गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८३- छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण)
| ३६४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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त्रिवृत्—ये सभी शब्द एक औषधिके वाचक हैं। सप्तला, यवतिक्ता, चर्मा और चर्मकसा—ये सभी नाम समान औषधिके माने गये हैं। अक्षिपीलुको शंखिनी, सुकुमारी और तिक्ताक्षी कहा जाता है। अपराजिता नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं गवाक्षी, अमृता, श्वेता, गिरिकर्णी तथा गवादिनी। काम्पिल्लको रक्ताङ्ग, गुण्डा और रोचनिका कहा जाता है। हेमक्षीरी या स्वर्णक्षीरी नामकी औषधिको पीता, गौरी तथा कालदुग्धिका नामसे स्वीकार किया गया है। गाङ्गेरुकी, नागबला, विशाला और इन्द्रवारुणी अर्थात् इन्द्रायण एक ही औषधिके वाचक हैं। रसांजन नामक औषधिके पर्याय हैं तार्क्ष्य, शैल, नीलवर्ण तथा अंजन। शाल्मली या सेमरवृक्षके निर्यासको मोचरसके* नामसे अभिहित किया जाता है। प्रत्यक्पुष्पीको खरी और अपामार्गको मयूरक कहा गया है। जंगली अडूसाका नाम है सिंहास्य वृषवासाक तथा आटरूष। जीवशाक नामक औषधिको जीवक और कर्बुरको शटी नामसे भी कहा गया है। कट्फलका नाम सोमवृक्ष तथा अग्निगन्धाका नाम सुगन्धिका भी है। सौंफको शताङ्ग और शतपुष्पा कहा जाता है। मिसिको मधुरिका माना गया है। पुष्करमूलको पुष्कर तथा पुष्कराह्वय नामसे भी स्वीकार करना चाहिये। यास नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं धन्वयास, दुष्पर्श और दुरालभा। वाकुची अर्थात् वकुची, सोमराजी और सोमवल्ली एक ही औषधिके नाम हैं। भँगरइयाको मार्कव, केशराज तथा भृंगराज कहा जाता है।
एडगज नामक औषधिको आयुर्वेद एवं वनस्पतियोंके विद्वान् चक्रमर्दक या चकवड़ कहते हैं। काकतुण्डी नामक औषधिके वाचक हैं सुरंगी, तगर, स्नायु, कलनाशा और वायसी। महाकालको बेल तथा तण्डुलीयको घनस्तन कहा जाता है। इक्ष्वाकुको तिक्ततुम्बी और तिक्तालापु कहा जाता है। धामार्गवको कोषातकी तथा यामिनी कहा जाता है। कृतभेद नामक इस कोषातकी औषधिका एक अन्य भेद है। देवताडक नामक वृक्षके पर्याय हैं जीमूतक तथा खुड्डक। गृध्रादना, गृध्रनखी, हिङ्गु और काकादनी शब्द हींगके वाचक माने जाते हैं। करवीर (कनेर)-का पर्यायवाची शब्द है अश्वारि तथा अश्ममारक।
सेंधानमकको सिन्धु, सैन्धव, सिन्धूथ तथा मणिमन्थ कहा जाता है। यवक्षार लवणका नाम है क्षार और यवाग्रज। सज्जी या छज्जी मिट्टीका नाम है सर्जिका एवं सर्जिकाक्षार। काशीशके नाम हैं पुष्पकाशीश, नेत्रभेषज, धातुकाशीश और काशी। यह पुष्प एवं धातुभेदसे दो प्रकारका है। पङ्कपर्पटी (गुजराती मिट्टी)-को सौराष्ट्री, मृत्तिकाक्षार तथा काक्षी कहा जाता है। स्वर्णमाक्षिका नामक मिट्टीके पर्याय हैं माक्षिक, ताप्य, ताप्युत्थ और ताप्यसम्भवा। मनःशिला या मैनसिलका नाम है शिला। नेपाली मनःशिलाको कुलटी कहा जाता है। हरितालके लिये आल अथवा मनस्ताल नाम प्रयुक्त होता है। गन्धक, गन्धपाषाण तथा रस पारद या पारा कहलाता है। ताँबेके वाचक हैं ताम्र, औदुम्बर, शुल्ब और म्लेच्छमुख। लोहेको अद्रिसार, अयस्, लोहक तथा तीक्ष्ण भी कहा जाता है।
