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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८


अथ कामार्दिता प्राह सखीं छन्दोऽनुवर्तिनीम्।<br>विकारश्च समुत्पन्नो देहे यच्छ्रवणादनु ॥ ३<br><br>अज्ञातरसविज्ञानं कुमारं कुलसम्भवम्।<br>धुनोति मदनः पापः किं करोमि क्व यामि च ॥ ४तदनन्तर उस शशिकलाने अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाली एक सखीसे कहा कि रससे अनभिज्ञ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न उस राजकुमारके विषयमें सुनकर मेरे शरीरमें विकार उत्पन्न हो गया है। इस समय कामदेव मुझे अत्यधिक पीड़ा दे रहा है। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? ॥ ३-४ ॥
स्वप्नेषु वा मया दृष्टः पञ्चबाण इवापरः।<br>तपते मे मनोऽत्यर्थं विरहाकुलितं मृदु ॥ ५जबसे मैंने स्वप्नमें दूसरे कामदेवके सदृश उस राजकुमारको देखा है, तभीसे विरहसे आकुल हुआ मेरा कोमल मन अत्यधिक सन्तप्त हो रहा है ॥ ५ ॥
चन्दनं देहलग्नं मे विषवद्भाति भामिनि।<br>स्रगियं सर्पवच्चैव चन्द्रपादाश्च वह्निवत् ॥ ६हे भामिनि! इस समय मेरे शरीरमें लगा हुआ चन्दन विषके समान, यह माला सर्पके तुल्य तथा चन्द्रमाकी किरणें अग्निसदृश प्रतीत हो रही हैं ॥ ६ ॥
न च हर्म्ये वने शं मे दीर्घिकायां न पर्वते।<br>न दिवा न निशायां वा न सुखं सुखसाधनैः ॥ ७इस समय महलमें, वनमें, बावलीमें तथा पर्वतपर—कहीं भी मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिल पा रही है। नानाविध सुख-साधनोंसे दिनमें अथवा रातमें किसी भी समय सुखकी अनुभूति नहीं हो रही है ॥ ७ ॥
न शय्या न च ताम्बूलं न गीतं न च वादनम्।<br>प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य न तृप्ते मम लोचने ॥ ८शय्या, ताम्बूल, गायन तथा वादन—इनमें कोई भी चीजें मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर पा रही हैं और न तो मेरे नेत्रोंको कोई भी वस्तु तृप्त ही कर पा रही है ॥ ८ ॥
प्रयाम्यद्य वने तत्र यत्रासौ वर्तते शठः।<br>भीतास्मि कुललज्जायाः परतन्त्रा पितुस्तथा ॥ ९[जी करता है] उसी वनमें चली जाऊँ जहाँ वह निष्ठुर विद्यमान है, किंतु कुलकी लज्जाके कारण भयभीत हूँ, और फिर अपने पिताके अधीन भी हूँ ॥ ९ ॥
स्वयंवरं पिता मेऽद्य न करोति करोमि किम्।<br>दास्यामि राजपुत्राय कामं सुदर्शनाय वै ॥ १०क्या करूँ, मेरे पिता अभी मेरा स्वयंवर भी नहीं आयोजित कर रहे हैं। [यदि स्वयंवर हुआ तो] मैं इच्छापूर्वक अपनेको सुदर्शनको समर्पित कर दूँगी ॥ १० ॥
सन्त्यन्ये पृथिवीपालाः शतशः सम्भृतर्द्धयः।<br>रमणीया न मे तेऽद्य राज्यहीनोऽप्यसौ मतः ॥ ११यद्यपि दूसरे सैकड़ों समृद्धिशाली नरेश हैं, परंतु वे मुझे रमणीय नहीं लगते। राज्यहीन होते हुए भी इस सुदर्शनको मैं अधिक रमणीय मानती हूँ ॥ ११ ॥
