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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१३९- उदररोग-निदान

२८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अनुलोम गति होती है तो यह मूत्रके साथ बाहर निकल जाती है अथवा मूत्रके साथ प्रतिलोम-अवस्थामें अंदर ही रुक जाती है। क्रुद्ध हुआ वायु वस्तिभागके मुखको रोककर आमाशयके जलस्रोतसे नीचे आनेवाले उस मलिन जलको एकत्र कर देता है। इस मूत्रके संचित होनेसे वस्तिभागमें विकारकी उत्पत्ति होती है, रोगीको कष्ट होता है और उस भागमें खुजलाहट होने लगती है।

रोगीके शरीरमें विक्षुब्ध वह वायु वस्तिभागके मुखको विधिवत् ढककर मूत्रावरोध उत्पन्न करता है तथा वस्तिको अपने स्थानसे हटाता हुआ उल्टा या इधर-उधर करके वस्तिमें विकृति उत्पन्नकर गर्भ-जैसा स्थूल (मोटा) बना देता है एवं उस स्थानको पीड़ित करता है। वहाँ उसके कारण जलन होती है। उसमें स्पन्दन होने लगता है और कूल्होंमें भी पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है। रोगीका मूत्र बिन्दुवत् टपकता है, वह अपने सही वेगसे नहीं निकलता। वस्तिभागमें पीड़ा बनती रहती है। दबानेपर मूत्र धारा-रूपमें निकलता है। वायुजन्य इस रोगको वातवस्तिके नामसे स्वीकार किया गया है।<sup>१</sup>

वातवस्तिके दो भेद हैं—पहला वस्तिके मुखको रोकनेवाला दुस्तर कहलाता है और दूसरा दुस्तरतर। वस्तिके मुखको ऊपर करनेवाला अत्यन्त कृच्छ्रसाध्य है, क्योंकि इसमें वायुका विशेष प्रकोप होता है। मलमार्ग तथा वस्तिभागके बीच स्थित वायु अष्ठीलाकृति अर्थात् गोलककडी या अँठुलीके समान घनीभूत शक्तिशाली, मज़बूत ग्रन्थि (गाँठ) उत्पन्न करता है, जिसके कारण इसको वाताष्ठीला नामसे अभिहित किया गया है। इस रोगमें वायु रोगीके अपानवायु तथा मल-मूत्रको अवरुद्ध कर देता है। वस्तिभागमें विद्यमान कुपित वायु कुण्डली मारकर तीव्र पीड़ाको जन्म देता है। वहाँ मूत्रको रोककर वह उसमें अत्यधिक स्तम्भनका दोष उत्पन्न करता है। ऐसी अवस्थामें रोगीको बहुत ही अल्प मात्रामें बार-बार मूत्र होता है तथा ऐसी अवस्थामें रोगी मूत्रको अधिक देरतक रोकनेमें असमर्थ रहता है। ऐसे रोगको वातकुण्डैलिका<sup>२</sup> कहते हैं। जब रोगी रुके हुए मूत्रको निकालनेमें पीड़ाका अनुभव करता है तो वह निरुद्ध मूत्र-कृच्छ्ररोग है अथवा मूत्रको अधिक कालतक रोकनेके पश्चात् यदि उसका वेग नहीं आता है या रुक-रुककर आता है और कुछ कष्ट होता है तो उसको मूत्रातीत कहा जाता है।

मूत्रके वेगको रोकनेसे प्रतिहत हुआ मूत्र अथवा वायुसे पीछेको घुमाया हुआ मूत्र जब नाभिके नीचे उदरमें भर जाता है, तब वह तीव्र वेदना और आध्मान पैदा करता है और मलका संग्रह करता है। इसे मूत्रजठर कहते हैं। मूत्रके दोषसे अथवा कुपित वायुके द्वारा आक्षिप्त हुआ थोड़ा-सा मूत्र वस्ति, नाल, उपस्थकी मणिमें स्थित होकर थोड़ा-थोड़ा दर्द करता हुआ अथवा बिना दर्दके ही निकलता है, इसे मूत्रोत्सर्ग या मूत्रजठर कहते हैं।

अबाधगतिसे<sup>३</sup> मूत्रोत्सर्ग होना प्राणीके श्रेष्ठ अण्डकोषोंपर निर्भर होता है। एकाएक रुका हुआ मूत्र निकल जानेपर अन्तःकरण और मुख शुष्क हो जाता है। अधिकाधिक या अल्प मात्रामें प्राणीको प्यास लगती है। वस्तिके आभ्यन्तर भागमें मूत्रावरोधके कारण अश्मरीके सदृश एक ग्रन्थि पड़ जाती है, जिसको मूत्रग्रन्थि कहते हैं। मूत्र-रोग<sup>४</sup>-ग्रसित रोगीका जब स्त्रीके साथ सहवास होता है तो उस समय वायुके द्वारा ही स्त्रीके गर्भाशयमें शुक्र पहुँच जाता है, किंतु स्थान-विशेषसे निकला हुआ वह


