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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१९१- संध्याविधि

३८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

व्यवहारमें अर्थका महत्त्व है। जैसे नदियोंके मूल पर्वत हैं, वैसे ही समस्त कार्योंका मूल अर्थ है; इसीलिये अर्थको उत्पन्न करना एवं बढ़ाना आवश्यक होता है। अर्थ उसे ही कहते हैं, जो हमारे सभी कार्योंकी सम्पन्नतामें अनिवार्यरूपसे उपयोगी हो। इसी दृष्टिसे सभी रत्नोंकी निधि पृथ्वी, धान्य, पशु, स्त्रियाँ आदि अर्थ माने जाते हैं। इस तरह अर्थका महत्त्व होनेपर भी इसके अर्जनमें संयम आवश्यक है; अतएव विशेषकर ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये अर्थार्जन करते समय यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि आपत्तिकाल नहीं है तो किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम-से-कम द्रोह करना पड़े।

धन तीन प्रकारका माना गया है—शुक्ल, शबल (मिश्रित) और कृष्ण। उस धनके सात विभाग हैं। सभी वर्णोंको प्राप्त होनेवाला धन तीन प्रकारका होता है—१-दायभागके अनुसार वंशपरम्परासे यथाधिकार प्राप्त धन, २-प्रेमके कारण किसीके द्वारा दिया गया धन और ३-यथाविधि विवाहित पत्नीके साथ प्राप्त धन। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये तीन प्रकारके विशेष धन हैं— याजन (यज्ञ करानेसे प्राप्त), अध्यापनसे प्राप्त तथा विशुद्ध प्रतिग्रह (सत्पात्रसे लिया गया दान)। क्षत्रिय वर्णका विशेष धन भी तीन प्रकारका कहा गया है—करसे प्राप्त धन उसका पहला धन है, दूसरा धन दण्डद्वारा प्राप्त तथा तीसरा धन वह है जो विजयद्वारा प्राप्त हो। वैश्यका भी तीन प्रकारका विशेष धन है—खेतीसे प्राप्त, गोपालनसे प्राप्त तथा व्यापारसे प्राप्त। शूद्रका विशेष धन एक ही प्रकारका है, जो उपर्युक्त वर्णोंकी कृपासे उसको प्राप्त होता है। आपत्तिकालमें ब्राह्मण एवं क्षत्रिय स्वयं ब्याजसे, खेतीसे तथा व्यापारसे धन अर्जित कर सकते हैं, आपत्तिकालमें ऐसा करनेपर पाप नहीं होता है।

ऋषियोंके द्वारा जीवनयापनके लिये बहुत-से उपाय बताये गये हैं, उनमें कुसीद (ब्याज) सभी वर्णोंके लिये बताये गये विशेष उपायोंकी अपेक्षा अधिक है। अनावृष्टि, राजभय तथा चूहा आदि जीव-जन्तुओंके उपद्रवोंसे कृषि आदिमें बाधा आ जाती है, किंतु कुसीद-वृत्तिमें यह बाधा नहीं आती। शुक्लपक्ष हो, कृष्णपक्ष हो, रात्रि हो, दिन हो, गर्मी हो, वर्षा अथवा शीत हो—सभी दशाओंमें कुसीदसे होनेवाली धनवृद्धि रुकती नहीं है। अर्थात् सूदपर दिया गया धन बढ़ता ही रहता है। नाना प्रकारके व्यापारिक कार्योंमें संलग्न वणिक्-जनोंकी जो धनकी अभिवृद्धि दूसरे देशमें जानेसे होती है, वही अभिवृद्धि कुसीद-वृत्ति करनेसे घरमें बैठे-ही-बैठे प्राप्त हो जाती है।