व्यास उवाच<br>एकाकी निर्धनश्चैव बलहीनः सुदर्शनः।<br>वनवासी फलाहारस्तस्याश्चित्ते सुसंस्थितः ॥ १२<br><br>वाग्बीजस्य जपात्सिद्धिस्तस्या एषाप्युपस्थिता।<br>सोऽपि ध्यानपरोऽत्यन्तं जजाप मन्त्रमुत्तमम् ॥ १३**व्यासजी बोले—**अकेला, निर्धन, बलहीन, वनवासी तथा फलका आहार करनेवाला होते हुए भी सुदर्शन उस शशिकलाके हृदयमें पूर्णरूपसे बस गया था। भगवतीके वाग्बीजमन्त्रके जपसे सुदर्शनको यह सिद्धि प्राप्त हो गयी थी। वह पूर्णरूपसे ध्यानमग्न होकर उस सर्वोत्तम मन्त्रका निरन्तर जप करता रहता था ॥ १२-१३ ॥
अ० १८ ]तृतीय स्कन्ध३३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्वप्ने पश्यत्यसौ देवीं विष्णुमायामखण्डिताम्।<br>विश्वमातरमव्यक्तां सर्वसम्पत्कराम्बिकाम्॥ १४एक बार स्वप्नमें सुदर्शनने उन अव्यक्त, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा, जगज्जननी, विष्णुमाया तथा सभी सम्पदा प्रदान करानेवाली भगवती अम्बिकाका दर्शन किया॥ १४॥
शृङ्गवेरपुराध्यक्षो निषादः समुपेत्य तम्।<br>ददौ रथवरं तस्मै सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १५<br><br>चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं पताकावरमण्डितम्।<br>जैत्रं राजसुतं ज्ञात्वा ददौ चोपायनं तदा॥ १६<br><br>सोऽपि जग्राह तं प्रीत्या मित्रत्वेन सुसंस्थितम्।<br>वन्यैर्मूलफलैः सम्यगर्चयामास शम्बरम्॥ १७उसी समय शृंगवेरपुरके अधिपति निषादने सुदर्शनके पास आकर उसे सब प्रकारकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण उत्तम रथ प्रदान किया। उस रथमें चार घोड़े जुते हुए थे और वह सुन्दर पताकासे सुशोभित था। निषादराजने राजकुमार सुदर्शनको विजयशाली समझकर उसे भेंटस्वरूप वह रथ दिया था। सुदर्शनने भी प्रेमपूर्वक उसे स्वीकार कर लिया और मित्ररूपमें आये हुए उस निषादका वन्य फल-मूलोंसे भलीभाँति सत्कार किया॥ १५-१७॥
कृतातिथ्ये गते तस्मिन्निषादाधिपतौ तदा।<br>मुनयः प्रीतियुक्तास्ते तमूचुस्तापसा मिथः॥ १८<br><br>राजपुत्र ध्रुवं राज्यं प्राप्स्यसि त्वं च सर्वथा।<br>स्वल्पैरहोभिरव्यग्रः प्रतापान्नात्र संशयः॥ १९<br><br>प्रसन्ना तेऽम्बिका देवी वरदा विश्वमोहिनी।<br>सहायस्तु सुसम्पन्नो न चिन्तां कुरु सुव्रत॥ २०तब आतिथ्य स्वीकार करके उस निषादराजके चले जानेपर वहाँके तपस्वी मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर सुदर्शनसे कहने लगे—हे राजकुमार! आप धैर्यवान् हैं; भगवतीकी कृपासे थोड़े ही दिनोंमें निश्चय ही अपना राज्य प्राप्त करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रत! विश्वमोहिनी और वरदायिनी भगवती अम्बिका आपके ऊपर प्रसन्न हैं। अब आपको उत्तम सहायक भी मिल गया है, आप चिन्ता न करें॥ १८-२०॥
मनोरमां तथोचुस्ते मुनयः संशितव्रताः।<br>पुत्रस्तेऽद्य धराधीशो भविष्यति शुचिस्मिते॥ २१तत्पश्चात् उन व्रतधारी मुनियोंने मनोरमासे कहा—हे शुचिस्मिते! अब आपका पुत्र सुदर्शन शीघ्र ही भूमण्डलका राजा होगा॥ २१॥