मधु शब्दके पर्यायवाची हैं माक्षिक, मधु, क्षौद्र और पुष्परस। इसके दो उपभेद हैं—ज्येष्ठी मधु तथा उदकी मधु। काँजीको सुवीरक नामसे अभिहित किया गया है। शर्कराको सिता, सितोपला और मत्स्याण्डीके नामसे कहा जाता है।
* सेमलके गोंदको मोचरस कहते हैं।
काण्ड ] * औषधियोंके पर्यायवाची नाम * ३६५
त्रिसुगन्धि नामक औषधिका निर्माण दारुचीनी नामक वृक्षकी छाल, इलायची तथा तेजपत्ताको समान मात्रामें मिलानेपर होता है, इसे त्रिजातक कहा जाता है, उसमें नागकेशरका मिश्रण कर देनेपर वह चतुर्जातक कहलाता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागरके मिश्रित स्वरूपको पञ्चकोल और कोल कहा जाता है।
प्रियंगुको कंगुका (काकुन) तथा कोद्रव या कोदोको कोरदूषके नामसे जानना चाहिये। त्रिपुट्का नाम पुट है और कलापका लङ्कक नाम स्वीकार किया गया है। वेणु अर्थात् बाँसको सतीन तथा वर्तुल भी कहा जाता है।
पिचुक, पित्तल, अक्ष और विडालपदक शब्द तौल-परिमाणमें एक कर्ष (सोलह मासा)-के वाचक हैं। सुवर्ण तथा कवलग्रहका बराबर मान है। पलार्ध अर्थात् आधा पल, एक शुक्ति तथा आठ माषक भारमें समान है। पल,बिल्व और मुष्टिका परिमाण समान होता है। दो पलकी मात्राको प्रसुति अर्थात् एक पसर कहा गया है। अंजलि और कुडवका मान चार पलके बराबर होता है। आठ पलको अष्टमान कहा जाता है, उसे मान भी कहा गया है। चार कुडवका एक प्रस्थ (एक सेर) और चार प्रस्थका एक आढक अर्थात् एक अढैया होता है। इसीको एक काशपात्र कहा गया है। चार आढकका एक द्रोण होता है। एक सौ पलका एक तुला और बीस पलका एक भाग माना गया है। विद्वानोंने प्रस्थ आदिकी मात्रामें प्राप्त होनेवाले द्रव्योंका मान तो इस प्रकारसे कहा है, किंतु द्रव-पदार्थोंकी मात्राको उसका दुगुना स्वीकार किया गया है।
भद्रदारु, देवकाष्ठ तथा दारु देवदारुके वाचक हैं। कुष्ठको आमय और मांसीको नलदंश कहा गया है। शंख नामक औषधिका नाम शुक्तिनख है तथा व्याघ्र नामकी औषधि व्याघ्रनखी या व्याघ्रनख शब्दसे कही गयी है। गुग्गुल नामकी औषधिके वाचक पुर, पलङ्कष तथा महिषाक्ष शब्द हैं। रस गन्ध-रसका पर्यायवाची है, इसीको बोल भी कहा जाता है। सर्ज अर्थात् राल सर्जरसका बोधक है। प्रियङ्गु फलिनी, श्यामा, गौरी और कान्ता—इन नामोंसे अभिहित किया जाता है। करंज या कंजेका नाम नक्तमाल, पूतिक तथा चिरबिल्वक है। शिग्रु शोभाञ्जन तथा रोनमान नामसे प्रसिद्ध है। इसे सहिजन भी कहा जाता है। सिन्धुवार नामक औषधिके वाचक हैं—जया, जयन्ती, शरणी और निर्गुण्डी। मोरटा नामक औषधि पीलुपर्णी (मूर्वा) है तथा तुण्डीका नाम तुण्डिकेरी है।
