देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
४३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देव्य ऊचुः<br>क्व गच्छामो महाभाग प्राप्तास्ते पादपङ्कजम्।<br>नारायण सुरश्रेष्ठ भक्त्या परमया मुदा॥ ४७ | देवियाँ बोलीं— हे महाभाग! हे नारायण! हे सुरश्रेष्ठ! परमभक्तिके साथ प्रसन्नतापूर्वक हम सभी अप्सराएँ आपके चरणकमलोंका सान्निध्य प्राप्त कर चुकी हैं; अब हम सब कहाँ जायें? ॥ ४७॥ |
| वाञ्छितं चेद्वरं नाथ ददासि मधुसूदन।<br>तुष्टः कमलपत्राक्ष ब्रवीमो मनसेप्सितम्॥ ४८ | हे नाथ! हे मधुसूदन! हे कमलपत्राक्ष! यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न होकर वांछित वरदान देना चाहते हैं, तो हम अपने मनकी इच्छा प्रकट कर रही हैं॥ ४८॥ |
| पतिस्त्वं भव देवेश वरमेनं परन्तप।<br>भवामः प्रीतियुक्तास्त्वां सेवितुं जगदीश्वर॥ ४९ | हे देवेश! आप हमारे पति बन जायँ। हे परन्तप! हमलोगोंके इसी वरदानको पूर्ण कीजिये। हे जगदीश्वर! आपकी सेवा करनेमें हम सभीको प्रसन्नता होगी॥ ४९॥ |
| त्वया चोत्पादिता नार्यः सन्त्वन्याश्चारुलोचनाः।<br>उर्वश्याद्यास्तथा यान्तु स्वर्गं वै भवदाज्ञया॥ ५०<br><br>स्त्रीणां षोडशसाहस्त्रं तिष्ठत्वत्र शतार्धकम्।<br>सेवां तेऽत्र करिष्यामो युवयोस्तापसोत्तमौ॥ ५१ | आपने जिन उर्वशी आदि सुन्दर नयनोंवाली अन्य रमणियोंको उत्पन्न किया है, वे अब आपकी आज्ञासे स्वर्ग चली जायँ। हे श्रेष्ठ तपस्वियो! हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहीं रहेंगी और यहाँ हम सब आप दोनोंकी सेवा करेंगी॥ ५०-५१॥ |
| वाञ्छितं देहि देवेश सत्यवाग्भव माधव।<br>आशाभङ्गो हि नारीणां हिंसनं परिकीर्तितम्॥ ५२<br><br>कामार्तानाञ्च मुनिभिर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>भाग्ययोगादिह प्राप्ताः स्वर्गात्प्रेमपरिप्लुताः॥ ५३<br><br>त्यक्तुं नार्हसि देवेश समर्थोऽसि जगत्पते। | हे देवेश! आप हमारा मनोवांछित वर दीजिये और अपने सत्यव्रतका पालन कीजिये। हे माधव! धर्मज्ञ तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने प्रेमासक्त स्त्रियोंकी आशाको भंग करना हिंसा बताया है। दैवयोगसे हम अप्सराएँ भी स्वर्गसे यहाँ आकर आप दोनोंके प्रेमरससे संसिक्त हो गयी हैं। हे देवेश! आप हमारा त्याग न कीजिये। हे जगत्पते! आप तो सर्वसमर्थ हैं॥ ५२-५३ १/२॥ |
| नारायण उवाच<br>पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु तपस्तप्तं मयात्र वै॥ ५४<br><br>जितेन्द्रियेण चार्वङ्ग्यः कथं भङ्गं करोम्यतः।<br>नेच्छा कामे सुखे काचित्सुखधर्मविनाशके॥ ५५<br><br>पशूनामपि साधर्म्ये रमेत मतिमान्कथम्। | नारायण बोले— इन्द्रियोंको जीतकर मैंने पूरे एक हजार वर्षोंतक यहाँ तपस्या की है, अतएव हे सुन्दरियो! उसे कैसे नष्ट कर दूँ? सुख तथा धर्मका नाश करनेवाले वासनात्मक सुखमें मेरी कोई रुचि नहीं है। पाशविक धर्मके समान सुखमें विवेकशील पुरुष कैसे प्रवृत्त हो सकता है? ॥ ५४-५५ १/२॥ |