सा तानुवाच तन्वङ्गी वचनं वोऽस्तु सत्फलम्।<br>दासोऽयं भवतां विप्राः किं चित्रं सदुपासनात्॥ २२<br><br>न सैन्यं सचिवाः कोशो न सहायश्च कश्चन।<br>केन योगेन पुत्रो मे राज्यं प्राप्तुमिहार्हति॥ २३<br><br>आशीर्वादाेश्च वो नूनं पुत्रोऽयं मे महीपतिः।<br>भविष्यति न सन्देहो भवन्तो मन्त्रवित्तमाः॥ २४तब उस कोमलांगी मनोरमाने उनसे कहा—आपलोगोंका वचन सफल हो। हे विप्रगण! यह सुदर्शन आपलोगोंका सेवक है। सच्ची उपासनासे सब कुछ सम्भव हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही क्या? [किंतु] उसके पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न कोई सहायक ही है। [ऐसी दशामें] किस उपायसे मेरा पुत्र राज्य पानेके योग्य बन सकता है? आपलोग मन्त्रके पूर्णवेत्ता हैं, अतः आपलोगोंके आशीर्वचनोंसे मेरा यह पुत्र निश्चय ही राजा होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२-२४॥
३३६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
रथारूढः स मेधावी यत्र याति सुदर्शनः।<br>अक्षौहिणीसमावृत्त इवाभाति स तेजसा॥ २५<br><br>प्रतापो मन्त्रबीजस्य नान्यः कश्चन भूपते।<br>एवं वै जपतस्तस्य प्रीतियुक्तस्य सर्वथा॥ २६रथपर सवार होकर मेधावी सुदर्शन जहाँ भी जाता था, वहाँ वह अपने तेजसे एक अक्षौहिणी सेनासे आवृत प्रतीत होता था। हे भूप! यह उस बीजमन्त्रका ही प्रभाव था, दूसरा कोई कारण नहीं; क्योंकि वह सुदर्शन सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक उसी मन्त्रका जप किया करता था॥ २५-२६॥
सम्प्राप्य सद्गुरोर्बीजं कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>जपेद्यस्तु शुचिः शान्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २७जो मनुष्य किसी सद्गुरुसे कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र ग्रहण करके शान्त होकर पवित्रतापूर्वक उसका जप करता है, वह अपनी सभी कामनाएँ पूर्ण कर लेता है॥ २७॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि वापि सुदुर्लभम्।<br>प्रसन्नायाः शिवायाश्च यदप्राप्यं नृपोत्तम॥ २८हे नृपश्रेष्ठ! भूतलपर अथवा स्वर्गमें भी कोई ऐसा अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ नहीं है, जो कल्याणकारिणी भगवतीके प्रसन्न होनेपर न मिल सके॥ २८॥
ते मन्दास्तेऽतिदुर्भाग्या रोगैस्ते समभिद्रुताः।<br>येषां चित्ते न विश्वासो भवेदम्बार्थनादिषु॥ २९वे महान् मूर्ख, भाग्यहीन तथा रोगोंसे व्यथित होते हैं, जिनके मनमें जगदम्बाके अर्चन आदिमें विश्वास नहीं होता॥ २९॥