शास्त्रसम्मत विधिसे अर्जित धनके लाभांशसे सभी लोगोंको पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। ये संतुष्ट होकर धन-अर्जनमें अज्ञानवश हुए दोषको निःसंदेह शान्त कर देते हैं। जो वणिक् ब्याजके द्वारा (धनार्जनके लिये) वस्त्र, गौ तथा स्वर्णादि देता है और जो किसान अन्न, पेय पदार्थ, सवारी, शय्या तथा आसन आदि (ब्याज-वृत्तिमें) देता है, वह (उपार्जित धनका) बीसवाँ भाग और पशु-स्वर्णादिका १००वाँ भाग राजाको देकर शेष बचे हुए धनके चतुर्थांशसे जौ (यव) आदि विभिन्न वस्तुओंका सञ्चय करे। दो-चौथाई अर्थात् आधे धनका उपयोग अपने भरण-पोषण तथा नित्य-नैमित्तिक कार्यके लिये होना चाहिये। जो एक-चौथाई धन शेष बचे, उसका उपयोग मूलधनकी वृद्धिमें करना चाहिये।

विद्या, शिल्प, वेतन, सेवा, गोरक्षा, व्यापार, कृषि, वृत्ति*, भिक्षा और ब्याज—ये दस जीवनयापनके


* वृत्ति—सहायताके रूपमें प्रतिमास दी जानेवाली धनराशि।

काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८७

साधन हैं। ब्राह्मणको सत्पात्र व्यक्तिसे दानरूपमें प्राप्त धनसे अपना निर्वाह करना चाहिये। क्षत्रिय वर्ण अपने शस्त्रास्त्रोंसे धनार्जन करे। वैश्य वर्ण न्यायोचित ढंगसे धनसंग्रह कर अपना कार्य पूर्ण करे और शूद्र सेवा-भावसे धन अर्जितकर अपने सभी कार्योंको सम्पन्न करे। प्रचुर जलराशिसे परिपूर्ण नदी, शाक, मृत्तिका, समिधा, कुश, पलाश, केला आदिके पत्र, अग्निदेवकी आराधनाके उपकरण और ब्रह्मघोष (स्वाध्याय)—ये ब्राह्मणोंके श्रेष्ठतम धन हैं। यदि अयाचित (स्वतःप्राप्त) धनको ब्राह्मण स्वीकार करे तो दोष नहीं है। देवताओोंने ऐसे धनको अमृतके समान कहा है। अतः बिना याचना किये ही आये धनका परित्याग ब्राह्मणको नहीं करना चाहिये।

गुरुके धनका उद्धार करनेकी इच्छासे देवता और अतिथिकी पूजा करते हुए सभीसे प्रतिग्रह लेना चाहिये, पर उसका उपयोग अपनी तुष्टिके लिये नहीं करना चाहिये। साधुसे अथवा असाधुसे भी केवल उसके कल्याणके लिये प्रतिग्रह लेना चाहिये। यदि प्रतिग्रहीता ब्राह्मण (आचारहीन) कर्मनिष्ठ है तो अल्प दोष होगा। यदि निर्गुण है तो दोषमें डूब जायगा। इस प्रकार तस्करवृत्ति (अपने पुण्यको क्षीण करनेवाली वृत्ति)—से अपना भरण करनेके बाद उत्तम द्विजको अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये। दिनके चौथे भागमें मिट्टी, तिल, पुष्प तथा कुशादि सामग्री लाकर प्रकृतिप्रदत्त जलमें स्नान करना चाहिये।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग, मलापकर्षण, मार्जन, आचमन और अवगाहन—ये आठ प्रकारके स्नान बताये गये हैं। बिना स्नान किया पुरुष जप, अग्नि और हवन आदि करनेका अधिकारी नहीं है। प्रातःस्नान पूजा-पाठ आदि धार्मिक कृत्यके लिये करना चाहिये। इसीको नित्य-स्नान कहा गया है। चाण्डाल, शव, विष्ठा तथा रजस्वला आदिका स्पर्श करनेके पश्चात् जो स्नान किया जाता है, वह नैमित्तिक-स्नान कहलाता है। ज्योतिषशास्त्रके अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रोंमें जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, उसे काम्य-स्नान कहते हैं। निष्काम व्यक्तिको इस प्रकारका स्नान नहीं करना चाहिये। जप-होमादिक कृत्योंको सम्पन्न करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर अथवा अन्य अनेक पवित्र कृत्य, देवता तथा अतिथि आदिका पूजन करनेकी इच्छासे जो स्नान किया जाता है, उसको क्रियाङ्ग-स्नानके नामसे अभिहित किया गया है। शारीरिक मलको दूर करनेके लिये सरोवर, देवकुण्ड, तीर्थ और नदियोंमें जो स्नान किया जाता है, वह मलापकर्षण-स्नान है। सामान्य जलसे स्नान करनेपर केवल शरीरकी शुद्धि होती है। तीर्थमें स्नान करनेपर विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मज्जन (स्नान)—के लिये विहित मन्त्रोंसे मार्जन करनेसे मनुष्यका पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। नित्य, नैमित्तिक, क्रियाङ्ग तथा मलापकर्षण नामक जो स्नान बताये गये हैं, उन स्नानोंको तीर्थका अभाव होनेपर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकारसे प्राप्त कृत्रिम जलसे सम्पन्न कर लेना चाहिये।

