देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
द्वितीयः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
ब्राह्मणके शापसे अद्रिका अप्सराका मछली होना और उससे राजा मत्स्य तथा मत्स्यगन्धाकी उत्पत्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>आश्चर्यकरमेतत्ते वचनं गर्भहेतुकम्।<br>सन्देहोऽत्र समुत्पन्नः सर्वेषां नस्तपस्विनाम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] आपकी यह बात आश्चर्यजनक एवं रहस्यपूर्ण है। इस सम्बन्धमें हम सब तपस्वियोंको महान् सन्देह उत्पन्न हो गया है॥ १॥ |
| माता व्यासस्य मेधाविन्नाम्ना सत्यवतीति च।<br>विवाहिता पुरा ज्ञाता राज्ञा शन्तनुना यथा॥ २<br><br>तस्याः पुत्रः कथं व्यासः सती स्वभवने स्थिता।<br>ईदृशी सा कथं राज्ञा पुनः शन्तनुना वृता॥ ३<br><br>तस्यां पुत्रावुभौ जातौ तत्त्वं कथय सुव्रत।<br>विस्तरेण महाभाग कथां परमपावनीम्॥ ४<br><br>उत्पत्तिं वद व्यासस्य सत्यवत्यास्तथा पुनः।<br>श्रोतुकामाः पुनः सर्वे ऋषयः संशितव्रताः॥ ५ | हे मेधाविन्! पूर्वकालमें सत्यवती नामसे विख्यात व्यासजीकी माताका राजा शन्तनुके साथ जिस प्रकार विवाह हुआ, उन सतीके अपने घरमें रहते हुए भी उनसे पुत्ररूपमें व्यास कैसे उत्पन्न हुए, ऐसी सत्यवतीका शन्तनुने पुनः वरण कैसे किया और उनसे दो पुत्रोंकी उत्पत्ति कैसे हुई? हे सुव्रत! हे महाभाग! आप इस परम पावन कथाको विस्तारपूर्वक कहिये। आप व्यासजी तथा सत्यवतीकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये; हम सभी व्रतधारी ऋषि इस विषयमें सुननेके लिये उत्सुक हैं॥ २–५॥ |
| सूत उवाच<br>प्रणम्य परमां शक्तिं चतुर्वर्गप्रदायिनीम्।<br>आदिशक्तिं वदिष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्॥ ६ | **सूतजी बोले—**मैं चतुर्वर्ग [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] प्रदान करनेवाली परमा आदिशक्तिको प्रणाम करके यह शुभ पौराणिक कथा कहूँगा॥ ६॥ |
| यस्योच्चारणमात्रेण सिद्धिर्भवति शाश्वती।<br>व्याजेनापि हि बीजस्य वाग्भवस्य विशेषतः॥ ७<br><br>सम्यक् सर्वात्मना सर्वैः सर्वकामार्थसिद्धये।<br>स्मर्तव्या सर्वथा देवी वाञ्छितार्थप्रदायिनी॥ ८ | जिनके विशिष्ट वाग्भव बीजमन्त्र (ऐं)-का किसी भी बहानेसे उच्चारण करते ही शाश्वती सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन इच्छित फल देनेवाली भगवतीका सभी लोगोंको अपनी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेके लिये समर्पण भावसे सम्यक् स्मरण करना चाहिये॥ ७-८॥ |
| राजोपरिचरो नाम धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>चेदिदेशपतिः श्रीमान् बभूव द्विजपूजकः॥ ९ | उपरिचर नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा, ब्राह्मणपूजक तथा श्रीमान् राजा हुए, जो चेदि |
| १७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तपसा तस्य तुष्टेन विमानं स्फाटिकं शुभम्।<br>दत्तमिन्द्रेण तत्तस्मै सुन्दरं प्रियकाम्यया॥ १० | देशके शासक थे। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर देवराज इन्द्रने उन्हें प्रसन्न करनेके लिये स्फटिक मणिका बना हुआ एक सुन्दर तथा दिव्य विमान दिया॥ ९-१०॥ |
| तेनारूढस्तु सर्वत्र याति दिव्येन भूपतिः।<br>न भूमावुपरीस्थोऽसौ तेनोपरिचरो वसुः॥ ११<br><br>विख्यातः सर्वलोकेषु धर्मनित्यः स भूपतिः।<br>तस्य भार्या वरारोहा गिरिका नाम सुन्दरी॥ १२ | उस दिव्य विमानपर चढ़कर चेदिराज सर्वत्र विचरण करते थे। वे कभी भूमिपर न उतरने तथा पृथ्वीसे ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण सभी लोकोंमें 'उपरिचर' वसुके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे राजा अत्यन्त धर्मपरायण थे। उनकी धर्मपत्नीका नाम गिरिका था, जो रूपवती तथा सुन्दरी थी॥ ११-१२॥ |
| पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः।<br>पृथग्देशेषु राजानः स्थापितास्तेन भूभुजा॥ १३ | महाराज उपरिचरके पाँच पुत्र हुए जो बड़े महान् वीर एवं परम प्रतापी थे। [यथासमय] उन्होंने अपने राजकुमारोंको अलग-अलग देशोंका राजा बना दिया॥ १३॥ |
| वसोस्तु पत्नी गिरिका कामान् काले न्यवेदयत्।<br>ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः॥ १४<br><br>तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति।<br>तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास भार्यामृतुमतीं तथा॥ १५<br><br>पितृवाक्यं गुरुं मत्वा कर्तव्यमिति निश्चितम्।<br>चचार मृगयां राजा गिरिकां मनसा स्मरन्॥ १६ | एक बार राजा वसुकी पत्नी गिरिकाने ऋतुकालके स्नानसे पवित्र होकर राजासे पुत्रप्राप्तिकी कामना की। जिस समय वह प्रार्थना करने लगी, उसी समय उनके पितरोंने उन राजासे कहा— हे राजन्! मृगोंको मार लाओ—इस आदेशको सुनकर राजाको अपनी ऋतुमती पत्नीका भी स्मरण हो आया, किंतु पितरोंकी आज्ञा श्रेष्ठ मानकर तथा अपने कर्तव्यका निश्चयकर राजा मन-ही-मन गिरिकाका स्मरण करते हुए आखेटके लिये चल पड़े॥ १४-१६॥ |
| वने स्थितः स राजर्षिश्चिन्तते सस्मार भामिनीम्।<br>अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम्॥ १७<br><br>तस्य रेतः प्रचस्कन्द स्मरतस्तां च कामिनीम्।<br>वटपत्रे तु तद्राजा स्कन्नमात्रं समाक्षिपत्॥ १८ | वनमें रहते हुए राजा वसु साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूपवती अपनी पत्नीका स्मरण करने लगे। इस प्रकार उस कामिनीके ध्यानसे एकाएक उनका वीर्य स्खलित हो गया और राजाने शीघ्र ही उस स्खलित वीर्यको बरगदके पत्तेपर रख लिया॥ १७-१८॥ |
| इदं वृथा परिस्कन्नं रेतो वै न भवेत्कथम्।<br>ऋतुकालं च विज्ञाय मतिं चक्रे नृपस्तदा॥ १९<br><br>अमोघं सर्वथा वीर्यं मम चैतन्न संशयः।<br>प्रियायै प्रेषयाम्येतदिति बुद्धिमकल्पयत्॥ २० | यह स्खलित तेज व्यर्थ न हो—[यह सोचकर] तथा स्त्रीका ऋतुकाल जानकर उन्होंने ऐसा निश्चय कर लिया कि मेरा तेज सर्वथा अमोघ है, इसमें सन्देह नहीं है अतः अवश्य ही इसे मैं रानीके पास भेज दूँ॥ १९-२०॥ |
| शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य सः।<br>अभिमन्त्र्याथ तद्वीर्यं वटपर्णपुटे कृतम्॥ २१ | राजा जब उस वीर्यको बरगदके दोनेमें रखकर अपनी रानीके पास भेजने लगे तब उन्होंने रानीका ऋतुकाल जानकर उस वीर्यको अभिमन्त्रित किया। |
| अ० १ ] | द्वितीय स्कन्ध | १७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पार्श्वस्थं श्येनमाभाष्य राजोवाच द्विजं प्रति।<br>गृहाणेदं महाभाग गच्छ शीघ्रं गृहं मम॥ २२<br><br>मत्प्रियार्थमिदं सौम्य गृहीत्वा त्वं गृहं नय।<br>गिरिकायै प्रयच्छाशु तस्यास्त्वार्तवमद्य वै॥ २३ | राजाने पास ही बैठे हुए बाज पक्षीको बुलाकर उससे कहा—‘हे महाभाग! तुम इसे ग्रहण करो और शीघ्र ही मेरे घर चले जाओ। हे सौम्य! मेरा हित करनेके लिये इसे लेकर तुम मेरे घर जाओ और इसे शीघ्र ही गिरिकाको दे देना; क्योंकि आज ही उसका ऋतुकाल है’॥ २१—२३॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा प्रददौ पर्णं श्येनाय नृपसत्तमः।<br>स गृहीत्वोत्पपाताशु गगनं गतिवित्तमः॥ २४ | **सूतजी बोले—**ऐसा कहकर नृपश्रेष्ठने बाजको वह दोना दे दिया और वह द्रुतगामी बाज भी उसे लेकर शीघ्र ही आकाशमें उड़ने लगा॥ २४॥ |
| गच्छन्तं गगनं श्येनं धृत्वा चञ्चुपुटे पुटम्।<br>तमपश्यदथायान्तं खगं श्येनस्तथापरः॥ २५ | चोंचमें पत्तेका दोना लेकर आकाशमें उड़ते हुए उस बाजको एक दूसरे बाजपक्षीने अपनी ओर आते हुए देखा॥ २५॥ |
| आमिषं स तु विज्ञाय शीघ्रमभ्यद्रवत्खगम्।<br>तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः॥ २६<br><br>युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि।<br>खगौ तौ निर्गतौ कामं पुटके पतिते तदा॥ २७ | बाजकी चोंचमें मांसका टुकड़ा समझकर तत्काल उसने उस बाजपर आक्रमण कर दिया। दोनों बाजोंके बीच आकाशमें चोंचोंसे घोर युद्ध होने लगा। उन दोनोंके युद्ध करते समय वीर्यवाला वह दोना यमुनाजीके जलमें जा गिरा। दोनेके गिर जानेपर दोनों पक्षी वहाँसे यथेच्छ दिशामें चले गये॥ २६-२७॥ |