या माता सर्वदेवानां युगादौ परिकीर्तिता।<br>आदिमातेति विख्याता नाम्ना तेन कुरूद्वह॥ ३०<br><br>बुद्धिः कीर्तिर्धृतिर्लक्ष्मीः शक्तिः श्रद्धा मतिः स्मृतिः।<br>सर्वेषां प्राणिनां सा वै प्रत्यक्षं वै विभासते॥ ३१हे कुरुनन्दन! जो भगवती युगके आदिमें सब देवताओंकी माता कही गयी थीं, इसी कारण आदिमाता—इस नामसे विख्यात हैं; वे ही बुद्धि, कीर्ति, धृति, लक्ष्मी, शक्ति, श्रद्धा, मति और स्मृति आदि रूपोंसे समस्त प्राणियोंमें प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं॥ ३०-३१॥
न जानन्ति नरा ये वै मोहिता मायया किल।<br>न भजन्ति कुतर्कज्ञा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्॥ ३२जो लोग मायासे मोहित हैं, वे उन्हें नहीं जान पाते। कुतर्क करनेवाले मनुष्य उन भुवनेश्वरी भगवती शिवाका भजन नहीं करते॥ ३२॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्वासवो वरुणो यमः।<br>वायुरग्निः कुबेरश्च त्वष्टा पूषाश्विनौ भगः॥ ३३<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।<br>सर्वे ध्यायन्ति तां देवीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्॥ ३४ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, वायु, अग्नि, कुबेर, त्वष्टा, पूषा, दोनों अश्विनीकुमार, भग, आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव एवं मरुद्गण—ये सभी देवता सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली उन भगवतीका ध्यान करते हैं॥ ३३-३४॥
को न सेवेत विद्वान्वै तां शक्तिं परमात्मिकाम्।<br>सुदर्शनेन सा ज्ञाता देवी सर्वार्थदा शिवा॥ ३५कौन ऐसा विद्वान् है, जो उन परमात्मिका शक्तिकी आराधना न करता हो? सुदर्शनने सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन्हीं कल्याणकारिणी भगवतीको जान लिया था॥ ३५॥
ब्रह्मैव सातिदुष्प्राप्या विद्याविद्यास्वरूपिणी।<br>योगगम्या परा शक्तिर्मुमुक्षूणां च वल्लभा॥ ३६वे विद्या तथा अविद्यास्वरूपा भगवती ही ब्रह्म हैं और अत्यन्त दुष्प्राप्य हैं। वे पराशक्ति योगद्वारा ही अनुभवगम्य हैं और मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको विशेष प्रिय हैं॥ ३६॥

| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३७ |
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| परमात्मस्वरूपं को वेत्तुमर्हति तां विना।<br>या सृष्टिं त्रिविधां कृत्वा दर्शयत्यखिलात्मने ॥ ३७<br><br>सुदर्शनस्तु तां देवीं मनसा परिचिन्तयन्।<br>राज्यलाभात्परं प्राप्य सुखं वै कानने स्थितः ॥ ३८ | उन भगवतीके बिना परमात्माका स्वरूप जाननेमें कौन समर्थ है? जो तीन प्रकारकी सृष्टि करके सर्वात्मा भगवान्‌को दिखलाती हैं, उन्हीं भगवतीका मनसे सम्यक् चिन्तन करता हुआ राजकुमार सुदर्शन राज्य-प्राप्तिसे भी अधिक सुखका अनुभव करके वनमें रहता था ॥ ३७-३८ ॥ |
| सापि चन्द्रकलात्यर्थं कामबाणप्रपीडिता।<br>नानोपचारैरनिशं दधार दुःखितं वपुः ॥ ३९ | उधर, वह शशिकला भी कामसे निरन्तर अत्यधिक पीड़ित रहती हुई नानाविध उपचारोंसे किसी प्रकार अपना दुःखित शरीर धारण किये हुए थी ॥ ३९ ॥ |
