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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१७७- गो एवं अश्व-चिकित्सा

काण्ड ]
विष्णुधर्माख्यविद्या
३५३


हूँ, आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न! हे अनिरुद्ध! हे संकर्षण! आपको नमस्कार है। हे परमानन्दस्वरूप! आप मात्र अनुभवजन्य हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप आत्माराम एवं शान्तमूर्ति हैं तथा द्वैत-दृष्टिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार है। यह समस्त चराचर जगत् आपका ही रूप है, आपको बारंबार प्रणाम है। हे अनन्तमूर्ति भगवान् हृषीकेश! आप महत्त्वस्वरूपको नमस्कार है। प्रलयकालमें यह सारा जगत् जिस मूर्तिमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है और पुनः प्रलयकालके पश्चात् सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले उत्पन्न भी होता है तथा जो इस मृण्मयी पृथ्वीको धारण करता है, उस ब्रह्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिस देवको स्पर्श करने और पहचाननेमें न मन-बुद्धि समर्थ हैं, न ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और प्राण समर्थ हैं तथा आकाशके समान जो देव समस्त चराचर प्राणियोंके अंदर और बाहर विचरण करते हैं, ऐसे व्योमस्वरूप आप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ। हे पञ्चभूतोंके स्वामी ऐश्वर्यमूर्ति महापुरुष भगवान् वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे परमेष्ठिन्! आपसे सकल सत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है तथा आपके चरणारविन्दयुगल मानो शील-समूहरूपी कमलोंकी धर्माख्यविद्यारूप रेणूत्पल हैं, आपको नमस्कार है। चित्रकेतुने इस विद्याके द्वारा विद्याधरत्वको प्राप्त किया था। (अध्याय १९५)


विष्णुधर्माख्यविद्या

श्रीहरिने कहा—हे महेश्वर! जिस 'विष्णुधर्म' नामक विद्याका जप करके देवराज इन्द्रने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्तकर इन्द्रत्व-पद प्राप्त किया था, उस विद्याको कहता हूँ।

इस विद्याके जपसे पूर्व दोनों पैर, दोनों जानु, दोनों जंघा-प्रदेश, उदर, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और शिरोभागमें ॐकारादि वर्णोंसे यथाक्रम न्यास करना चाहिये। 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रद्वारा विपरीत-क्रमसे भी न्यास करे। तदनन्तर द्वादशाक्षर-मन्त्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय')-के आदि वर्ण ॐकारसे करन्यास करे। अन्तिम यकारसे अंगुष्ठ आदि अँगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें न्यास करके हृदयमें ॐकारका न्यास करना चाहिये। सम्पूर्ण मन्त्रसे मस्तक-भागमें न्यास करे। मूर्धासे प्रारम्भ करके भ्रुवोंके मध्य-भागमें ॐकार-मन्त्रसे न्यास करके शिखा तथा नेत्रादिमें 'ॐ विष्णवे नमः' इस मन्त्रसे न्यास करना चाहिये। अनन्तर अन्तरात्मामें उन परम शक्तियोंसे सम्पन्न परमात्मा शेषनारायणका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

मम रक्षां हरिः कुर्यान्मत्स्यमूर्तिर्जलेऽवतु ॥
त्रिविक्रमस्तथाकाशे स्थले रक्षतु वामनः।
अटव्यां नरसिंहस्तु रामो रक्षतु पर्वते ॥
भूमौ रक्षतु वराहो व्योम्नि नारायणोऽवतु।
कर्मबन्धाच्च कपिलो दत्तो रोगाच्च रक्षतु ॥
हयग्रीवो देवताभ्यः कुमारो मकरध्वजात्।
नारदोऽन्यर्चनार्नादेवः कूर्मो वै नैर्ऋते सदा ॥
धन्वन्तरिश्चापथ्याच्च नागः क्रोधवशात् किल।
यज्ञो रोगात् समस्ताच्च व्यासोऽज्ञानाच्च रक्षतु ॥
बुद्धः पाषण्डसंघातात् कल्की रक्षतु कल्मषात्।
पायान्मध्यन्दिने विष्णुः प्रातर्नारायणोऽवतु ॥
मधुहा चापराह्ने च सायं रक्षतु माधवः।
हृषीकेशः प्रदोषेऽव्यात् प्रत्यूषेऽव्याज्जनार्दनः ॥
श्रीधरोऽव्यादर्थरात्रे पद्मनाभो निशीथके।
चक्रकौमोदकीबाणा घ्नन्तु शत्रूंश्च राक्षसान् ॥
शंखः पद्मं च शत्रुभ्यः शार्ङ्गं वै गरुडस्तथा।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् पान्तु पार्श्वविभूषणः ॥
शेषः सर्पस्वरूपश्च सदा सर्वत्र पातु माम्।
विदिक्षु दिक्षु च सदा नरसिंहश्च रक्षतु ॥
एतद्धारयमाणश्च यं यं पश्यति चक्षुषा।
स वशी स्याद्विपाप्मा च रोगमुक्तो दिवं व्रजेत् ॥
(१९६।६–१६)

