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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

५३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १

५३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निर्माय षोडशसहस्रशतार्धकास्ता<br>नार्योऽष्टसम्मततराः स्वकलासमुत्थाः।<br>तासां विलासवशगं तु विधाय कामं<br>दासीकृतो हि भगवाननयाप्यनन्तः॥ ३१॥उन्होंने ही अपनी कला-शक्तिसे सोलह हजार पचास रानियों तथा आठ पटरानियोंकी रचना करके पुनः भगवान् श्रीकृष्णको उनके विलासके वशीभूत करके उन अनन्त शक्तिसम्पन्न श्रीकृष्णको उनका वशवर्ती बना दिया॥ ३१॥
एकापि बन्धनविधौ युवती समर्था<br>पुंसो यथा सुदृढलोहमयं तु दाम।<br>किं नाम षोडशसहस्रशतार्धकाश्च<br>तं स्वीकृतं शुकमिवातिनिबन्धयन्ति॥ ३२॥केवल एक ही युवती अपने लौहमय सुदृढ़ पाशमें पुरुषको बाँध सकनेमें समर्थ है तो फिर जिसकी सोलह हजार पचास भार्याएँ हों उसके विषयमें क्या कहना? वे सब तो उस पुरुषको पालित तोतेकी भाँति अपनी इच्छाके अनुरूप नियन्त्रित कर ही सकती हैं॥ ३२॥
सत्राजितीवशगतेन मुदान्वितेन<br>प्राप्तं सुरेन्द्रभवनं हरिणा तदानीम्।<br>कृत्वा मृधं मघवता विहृतस्तरूणा-<br>मीशः प्रियासदनभूषणतां य आप॥ ३३॥सत्राजित्की पुत्री सत्यभामाके वशीभूत श्रीकृष्ण उसके कहनेपर प्रसन्नतापूर्वक इन्द्रके भवनमें पहुँच गये। वहाँपर इन्द्रके साथ युद्ध करके उन्होंने तरुराज कल्पवृक्ष छीन लिया और उससे अपनी प्रिया सत्यभामाके महलको सुशोभित किया॥ ३३॥
यो भीमजां हि हृतवाञ्छिशुपालकादी-<br>ञ्जित्वा विधिं निखिलधर्मकृतो विधित्सुः।<br>जग्राह तां निजबलेन च धर्मपत्नीं<br>कोऽसौ विधिः परकलत्रहृतौ विजातः॥ ३४॥समस्त धार्मिक अनुष्ठानोंको विधिपूर्वक करनेकी इच्छावाले भगवान् श्रीकृष्णने शिशुपाल आदि वीरोंको जीतकर [पूर्वतः वाग्दत्ता] रुक्मिणीका हरण कर लिया और अपने बलके प्रभावसे उसे अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। किसी दूसरेकी भार्या हरण करनेकी यह कौन-सी विधि निर्मित हो गयी?॥ ३४॥
अहङ्कारवशः प्राणी करोति च शुभाशुभम्।<br>विमूढो मोहजालेन तत्कृतेनातिपातिना॥ ३५॥अत्यन्त दारुण अधःपतन करानेवाले मोहजालसे विमोहित तथा अहंकारके वशीभूत मनुष्य नानाविध शुभ तथा अशुभ कार्य करता है॥ ३५॥
अहङ्काराद्धि सञ्जातमिदं स्थावरजङ्गमम्।<br>मूलाद्धरिहरादीनामुग्रात्प्रकृतिसम्भवात् ॥ ३६॥मूलप्रकृतिजन्य उग्र अहंकारसे ही इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्की उत्पत्ति हुई है और इसीसे विष्णु, शिव आदि देवोंका भी प्रादुर्भाव हुआ है॥ ३६॥
अहङ्कारपरित्यक्तो यदा भवति पद्मजः।<br>तदा विमुक्तो भवति नोचेत्संसारकर्मकृत्॥ ३७॥जब ब्रह्माजी पूर्णरूपसे अहंकारसे रहित होते हैं, तब वे सृष्टिके निर्माण-कार्यसे मुक्त हो जाते हैं; अन्यथा अहंकारके वशवर्ती होकर वे सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त रहते हैं॥ ३७॥
तन्मुक्तस्तु विमुक्तो हि बद्धस्तद्वशतां गतः।<br>न नारी न धनं गेहं न पुत्रा न सहोदराः॥ ३८॥उस अहंकारसे मुक्त प्राणी सांसारिक बन्धनसे छूट जाता है और उसके वशीभूत हुआ प्राणी सांसारिक बन्धनमें पड़ जाता है। हे राजन्! स्त्री, धन, घर, पुत्र तथा सहोदर भाई—ये सब बन्धनके मूल