| अप्सरस ऊचुः<br>शब्दादीनां च पञ्चानां मध्ये स्पर्शसुखं वरम्॥ ५६<br><br>आनन्दरसमूलं वै नान्यदस्ति सुखं किल।<br>अतोऽस्माकं महाराज वचनं कुरु सर्वथा॥ ५७ | अप्सराएँ बोलीं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इन पाँच सुखोंमें स्पर्श-सुख सर्वश्रेष्ठ है। यह आनन्दरसका मूल है और इससे बढ़कर अन्य कोई भी सुख नहीं है। अतः हे महाराज! आप हमारी बात मान लीजिये॥ ५६-५७॥ |
अ० ७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३१
| निर्भरं सुखमासाद्य चरस्व गन्धमादने।<br>यदि वाञ्छसि नाकत्वं नाधिको गन्धमादनात्॥ ५८<br><br>रमस्वात्र शुभे स्थाने प्राप्य सर्वाः सुराङ्गनाः॥ ५९ | पूर्ण आनन्द प्राप्त करते हुए आप गन्धमादन-पर्वतपर विचरण कीजिये। यदि आप स्वर्ग-प्राप्तिकी आकांक्षा रखते हैं तो यह निश्चय जान लीजिये कि वह स्वर्ग इस गन्धमादनसे अच्छा नहीं है। अतः हम सभी अप्सराओंको अंगीकार करके आप इस दिव्य स्थानमें विहार कीजिये॥ ५८-५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे अप्सरसां नारायणसमीपे प्रार्थनाकरणं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
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अथ सप्तमोऽध्यायः
अप्सराओंके प्रस्तावसे नारायणके मनमें ऊहापोह और नरका उन्हें समझाना तथा अहंकारके कारण प्रह्लादके साथ हुए युद्धका स्मरण कराना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्याकर्ण्य वचस्तासां धर्मपुत्रः प्रतापवान्।<br>विमर्शमकरोञ्चित्ते किं कर्तव्यं मयाधुना॥ १<br><br>हास्योऽहं मुनिवृन्देषु भविष्याम्यद्य सङ्गमात्।<br>अहंकारादिदं प्राप्तं दुःखं नात्र विचारणा।<br>मूलं धर्मविनाशस्य प्रथमं यदहङ्कृतिः॥ २<br><br>मूलं संसारवृक्षस्य यतः प्रोक्तो महात्मभिः।<br>दृष्ट्वा मौनं समाधाय न स्थितोऽहं समागतम्॥ ३<br><br>वाराङ्गनागणं जुष्टं तेनासं दुःखभाजनम्।<br>उत्पादितास्तथा नार्यो मया धर्मव्ययेन वै॥ ४<br><br>तास्तु मां बाधितुं वृत्ताः कामार्ताः प्रमदोत्तमाः।<br>ऊर्णनाभिरिवाद्याहं जालेन स्वकृतेन वै॥ ५<br><br>बद्धोऽस्मि सुदृढेनात्र किं कर्तव्यमतः परम्।<br>यदि चिन्तां समुत्सृज्य सन्त्यजाम्यबला इमाः॥ ६<br><br>शप्त्वा भ्रष्टा व्रजिष्यन्ति सर्वा भग्नमनोरथाः।<br>मुक्तोऽहं सञ्चरिष्यामि विजने परमं तपः॥ ७<br>तस्मात्क्रोधं समुत्पाद्य त्यक्ष्यामि सुन्दरीगणम्। | उन देवांगनाओंका वचन सुनकर धर्मपुत्र प्रतापी नारायण अपने मनमें विचार करने लगे कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं इस समय विषयभोगमें लिप्त होता हूँ तो मुनिसमुदायमें उपहासका पात्र बनूँगा। अहंकारसे ही मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें कोई संशय नहीं। धर्मके विनाशका मूल तथा प्रधान कारण अहंकार है। अतः महात्माओंने उसे संसाररूपी वृक्षका मूल कहा है॥ १-२\frac{१}{२}॥