३५४
संक्षिप्त गरुडपुराण
[ आचार-

भगवान् हरि मेरी रक्षा करें। मत्स्यमूर्ति भगवान् जलमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रम आकाशमें और भगवान् वामन स्थलमें मेरी रक्षा करें। वन-प्रान्तमें भगवान् नरसिंह, पर्वतभागमें जामदग्न्य-परशुराम मेरी रक्षा करें। भूमिपर भगवान् वराह, व्योममें भगवान् नारायण मेरी रक्षा करें। कर्मोंके बन्धनसे भगवान् कपिल तथा रोगोंके प्रकोपसे भगवान् दत्तात्रेय मेरी रक्षा करें। भगवान् हयग्रीव देवताओंसे, कुमार कामदेवसे मेरी रक्षा करें। भगवान् नारद अन्य देवोंकी उपासनासे और भगवान् कूर्मदेव नैर्ऋतमें सदैव मेरी रक्षा करें। भगवान् धन्वन्तरि अपथ्य-सेवनसे, भगवान् शेषनाग क्रोधसे, भगवान् यज्ञदेव समस्त रोग-समुदायसे और भगवान् व्यास अज्ञानसे मेरी रक्षा करें। भगवान् बुद्ध पाखण्ड-समूहसे एवं भगवान् कल्किदेव पापसे मेरी रक्षा करें। भगवान् विष्णु मध्याह्नकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् नारायण प्रातःकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् मधुसूदन अपराह्नकाल और भगवान् माधव सायंकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् हृषीकेश प्रदोषकालमें तथा भगवान् जनार्दन प्रत्यूषकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् श्रीधर अर्धरात्रि तथा भगवान् पद्मनाभ निशीथकालमें मेरी रक्षा करें। हे भगवन्! आपका सुदर्शन, कौमोदकी गदा और बाण मेरे शत्रुओं तथा राक्षसादिका संहार करे। आपका शंख, पद्म, शार्ङ्ग धनुष तथा वाहन गरुड भी शत्रुओंसे मेरी रक्षा करें। भगवान् वासुदेवके संनिकट स्थित अलंकारस्वरूप सभी पार्षद मेरे बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी रक्षा करें। सर्पका रूप धारण करनेवाले भगवान् शेषनारायण सदैव सर्वत्र मेरी रक्षा करें। भगवान् नरसिंह सदैव सभी दिशाओं और विदिशाओंमें मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार जो व्यक्ति इस विष्णुधर्माख्यविद्याको धारण करता है, वह अपने नेत्रोंसे जिस-जिसको देखता है वह उसीके वशमें हो जाता है और सभी पापोंसे मुक्त तथा रोगरहित होकर वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है।
(अध्याय १९६)


विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन

धन्वन्तरिने कहा—अब मैं गरुडके द्वारा कही गयी गारुडी विद्याका वर्णन करता हूँ। इस विद्याको सुमित्रने कश्यपमुनिसे कहा था। यह विद्या सभी प्रकारके विषोंका अपहारक है।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व हैं। इन पाँचों तत्त्वोंके पृथक्-पृथक् मण्डल होते हैं तथा उन-उन मण्डलोंके अधिष्ठाता ये पृथ्वी आदि देवता ही माने गये हैं। अन्य देवता भी इन मण्डलोंमें स्थित रहते हैं। इनके पृथक्-पृथक् मन्त्र भी हैं। इन मण्डलाधिपति देवताओंके मन्त्रोंका यथाविधि न्यासपूर्वक जप करनेसे अभीष्ट-सिद्धि होती है और विष-बाधा दूर हो जाती है।

साधकको चाहिये कि वह पृथक्-पृथक् पाँचों मण्डलोंके स्वरूप तथा उनके अधिष्ठातृ देवोंका ध्यान करे। मण्डलोंका स्वरूप इस प्रकार है—पृथ्वीमण्डल चौकोर, फैला हुआ, चारों ओर मुखवाला तथा पीले वर्णका कहा गया है तथा यह मण्डल इन्द्रदेवतापरक है। वरुणमण्डल (जलमण्डल) पद्माकार तथा अर्धचन्द्रयुक्त है। इन्द्रनीलमणिके समान कान्तिवाले, सौम्यस्वरूप, स्वस्तिकसे युक्त, त्रिकोण आकारवाले अग्निमण्डलमें ज्वालामालाओंसे समन्वित अग्निका ध्यान करना चाहिये। विभिन्न