मदन-वृक्षको गालव बोधा, घोटा और घोटी कहा जाता है। चतुरङ्गुल नामक औषधि सम्पाक तथा व्याधिघातक नामसे भी प्रसिद्ध है। आरग्वधका नाम राजवृक्ष और रैवत है। दन्तीको लोग काकेन्दु, तिक्ता, कण्टकी और विकङ्कत कहते हैं। निम्बको अरिष्ट कहा गया है तथा पटोलका एक नाम कोलका (परवल) है। वयस्थाका नाम विशल्या, छिन्ना और छिन्नरुहा है। गुडूचीके पर्यायवाची हैं—वशा, दन्ती तथा अमृता। किराततिक्तका नाम भूनिम्ब और काण्डतिक्त है।
सूतजीने कहा— हे शौनक ! ये सभी नाम वनमें उत्पन्न होनेवाली औषधियोंके हैं। इन्हीं वनस्पतियोंका वर्णन भगवान् श्रीहरिने शिवजीसे किया था। अब मैं कुमार अर्थात् भगवान् स्कन्दके द्वारा कहे गये व्याकरणशास्त्रको बतलाऊँगा, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें।
(अध्याय २०४)
३६६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
व्याकरण-निरूपण
कुमारने कहा— हे कात्यायन! अब मैं संक्षेपमें व्याकरणके विषयमें बतला रहा हूँ। यह व्याकरणसे सिद्ध शब्दोंके ज्ञानके लिये तथा बालकोंकी व्युत्पत्ति-प्रक्रिया बढ़ानेके लिये है।
सुबन्त और तिङन्त—ये दो प्रकारके पद होते हैं। सुप् प्रत्यय सात विभक्तियोंमें बँटे हैं। सु, औ, जस्—यह प्रथमा विभक्ति है। प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिकार्थमें, सम्बोधन-अर्थमें, लिङ्गादि-बोधक-अर्थमें तथा कर्मके उक्त होनेपर कर्मवाचक-पदसे और कर्ताके उक्त होनेपर कर्तृवाचक-पदसे होती है। धातु और प्रत्ययसे भिन्न अर्थवान् शब्दस्वरूपकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। अम्, औट्, शस्—यह द्वितीया विभक्ति है। द्वितीया विभक्ति कर्म-अर्थमें होती है। अन्तरा, अन्तरेण पदोंके योगमें भी द्वितीया विभक्ति होती है। टा, भ्याम्, भिस्—यह तृतीया विभक्ति है। तृतीया विभक्ति करण और कर्ता-अर्थमें होती है। क्रिया (फल)-की सिद्धिमें अत्यन्त उपकारक कारककी करण संज्ञा होती है। क्रियाके प्रधान आश्रयको कर्ता कहते हैं। ङे, भ्याम्, भ्यस्—यह चतुर्थी विभक्ति है। चतुर्थी विभक्ति सम्प्रदान कारकके अर्थमें होती है। रुच्यर्थक धातुके योगमें तृप्त होनेवालेकी, ण्यन्त धृ धातुके प्रयोगमें उत्तमर्णकी एवं दानके उद्देश्यकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। ङसि, भ्याम्, भ्यस्—यह पञ्चमी विभक्ति है। पञ्चमी विभक्ति अपादान कारकके अर्थमें होती है। जिससे पृथक् हुआ जाता है, जिससे लिया जाता है, जिसके समीपसे लिया जाता है या जो भयका हेतु होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है। ङस्, ओस् और आम्—यह षष्ठी विभक्ति है। यह विभक्ति मुख्यरूपसे स्व-स्वामिभाव-सम्बन्धमें होती है। वस्तुतः सम्बन्ध सामान्य षष्ठीका अर्थ है। [ इस सम्बन्धमें 'एकशतं षष्ठ्यर्थाः' (षष्ठी विभक्तिके सौ अर्थ होते हैं) यह भाष्य अनुसंधेय है।] ङि, ओस्, सुप्—यह सप्तमी विभक्ति है। सप्तमी विभक्ति अधिकरण-अर्थमें हुआ करती है। आधारकी अधिकरण संज्ञा होती है। आधार औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक-भेदसे तीन प्रकारका होता है। वारणार्थक धातुके योगमें ईप्सित और अनीप्सितकी भी