<br><br>इन वारांगनाओंके समूहको आया हुआ देखकर मैं मौन धारणकर स्थित नहीं रह सका और प्रसन्नतापूर्वक मैंने इनसे वार्तालाप किया, इसीलिये मैं दुःखका भाजन हुआ। अपने धर्मका व्यय करके मैंने उन उर्वशी आदि स्त्रियोंकी व्यर्थ रचना की। ये कामार्त अप्सराएँ मेरी तपस्यामें विघ्न डालनेमें प्रवृत्त हैं। मकड़ियोंके द्वारा बनाये गये जालकी भाँति अब अपने ही द्वारा उत्पादित सुदृढ़ जालमें मैं बुरी तरह फँस गया हूँ, अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि चिन्ता छोड़कर इन स्त्रियोंको अस्वीकार कर देता हूँ तो अपना मनोरथ निष्फल हुआ पाकर ये भ्रष्ट स्त्रियाँ मुझे शाप देकर चली जायेंगी। तब इनसे छुटकारा पाकर मैं निर्जन स्थानमें कठोर तप करूँगा। अतएव क्रोध उत्पन्न करके मैं इनका परित्याग कर दूँगा॥ ३—७\frac{१}{२}॥ |
| ४३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा मुनिर्नारायणस्तदा ॥ ८<br><br>विमर्षमकरोच्चित्ते सुखोत्पादनसाधने ।<br>द्वितीयोऽयं महाशत्रुः क्रोधः सन्तापकारकः ॥ ९<br><br>कामादप्यधिको लोके लोभादपि च दारुणः ।<br>क्रोधाभिभूतः कुरुते हिंसां प्राणविघातिनीम् ॥ १०<br><br>दुःखदां सर्वभूतानां नरकारामदीर्घिकाम् ।<br>यथाग्निर्घर्षणाज्जातः पादपं प्रदहेत्तथा ॥ ११<br><br>देहोत्पन्नस्तथा क्रोधो देहं दहति दारुणः । | व्यासजी बोले—मुनि नारायणने ऐसा निश्चय करके अपने मनमें विचार किया कि सुख-प्राप्तिके समस्त साधनोंमें [अहंकारके बाद] यह क्रोध दूसरा प्रबल शत्रु है, जो अत्यन्त कष्ट प्रदान करता है। यह क्रोध संसारमें काम तथा लोभसे भी अधिक भयंकर है। क्रोधके वशीभूत प्राणी प्राणघातक हिंसातक कर डालता है, जो (हिंसा) सभी प्राणियोंके लिये दुःखदायिनी तथा नरकरूपी बगीचेकी बावलीके तुल्य है। जिस प्रकार वृक्षोंके परस्पर घर्षणसे उत्पन्न अग्नि वृक्षको ही जला डालती है, उसी प्रकार शरीरसे उत्पन्न भीषण क्रोध उसी शरीरको जला डालता है॥ ८–११ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्यमानं तं भ्रातरं दीनमानसम् ॥ १२<br><br>उवाच वचनं तथ्यं नरो धर्मसुतोऽनुजः । | व्यासजी बोले—इस प्रकार खिन्नमनस्क होकर चिन्तन करते हुए अपने भाई नारायणसे उनके लघु भ्राता धर्मपुत्र नरने यह तथ्यपूर्ण वचन कहा॥ १२ १/२॥ |
| नर उवाच<br>नारायण महाभाग कोपं यच्छ महामते ॥ १३<br><br>शान्तं भावं समाश्रित्य नाशयाहङ्कृतिं पराम् ।<br>पुराहङ्कारदोषेण तपो नष्टं किलावयोः ॥ १४ | नर बोले—हे नारायण! हे महाभाग! हे महामते! आप क्रोधका त्याग कीजिये और शान्तभावका आश्रय लेकर इस प्रबल अहंकारका नाश कीजिये; क्योंकि पूर्व समयमें इसी अहंकारके दोषसे हम दोनोंका तप विनष्ट हो गया था॥ १३-१४॥ |
| संग्रामश्चाभवत्ताभ्यां भावाभ्यामसुरेण ह ।<br>दिव्यवर्षसहस्रं तु प्रह्लादेन महाद्भुतम् ॥ १५<br><br>दुःखं बहुतरं प्राप्तं तत्रावाभ्यां सुरोत्तम ।<br>तस्मात्क्रोधं परित्यज्य शान्तो भव मुनीश्वर ॥ १६<br><br>(शान्तत्वं तपसो मूलं मुनिभिः परिकीर्तितम् ।) | अहंकार तथा क्रोध—इन्हीं दोनों भावोंके कारण हमलोगोंको असुरराज प्रह्लादके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त अद्भुत युद्ध करना पड़ा था। हे सुरश्रेष्ठ! उस युद्धमें हम दोनोंको महान् क्लेश मिला था। अतएव हे मुनीश्वर! आप क्रोधका परित्याग करके शान्त हो जाइये॥ १५-१६॥ (मुनियोंने शान्तिको तपस्याका मूल बतलाया है।) |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शान्तोऽभूद्धर्मनन्दनः । | व्यासजी बोले—उनकी यह बात सुनकर धर्मपुत्र नारायण शान्त हो गये॥ १६ १/२॥ |