| तावत्तस्याः पिता ज्ञात्वा कन्यां पुत्रवरार्थिनीम्।<br>सुबाहुः कारयामास स्वयंवरमतन्द्रितः ॥ ४० | इसी बीच उसके पिता सुबाहुने कन्या शशिकलाको वरकी अभिलाषिणी जानकर बड़ी सावधानीके साथ स्वयंवर आयोजित कराया ॥ ४० ॥ |
| स्वयंवरस्तु त्रिविधो विद्वद्भिः परिकीर्तितः।<br>राज्ञां विवाहयोग्यो वै नान्येषां कथितः किल ॥ ४१<br><br>इच्छास्वयंवरश्चैको द्वितीयश्च पणाभिधः।<br>यथा रामेण भग्नं वै त्र्यम्बकस्य शरासनम् ॥ ४२<br><br>तृतीयः शौर्यशुल्कश्च शूराणां परिकीर्तितः।<br>इच्छास्वयंवरं तत्र चकार नृपसत्तमः ॥ ४३ | विद्वानोंने स्वयंवरके तीन प्रकार बताये हैं। वह क्षत्रिय राजाओंके विवाहहेतु उचित कहा गया है, अन्यके लिये नहीं। उनमें प्रथम इच्छास्वयंवर है, जिसमें कन्या अपने इच्छानुसार पति स्वीकार करती है। दूसरा पणस्वयंवर है, जिसमें किसी प्रकारका पण (शर्त) रखा जाता है। जैसे भगवान् श्रीरामने [जानकीके स्वयंवरमें] शिवधनुष तोड़ा था। तीसरा स्वयंवर शौर्यशुल्क है, जो शूरवीरोंके लिये कहा गया है। नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उनमें इच्छास्वयंवरका आयोजन किया ॥ ४१—४३ ॥ |
| शिल्पिभिः कारिता मञ्चाः शुभैरास्तरणैर्युताः।<br>ततश्च विविधाकाराः सुक्लृप्ताः सभ्यमण्डपाः ॥ ४४ | शिल्पियोंद्वारा बहुत-से मंच बनवाये गये और उनपर सुन्दर आसन बिछाये गये। तत्पश्चात् राजाओंके बैठनेयोग्य विविध आकार-प्रकारके सभामण्डप बनवाये गये ॥ ४४ ॥ |
| एवं कृतेऽतिसम्भा‌रे विवाहार्थं सुविस्तरे।<br>सखीं शशिकला प्राह दुःखिता चारुलोचना ॥ ४५<br><br>इदं मे मातरं ब्रूहि त्वमेकान्ते वचो मम।<br>मया वृतः पतिश्चित्ते ध्रुवसंधिसुतः शुभः ॥ ४६<br><br>नान्यं वरं वरिष्यामि तमृते वै सुदर्शनम्।<br>स मे भर्ता नृपसुतो भगवत्या प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | इस प्रकार विवाहके लिये सम्पूर्ण सामग्री जुट जानेपर सुन्दर नेत्रोंवाली शशिकलाने दुःखित होकर अपनी सखीसे कहा—एकान्तमें जाकर तुम मेरी मातासे मेरा यह वचन कह दो कि मैंने अपने मनमें ध्रुवसन्धिके सुन्दर पुत्रका पतिरूपमें वरण कर लिया है। उन सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेको पति नहीं बनाऊँगी; क्योंकि स्वयं भगवतीने राजकुमार सुदर्शनको मेरा पति निश्चित कर दिया है ॥ ४५—४७ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा सखी गत्वा मातरं प्राह सत्वरा।<br>वैदर्भी विजने वाक्यं मधुरं मञ्जुभाषिणी ॥ ४८ | व्यासजी बोले—उसके ऐसा कहनेपर उस मृदुभाषिणी सखीने शशिकलाकी माता विदर्भसुताके पास शीघ्र जाकर एकान्तमें उनसे मधुर वाणीमें कहा— |

३३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९ ]