| एतस्मिन्समये काचिदद्रिका नाम चाप्सराः।<br>ब्राह्मणं समनुप्राप्तं सन्ध्यावन्दनतत्परम्॥ २८<br><br>कुर्वन्ती जलकेलिं सा जले मग्ना चचार सा।<br>जग्राह चरणं नारी द्विजस्य वरवर्णिनी॥ २९ | उसी समय अद्रिका नामकी एक अप्सरा जलमें निमग्न होकर जलक्रीडा कर रही थी। उस सुन्दरी स्त्रीने वहाँपर उपस्थित सन्ध्यावन्दन करनेमें तत्पर एक ब्राह्मणको देखा और उन ब्राह्मणका पैर पकड़ लिया॥ २८-२९॥ |
| प्राणायामपरः सोऽथ दृष्ट्वा तां कामचारिणीम्।<br>शशाप भव मत्स्यी त्वं ध्यानविघ्नकरी यतः॥ ३०<br><br>सा शप्ता विप्रमुख्येन बभूव यमुनाचरी।<br>शफरी रूपसम्पन्ना ह्यद्रिका च वराप्सराः॥ ३१ | प्राणायाम करते हुए ब्राह्मणने उस स्वेच्छाचारिणीको देखकर उसे यह शाप दे दिया कि ‘तुमने मेरे ध्यानमें विघ्न डाला है, अतएव तुम मछली हो जाओ।’ इस प्रकार ब्राह्मणश्रेष्ठसे शाप पाकर वह अद्रिका नामकी रूपवती श्रेष्ठ अप्सरा मछली बनकर यमुनाके जलमें विचरने लगी॥ ३०-३१॥ |
| श्येनपादपरिभ्रष्टं तच्छुक्रमथ वासवी।<br>जग्राह तरसाभ्येत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी॥ ३२ | बाजके पादाघातसे गिरे हुए उस वीर्यके पास जाकर मत्स्यरूपधारिणी अद्रिका अप्सराने उसे शीघ्रतापूर्वक निगल लिया॥ ३२॥ |
| अथ कालेन कियता मत्स्यीं तां मत्स्यजीवनः।<br>सम्प्राप्ते दशमे मासि बबन्ध तां मनोरमाम्॥ ३३ | कुछ समय बाद दस महीने बीतनेपर एक मछुआरेने उस सुन्दर मछलीको अपने जालमें फँसा लिया॥ ३३॥ |
| उदरं विददाराशु स तस्या मत्स्यजीवनः।<br>युग्मं विनिःसृतं तस्मादुदरान्मानुषाकृति॥ ३४ | उस मछुआरेने शीघ्र ही उस मछलीका पेट चीर दिया। उसके उदरसे मनुष्यके आकारवाली जुड़वाँ सन्तति निकली॥ ३४॥ |
| १८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बालः कुमारः सुभगस्तथा कन्या शुभानना।<br>दृष्ट्वाश्चर्यमिदं सोऽथ विस्मयं परमं गतः ॥ ३५ | उन दोनोंमें एक रूपवान् बालक तथा एक सुन्दर मुखवाली बालिका थी। इस अद्भुत घटनाको देखकर वह भी अत्यन्त विस्मित हुआ॥ ३५॥ |
| राज्ञे निवेदयामास पुत्रौ द्वौ तु झषोद्भवौ।<br>राजापि विस्मयाविष्टः सुतं जग्राह तं शुभम् ॥ ३६ | उसने मछलीके पेटसे निकले उन दोनों बच्चोंको राजा उपरिचरको सौंप दिया। राजा भी आश्चर्यचकित हुआ और उसने उस सुन्दर पुत्रको ले लिया॥ ३६॥ |
| स मत्स्यो नाम राजासौ धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>वसुपुत्रो महातेजाः पित्रा तुल्यपराक्रमः ॥ ३७ | वह वसुपुत्र मत्स्य नामक राजा हुआ, जो अपने पिताके समान ही धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, महातेजस्वी तथा पराक्रमी था॥ ३७॥ |
| कालिका वसुना दत्ता तरसा जलजीविने।<br>नाम्ना कालीति विख्याता तथा मत्स्योदरीति च ॥ ३८ | राजा उपरिचर वसुने वह कन्या उस मछुआरेको ही दे दी, जो आगे चलकर काली तथा मत्स्योदरी नामसे प्रसिद्ध हुई। अपने गुणविशेषके कारण वह मत्स्यगन्धा नामसे कही जाने लगी। उस मछुआरे दाशके घर वह सुन्दरी वासवी धीरे-धीरे बढ़ने लगी॥ ३८-३९॥ |
| मत्स्यगन्धेति नाम्ना वै गुणेन समजायत।<br>विवर्धमाना दाशस्य गृहे सा वासवी शुभा ॥ ३९ | |
| ऋषय ऊचुः<br>अद्रिका मुनिना शप्ता मत्स्यी जाता वराप्सराः।<br>विदारिता च दाशेन मृता च भक्षिता पुनः ॥ ४० | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! मुनिके द्वारा शापित वह अद्रिका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा जब मछली हो गयी और मछुआरेने उसे चीर डाला, तब वह मर गयी अथवा उसने उसे खा लिया। उस अप्सराका फिर क्या हुआ? उसके शापकी समाप्ति कैसे हुई और उसे पुनः स्वर्ग कैसे मिला? यह बताइये॥ ४०-४१॥ |