काण्ड ] विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन ३५५


ओषधियोंको पीसकर तैयार किये गये सुरमेके समान कान्तिवाले वृत्ताकार बिन्दुयुक्त वायुमण्डलमें वायुका ध्यान करे। आकाशमण्डलका चिन्तन क्षीरसागरमें उठती हुई लहरोंके समान आकारवाले, शुद्ध स्फटिकके सदृश आभावाले तथा सम्पूर्ण संसारको अपनी अमृतमयी रश्मियोंसे आप्लावित करनेवालेके रूपमें करे।

जो अष्ट महानाग कहे गये हैं, उनमेंसे वासुकि और शंखपाल नामक नाग पृथ्वीमण्डलमें स्थित रहते हैं। कर्कोटक तथा पद्मनाभ नामक दो नागोंका वास वरुणमण्डल (जलमण्डल)-में है। कुलिक और तक्षक नामक नाग अग्निमण्डलमें निवास करते हैं। महापद्म तथा पद्म नामक नाग वायुमण्डलमें रहते हैं। साधकको इन नागोंका ध्यान करके पृथ्वी आदि पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करना चाहिये। अंगुष्ठसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त अंगुलियोंमें अनुलोम और विलोम-रीतिसे न्यास करना चाहिये। अंगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें जया तथा विजया नामक दो शक्तियोंका न्यास करना चाहिये।

पुनः अपने शरीरमें शिवषडङ्गन्यास, पञ्चतत्त्वन्यास तथा व्यापक-न्यास करे। देवताके नामके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' प्रयुक्त करे, यह विधि स्थापन एवं पूजनादिक-मन्त्रके रूपमें बतलायी गयी है। देवताके नामके आद्य अक्षर भी मन्त्ररूप होते हैं। आठों नागोंके जो मन्त्र हैं, वे उनके संनिधानको प्राप्त करानेवाले हैं। पञ्चतत्त्वोंके साथ आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'स्वाहा' लगानेसे मन्त्र बन जाते हैं। ऐसा करनेसे ये मन्त्र साक्षात् गरुडके समान साधकके सभी अभीष्ट कर्मोंको सिद्ध करनेवाले हो जाते हैं।

स्वर-वर्णोंसे करन्यास करके पुनः उन्हींसे शरीरके अन्य अङ्गोंमें भी न्यास करना चाहिये। तदनन्तर आत्मशुद्धिकारक उद्दीप्त प्राणशक्तिका चिन्तन करना चाहिये। इसके बाद साधकको अमृतकी वर्षा करनेवाले बीजका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार आप्यायन करके साधकको अपने मस्तिष्कमें आत्मतत्त्वका चिन्तन करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वर्णके समान कान्तिवाली, समस्त लोकोंमें फैली हुई तथा लोकपालोंसे समन्वित पृथ्वीका दोनों पैरोंमें न्यास करना चाहिये।

बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह भगवती पृथ्वीदेवीका अपने सम्पूर्ण देहमें न्यास करे। इसी प्रकार अपने देहके अङ्गोंमें शेष चार मण्डलों तथा उनमें स्थित देवोंका न्यास करे। इस प्रकार पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करके यथाक्रम आठ नागोंका न्यास-ध्यान करना चाहिये।

इसके बाद स्थावर और जंगम प्राणियोंके विष-दोषका विनाश करनेके लिये पक्षिराज गरुडका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—गरुडदेव अपने दोनों पैरों, पंखों तथा चोंचद्वारा पकड़े हुए कृष्णवर्णवाले नागोंसे विभूषित हैं। ग्रह, भूत, पिशाच, डाकिनी, यक्ष, राक्षसका उपद्रव होनेपर विषधर नागोंसे घिरे हुए भगवान् शिवका अपने शरीरमें न्यास करना चाहिये।

