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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२०५- नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा

काण्ड ] भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा ४१७


मन्त्रका जप करनेवाले हजार जपकर्ताओंकी अपेक्षा सभी वेदान्तदर्शनों, शास्त्रोंमें पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ है। सर्ववेदान्तनिष्णात करोड़ों विद्वानोंकी अपेक्षा विष्णुभक्त श्रेष्ठ है। जो लोग भगवान् विष्णुमें ऐकान्तिक भक्ति रखते हैं, वे सशरीर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाते हैं। श्रीविष्णुभक्तिको ही परम पुरुषार्थ माननेवाले एकान्ती भक्त हैं। इनका चित्त सर्वात्मना भागवत होता है। ऐसे परम भागवत श्रीविष्णुके ही समान हो जाते हैं, किंबहुना, श्रीविष्णु ऐसे परम भागवत भक्तोंके परायण (सर्वथा अभिन्न) रहते हैं। ये परम भागवत भक्त देवदेव श्रीविष्णुके परम प्रिय लोगोंसे भी अधिक सुप्रिय होते हैं। इनकी भक्ति अव्यभिचारिणी (नितान्त सुदृढ़) होती है। इसीलिये कठिन-से-कठिन आपत्कालमें भी यह भक्ति सुस्थिर रहती है। ये परम भागवत भक्त सदा यही प्रार्थना करते रहते हैं—'प्रभो! विष्णो! विषयोंमें जो अधिकाधिक स्थिर प्रीति होती है, वही आपका स्मरण करते हुए मुझमें सदा अविचल-भावसे बनी रहे।' यह विशेष रूपमें ध्यातव्य है कि प्रभु श्रीविष्णुकी ही भक्ति करनी चाहिये। यदि कोई अन्य किसीके प्रति दृढ़ भक्त है, सर्वेश्वर प्रभुका भक्त नहीं है तो वेदादि समस्त शास्त्रोंके अर्थका पारङ्गत होनेपर भी वह वास्तवमें पुरुषाधम ही है। जिसने वेद या अन्य शास्त्रोंका अध्ययन नहीं किया है, जो यज्ञादिक पुण्यकर्मोंको अपने जीवनमें सम्पन्न करनेसे वञ्चित रह गया है, वह भी यदि भगवान् विष्णुमें भक्ति रखता है तो (समझना चाहिये कि) उसने सब कुछ कर लिया है। जो लोग याज्ञिक हैं, अश्वमेध, राजसूयादिक मुख्य यज्ञोंको करनेवाले हैं और वेदोंके पारंगत हैं, वे मुनिसत्तम (मुनिश्रेष्ठ) भी उस परमगतिको प्राप्त नहीं कर पाते, जिस परमगतिको विष्णुभक्त अपनी भक्तिसे प्राप्त कर लेते हैं। इस संसारमें जो मनुष्य निर्दयी हैं, दुष्टात्मा हैं तथा दुराचारमें लगे रहते हैं, वे भी यदि भगवान् विष्णु नारायणकी भक्तिमें संलग्न हों तो उन्हें परमगतिकी प्राप्ति होती है। जब मनुष्यकी भक्ति भगवान् जनार्दनके प्रति अचल और दृढ़ हो जाती है, तब उसके लिये स्वर्गका सुख कितना महत्त्व रखता है! वह भक्ति ही उसके लिये मुक्ति है। हे शौनक! इस संसारके दुर्गम कर्ममार्गमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंके लिये भक्ति ही एकमात्र अवलम्ब है, जिसके करनेसे जनार्दन संतुष्ट होते हैं। जो मनुष्य देवाधिदेव विष्णुके दिव्य गुणोंको नहीं सुनता, वह बहरा है और सभी धर्मोंसे बहिष्कृत है। हरिनाम-संकीर्तनसे जिस व्यक्तिका शरीर रोमाञ्चित नहीं हुआ, उसका वह शरीर मृतकके समान है। हे द्विजश्रेष्ठ! जिसके अन्तःकरणमें विष्णुभक्ति विद्यमान रहती है, उसे यथाशीघ्र ही इस संसारके आवागमन-चक्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जिन मनुष्योंका मन हरिभक्तिमें रमा हुआ है, उनके सभी पापोंका विनाश सब प्रकारसे निश्चित है।

हाथमें पाश लेकर खड़े हुए अपने दूतको देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं कि हे दूत! तुम उन लोगोंको छोड़ देना जो मधुसूदन विष्णुके भक्त हैं। मैं तो अन्य दुराचारी और पापियोंका स्वामी हूँ, वैष्णवोंके स्वामी स्वयं हरि हैं। श्रीविष्णुने स्वयं कहा है कि यदि दुराचारी व्यक्ति भी मुझमें अनन्य भक्ति रखता है तो वह साधु ही है; क्योंकि उसने भक्तिका निश्चय कर लिया है कि श्रीविष्णुकी भक्तिके समान अन्य कुछ भी नहीं है। निश्चयपूर्वक भगवान्‌की भक्तिमें अनन्य भावसे लगा हुआ व्यक्ति तुरंत धर्मात्मा हो जाता है और उसको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है। हे द्विजश्रेष्ठ! आप ऐसा निश्चित ही जान लें कि विष्णुभक्तका कभी विनाश नहीं होता। समस्त संसारके मूल कारण भगवान् हरिमें जिस मनुष्यकी भक्ति स्थिर रहती है, उसके लिये धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गका कोई महत्त्व नहीं है; क्योंकि परम सुखरूप मुक्ति ही उसके हाथमें सदा रहती है। यह जो हरिकी त्रिगुणात्मिका दैवी माया है, उसको वे लोग पार करते हैं जो हरिकी शरणमें