भूमिसे निकला हुआ जल पवित्र होता है। इस जलकी अपेक्षा पर्वतसे निकलनेवाले झरनेका जल पवित्र होता है। इससे भी बढ़कर पवित्र जल सरोवरका है और उसकी अपेक्षा नदीका जल पवित्र है। नदीके जलकी अपेक्षा भी तीर्थका जल पवित्र है। इन सभी जलोंकी अपेक्षा गङ्गाका जल परम पवित्र है। गङ्गाका श्रेष्ठतम जल तो जीवनपर्यन्त किये गये प्राणीके सभी पापोंका विनाश अतिशीघ्र ही कर देता है। गया तथा कुरुक्षेत्र नामक तीर्थोंके जलसे भी बढ़कर पवित्र एवं पुण्यदायक जल गङ्गाजीका है—

३८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भूमिष्ठादुद्धृतं पुण्यं ततः प्रस्त्रवणोदकम् ॥
ततोऽपि सारसं पुण्यं तस्मान्नादेयमुच्यते ।
तीर्थतोयं ततः पुण्यं गाङ्गं पुण्यं तु सर्वतः ॥
गाङ्गं पयः पुनात्याशु पापमामरणान्तिकम् ।
गयायां च कुरुक्षेत्रे यत्तोयं समुपस्थितम् ॥
तस्मात्तु गाङ्गमपरं जानीयात्तोयमुत्तमम् ।
(२१३ । ११६-११९)

पुत्रजन्म, कतिपय विशिष्ट योग, मकर आदि राशियोंपर सूर्यकी संक्रान्ति तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण होनेपर ही रात्रिमें स्नान करना प्रशस्त है। अन्यथा रात्रिमें स्नान नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन उषःकालमें, संध्याकालमें और सूर्यका उदय होते ही जो स्नान किया जाता है, वह स्नान प्राजापत्य यज्ञकी भाँति महापातकका नाश करनेवाला है। बारह वर्षतक प्राजापत्य यज्ञ करनेपर जो फल प्राप्त होता है, वह फल श्रद्धापूर्वक एक वर्षतक प्रातःकाल स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति सूर्य और चन्द्र नामक श्रेष्ठ ग्रहोंके समान प्रचुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, वह माघ तथा फाल्गुन—इन दो मासोंमें नित्य प्रातःकाल स्नान करे। जो श्रद्धालु माघमास आनेपर प्रातःकाल स्नान करके हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह एक ही मासमें अपने महाघोर और अतिपापोंका विनाश कर देता है। माता, पिता, भ्राता, मित्र अथवा गुरु आदिको उद्देश्य बनाकर जो प्रातःकाल स्नान करता है, उसे शास्त्रनिर्दिष्ट पुण्यका द्वादश गुणित अधिक पुण्य प्राप्त होता है। भगवान् विष्णु एकादशी तिथिको आमलक (आँवला)-के समर्पण एवं दानसे विशेषरूपसे तुष्ट होते हैं। लक्ष्मीकी कामना करनेवाले मनुष्यको सर्वदा आमलकसे स्नान करना चाहिये।