यथाविधि ध्यान-पूजन आदि कृत्योंको करके साधकको सभी कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेके लिये अभीष्ट रूप धारण करनेवाले, मनपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ, सम्पूर्ण संसारको अपने रसमें आप्लावित करनेवाले एवं सृष्टि तथा संहारके कारण, अपने प्रकाशपुञ्जसे उद्दीप्त और समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त, दस भुजाओं और चार मुखोंवाले, पिङ्गलवर्णके नेत्रवाले, हाथमें शूल धारण करनेवाले, भयंकर दाँतवाले, अत्यन्त उग्र, त्रिनेत्र तथा चन्द्रचूडसे विभूषित और गरुडस्वरूप भैरवका चिन्तन करना चाहिये।

३५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नागोंका विनाश करनेके लिये उन परमतत्त्वने महाभयंकर गरुडका रूप धारण किया है। विराट्-रूप भगवान् गरुडके दोनों पैर पाताललोकमें स्थित हैं और उनके सभी पंख समस्त दिशाओंमें फैले हुए हैं। सातों स्वर्ग उनके वक्षःस्थलपर विद्यमान हैं। ब्रह्माण्ड उनके कण्ठका आश्रय लेकर अवस्थित है, पूर्वसे लेकर ईशानपर्यन्त आठों दिशाओंको उनका शिरोभाग समझना चाहिये। अपनी तीनों शक्तियोंसे समन्वित सदाशिव इनके शिखामूलमें स्थित हैं। ये तार्क्ष्य (गरुड) साक्षात् परात्पर शिव और समस्त भुवनोंके नायक हैं। त्रिनेत्रधारी, उग्र स्वरूपवाले, नागोंके विषोंके विनाशक, सबको ग्रास बनानेवाले, भीषण मुखवाले, गरुडमन्त्रके मूर्तरूप, कालाग्निके सदृश देदीप्यमान गरुडदेवका अपने समस्त अभीष्ट कर्मोंकी सिद्धिके लिये चिन्तन करना चाहिये। जो मनुष्य न्यास-ध्यानकी विधि सम्पन्न करके इन देवकी पूजा करता है, उसका सब कुछ सिद्ध हो जाता है तथा वह स्वयं गरुडदेवकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। भूत, प्रेत, यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि तो उसके दर्शनमात्रसे ही भाग जाते हैं। चौथिया आदि ज्वर भी विनष्ट हो जाते हैं। (अध्याय १९७)


त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि

भैरवने कहा—इसके बाद मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली त्रिपुरादेवीकी पूजा आदिका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें।

देवीका यथाविधि 'ॐ ह्रीं आगच्छ देवि'—इस मन्त्रसे आवाहन करके 'ऐं ह्रीं ह्रीं'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रेखा करके 'ॐ ह्रीं क्लेदिनी भं नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे तथा उनकी शक्तियोंके साथ महाप्रेतासनपर विराजमान रहनेवाली देवी त्रिपुराभैरवीका पूजन करे। 'ऐं ह्रीं त्रिपुरायै नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करे। देवीके पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व आदि मुखोंको भी नमस्कार करे। 'ॐ ह्रीं पाशाय नमः', 'क्रों अङ्कुशाय नमः', 'ऐं कपालाय नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उनके पाश, अंकुश, कपाल आदि आयुधोंको नमस्कार करे। त्रिपुराभैरवीदेवीकी पूजामें आठ भैरवों तथा उनके साथ मातृकाओंकी भी पूजा करनी चाहिये। असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव—ये आठ भैरव हैं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा तथा अपराजिता (दुर्गा)—ये आठ मातृकाएँ हैं।

पूजकको चाहिये कि वह 'ॐ कामरूपाय असिताङ्गाय भैरवाय नमो ब्रह्माण्यै'—इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें कामरूप असिताङ्गभैरव और देवी ब्रह्माणीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद 'ॐ स्कन्दाय नमः, रुरुभैरवाय नमः, माहेश्वर्यै नमः' मन्त्रोंद्वारा दक्षिण दिशामें स्कन्ददेव, रुरुभैरव और देवी माहेश्वरीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ चण्डाय नमः, कौमार्यै नमः' इन मन्त्रोंसे पश्चिम दिशामें चण्डभैरव तथा देवी कौमारीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तत्पश्चात् 'ॐ उल्काय नमः, ॐ क्रोधाय नमः, ॐ वैष्णव्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे उत्तर दिशामें उल्कादेव, क्रोधभैरव और देवी वैष्णवीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ अघोराय नमः, ॐ उन्मत्तभैरवाय नमः, ॐ वाराह्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे अग्निकोणमें अघोरदेव, उन्मत्तभैरव और देवी वाराहीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ साराय कपालिने भैरवाय नमः,

