायुदेवोंके समान वेगवान् और हजारों मूर्ख प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हे दयानिधान ! आपको मेरा नमस्कार है।
इस प्रकार नृसिंहरूपधारी देवदेवेश्वर भगवान् हरिकी स्तुति करके विनम्रतापूर्वक शिवने पुनः उनसे कहा—
हे देवदेवेश्वर ! अन्धकासुरका विनाश करनेके लिये जिन मातृकाओंकी सृष्टि मैंने की थी, वे तो मेरे ही वचनकी अवहेलना करके संसारकी विविध प्रजाओंका भक्षण कर रही हैं। मातृकाओंकी सृष्टि करके तो अब स्वयं मैं इनका संहार करनेमें असमर्थ हूँ। पहले इनकी सृष्टि की, अब कैसे इनका विनाश करूँ ? यह मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।
रुद्रके ऐसा कहनेपर नृसिंहरूपधारी भगवान् हरिने उसी समय अपनी जिह्वाके अग्रभागसे हजारों देवियोंको उत्पन्न करके उन्हींके द्वारा देवता, असुर और मनुष्य आदिका संहार करनेवाली क्रुद्ध मातृकाओंका विनाश कर संसारका कल्याण किया। तदनन्तर वे हरि अन्तर्धान हो गये।
जो मनुष्य नियमपूर्वक इस नारसिंहस्तोत्रका जितेन्द्रिय होकर पाठ करता है, निश्चित ही भगवान् हरि उसके समस्त मनोरथको वैसे ही पूर्ण करते हैं जैसे उन्होंने शिवके मनोरथको पूर्ण किया था।
मध्याह्नकालीन प्रचण्ड सूर्यके समान तेजस्वी नेत्रोंवाले, श्वेत वर्णके कमलमें स्थित, प्रज्वलित अग्निके सदृश भयंकर, अनादि, मध्य और अन्तसे रहित पुराणपुरुष, परात्पर, जगदाधार भगवान् नृसिंहका ध्यान करना चाहिये—
ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं
सिताम्बुजातं ज्वलिताग्निवक्त्रम्।
अनादिमध्यान्तमजं पुराणं
परात्परेशं जगतां निधानम्॥
(२३१। २३)
जो मनुष्य इस स्तोत्रका निरन्तर जप करता है, उसके दुःखसमूहको श्रीनृसिंह उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जिस प्रकार अंशुमाली सूर्य कुहरेकी राशिको अपने सामनेसे हटा देते हैं। जब साधक कल्याणकारी मातृवर्गसे युक्त नृसिंहदेवकी मूर्तिका निर्माण करके उनकी पूजा करता है, तब वह सदैव उन परात्परदेवके समीपमें ही रहता है। त्रिपुरारि शिवने भी तो उन्हीं देवदेवेश्वर नृसिंहमूर्ति भगवान् हरिकी पूजा की थी। उन्हीं देवको प्रसन्न करके श्रीशिवजीने वर प्राप्त किया और मातृकाओंसे संसारकी रक्षा की। (अध्याय २३१)
काण्ड ] कुलामृतस्तोत्र ४२७
कुलामृतस्तोत्र
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं उस कुलामृत नामक स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिसका वर्णन देवर्षि नारदके पूछनेपर शिवने किया था। उसे आप सुनें।
नारदजीने कहा—हे त्रिपुरान्तक भगवन्! जो दुर्मतिपूर्ण मनुष्य संसारमें काम-क्रोध और शुभाशुभ द्वन्द्वोंसे तथा शब्दादि विषयोंसे बँधकर सदासे पीड़ित हो रहे हैं, उनकी जन्म-मृत्युरूपी संसार-सागरसे जिस उपायद्वारा क्षणमात्रमें विमुक्ति हो जाय, उसको हम आपसे सुनना चाहते हैं।
इसपर भगवान् शंकर बोले—हे ऋषिश्रेष्ठ! भव-बन्धनको नष्ट करनेवाले और दुःखका विनाश करनेवाले परम गोपनीय रहस्यको मैं कहता हूँ, सुनो—तिनकेसे लेकर ब्रह्मातक चार प्रकारकी चराचर सृष्टि इस जगत्में जिन प्रभुकी मायासे अज्ञानके वशीभूत होकर सदैव सोती रहती है, उन विष्णुकी कृपासे यदि कोई जग जाता है तो वही संसारसे पार होता है। यह संसार देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुस्तर है। भोग और ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त तथा तत्त्वज्ञानसे पराङ्मुख, स्त्री, पुत्र और कुटुम्बियोंके व्यामोहमें भ्रमित होकर सभी प्राणी नाना प्रकारके दुःख झेलते हैं। इस व्यामोहमें फँसे हुए सभी जीवोंकी वैसी ही गति होती है, जैसी गति समुद्रमें स्नान करनेके लिये आये हुए वृद्ध जंगली हाथियोंकी होती है। जो मनुष्य हरिकीर्तन करनेके समय अपने मुखको बंद रखता है अर्थात् हरिकीर्तनसे पराङ्मुख रहता है, वह कोशमें स्थित कीड़ेके समान होता है। उसकी मुक्ति तो करोड़ों जन्म लेनेपर भी सम्भव नहीं है। अतः हे नारद! प्रसन्न-चित्त होकर सदैव देवदेवेश अव्यय भगवान् विष्णुकी प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् आराधना करनी चाहिये।
जो विश्वरूप, अनादि, अनन्त, अजन्मा तथा हृदयमें स्थित, अविचल, सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। शरीररहित, विधाता, सर्वज्ञानसम्पन्न, मनके रमणके अनन्य आश्रय, अचल, सर्वत्र व्याप्त भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मुक्त हो जाता है। निर्विकल्प (निर्विशेष), निराभास, निष्प्रपञ्च तथा निर्दोष, वासुदेव, परम गुरु भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे मनुष्य मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। सर्वात्मक एवं प्राणिमात्रके ज्ञानके एकमात्र प्रतिनिधि, शुभ, एकाक्षर (एक अक्षर 'अ' मात्रसे बोध्य) विष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। वाक्यातीत (किसी भी वाक्यसे अवर्णनीय), तीनों कालोंको जाननेवाले, लोकसाक्षी, विश्वेश्वर तथा सभीसे श्रेष्ठ विष्णुका सदा ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। ब्रह्मा आदि देव, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, चारण एवं योगियोंके द्वारा सदा सेवित श्रीविष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले सभी लोगोंको वरद श्रीविष्णुकी इसी प्रकार सदा स्तुति करनी चाहिये। यदि कोई भी संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहता है तो उसे समाहितचित्त होकर अनन्त, अव्यय, देवाधिदेव, अनन्त ब्रह्माण्डमें सर्वोच्च देवके रूपमें सुप्रतिष्ठित, समस्त जगत्के नियन्ता, अज श्रीविष्णुका सदा ध्यान करना चाहिये।*