सन्ताप, कीर्ति, अल्पायु, धन, मृत्यु, आरोग्य तथा सभी कामनाओंकी पूर्ति क्रमशः रविवार आदिको तैलका अभ्यङ्ग करनेसे प्राप्त होती है। अर्थात् रविवारको शरीरमें तैलका अभ्यङ्ग करनेपर सन्ताप, सोमवारको तैल-अभ्यङ्गसे कीर्ति, मंगलवारको तैल-अभ्यङ्गसे अल्पायु, बुधवारको तैल-अभ्यङ्गसे धन, बृहस्पतिवारको ऐसा करनेसे मृत्यु, शुक्रवारको तैल-अभ्यङ्गसे आरोग्य और शनिवारको तैल-अभ्यङ्ग करनेपर मनुष्यका सम्पूर्ण अभीष्ट पूर्ण होता है। उपवास करनेवाले व्रतीसे तथा नाईके द्वारा क्षौरकर्म करानेके पश्चात् मनुष्यसे तबतक ही लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं, जबतक वह तैलका स्पर्श नहीं करता है। अतः तैलस्पर्श करनेके पश्चात् मनुष्यको तत्काल स्नान कर लेना चाहिये। व्रतके दिन तो तैलस्पर्श नहीं ही करना चाहिये।

स्नान करनेके बाद मनुष्यको यथाविधान पितृगण, देवगण और मनुष्योंका तर्पण करना चाहिये। नाभिपर्यन्त जलमें स्थित होकर एकाग्र मनसे पितरोंका आवाहन करना चाहिये—

आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम् ॥

हे मेरे पितृगण! आप सब इस तीर्थस्थानपर आकर विराजमान हों और मेरे द्वारा दी जा रही जलाञ्जलिको स्वीकार करें।

इस प्रकार आवाहन करके आकाश और दक्षिण दिशामें स्थित पितृगणोंको तीन-तीन जलाञ्जलि प्रदान करे। यदि जलसे बाहर निकलकर तर्पण करना हो तो तर्पणकी विधि जाननेवाले लोगोंको सूखे और स्वच्छ वस्त्र पहनकर समूल कुशाओंपर तर्पण करना चाहिये। पात्र (बर्तन)-में तर्पण नहीं करना चाहिये।

तर्पण-कृत्यमें रक्षोगण प्रतिबन्ध न कर सकें, इसके लिये तर्पण आरम्भ करते समय बायें हाथमें जल लेकर नैर्ऋत्य कोणमें उसे छोड़ना चाहिये और जल छोड़ते समय निम्नलिखित मन्त्र बोलना चाहिये—

यदपां क्रूरमांसाबु यदमेध्यं तु किञ्चन ॥
अशान्तं मलिनं यच्च तत्सर्वमपगच्छतु ।
(२१३ । १३१-१३२)

कांड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८९

कूरमांसके कारण, अपवित्रताके कारण अथवा तर्पणके जलमें अज्ञानवश विद्यमान अशान्तिजनक किसी तत्त्व या मलिनताके कारण जो कुछ भी प्रतिबन्ध है, वह दूर हो जाय।

अन्तमें तर्पणका संक्षेप (उपसंहार) करते समय तीन जलाञ्जलि निम्नलिखित मन्त्रोंसे देनी चाहिये—

निषिद्धभक्षणाद्यत्तु पापाद्यच्च प्रतिग्रहात्॥
दुष्कृतं यच्च मे किञ्चिद्वाङ्मनःकायकर्मभिः।
पुनातु मे तदिन्द्रस्तु वरुणः सबृहस्पतिः॥
सविता च भगश्चैव मुनयः सनकादयः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यत्विति ब्रुवन्॥
(२१३। १३३-१३५)