| जनमेजय उवाच<br>संशयोऽयं मुनिश्रेष्ठ प्रह्लादेन महात्मना ॥ १७<br><br>विष्णुभक्तेन शान्तेन कथं युद्धं कृतं पुरा ।<br>कृतवन्तौ कथं युद्धं नरनारायणावृषी ॥ १८ | जनमेजय बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह सन्देह उत्पन्न हो गया है कि शान्त स्वभाववाले विष्णुभक्त महात्मा प्रह्लादने पूर्वकालमें यह युद्ध क्यों किया और ऋषि नर-नारायणने भी संग्राम क्यों किया?॥ १७-१८॥ |
| तापसौ धर्मपुत्रौ द्वौ सुशान्तमानसावुभौ ।<br>समागमः कथं जातस्तयोर्दैत्यसुतस्य च ॥ १९ | धर्मपुत्र नर-नारायण—ये दोनों ही अत्यन्त शान्त स्वभाववाले तपस्वी थे। ऐसी स्थितिमें दैत्यपुत्र प्रह्लाद तथा उन दोनों ऋषियोंका सम्पर्क कैसे हुआ?॥ १९॥ |
| अ० ७ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| संग्रामस्तु कथं ताभ्यां कृतस्तेन महात्मना।<br>प्रह्लादोऽप्यतिधर्मात्मा ज्ञानवान्विष्णुतत्परः॥ २० | प्रह्लाद भी अत्यन्त धर्मपरायण, ज्ञानसम्पन्न तथा विष्णुभक्त थे, तब महात्मा प्रह्लादने उन ऋषियोंके साथ युद्ध क्यों किया ?॥ २०॥ |
| नरनारायणौ तद्वत्तापसौ सत्त्वसंस्थितौ।<br>तेन ताभ्यां समुद्भूतं वैरं यदि परस्परम्॥ २१<br><br>तदा तपसि धर्मे च श्रम एव हि केवलम्।<br>क्व जपः क्व तपश्चर्या पुरा सत्ययुगेऽपि च॥ २२ | तपस्वी नर-नारायण भी प्रह्लादकी ही भाँति सात्त्विक भावसे सम्पन्न थे। उन दोनों ऋषियों तथा प्रह्लादमें यदि परस्पर वैर उत्पन्न हो गया तो फिर उनकी तपस्या तथा धर्माचरणके पालनमें केवल परिश्रम ही उनके हाथ लगा। उस सत्ययुगमें भी उनके जप तथा घोर तप कहाँ चले गये थे ?॥ २१-२२॥ |
| तादृशैनं जितं चित्तं क्रोधाहङ्कारसंवृतम्।<br>न क्रोधो न च मात्सर्यमहङ्कारांकुरं विना॥ २३<br><br>अहङ्कारात्समुत्पन्नाः कामक्रोधादयः किल।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु तपः कृत्वातिदारुणम्॥ २४<br><br>अहङ्कारांकुरे जाते व्यर्थं भवति सर्वथा।<br>यथा सूर्योदये जाते तमोरूपं न तिष्ठति॥ २५<br><br>अहङ्कारांकुरस्याग्रे तथा पुण्यं न तिष्ठति। | वैसे वे महात्मा भी क्रोध और अहंकारसे भरे अपने मनको वशमें नहीं कर सके। अहंकाररूपी बीजके अंकुरित हुए बिना क्रोध तथा मात्सर्य उत्पन्न नहीं होते हैं। यह निश्चित है कि काम-क्रोध आदि अहंकारसे ही उत्पन्न होते हैं। हजार करोड़ वर्षोंतक घोर तपस्या करनेके पश्चात् भी यदि अहंकारका अंकुरण हुआ तो फिर सब कुछ निरर्थक हो जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होनेपर अन्धकार नहीं ठहरता, उसी प्रकार अहंकाररूपी अंकुरके समक्ष पुण्य नहीं ठहर पाता है॥ २३-२५ ½॥ |
| प्रह्लादोऽपि महाभाग हरिणा समयुध्यत॥ २६<br><br>तदा व्यर्थं कृतं सर्वं सुकृतं किल भूतले। | हे महाभाग! प्रह्लादने भी भगवान् नर-नारायणके साथ संग्राम किया, जिसके कारण पृथ्वीपर उनके द्वारा अर्जित समस्त पुण्य व्यर्थ हो गया॥ २६ ½॥ |