अपादान संज्ञा होती है। वारणार्थक धातुके प्रयोगमें जो ईप्सित अभीष्ट हो उसकी अपादान संज्ञा होती है तथा अनीप्सित (अनीच्छित)-की कर्म संज्ञा होती है। कर्मप्रवचनीयसंज्ञक परि, अप्, आङ् के योगमें तथा इतर, ऋते (बिना) अन्य-दिक् (दिशा)-वाचक शब्दका योग होनेपर पञ्चमी विभक्ति होती है। प्रत्ययान्तके एन योगमें द्वितीया विभक्ति होती है। कर्मप्रवचनीय-संज्ञक पदोंके योगमें भी द्वितीया विभक्ति होती है। लक्षण-अर्थमें, इत्थम्भूत तथा आख्यान-अर्थमें और वीप्सा-अर्थमें प्रति, परि, अनुकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। हीन-अर्थमें अनुकी अधिक अर्थमें उप उपसर्गकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। अध्ववाचक-शब्दके कर्ममें और गत्यर्थक धातुके कर्ममें द्वितीया तथा चेष्टा-अर्थमें चतुर्थी विभक्ति होती है। दिवादिगणमें पठित मन् धातुके कर्ममें अनादरके तात्पर्यसे अप्राणिवाचक पदमें द्वितीया और चतुर्थी विभक्ति होती है।
नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट्का योग होनेपर तथा तादर्थ्यके योगमें चतुर्थी विभक्ति होती है। भाववाची तदर्थसे विहित तुमुन् प्रत्ययान्तसे चतुर्थी होती है।
सह शब्दसे युक्त और विकृत-अङ्गवाचक शब्दमें तृतीया विभक्ति होती है। कालार्थक तथा
काण्ड ] | व्याकरणसार | ३६७
भावार्थक शब्दोंमें सप्तमी विभक्तिके प्रयोगका विधान है, किंतु षष्ठी विभक्तिका भी प्रयोग इन अर्थोंमें किया जाता है। स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी, दायाद, प्रतिभू और प्रसूत—इन शब्दोंके योगमें षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति होती है। निर्धारण-अर्थमें षष्ठी तथा सप्तमी दोनों विभक्ति होती है। हेतुवाचक शब्दके प्रयोगमें हेतुद्योत्य होनेपर मात्र षष्ठी विभक्ति होती है।
स्मरणार्थक धातुके कर्ममें और प्रतियत्नार्थक कृ धातुके कर्ममें तथा शेषत्वकी विवक्षामें षष्ठी विभक्ति ही होती है। हिंसार्थक जास्, नि पूर्वक और प्र पूर्वक हन् आदि और नाट्, क्राथ् एवं पिष् धातुओंके कर्ममें शेषत्वकी विवक्षामें षष्ठी होती है तथा कृदन्त पदादिके योगमें कर्तृकर्मवाचक-पदसे षष्ठी होती है। निष्ठाप्रत्ययान्तके योगमें कर्तृकर्मवाचक-पदसे षष्ठी विभक्ति नहीं होती।
प्रातिपदिक नाम और नामधातु—इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है। भू आदि धातुओंसे लट् आदि दस लकार होते हैं, जिनके स्थानपर तिङ् प्रत्यय हुआ करते हैं। तिप्, तस्, झि प्रथमपुरुष है। सिप्, थस्, थ मध्यमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय हैं और मिप्, वस्, मस् उत्तमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय हैं। इन प्रत्ययोंकी परस्मैपद संज्ञा होती है। आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्यय त, आताम्, झ की प्रथमपुरुष संज्ञा तथा थास्, आथाम्, ध्वम् की मध्यमपुरुष संज्ञा और इट्, वहिङ्, महिङ् की उत्तमपुरुष संज्ञा होती है। ये परस्मैपद एवं आत्मनेपद प्रत्यय णिच् आदि प्रत्ययोंकी भाँति धातुसे विहित होते हैं।