| किं बभूव पुनस्तस्या अप्सराया वदस्व तत्।<br>शापस्यान्तं कथं सूत कथं स्वर्गमवाप सा ॥ ४१ | |
| सूत उवाच<br>शप्ता यदा सा मुनिना विस्मिता सम्बभूव ह।<br>स्तुतिं चकार विप्रस्य दीनेव रुदती तदा ॥ ४२ | सूतजी बोले— जब मुनिने उसे शाप दिया, तब वह विस्मित हो गयी और दीनतापूर्वक रोती हुई उस ब्राह्मणकी स्तुति करने लगी॥ ४२॥ |
| दयावान् ब्राह्मणः प्राह तां तदा रुदतीं स्त्रियम्।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि शापान्तं ते वदाम्यहम् ॥ ४३ | दयालु ब्राह्मणने उस रोती हुई स्त्रीसे कहा—हे कल्याणि! तुम शोक न करो, मैं तुम्हारे शापके अन्तका उपाय बताता हूँ। हे शुभे! मैंने क्रुद्ध होकर जो शाप दिया है, उससे तुम मत्स्ययोनिको प्राप्त होओगी; किंतु तुम अपने उदरसे एक युग्म मानव-सन्तान उत्पन्नकर इस शापसे मुक्त हो जाओगी॥ ४३-४४॥ |
| मत्क्रोधशापयोगेन मत्स्ययोनिं गता शुभे।<br>मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४४ | |
| इत्युक्ता तेन सा प्राप मत्स्यदेहं नदीजले।<br>बालकौ जनयित्वा सा मृता मुक्ता च शापतः ॥ ४५ | उनके ऐसा कहनेपर वह यमुनाजलमें मछलीका शरीर पाकर तथा दो सन्तानोंको उत्पन्न करके मर गयी और शापसे मुक्त हो गयी॥ ४५॥ |
| सन्त्यज्य रूपं मत्स्यस्य दिव्यरूपमवाप्य च।<br>जगामामरमार्गं च शापान्ते वरवर्णिनी ॥ ४६ | इस प्रकार शापोद्धार होनेपर वह सुन्दरी मछलीका शरीर त्यागकर दिव्य रूप धारण करके स्वर्गको चली गयी॥ ४६॥ |
| अ० २ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८१ |
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| एवं जाता वरा पुत्री मत्स्यगन्धा वरानना।<br>पुत्रीव पाल्यमाना सा दाशगेहे व्यवर्धत ॥ ४७ | इस प्रकार सुन्दर मुखवाली उस कन्या मत्स्य-गन्धाका जन्म हुआ। दाशके घरमें पुत्रीकी भाँति पालन-पोषणकी जाती हुई वह कन्या बढ़ने लगी ॥ ४७ ॥ |
| मत्स्यगन्धा तदा जाता किशोरी चातिसुप्रभा।<br>तस्य कार्याणि कुर्वाणा वासवी चातिसुप्रभा ॥ ४८ | जब वह मत्स्यगन्धा किशोरावस्थाको प्राप्त हुई, तब उसका सौन्दर्य और भी बढ़ गया। वह परम सुन्दरी वसुकन्या निषादराजके कार्योंको करती हुई रहने लगी ॥ ४८ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे मत्स्यगन्धोत्पत्तिवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
~ ~ ~ ० ~ ~ ~
अथ द्वितीयोऽध्यायः
व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्याके लिये जाना
</div>| सूत उवाच | |
|---|---|
| एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः।<br>आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥ १ | **सूतजी बोले—**एक बार तीर्थयात्रा करते हुए महान् तेजस्वी पराशरमुनि यमुनानदीके उत्तम तटपर आये और उन धर्मात्माने भोजन करते हुए निषादसे कहा—मुझको नावसे यमुनाके पार पहुँचा दो ॥ १-२ ॥ |
| निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा।<br>प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम्॥ २ | |
| दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे।<br>उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥ ३ | मुनिका वचन सुनकर यमुनाके तटपर भोजन करते हुए उस निषादने अपनी सुन्दर युवा पुत्री मत्स्यगन्धासे कहा—‘हे सुन्दर मुसकानवाली पुत्रि! तुम इन मुनिको नावमें बैठाकर पार उतार दो; क्योंकि ये धर्मात्मा तपस्वी उस पार जानेके इच्छुक हैं’ ॥ ३-४ ॥ |
| उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह।<br>गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते ॥ ४ | |
| इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी।<br>उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५ | पिताके ऐसा कहनेपर वह सुन्दर वासवी मत्स्यगन्धा मुनिको नावमें बैठाकर खेने लगी। यमुनानदीके जलपर नावसे चलते समय दैवयोगसे प्रारब्धानुसार मुनि पराशर उस सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याको देखकर आसक्त हो गये ॥ ५-६ ॥ |