अ० १ ] पञ्चम स्कन्ध ५३५

बन्धनं प्राणिनां राजन्नहङ्कारस्तु बन्धकः।<br>अहं कर्ता मया चेदं कृतं कार्यं बलीयसा ॥ ३९<br><br>करिष्यामि करोम्येवं स्वयं बध्नाति प्राणभृत्।<br>कारणेन विना कार्यं न सम्भवति कर्हिचित् ॥ ४०<br><br>यथा न दृश्यते जातो मृत्पिण्डेन विना घटः।कारण नहीं हैं, अपितु अहंकार ही प्राणियोंके लिये बन्धनकारी वस्तु है। मैं ही कर्ता हूँ, यह कार्य मैंने अपने ही सामर्थ्यसे पूरा किया है, यह कार्य पूरा कर लूँगा, यह कार्य अभी कर लेता हूँ—इन भावनाओंके कारण प्राणी स्वयं बँधता चला जाता है। कोई भी कार्य बिना कारणके कदापि नहीं होता है, जैसे मिट्टीके पिण्डके बिना घड़ा न तो बन सकता है, न दिखायी पड़ सकता है॥ ३८—४० १/२ ॥
विष्णुः पालयिता विश्वस्याहङ्कारसमन्वितः ॥ ४१<br><br>अन्यथा सर्वदा चिन्ताम्बुधौ मग्नः कथं भवेत्।जब भगवान् विष्णु अहंकारके वशवर्ती होते हैं तभी वे विश्वका पालन करनेमें समर्थ होते हैं। नहीं तो वे सदा [सृष्टिपालनके] चिन्तारूपी समुद्रमें डूबे क्यों रहते ? ॥ ४१ १/२ ॥
अहङ्कारविमुक्तस्तु यदा भवति मानवः ॥ ४२<br><br>अवतारप्रवाहेषु कथं मज्जेच्छुभाशयः।अहंकारमुक्त होकर यदि वे मनुष्यरूप ग्रहण करें तो निर्मलचित्त हुए वे अवतार-प्रवाहमें होनेवाले (सुख-दुःखादि)-में कैसे डूबें-उतराएँ? ॥ ४२ १/२ ॥
मोहमूलमहङ्कारः संसारस्तत्समुद्भवः ॥ ४३<br><br>अहङ्कारविहीनानां न मोहो न च संसृतिः।अहंकार ही अज्ञानका मूल कारण है तथा उसीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है। अहंकारसे विहीन प्राणीको अज्ञानता तथा सांसारिक बन्धन—दोनों ही नहीं होते ॥ ४३ १/२ ॥
त्रिविधः पुरुषः प्रोक्तः सात्त्विको राजसस्तथा ॥ ४४<br><br>तामसस्तु महाराज ब्रह्मविष्णुशिवादिषु।<br>त्रिविधस्त्रिषु राजेन्द्र काजेशादिषु सर्वदा ॥ ४५<br><br>अहङ्कारः सदा प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>अहङ्कारेण तेनैव बद्धा एते न संशयः ॥ ४६हे महाराज! इस जगत्में सत्त्वगुणी, रजोगुणी तथा तमोगुणी—ये तीन प्रकारके पुरुष कहे गये हैं। हे राजेन्द्र! सृष्टि, पालन तथा संहारकार्य सम्पन्न करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तीनों देवताओंमें भी ये तीन गुण सदा विद्यमान रहते हैं। तत्त्वदर्शी मुनियोंने अहंकारको ही जगत्की उत्पत्तिका परम कारण बताया है। अतएव इसमें सन्देह नहीं है कि ये ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश भी उसी अहंकारसे आबद्ध हैं ॥ ४४—४६ ॥
मायाविमोहिता मन्दाः प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>करोति स्वेच्छया विष्णुरवताराननेकणः ॥ ४७<br><br>मन्दोऽपि दुःखगहने गर्भवासेऽतिसङ्कटे।<br>न करोति मतिं विद्वान्कथं कुर्यात्स चक्रभृत् ॥ ४८मायासे विमोहित मन्द बुद्धिवाले कुछ मनीषी कहते हैं कि भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे नानाविध अवतार ग्रहण करते हैं, किंतु जब कोई मन्दमति प्राणी भी अतिशय दुःखप्रद गर्भमें निवास करना पसन्द नहीं करता तो फिर सर्वविद्या-सम्पन्न वे चक्रधारी भगवान् विष्णु अवतार ग्रहण करना क्यों चाहेंगे? ॥ ४७-४८ ॥