युष्मद् और अस्मद्से अतिरिक्त क्रियाका कर्ता होनेपर धातुसे प्रथमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय होते हैं। कर्ताके रूपमें युष्मद् शब्दका प्रयोग होनेपर मध्यमपुरुष और कर्ताके रूपमें अस्मद् शब्दका प्रयोग होनेपर उत्तमपुरुष होता है। भू आदिकी धातु संज्ञा होती है। सन्, क्यच्, काम्यच् आदि प्रत्यय जिसके अन्तमें हों उनकी भी धातु संज्ञा होती है। लट् लकारका प्रयोग वर्तमान कालके लिये होता है तथा 'स्म'का योग हो जानेपर वही क्रिया भूतकालिक हो जाती है। लिट् भूतकाल (परोक्ष)-के लिये प्रयोज्य है। अनद्यतन भूतके अर्थमें लङ् लकार होता है। आज्ञा तथा आशीर्वादकी क्रियाके निमित्त लोट् आदि लकारोंका प्रयोग होता है। विधि आदि अर्थमें भी लोट्का प्रयोग हो सकता है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न तथा प्रार्थनाके अर्थमें जो लिङ् होता है, उसे विधिलिङ् तथा आशीर्वादके अर्थमें जो लिङ् होता है उसे आशीर्लिङ् कहते हैं। भविष्य (सामान्य)-में लृट् लकार होता है और अनद्यतन भविष्यमें लुट् लकार होता है। हेतुहेतुमद्भावके विषयमें क्रियाकी अनिष्पत्ति गम्यमान हो तो भविष्य और भूत-अर्थोंमें लृङ् लकार होता है। लिङ् के अर्थमें लेट् लकार होता है, किंतु इसका प्रयोग केवल वेदमें होता है।
लकार सकर्मक धातुसे कर्ता या कर्म-अर्थमें तथा अकर्मक धातुसे भाव या कर्ता-अर्थमें होते हैं। कृत्संज्ञक प्रत्यय कर्ता अथवा कर्म अथवा भाव-अर्थमें होते हैं। इसी प्रकार तव्यत् आदि कृत्-संज्ञक प्रत्यय तथा अनीयर्, तृच् आदि प्रत्यय होते हैं।
(अध्याय २०५)
व्याकरणसार
**सूतजीने कहा—**हे विप्रो! अब मैं संहिता आदिसे युक्त सिद्ध शब्दोंको बतलाने जा रहा हूँ। आप उसे सुनें—सागता, वीदं, सूत्तमम्, पितृर्षभ, लृकार—इन पदोंमें दीर्घ सन्धि है। लांगलीषा, मनीषा—यहाँ पररूप सन्धि है। इसी प्रकार गंगोदकम् (यहाँ गुण हुआ है।) तवल्कारः (यहाँ गुण),
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ऋर्णार्णम्, प्रार्णम्में (वृद्धि), शीतार्तः में (दीर्घ), सैन्द्री-सौकरमें (वृद्धि), बध्वासन, पित्रर्थ, लनुबन्धमें (यण्), नायकः, लवणम्, गावःमें (अयादि), एते (गुण) त ईश्वराःमें (अय् और यलोप्) (ये शब्द स्वरसन्धिके उदाहरण हैं।) देवी गृहमथो अत्र अ अवेहि पटू इमौ (इनमें प्रकृति भाव है।), अश्वाः षडस्य (जश्त्वा), तन्न (अनुनासिक), वाक् (चर्त्व), षड्दलानि (जश्त्वा), तच्चरेत् (श्रुत्व-चर्त्व), तल्लुनाति (परसवर्ण), तज्जलम् (श्रुत्व), तच्छमशानकम् (छत्व-श्रुत्व), सुगण्णण्त्र, पचन्नन्न्र (नुट् आगम), भवांश्छादयति (अनुस्वार सुट्-श्रुत्व), भवाञ्झनकरः (परसवर्ण), भवांस्तरति, (अनुस्वार-सुट्), भवाँल्लिखति (परसवर्ण), ताञ्छक्रे (श्रुत्व), भवाञ्शेते (श्रुत्व) भवाण्डीनं त्वन्तरसि त्वङ्करोषि (परसवर्ण) (ये व्यञ्जनसन्धिके उदाहरण हैं), सदार्चनम् (दीर्घ), कश्चरेत् (श्रुत्व) कृष्टकारेण (ष्टुत्व), कःकुर्यात् कःफले (जिह्वामूलीय विसर्ग) कश्शेते (श्रुत्व), कष्षण्डः (ष्टुत्व), कस्कः (सत्त्व), क इहात्र क एवाहु—र्देवा आहुः, भो व्रज (रुत्व, यत्व, यलोप्), स्वयम्भूविष्णुर्व्रजति (रुत्व) गीष्पतिः (षत्व), धूर्पतिः (रुत्व), कुटीच्छाया (तुक्-श्रुत्व), तथाच्छाया (तुक्-विकल्प)—ये विसर्ग-सन्धिके उदाहरण हैं।