निषिद्ध भक्षणसे, जन्मान्तरीय दुष्कर्मोंसे, प्रतिग्रह (दान) लेनेसे और इस जन्ममें शरीर, वाणी एवं कर्मसे जो निषिद्ध आचरण हो गये हैं, उनसे उत्पन्न पापोंके कारण मुझमें जो अपवित्रता है, उसे दूर करके बृहस्पति, इन्द्र तथा वरुण मुझे पवित्र करें। सूर्य, यम (देवताविशेष), सनकादि ऋषि और ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब (अति लघु कीट या तृण) समस्त संसार—ये सभी मेरे तर्पणसे तृप्त हों।

इस प्रकार पितृतर्पण करके संयमी व्यक्तिको ईर्ष्या, द्वेष आदिसे रहित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि अभीष्ट देवोंकी पूजा करनी चाहिये। विभिन्न देवतालिङ्गक ब्राह्म, वैष्णव, रौद्र, सावित्र एवं मैत्रावरुण-मन्त्रोंसे सभी देवताओंकी नमस्कारपूर्वक अर्चा करनी चाहिये। तदनन्तर पुनः नमस्कारपूर्वक अर्चित देवोंको पृथक्-पृथक् पुष्पाञ्जलियाँ देनी चाहिये। पुनः सर्वदेवमय भगवान् विष्णु और सूर्यकी पूजा करनेका विधान है। इस पूजामें जो अधिकारी मनुष्य पुरुषसूक्तसे भगवान् विष्णुको पुष्प तथा जल समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर विश्वकी पूजाको सम्पन्न कर लेता है। इन देवोंकी पूजा अन्य तान्त्रिक मन्त्रोंसे भी की जा सकती है। पूजामें सबसे पहले आराध्यदेव जनार्दनको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये और सुगन्धित पदार्थसे उनके विग्रहका विलेपन करना चाहिये। तत्पश्चात् उन्हें पुष्पाञ्जलि, धूप, उपहार और फलका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।

जलके मध्य स्नान, जलके द्वारा मार्जन, आचमन, जलमें तीर्थका अभिमन्त्रण तथा अघमर्षण-सूक्तके द्वारा मार्जन नित्य तीन बार करना चाहिये। महात्माओंको स्नानविधिके विषयमें यही अभीष्ट है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको मन्त्रसहित स्नान करना चाहिये। शूद्रवर्णको मौन होकर नमस्कारपूर्वक स्नान करना चाहिये। अध्यापन ब्रह्मयज्ञ, तर्पण पितृयज्ञ, होम देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ तथा अथितिका पूजन मनुष्ययज्ञ है। गौओंके गोष्ठमें दस गुना, अग्निशालामें सौ गुना, सिद्धक्षेत्र-तीर्थ तथा देवालयोंमें क्रमशः एक हजार गुना, एक लाख गुना और एक करोड़ गुना फल इन कर्मोंको करनेसे प्राप्त होता है। जब ये ही कर्म भगवान् विष्णुके सान्निध्यमें किये जाते हैं तो इनसे अनन्त गुना फलोंकी प्राप्ति होती है।

दिनका यथायोग्य पाँच विभाग करके पितृगण, देवगणकी अर्चा और मानवके कार्य करने चाहिये। जो मनुष्य अन्नदान करके सर्वप्रथम ब्राह्मणको भोजन कराकर अपने मित्रजनोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह देहत्यागके बाद स्वर्गलोकके सुखका अधिकारी बन जाता है।

मनुष्यको सर्वप्रथम मधुर, मध्यभागमें नमकीन और अम्लसे युक्त पदार्थ, उसके बाद कडुवा, तीता तथा कसैला भोजन करना चाहिये। भोजनके अनन्तर दुग्धपान करना चाहिये। रातमें शाक तथा कन्दादिक पदार्थोंको अधिक नहीं खाना चाहिये। एक ही प्रकारके रसमें आसक्ति अच्छी नहीं होती है।