| व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः।<br>कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ॥ ६ | |
| ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम्।<br>दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७ | प्रस्फुटित यौवनवाली उस कन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छावाले मुनिराजने अपनी दाहिनी भुजासे उसकी दाहिनी भुजाका स्पर्श किया ॥ ७ ॥ |
| तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८ | इसपर उस असितापांगीने मुसकराकर कहा—क्या आपका यह कृत्य आपके कुल, तपस्या तथा वेदज्ञानके अनुरूप है ? हे धर्मज्ञ! आप वसिष्ठजीके वंशज हैं और कुल तथा शीलसे युक्त हैं फिर भी कामदेवसे पीड़ित होकर आप क्या करना चाहते हैं ? ॥ ८-९ ॥ |
| त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः।<br>किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः॥ ९ |
| १८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम।<br>तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः॥ १० | हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर मनुष्यजन्म दुर्लभ है। उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म लेना तो मैं विशेषरूपसे दुर्लभ मानती हूँ॥ १०॥ |
| कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन<br>द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च।<br>अनार्यभावं कथमागतोऽसि<br>विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम्॥ ११<br>मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे<br>शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम्।<br>समीपं समायासि कामातुरस्त्वं<br>कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम्॥ १२ | हे विप्रेन्द्र! आप कुलसे, शीलसे तथा वेदाध्ययनसे एक धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं? मुझ मत्स्यगन्धाको देखकर आप अनाचारयुक्त विचारवाले कैसे हो गये? हे अमोघ बुद्धिवाले ब्राह्मण! मेरे शरीरमें स्थित किस विशेषताको देखकर आप मेरा हाथ पकड़नेके लिये कामासक्त होकर मेरी ओर चले आ रहे हैं? क्या आपको अपने धर्मका ज्ञान नहीं है?॥ ११-१२॥ |
| अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-<br>ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा।<br>मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं<br>न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम्॥ १३ | अहो, ये मन्दबुद्धि ब्राह्मण इस जलमें मुझे पकड़नेको आतुर हो रहे हैं। मेरा स्पर्श करके कामबाणसे आहत इनका मन व्याकुल हो उठा है। इस समय कोई भी इन्हें रोकनेमें समर्थ नहीं है॥ १३॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम्।<br>धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै॥ १४ | ऐसा सोचकर उस निषादकन्याने महामुनि पराशरसे कहा—हे महाभाग! आप धैर्य धारण करें; मैं अभी आपको उस पार ले चलती हूँ॥ १४॥ |
| सूत उवाच<br>पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम्।<br>करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५ | सूतजी बोले—मुनि पराशर उसका हितकारी वचन सुनकर उसका हाथ छोड़ करके वहीं स्थित हो गये और उस पार पहुँच गये॥ १५॥ |
| मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा।<br>वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम्॥ १६<br>दुर्गन्धांहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे।<br>समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः॥ १७ | तदनन्तर पराशरमुनिने मत्स्यगन्धाको पकड़ लिया। तब भयसे काँपती हुई वह कन्या सम्मुखस्थित मुनिसे कहने लगी—हे मुनिवर! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मुझसे क्या आपको घृणा नहीं हो रही है? समान रूपवालोंके बीच ही परस्पर सम्बन्ध आनन्ददायक होता है॥ १६-१७॥ |
| इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी।<br>कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना॥ १८ | मत्स्यगन्धाके ऐसा कहते ही पराशरमुनिने क्षण-मात्रमें अपने तपोबलसे उस भामिनी कन्याको सुमुखी, रूपवती तथा योजनगन्धा बना दिया॥ १८॥ |
| मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम्।<br>जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः॥ १९<br>ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः॥ २० | उसे कस्तूरीकी सुगन्धिवाली मनोहर स्त्री बनाकर कामातुर मुनिराजने अपने दाहिने हाथसे उसे पकड़ लिया। तब सत्यवती नामवाली उस सुन्दरीने संयोगकी कामनावाले मुनिसे कहा—हे मुने! तटपर स्थित मेरे पिता तथा सभी लोग यहाँ हमें देख रहे हैं॥ १९-२०॥ |
| पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः।<br>प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्भवति यामिनी॥ २१ | हे मुनिश्रेष्ठ! यह भीषण पशुवत् व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता। जबतक रात नहीं हो जाती, तबतक प्रतीक्षा कीजिये॥ २१॥ |
| अ० २ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि।<br>दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥ २२<br><br>कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः॥ २३<br><br>नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै।<br>नीहारे च समुत्पन्ने ततेऽतितमसा युते॥ २४<br><br>कामिनीं तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।<br>कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥ २५<br><br>अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति।<br>पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्द्वाव्यहम्॥ २६<br><br>त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत्। | मनुष्यके लिये कामसंसर्ग रातमें ही विहित है, दिनमें नहीं। दिनमें संसर्ग करनेसे महान् दोष होता है और बहुत-से लोग उसे देख भी लेते हैं॥ २२॥<br><br>हे महाबुद्धे! अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें, लोकनिन्दा अत्यन्त कष्टकर होती है। सत्यवतीका कहा गया युक्तिसंगत वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले पराशरमुनिने अपने पुण्यबलसे तत्क्षण कुहरा उत्पन्न कर दिया। उस कुहरेके उत्पन्न हो जानेपर अत्यन्त अन्धकारमय नदीतटपर उस कामिनीने पराशरमुनिसे मधुर वाणीमें यह वचन कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अभी कन्या हूँ और आप मेरे साथ संसर्ग करके चले जायँगे। हे ब्रह्मन्! आप अमोघ वीर्यवाले हैं, ऐसी स्थितिमें मेरी क्या गति होगी? यदि मैं गर्भधारण कर लूँगी तो पिताको क्या उत्तर दूँगी? हे ब्रह्मन्! मेरे साथ संसर्ग करके आप चले जायँगे तब मैं क्या करूँगी, उसे बताइये?॥ २३—२६ १/२॥ |
| पराशर उवाच<br>कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि॥ २७<br><br>वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि। | पराशर बोले— हे प्रिये! आज मुझे प्रसन्न करके भी तुम कन्या ही बनी रहोगी। हे भामिनि! हे भीरु! तुम जो वर चाहती हो, उसे माँग लो॥ २७ १/२॥ |
| सत्यवत्युवाच<br>यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद॥ २८<br><br>कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम।<br>पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्भुतवीर्यवान्॥ २९<br><br>गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम्। | सत्यवती बोली— हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता-पिता लोकमें इसे न जान सकें। साथ ही हे विप्रवर! आप ऐसा करें, जिससे मेरा कन्याव्रत नष्ट न हो और जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपहीके समान अपूर्व ओजस्वी हो, मेरी यह सुगन्ध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे॥ २८–२९ १/२॥ |