* यस्तु विश्वमनाद्यन्तमजमात्मनि संस्थितम्। सर्वज्ञमचलं विष्णुं सदा ध्यायेत् स मुच्यते॥
देवं गर्भोचितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते। अशरीरं विधातारं सर्वज्ञानमनोरतिम्।
अचलं सर्वगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥
निर्विकल्पं निराभासं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। वासुदेवं गुरुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥
सर्वात्मकं च वै यावदात्मचैतन्यरूपकम्। शुभमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
| ४२८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सूतजीने कहा— प्राचीन कालमें देवर्षि नारदके द्वारा पूछनेपर वृषभध्वज शिवने नारदसे श्रीविष्णुका जैसा वर्णन किया था वैसा मैंने आपसे कर दिया है। हे तात! निरन्तर उन अक्षय, निष्कल, सनातन, अव्यय, ब्रह्मस्वरूप विष्णुका ध्यान करते हुए आप निश्चित ही उनके शाश्वत पदको प्राप्त करेंगे। हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको जो फल प्राप्त होता है, वह एकाग्रचित्त होकर विष्णुका क्षणमात्र ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले फलके सोलहवें भागकी भी समानता करनेमें समर्थ नहीं है।
भगवान् शिवसे विष्णुके इस माहात्म्यको सुनकर सिद्ध देवर्षि नारदने उनकी सम्यक् आराधना करते हुए परम पदको प्राप्त किया। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक नित्य इस स्तुतिका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्ममें किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं। महादेवके द्वारा कही गयी यह स्तुति बड़ी दिव्य है। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस स्तुतिका नित्य पाठ करता है, वह अमृतत्त्व अर्थात् परम वैष्णव पदको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय २३२)
मृत्य्राष्टकस्तोत्र*
सूतजीने कहा— हे शौनक! अब मैं मार्कण्डेयमुनिके द्वारा कहे गये स्तोत्रको बतलाता हूँ जो इस प्रकार है—
दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
शङ्खचक्रधरं देवं व्यक्तरूपिणमव्ययम्।
अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
वराहं वामनं विष्णुं नारसिंहं जनार्दनम्।
माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
पुरुषं पुष्करक्षेत्रबीजं पुण्यं जगत्पतिम्।
लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।
महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
भूतात्मानं महात्मानं यज्ञयोनिमयोनिजम्।
विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः।
अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैः प्रपीडितः॥
इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता।
प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्ति दुर्लभम्॥
(२३३।१–८)
मैं भगवान् दामोदरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं शंखचक्रधारी, व्यक्त, अव्यय, अधोक्षजकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं वराह, वामन, विष्णु, नृसिंह, जनार्दन, माधवके शरणागत हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं पुराणपुरुष, पुष्करक्षेत्रके (मूलतत्त्व) बीजभूत, (मूल पुरुष) महापुण्य, जगत्पति, लोकनाथकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं सहस्र सिरवाले, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, महायोगेश्वरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैंने प्राणियोंमें 'आत्मा' स्वरूपसे विद्यमान रहनेवाले, महात्मा, यज्ञयोनि, अयोनिज, विश्वरूप भगवान्की शरण ग्रहण कर ली है, अब मृत्यु मेरा क्या करेगी? इस प्रकार उन महात्मा
वाक्यातीतं त्रिकालज्ञं विश्वेशं लोकसाक्षिणम्। सर्वस्मादुत्तमं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः। योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
संसारबन्धनान्मुक्तिमिच्छँल्लोको हृाशेषतः। स्तुत्वैवं वरदं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
संसारबन्धनात् कोऽपि मुक्तिमिच्छन् समाहितः। अनन्तमव्ययं देवं विष्णुं विश्वप्रतिष्ठितम्।
विश्वेश्वरमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
* मृत्युका निवारक आठ श्लोकोंका स्तोत्र।
(२३२।११–१८)