३९०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ब्राह्मणका अन्न अमृतके समान, क्षत्रियका अन्न दुग्धके समान, वैश्यका अन्न अन्नके समान और शूद्रका अन्न रक्तके समान होता है। जो अमावास्याका व्रत एक वर्षतक करता है, उसके यहाँ ऐश्वर्य और लक्ष्मीका (अविचल्रूपसे) निवास होता है। द्विजातिके उदरभागमें गार्हपत्याग्नि, पृष्ठभागमें दक्षिणाग्नि, मुखमें आहवनीयाग्नि, पूर्वमें सत्याग्नि और मस्तकमें सर्वाग्निका वास रहता है। जो इन पञ्चाग्नियोंको जान लेता है उसको आहिताग्नि कहा जाता है। शरीरको जल, चन्द्र तथा विविध प्रकारके अन्नके द्वारा साध्य माना गया है। इस शरीरका उपभोग करनेवाले प्राण अग्नि और सूर्य हैं। ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन रूपोंमें भी अवस्थित रहकर एक ही हैं।

(भोजनके समय यह भावना करनी चाहिये कि) पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायुतत्त्वसे युक्त इस मेरे स्थूल शरीरकी पुष्टिके लिये प्रयुक्त अन्न शक्ति-सञ्चयके लिये होता है। शरीरमें पहुँचकर जब यह अन्न भूमि, जल, अग्नि और वायुतत्त्वके रूपमें परिणत हो जाता है तो अप्रतिहत—असीम सुखकी अनुभूति होती है।

इसके (भोजनके) बाद मनुष्यको अपने हाथसे मुख आदि स्वच्छकर ताम्बूल अर्थात् पानका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर इतिहासका श्रवण करना चाहिये। इतिहास और पुराणादिकी कथाओंके द्वारा मनुष्यको दिनके छठे और सातवें भागका समय व्यतीत करना चाहिये। तत्पश्चात् स्नान करके पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके सायंकालीन संध्योपासन करना चाहिये।

हे ब्राह्मणदेव ! मेरे द्वारा कहे गये इस विधानके अनुसार अपने कर्त्तव्योंका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य इस सदाचारके अध्यायका पाठ करता है अथवा अपने पुरोहित आदिके द्वारा इसका श्रवण करता है, वह निश्चित ही अपनी मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकको जाता है। हे द्विज ! इन सभी सदाचार एवं धर्मका पालन करनेवाला अधिकारी मनुष्य केशव (साक्षात् विष्णु) ही माना गया है।

(अध्याय २१३)


स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधिं

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं स्नानकी विधि कहता हूँ, क्योंकि सभी क्रियाएँ स्नानमूलक हैं अर्थात् स्नानके बिना कोई भी क्रिया सफल नहीं हो सकती। स्नानार्थी व्यक्तिको स्नानके पूर्व मिट्टी, गोमय, तिल, कुश, सुगन्धित पुष्प—ये सभी द्रव्य एकत्र कर लेना चाहिये। गन्ध आदि स्नानोपयोगी पदार्थोंको जलके समीप स्वच्छ स्थान—भूमिपर रखना चाहिये।

तदनन्तर विद्वान् व्यक्ति एकत्र किये हुए मिट्टी और गोमयको तीन भागोंमें विभक्त करके मिट्टी और जलके द्वारा दोनों पैर तथा दोनों हाथका प्रक्षालन करे। बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर शिखाबन्धनपूर्वक मौन होकर आचमन करे। 'ॐ उरुं हि राजा०'<sup>२</sup> इत्यादि मन्त्रोंसे दक्षिणभागमें जलको स्थापित करे। फिर 'ॐ ये ते शतं०'<sup>३</sup> इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करके उस जलका अभिमन्त्रण करे। 'ॐ सुमित्रिया न आप०'<sup>४</sup> इस मन्त्रसे


१-इस अध्यायमें मन्त्रोंके प्रतीकमात्र दिये गये हैं। जिज्ञासु विभिन्न मन्त्रसंहिताओंसे मन्त्रोंको जान लें।
२-ॐ उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थानमन्वेत वाउ। प्रतिधाता च वक्तारस्ताहृदयाविपश्वित्। नमोऽग्न्यरुणाया भिष्टुतोवरुणस्य पाशः। वरुणाय नमः॥ (२१४।६)
३-ॐ ये ते शतं वरुणये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥ (२१४।७)
४-ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु। दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयं द्विष्मः॥ (२१४।७)