| नरनारायणौ शान्तौ विहाय परमं तपः॥ २७<br><br>कृतवन्तौ यदा युद्धं क्व शमः सुकृतं पुनः। | शान्त स्वभाववाले नर-नारायण भी अपनी कठिन तपस्या त्यागकर यदि युद्ध करनेमें तत्पर हुए तो फिर उनकी शान्तिवृत्ति तथा पुण्यशीलताका क्या महत्त्व रहा ?॥ २७ ½॥ |
| ईदृग्भ्यां सत्त्वयुक्ताभ्यामजेया यद्यहङ्कृतिः॥ २८<br><br>मादृशानाञ्च का वार्ता मुनेऽहङ्कारसंक्षये।<br>अहङ्कारपरित्यक्तो न कोऽप्यस्ति जगत्त्रये॥ २९<br><br>न भूतो भविता नैव यस्त्यक्तस्तेन सर्वथा। | हे मुने! जब सात्त्विक भावोंसे सम्पन्न इस प्रकारके वे दोनों महात्मा भी अहंकारपर विजय प्राप्त करनेमें असमर्थ रहे, तब मेरे-जैसे व्यक्तियोंके लिये अहंकार नष्ट करनेकी बात ही क्या है? इस त्रिलोकमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो अहंकारसे मुक्त हो, इसी तरह ऐसा कोई भी न तो हुआ है और न होगा, जो अहंकारसे पूर्णतया मुक्त हो॥ २८-२९ ½॥ |
| मुच्यते लोहनिगडैर्बद्धः काष्ठमयैस्तथा॥ ३०<br><br>अहङ्कारनिबद्धस्तु न कदाचिद्विमुच्यते।<br>अहङ्कारावृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३१ | काष्ठ तथा लोहेकी जंजीरमें बँधा हुआ व्यक्ति बन्धनमुक्त हो सकता है, किंतु अहंकारसे बँधा व्यक्ति कभी भी नहीं छूट सकता। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् अहंकारसे व्याप्त है॥ ३०-३१॥ |
| ४३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| भ्रमत्येव हि संसारे विष्ठामूत्रप्रदूषिते ।<br>ब्रह्मज्ञानं कुतस्तावत्संसारे मोहसंवृते ॥ ३२ | अहंकारी मनुष्य मल-मूत्रसे प्रदूषित इस संसारमें चक्कर काटता रहता है, तो फिर इस मोहाच्छन्न संसारमें ब्रह्मज्ञानकी कल्पना ही कहाँ रह गयी ? ॥ ३२ ॥ |
| मतं मीमांसकानां वै सम्मतं भाति सुव्रत ।<br>महान्तोऽपि सदा युक्ताः कामक्रोधादिभिर्मुने ॥ ३३<br><br>मादृशानां कलावस्मिन्का कथा मुनिसत्तम । | हे सुव्रत! मुझे तो मीमांसकोंका कर्म-सिद्धान्त ही उचित प्रतीत होता है। हे मुने! जब महान्-से-महान् लोग भी काम, क्रोध आदिसे सदा ग्रस्त रहते हैं, तब हे मुनिश्रेष्ठ! इस कलियुगमें मुझ-जैसे लोगोंकी बात ही क्या ? ॥ ३३ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>कार्यं वै कारणाद्भिन्नं कथं भवति भारत ॥ ३४<br><br>कटकं कुण्डलञ्चैव सुवर्णसदृशं भवेत् ।<br>अहङ्कारोद्भवं सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम् ॥ ३५<br><br>पटस्तन्तुवशः प्रोक्तस्तद्वियुक्तः कथं भवेत् ।<br>मायागुणैस्त्रिभिः सर्वं रचितं स्थिरजङ्गमम् ॥ ३६<br><br>सतृणस्तम्बपर्यन्तं का तत्र परिदेवना ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्ते चाहङ्कारमोहिताः ॥ ३७<br><br>भ्रमन्त्यस्मिन्महागाधे संसारे नृपसत्तम ।<br>वसिष्ठनारदाद्याश्च मुनयो ज्ञानिनः परम् ॥ ३८<br><br>तेऽभिभूताः संसरन्ति संसारेऽस्मिन्पुनः पुनः ।<br>न कोऽप्यस्ति नृपश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु देहभृत् ॥ ३९<br><br>एभिर्मायागुणैर्मुक्तः शान्त आत्मसुखे स्थितः ।<br>कामक्रोधौ तथा लोभो मोहोऽहङ्कारसम्भवः ॥ ४० | व्यासजी बोले—हे भारत (जनमेजय)! कारणसे कार्य भिन्न कैसे हो सकता है? कड़ा तथा कुण्डल आकारमें भिन्न होते हुए भी स्वर्णके सदृश होते हैं। चराचरसहित समस्त ब्रह्माण्ड अहंकारसे उत्पन्न हुआ है। [धागेसे निर्मित होनेके कारण] वस्त्र उसके अधीन कहा गया है, अतएव वस्त्ररूपी कार्य तन्तुरूपी कारणसे पृथक् कैसे रह सकता है? जब मायाके तीनों गुणोंद्वारा ही तिनकेसे लेकर पर्वततक स्थावर-जंगमात्मक यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विरचित है, तब सृष्टिके विषयमें खेद किस बातका? हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव भी अहंकारसे मोहित होकर इस अत्यन्त अगाध संसारमें भ्रमण करते रहते हैं। वसिष्ठ, नारद आदि परम ज्ञानी मुनिगण भी अहंकारके वशवर्ती होकर इस संसारमें बार-बार आते-जाते रहते हैं। हे नृपश्रेष्ठ! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई भी देहधारी नहीं है जो मायाके इन गुणोंसे मुक्त होकर शान्ति धारण करता हुआ आत्मसुखका अनुभव कर सके। हे नृपश्रेष्ठ! अहंकारसे उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ तथा मोह किसी भी देहधारी प्राणीको नहीं छोड़ते ॥ ३४-४० १/२ ॥ |
| न मुञ्चन्ति नरं सर्वं देहवन्तं नृपोत्तम ।<br>अधीत्य वेदशास्त्राणि पुराणानि विचिन्त्य च ॥ ४१<br><br>कृत्वा तीर्थाटनं दानं ध्यानञ्चैव सुरार्चनम् ।<br>करोति विषयासक्तः सर्वं कर्म च चौरवत् ॥ ४२<br><br>विचारयति नो पूर्वं काममोहमदान्वितः । | वेद-शास्त्रोंका अध्ययन, पुराणोंका पर्यालोचन, तीर्थभ्रमण, दान, ध्यान तथा देव-पूजन करके भी विषयासक्त प्राणी चोरोंकी भाँति सभी कर्म करता रहता है। काम, मोह और मदसे युक्त होनेके कारण प्राणी आरम्भमें कुछ विचार ही नहीं करता ॥ ४१-४२ १/२ ॥ |
| कृते युगेऽपि त्रेतायां द्वापरे कुरुनन्दन ॥ ४३<br>विद्धोऽत्रास्ति च धर्मोऽपि का कथाद्य कलौ पुनः । | हे कुरुनन्दन! सत्ययुग, त्रेता तथा द्वापरमें भी धर्मका विरोध किया गया था, तो आज कलियुगमें |
| अ० ७ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्पर्धा सदैव सद्द्रोहा लोभामर्षौ च सर्वदा ॥ ४४<br><br>एवंविधोऽस्ति संसारो नात्र कार्या विचारणा।<br>साधवो विरला लोके भवन्ति गतमत्सराः ॥ ४५<br><br>जितक्रोधा जितामर्षा दृष्टान्तार्थं व्यवस्थिताः। | उसकी बात ही क्या! इसमें तो द्रोह, स्पर्धा, लोभ तथा क्रोध सर्वदा ही विद्यमान हैं। संसार ऐसे ही स्वभाववाला है; इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। संसारमें मत्सरहीन साधु पुरुष विरले ही होते हैं। क्रोध तथा ईर्ष्यापर विजय प्राप्त कर लेनेवाले तो दृष्टान्तमात्रके लिये मिलते हैं॥ ४३—४५ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>ते धन्याः कृतपुण्यास्ते मदमोहविवर्जिताः ॥ ४६<br><br>जितेन्द्रियाः सदाचारा जितं तैर्भुवनत्रयम्।<br>दुनोमि पातकं स्मृत्वा पितुर्मम महात्मनः ॥ ४७<br><br>कृतस्तपस्विनः कण्ठे मृतसर्पो ह्यघं विना।<br>अतस्तस्य मुनिश्रेष्ठ भविता किं ममाग्रतः ॥ ४८<br><br>न जाने बुद्धिसम्मोहात्किं वा कार्यं भविष्यति।<br>मधु पश्यति मूढात्मा प्रपातं नैव पश्यति ॥ ४९<br><br>करोति निन्दितं कर्म नरकान्न बिभेति च। | राजा बोले—वे लोग धन्य तथा पुण्यात्मा हैं, जिन्होंने मद तथा मोहसे छुटकारा प्राप्त कर लिया है। जो सदाचारपरायण तथा जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने मानो तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली है। अपने महात्मा पिताके पापका स्मरण करके मैं दुःखित रहता हूँ। उन्होंने बिना किसी अपराधके एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प डाल दिया। अतः हे मुनिवर! अब मेरे आगे उनकी क्या गति होगी? बुद्धिके मोहग्रस्त हो जानेपर क्या कार्य हो जायगा, यह मैं नहीं जानता। मूर्ख मनुष्य केवल मधु देखता है, किंतु उसके पास ही विद्यमान [गहरे] प्रपातकी ओर नहीं निहारता। वह निन्दनीय कर्म करता रहता है और नरकसे नहीं डरता॥ ४६—४९ १/२ ॥ |
| कथं युद्धं पुरा वृत्तं विस्तरात्तद्वदस्व मे ॥ ५०<br><br>प्रह्लादेन यथा चोग्रं नरनारायणस्य वै।<br>प्रह्लादस्तु कथं यातः पातालात्तद्वदस्व मे ॥ ५१<br><br>सारस्वते महातीर्थे पुण्ये बदरिकाश्रमे।<br>नरनारायणौ शान्तौ तापसौ मुनिसत्तमौ ॥ ५२<br><br>कृतवन्तौ तथा युद्धं हेतुना केन मानद। | [हे मुने!] अब आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बताइये कि पूर्वकालमें प्रह्लादके साथ नर-नारायणका घोर युद्ध क्यों हुआ था? प्रह्लाद पाताल-लोकसे सारस्वत महातीर्थ पवित्र बदरिकाश्रममें कैसे पहुँचे, यह भी मुझे बताइये। शान्त स्वभाववाले मुनिश्रेष्ठ नर-नारायण तो महान् तपस्वी थे; तब हे मानद! उन दोनोंने प्रह्लादके साथ युद्ध किस कारणसे किया?॥ ५०—५२ १/२ ॥ |
| वैरं भवति वित्तार्थं दारार्थं वा परस्परम् ॥ ५३<br><br>एषणारहितौ कस्माच्चक्रतुः प्रधनं महत्।<br>प्रह्लादोऽपि च धर्मात्मा ज्ञात्वा देवौ सनातनौ ॥ ५४<br><br>कृतवान्स कथं युद्धं नरनारायणौ मुनी।<br>एतद्विस्तरतो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि कारणम् ॥ ५५ | प्रायः धन अथवा स्त्रीके लिये लोगोंमें परस्पर शत्रुता होती है। तब हर प्रकारकी इच्छाओंसे रहित उन दोनोंने वह भीषण युद्ध क्यों किया और उन नर-नारायणको सनातन देवता जानते हुए भी महात्मा प्रह्लादने उनके साथ युद्ध क्यों किया? हे ब्रह्मन्! मैं विस्तारपूर्वक इसका कारण सुनना चाहता हूँ॥ ५३—५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
अहङ्कारावर्तनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
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| ४३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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अथाष्टमोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको प्रह्लादकी कथा सुनाना और इस प्रसंगमें च्यवनऋषिके पाताललोक जानेका वर्णन