४१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


जाते हैं। जिनकी बुद्धिमें भगवान् हरि निवास करते हैं, उनके लिये यज्ञाराधन आदिसे क्या लाभ? भक्तिसे ही नारायणकी आराधना होती है। भक्तिके अतिरिक्त उनकी आराधनाके लिये अन्य कोई साधन नहीं है। विभिन्न प्रकारके दान देनेसे, भलीभाँति पुष्प-समर्पणसे अथवा अनेक प्रकारके दिव्य अनुलेपनसे भी परमात्मा जनार्दन विष्णु उतना संतुष्ट नहीं होते जितना भक्तिसे।

इस संसाररूपी विषवृक्षके अमृतके समान दो फल हैं—पहला फल है—भगवान् केशवकी भक्ति और दूसरा फल है, उनके भक्तोंका सत्संग—

संसारविषवृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोपमे।
कदाचित्केशवे भक्तिस्तद्भक्तैर्वा समागमः॥
(२२७।३२)

सनातन पुरुष श्रीविष्णु एकमात्र भक्तिसे सुलभ हैं और यह भक्ति अनायास पत्र, पुष्प, फल अथवा जलका श्रद्धाके साथ श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पणमात्रसे प्राप्य है। ऐसी स्थितिमें अतिकष्टसाध्य मुक्तिके लिये क्यों प्रयत्न किया जाय?

‘हमारे कुलमें एक विष्णुभक्तने जन्म लिया है, यह हमारा इस संसार-सागरसे उद्धार करेगा।’ यह सोचकर पितृगण ताल ठोकते हैं और पितामह ताली बजा-बजाकर नृत्य करते हैं। अज्ञानी और पापात्मा शिशुपाल तथा सुयोधन आदि भी सुरश्रेष्ठ भगवान्‌की निन्दा-अपमानके ब्याजसे, भगवान्‌का स्मरणमात्र करके निष्पाप हो गये और मुक्तिको प्राप्त कर लिये। ऐसी स्थितिमें भगवान्‌में परमभक्ति रखनेवालोंके मुक्तिलाभमें कौन-सा संशय है? वह तो निस्सन्देह प्राप्त होगी ही—

अज्ञानिनः सुरवरे समधिक्षिपन्तो
यत्पापिनोऽपि शिशुपालसुयोधनाद्याः।
मुक्तिं गताः स्मरणमात्रविधूतपापाः
कः संशयः परमभक्तिमतां जनानाम्॥
(२२७।३५)

ध्यानयोगसे रहित होकर भी जो लोग श्रीविष्णुकी शरणमें आ जाते हैं, वे मृत्युका अतिक्रमण करके परम वैष्णवगतिको प्राप्त हो जाते हैं।

हे माधव! इस संसारमें प्राप्त होनेवाले सैकड़ों कष्टोंसे व्यथित और शरीरमें विद्यमान अनेक इन्द्रिय-छिद्ररूप अश्वोंके साथ विषयवासनाओंमें भटकते हुए इस मेरे मनरूपी घोड़ेको आप रोक लें और अपने चरणरूपी खूँटेमें सुदृढ़ भक्तिरूपी बन्धनसे बाँध दें, जिससे यह मेरा मन आपके चरणकमलका परित्याग कर अन्यत्र न जा सके—

भवोद्भवक्लेशशतैर्हतस्तथा
परिभ्रमन्निन्द्रियरन्ध्रकैर्हयैः।
नियम्यतां माधव मे मनोहय
स्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धने॥*
(२२७।३७)

विष्णु ही परमब्रह्म हैं, वे ही तीन भिन्न रूपोंमें वेद-शास्त्रादिके प्रतिपाद्य हैं। इस तथ्यको उनकी मायासे मोहितजन नहीं जानते और जो लोग इस मायासे परे रहते हैं तथा श्रीविष्णुमें अपनी अचल भक्ति रखते हैं, उन्हें यह भेद नहीं दिखायी देता। उनके लिये तो सब विष्णुमय ही होता है। (अध्याय २२७)


* यह श्लोक प्राचीन आप्तपरम्परामें इस प्रकार प्रसिद्ध है—
भवोद्भवक्लेशकशाहताहतः परिभ्रमन्नैन्द्रियकापथान्तरे। निगृह्यतां माधव मे मनोहयस्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धनैः॥
इसका अर्थ है—‘हे माधव! मेरा मनरूपी अश्व संसारमें उत्पन्न क्लेशरूपी सैकड़ों कोड़ोंसे आहत होकर ऐन्द्रिय (इन्द्रियसम्बन्धी) अनेक कापथ (कुत्सित मार्गों)-में भटक रहा है। कृपया आप अपने भक्तिरूप दृढ़ बन्धनोंसे अपने चरणरूपी शङ्कुमें इसे बाँधकर निगृहीत कर लें।’
[काशीके प्रसिद्ध परम आस्तिक प्रौढ विद्वान् श्रीरामयशजी त्रिपाठी (महाशयजी) इसी रूपमें इस श्लोकका प्रतिदिन प्रातः पाठ करते थे और कहा करते थे कि यह गरुडपुराणका श्लोक है। विशेषकर वर्तमान कलिकालमें इस श्लोकका पाठ भगवान्‌की भक्ति प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है। यह तथ्य महाशयजीके शिष्य स्व० श्री पं० बालचन्द्र दीक्षितजीसे ज्ञात हुआ है।]