| पुत्री ते दुःखिता प्राह साध्वि त्वां मन्मुखेन यत्।<br>शृणु त्वं कुरु कल्याणि तद्धितं त्वरिताधुना॥ ४९<br><br>भारद्वाजाश्रमे पुण्ये ध्रुवसन्धिंसुतोऽस्ति यः।<br>स मे भर्त्ता वृतश्चित्ते नान्यं भूपं वृणोम्यहम्॥ ५० | ‘हे साध्वि! आपकी पुत्रीने अत्यन्त दुःखित होकर मेरे मुखसे आपको जो कहलाया है, उसे आप सुन लें और हे कल्याणि! इस समय शीघ्र ही उसका हित-साधन करें’। [उसका कथन है कि] भारद्वाजमुनिके आश्रममें जो ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन रहते हैं, उनका मैं अपने मनमें पतिरूपमें वरण कर चुकी हूँ। अतः मैं किसी दूसरे राजाका वरण नहीं करूँगी॥ ४८-५०॥ |
| व्यास उवाच<br>राज्ञी तद्वचनं श्रुत्वा स्वपतौ गृहमागते।<br>निवेदयामास तदा पुत्रीवाक्यं यथातथम्॥ ५१ | व्यासजी बोले—वह वचन सुनकर रानीने राजाके आनेपर पुत्रीकी सारी बातें ज्यों-की-त्यों उनको बतायीं॥ ५१॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विस्मितः प्रहसन्मुहुः।<br>भार्यामुवाच वैदर्भीं सुबाहुस्तु ऋतं वचः॥ ५२ | उसे सुनकर राजा सुबाहु आश्चर्यमें पड़ गये और बार-बार मुसकराते हुए वे अपनी भार्या विदर्भराजकुमारीसे यथार्थ बात कहने लगे—॥ ५२॥ |
| सुभ्रु जानासि बालोऽसौ राज्यान्निष्कासितो वने।<br>एकाकी सह मात्रा वै वसते निर्जने वने॥ ५३ | हे सुभ्रु! तुम तो यह जानती ही हो कि वह बालक राज्यसे निकाल दिया गया है और निर्जन वनमें अकेले ही अपनी माताके साथ रहता है। उसीके लिये राजा वीरसेन युधाजित्‌के द्वारा मार डाले गये। |
| तत्कृते निहतो राजा वीरसेनो युधाजिता।<br>स कथं निर्धनो भर्त्ता योग्यः स्याच्चारुलोचने॥ ५४ | हे सुनयने! वह निर्धन योग्य पति कैसे हो सकता है?॥ ५३-५४॥ |
| ब्रूहि पुत्रीं ततो वाक्यं कदाचिदपि विप्रियम्।<br>आगमिष्यन्ति राजानः स्थितिमन्तः स्वयंवरे॥ ५५ | तुम यह बात पुत्री शशिकलासे कह दो कि बड़े-से-बड़े प्रतिष्ठित राजा इस स्वयंवरमें आनेवाले हैं। अतः उनके प्रति ऐसी अप्रिय बात वह कभी भी न बोले॥ ५५॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे शशिकलया मातरं प्रति संदेशप्रेषणं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


### अथैकोनविंशोऽध्यायः

#### माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्‌द्वारा सुदर्शनको मार डालनेकी बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना

| व्यास उवाच<br>भर्त्रा साभिहिता बालां पुत्रीं कृत्वाङ्कसंस्थिताम्।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं समाश्वास्य शुचिस्मिताम्॥ १<br><br>किं वृथा सुदति त्वं हि विप्रियं मम भाषसे।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति वाक्येनानेन सुव्रते॥ २ | व्यासजी बोले—पतिके ऐसा कहनेपर रानीने सुन्दर मुसकानवाली उस कन्याको अपनी गोदमें बैठाकर उसे आश्वासन दे करके यह मधुर वचन कहा—हे सुदति! तुम मुझसे ऐसी अप्रिय एवं निष्प्रयोजन बात क्यों कह रही हो? हे सुव्रते! इस कथनसे तुम्हारे पिता बहुत दुःखित हो रहे हैं॥ १-२॥ |