</div>| <div align="center">सूत उवाच</div>इति पृष्टस्तदा विप्रो राज्ञा पारीक्षितेन वै।<br>उवाच विस्तरात्सर्वं व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १॥ | **सूतजी बोले—**परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजयके यह पूछनेपर सत्यवतीसुत विप्र व्यासजीने विस्तारपूर्वक सारा वृत्तान्त बताया॥ १॥ |
| जनमेजयोऽपि धर्मात्मा निर्वेदं परमं गतः।<br>चित्तं दुश्चरितं मत्वा वैराटीतनयस्य वै॥ २॥ | धर्मपरायण राजा जनमेजय भी उत्तरापुत्र अपने पिता परीक्षित्की कुत्सित चेष्टाको सोच-सोचकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे॥ २॥ |
| तस्यैवोद्धरणार्थाय चकार सततं मनः।<br>विप्रावमानपापेन यमलोकं गतस्य वै॥ ३॥ | विप्रको अपमानित करनेके परिणामस्वरूप पापके कारण यमलोकको प्राप्त अपने उन पिताके उद्धारके लिये वे निरन्तर अपने मनमें अनेक प्रकारके उपाय सोचा करते थे॥ ३॥ |
| पुन्नामनरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं स्वकम्।<br>पुत्रेति नाम सार्थं स्यात्तेन तस्य मुनीश्वराः॥ ४॥ | हे मुनीश्वरो! जब पुत्र अपने पिताकी 'पुम्' नामक नरकसे रक्षा कर देता है, तभी उसका 'पुत्र' नाम सार्थक होता है॥ ४॥ |
| सर्पदष्टं नृपं श्रुत्वा हर्म्योपरि मृतं तथा।<br>विप्रशापादौत्तरेयं स्नानदानविवर्जितम्॥ ५॥<br>पितुर्गतिं निशम्यासौ निर्वेदं गतवान्नृपः।<br>पारीक्षितो महाभागः सन्तप्तो भयविह्वलः॥ ६॥ | जब उन्हें यह विदित हुआ कि एक महलकी ऊपरी मंजिलमें स्नान-दान किये बिना ही विप्रके शापवश सर्प-दंशसे महाराज परीक्षित्की मृत्यु हुई थी, तब अपने पिताकी दुर्गति सुनकर वे राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखित हुए और शोकसे सन्तप्त तथा भयसे व्याकुल हो उठे॥ ५-६॥ |
| पप्रच्छाथ मुनिं व्यासं गृहागतमनिन्दितः।<br>नरनारायणस्येमां कथां परमविस्तृताम्॥ ७॥ | इसके अनन्तर निष्पाप राजा जनमेजयने अपने घरपर स्वतः आये हुए महामुनि व्याससे नर-नारायणकी अति विस्तृत इस कथाके विषयमें पूछा॥ ७॥ |
| <div align="center">व्यास उवाच</div>स यदा निहतो रौद्रो हिरण्यकशिपुर्नृप।<br>अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम तत्सुतः॥ ८॥ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! जब नृसिंहभगवान्के द्वारा उस भयानक हिरण्यकशिपुका वध हो गया, तब प्रह्लाद नामक उसके पुत्रका राज्याभिषेक किया गया॥ ८॥ |
| तस्मिञ्छासति दैत्येन्द्रे देवब्राह्मणपूजके।<br>मखैर्भूमौ नृपतयो यजन्तः श्रद्धयान्विताः॥ ९॥ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन-सम्मान करनेवाले उस दैत्यराज प्रह्लादके शासनकालमें पृथ्वी-लोकके सभी राजागण श्रद्धापूर्वक यज्ञादिका अनुष्ठान करने लगे॥ ९॥ |
| ब्राह्मणाश्च तपोधर्मतीर्थयात्राश्च कुर्वते।<br>वैश्याश्च स्वस्ववृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः॥ १०॥ | ब्राह्मणलोग तपश्चरण, धर्मानुष्ठान तथा तीर्थाटनमें तत्पर हो गये; वैश्यसमुदाय अपने-अपने व्यावसायिक कार्योंमें लग गये तथा शूद्रगण सेवापरायण हो गये॥ १०॥ |