<sup>१</sup> मा०नि० मूत्राघात प्र० ४।
<sup>२</sup> मा०नि०मूत्राघात प्र० २, ३, श्लोक ७, ८।
<sup>३</sup> सु०उ० ८५, अ०हृ०नि०अ० ९।
<sup>४</sup> सु०उ०तं०अ० ५८।

काण्ड ] प्रमेहरोग-निदान २८३


शुक्र मूत्र-क्षरण होनेसे पहले अथवा बादमें लिंगसे बाहर आता है। इसका स्वरूप भस्ममिश्रित जलके समान होता है। उसको वैद्यकमें मूत्रशुक्रके नामसे जाना जाता है।

जब रूक्षता और दुर्बलताके कारण वातजन्य दोषसे उदावर्त उपद्रव होता है अर्थात् शरीरके अंदर विद्यमान अपानवायु व्यानवायुसे घिर जाता है अर्थात् मलावरोध हो उठता है तो उस कालमें वह मल-मूत्र स्रोतकी संसृष्टिसे संयुक्त हो जाता है। इसमें मूत्र बूँद-बूँद ही होता है और इस टपकनेवाले मूत्र-बिन्दुओंमें एक दुर्गन्ध-सी रहती है। ऐसे रोगको मूत्रविघातके नामसे स्वीकार किया जाता है।

पित्त², व्यायाम, तीक्ष्ण और अम्लाहार तथा आध्मान (पेट फूलने) अथवा अन्य विकृतियोंके द्वारा शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें बढ़ा हुआ पित्त-वायु-विकार वस्तिभागमें दाह उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण रक्तयुक्त मूत्र निकलता है अथवा उष्ण रक्त ही उसकी मूत्र-प्रवाहिकासे बार-बार कष्टपूर्वक गिरता है। इस प्रकारके कष्टको उत्पन्न करनेके कारण लोगोंने उस रोगको उष्णवातकी संज्ञा दी है।

रूक्षाहार तथा परिश्रम करनेसे श्रान्त रोगीका पित्त और वायु कुपित हो उठता है। वह उसके वस्तिभागमें मूत्रावरोध, पीड़ा, क्षय और जलन उत्पन्न कर देता है। उस लक्षणसे युक्त मूत्राघात-कष्टको मूत्रक्षय कहा गया है।

यदि कुपित वायुके द्वारा पित्त और कफ अथवा इन दोनोंको संक्षुब्ध कर दिया जाता है तो उस समय प्राणीको जलन, कष्टसाध्य मूत्र-निर्गमन होता है। उसके मूत्रका वर्ण पीला, रक्त तथा श्वेत हो जाता है और उसमें गाढ़ापन भी आ जाता है। वस्तिभागमें दाहभरी जलन होती है। जो मूत्र निकलता है, उसका वर्ण सूखे गोरोचन तथा शंख-चूर्णके समान होता है। इस रोगको कृच्छ्रमूत्रसाद कहते हैं। इस प्रकार विस्तारपूर्वक मूत्रमें होनेवाले रोगोंको भी मैंने बता दिया है। (अध्याय १५८)

प्रमेहरोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपको प्रमेह³-रोगोंका निदान सुनाऊँगा, उसे सुनें।

प्रमेह बीस प्रकारके होते हैं। उनमें दस प्रमेह कफजन्य, छः प्रमेह पित्तजन्य और चार प्रमेह वातजन्य हैं। इन सभीमें मेद, मूत्र और कफकी संसृष्टि होती है।

प्रमेहका सबसे पहला प्रकार हारिद्रमेह है। इस प्रमेहके होनेपर रोगीको कटु, रसमिश्रित मूत्र हल्दीके समान मल-मूत्र होता है। इस प्रमेहका दूसरा प्रकार मंजिष्ठामेह है। मंजिष्ठामेहके होनेपर मंजिष्ठ (मजीठ)-वर्णके जलके सदृश होता है। इसका तीसरा प्रकार है रक्तमेह। इस रक्तमेहके होनेपर रक्तवर्णकी आभावाला कच्चे मांसकी गन्धसे समन्वित उष्ण तथा लवण-तत्त्व-मिश्रित मूत्र होता है। वसामेहमें चर्बी-मिला हुआ मूत्र अथवा केवल चर्बी ही बार-बार निकलती है। वसायुक्त मज्जामेही व्यक्ति वर्ण और गन्धमें समानता रखनेवाले मज्जा-तत्त्वसे संश्लिष्ट मूत्रत्याग करता है।

जब प्राणी मतवाले हाथीके समान असंयमित वेगसे अधिक समयतक मूत्र निकालता है, जिसके साथ एक चिपचिपा पदार्थ भी आता है और यह यदा-कदा बीच-बीचमें रुक भी जाता है तो उस रोगीको हस्तिमेही मानना चाहिये। हस्तिमेह प्रायः वृद्धावस्थामें होता है। जब व्यक्तिको मधुके समान


१-सु०उ० ५७। २-सु०अ० ८५। ३-च०चि० ७, वा० नि० १० ।