काण्ड ] वायुजय-निरूपण ३५७

ॐ माहेन्द्र्यै नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा नैर्ऋत्यकोणमें समस्त संसारके सारभूत स्वरूप कपालिभैरव और देवी माहेन्द्रीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद साधकको 'ॐ जालन्धराय नमः, ॐ भीषणाय भैरवाय नमः, ॐ चामुण्डायै नमः'—इन मन्त्रोंसे वायुकोणमें जालन्धर, भीषणभैरव और देवी चामुण्डाका आवाहनपूर्वक पूजन करना चाहिये। तदनन्तर 'ॐ वटुकाय नमः, ॐ संहाराय नमः, ॐ चण्डिकायै नमः'—इन मन्त्रोंसे ईशानकोणमें वटुकदेव, संहारभैरव तथा देवी चण्डिकाका आवाहन करके उनकी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद साधकको रतिदेवी, प्रीतिदेवी, कामदेव और उनके पञ्चबाणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। इस प्रकार सदैव ध्यान, पूजा, जप तथा होम करनेसे देवी सिद्ध हो जाती हैं। नित्यक्लिन्ना, त्रिपुरभैरवी और ज्वालामुखी नामक देवियाँ समस्त व्याधियोंकी विनाशिका हैं। अब मैं ज्वालामुखीदेवीके पूजनका क्रम कहूँगा। पद्मके मध्य देवी ज्वालामुखीकी पूजा करनी चाहिये तथा पद्मके बाह्य दलोंमें क्रमशः—नित्या, अरुणा, मदनातुरा, महामोहा, प्रकृति, महेन्द्राणी, कलनाकर्षिणी, भारती, ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, अपराजिता, विजया, अजिता, मोहिनी, त्वरिता, स्तम्भिनी, जृम्भिणी तथा देवी कालिकाकी पूजा करनी चाहिये। देवी ज्वालामुखीकी यथाविधि पूजा करनेसे विष आदि दोष दूर हो जाते हैं।

भैरवने पुनः कहा—चूडामणि-यन्त्रके द्वारा प्रश्नकर्ताको शुभ एवं अशुभ समयका परिज्ञान हो जाता है। (अध्याय १९८-१९९)


वायुजय-निरूपण

भैरवने कहा—हे देवि ! अब मैं जय-पराजय तथा विदेश-यात्राके शुभाशुभ मुहूर्तका संकेत देनेवाले 'वायुजय' नामक विद्याका वर्णन करूँगा।

वायु, अग्नि, जल और इन्द्रको माङ्गलिक चतुष्टयके नामसे जाना जाता है। प्रायः प्राणीके शरीरमें वायु अधिकतर वाम और दक्षिणभागकी नाड़ियोंसे प्रवाहित होता है। अग्नि शरीरमें ऊर्ध्वगामी होता है और जल अधोगामी। महेन्द्र तत्त्व शरीरके मध्यभागमें स्थित रहता है, किंतु शुक्लपक्षमें वह वामभाग तथा कृष्णपक्षमें दक्षिण-भागकी नाड़ियोंसे होकर शरीरमें प्रवाहित होता है। प्रत्येक पक्षका प्रारम्भिक तीन-तीन दिन इसका उदयकाल है। अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर तृतीया तिथितक जो वायु नासिकाके वाम छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे लेकर तृतीया तिथिपर्यन्त जो वायु नासिकाके दक्षिण छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है, वह उदयकालका वायु माना जाता है। यदि इस नियमके अनुसार वायुका प्रवाह होता है तो अच्छा होता है, किंतु विपरीत होनेपर पतन होता है। यदि प्राणीके शरीरमें वायु सूर्यमार्गमें उदित होकर चन्द्रमार्गमें अस्त हो तो गुणोंमें वृद्धि होती है। इसके विपरीत होनेपर शरीरमें विघ्न होता है।

हे वरानने ! दिन और रातमें सोलह संक्रान्तियाँ मानी गयी हैं। आधे-आधे प्रहरके बाद एक-एक संक्रान्तिका परिमाण है। इसी गतिसे शरीरमें प्रवहमान वायुका संक्रमण-काल आता है। जब वायु शरीरके अन्तर्गत आधे प्रहरके बाद ही संक्रान्त होने लगता है, अर्थात् आधे-आधे प्रहरमें वायुका भ्रमण होता है, तो स्वास्थ्यकी हानि अवश्यम्भावी है। भोजन और मैथुनकालमें दाहिने नासापुटसे वायु भ्रमण करे तो हितकर होता है। इस स्थितिमें हाथमें तलवार लेकर योद्धा युद्धमें यथेच्छ शत्रुओंको जीत सकता है। समस्त कार्योंमें यदि वाम नासापुटसे