समास छः प्रकारके होते हैं (द्वन्द्व, द्विगु, तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव)। स द्विजः=सद्विज (कर्मधारय), त्रिवेद (त्रयाणां वेदानां समाहारः द्विगु) तत्कृतः तदर्थः वृकभीतिः, यद्धनम् ज्ञानदक्षः (इनमें क्रमशः तेन कृतः, तस्मै अर्थः, वृकाद् भीतिः, यस्य धनम्, ज्ञानेदक्षः इस व्युत्पत्तिसे तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी तत्पुरुष समास है।) तत्त्वज्ञमें बहुव्रीहि तथा अधिमानमें अव्ययीभाव समास है। देवर्षिमानवाःमें देवश्च ऋषिश्च मानवश्च इस व्युत्पत्तिसे द्वन्द्व समास है।
'पाण्डव (पाण्डोः अपत्यमिति पाण्डवः इत्यर्थे अण्)<sup>१</sup>', शैव (शिवो देवताऽस्य इत्यर्थे अण्)<sup>१</sup>, ब्राह्म्यम् (ब्राह्मणः भावः कर्म इत्यर्थे ष्यञ्)<sup>२</sup>, तथा ब्रह्मता (ब्राह्मणःभावः इत्यर्थे तल्)<sup>३</sup>, आदि तद्धित प्रत्ययान्त शब्द हैं।
देव, अग्नि, सखि, पति, अंश, क्रोष्टा (सियार), स्वायम्भुव, पितृ, नृ, प्रशस्ता (प्रशंसक), रै (धन), गौ और ग्लौ (चन्द्रमा)—ये अत्यन्त पुँल्लिङ्गके सिद्ध शब्द हैं। अश्वयुक् (घोड़ेसे युक्त), क्ष्माभुक् (पृथ्वीका उपभोग करनेवाला राजा), मरुत् (पवन), क्रव्याद, मृगव्यध (मृगका पीछा करनेवाला शिकारी), आत्मन्, राजन् (राजा), यव, पन्था (मार्ग), पूषन् (सूर्य), ब्रह्महन् (ब्राह्मणको मारनेवाला ब्रह्मघाती), हलिन् (हल धारण करनेवाला मनुष्य), विट् (जार पुरुष), वेधस् (विधाता), उशनस् (उशना-शुक्राचार्य), अनड्वान् (गाड़ी खींचनेवाला बैल), मधुलिट् (शहद चाटनेवाला भौंरा) तथा काष्ठतृट् (कठफोर पक्षी या बढ़ई)—ये हलन्त् पुँल्लिङ्गके अन्तर्गत आनेवाले सिद्ध शब्द हैं।
वन (जंगल), वारि (जल), अस्थि (हड्डी), वस्तु (सामग्री), जगत् (संसार), साम्, अहः, कर्म, सर्पिष् (घी), वपुष् (शरीर), तेजस् (ऊर्जा)—ये आदिके चार शब्द अजन्त और शेष हल् प्रत्ययान्त नपुंसकलिंगके सिद्ध रूप हैं।
जाया (पत्नी), जरा (वृद्धावस्था), नदी, लक्ष्मी, श्री, स्त्री, भूमि, वधू, भ्रू (भौंह), पुनर्भू (पुनर्जन्म), धेनु (गौ), स्वसा (बहन), मातृ (माता) तथा नौ
१. शिवादिभ्योऽण् (पा०सू० ४।१।११२)
२. गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च (पा०सू० ५।१।१२४)
३. तस्य भावस्त्वतलौ (पा०सू० ५।१।११९)
काण्ड ] छन्द-विधान [ ३६९
(नौका)—ये अजन्त स्त्रीलिङ्गमें सिद्ध रूप हैं।
वाक् (वाणी), स्रक् (माला), दिक् (दिशा), मुद् (मुदा-प्रसन्नता), क्रुध् (क्रोध), युवति, ककुभ्, द्यौ (आकाश), दिव् (स्वर्ग), प्रावृट् (वर्षा), सुमना और उष्णिक्—ये हलन्त स्त्रीलिङ्गके सिद्ध रूप हैं।
अब मैं आपको गुण, द्रव्य और क्रियाके योगसे बननेवाले स्त्रीलिङ्गके शब्दोंको भी बता रहा हूँ।
शुक्ल (श्वेत), कीलालक (अमृतके समान पेय पदार्थ), शुचि (पवित्रता), ग्रामणी (गाँवका अधिकारी), सुधी (विद्वान्), पटु (चतुर), कमलभू (कमलसे उत्पन्न ब्रह्मा या पराग), कर्तृ (कर्ता), सुमत (सुन्दर विचारोंवाला पुरुष), सूनु (पुत्र), सत्या, अभक्ष (न खाने योग्य), दीर्घपा, सर्वविश्वा, उभय (दो), उभौ, एक, अन्या (दूसरी) और अन्यतरा (दूसरेमें प्रमुख)—ये सब गुणप्रधान शब्द हैं, जो स्त्रीलिङ्गमें बनते हैं।
इसके बाद डतर (उच्चतर), डतम (उच्चतम), नेम, तु (तो), सम (समान), अथ (तदनन्तर), सिम (प्रत्येक), इतर (अतिरिक्त), पूर्व (प्राचीन), अधः (नीचे), च (और), दक्षिण (दक्षिण दिशा), उत्तर (उत्तर दिशा), अवर (अधम), पर (दूसरे), अन्तर, एतद् (यह), यद्यत् (जो-जो), किं (क्या), अदस् (यह), इदम् (यह), युष्मत् (तुम), अस्मत् (मैं-हम), तत् (वह), प्रथम (पहला), चरम (अन्तिम), अल्पतया (संक्षेप), अर्ध (आधा), तथा (और), कतिपय (कुछ), द्वौ (दो), चेति (और ऐसा), एवं (इस प्रकार)—ये सभी शब्द सर्वनाम हैं। इनको सर्वादिगणमें परिगृहीत किया गया है।
शृणोति (सुनता है), जुहोति (हवन करता है), जहाति (परित्याग करता है), दधाति (धारण करता है), दीप्यति (तेजस्वी बन रहा है), स्तयति (स्तुति करता है), पुत्रीयति (पुत्रके समान व्यवहार करता है), धनीयति (धनवान् बन रहा है), त्र्युट्यति, म्रियते (मर रहा है), चिचीर्षति (संग्रहकी इच्छा कर रहा है) तथा निनीषति (ले जानेकी इच्छा कर रहा है)—ये कतिपय तिङन्तके सिद्ध रूप शब्द हैं।
‘सर्व’ शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वे’, चतुर्थी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मै’, पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मात्’, षष्ठी विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वेषाम्’ रूप बनता है। इसी प्रकार विश्व आदि शब्दोंके रूपोंको भी आप जानें। पहले कहे गये ‘पूर्व’ शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘पूर्वे, पूर्वाः’ पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मात्’ और सप्तमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मिन्’ रूप बनता है।
सूतजीने कहा— हे ऋषियो! सुबन्त और तिङन्त पदोंके सिद्धरूपका वर्णन नाममात्र ही किया गया है। कुमारसे इस व्याकरणको सुनकर कात्यायनने इसको विस्तारपूर्वक कहा था।
(अध्याय २०६)
छन्द-विधान
सूतजीने कहा— अब मैं वासुदेव, गुरु, गणपति, शम्भु और सरस्वतीको नमस्कार करके अल्प बुद्धिवालोंके लिये विशिष्ट बुद्धिकी प्राप्ति-हेतु मात्रा और वर्णके भेदके अनुसार छन्द-विधानको कहता हूँ।
सभी गणोंमें आदि, मध्य और अन्त होता है। इसके अतिरिक्त इनमें गुरु तथा लघु होते हैं। (इन्हीं गुरु तथा लघु वर्णोंसे आठ गणोंकी रचना हुई है,