| पराशर उवाच<br>शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्णवंशसम्भवः शुचिः॥ ३०<br><br>भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि।<br>केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि॥ ३१<br><br>कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने।<br>दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम्॥ ३२<br><br>दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम्।<br>तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम्।<br>पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने॥ ३४<br><br>वेदविद्भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये। | पराशर बोले— हे सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा पुत्र पवित्र तथा भगवान् विष्णुके अंशसे अवतीर्ण होगा। हे सुन्दरि! वह तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। मैं तुम्हारे ऊपर किसी कारणविशेषसे ही कामासक्त हुआ हूँ। हे सुमुखि! मुझे ऐसा मोह पूर्वमें कभी नहीं हुआ। अप्सराओंके रूपको देखकर भी मैं सदा धैर्य धारण किये रहा। दैवयोगसे ही तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार कामके वशीभूत हुआ हूँ। इस विषयमें तुम कोई विशेष कारण ही समझो, दैवका अतिक्रमण अत्यन्त कठिन है, अन्यथा अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार क्यों मोहित होता! हे वरानने! तुम्हारा पुत्र पुराणोंका रचयिता, वेदोंका विभाग करनेवाला तथा तीनों लोकोंमें विख्यात होगा॥ ३०—३४ १/२॥ |
| १८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तमः ॥ ३५<br>जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः।<br>सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥ ३६ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर अपने वशमें आयी हुई उस कन्याके साथ संसर्ग करके मुनिश्रेष्ठ पराशर तत्काल यमुनानदीमें स्नानकर वहाँसे शीघ्र चले गये। वह साध्वी सत्यवती भी तत्काल गर्भवती हो गयी॥ ३५-३६॥ |
| सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम्।<br>जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥ ३७<br><br>तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान्।<br>गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥ ३८<br><br>तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः।<br>मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥ ३९<br><br>स्मर्त्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥ ४० | [यथासमय] सत्यवतीने यमुनाजीके द्वीपमें दूसरे कामदेवके तुल्य एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। उत्पन्न होते ही उस तेजवान् पुत्रने अपनी मातासे कहा—हे माता! मनमें तपस्याका निश्चय करके ही अत्यन्त तेजस्वी मैं गर्भमें प्रविष्ट हुआ था। हे महाभागे! अब आप अपनी इच्छानुसार कहीं भी चली जायँ और मैं भी यहाँसे तप करनेके लिये जा रहा हूँ। हे माता! आपके स्मरण करनेपर मैं अवश्य ही दर्शन दूँगा। हे माता! जब कोई उत्तम कार्य आ पड़े तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा, मैं शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊँगा। हे भामिनि! आपका कल्याण हो, अब मैं चलूँगा। आप चिन्ता छोड़कर सुखपूर्वक रहिये॥ ३७—४०॥ |
| इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता।<br>द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद् द्वैपायनोऽभवत् ॥ ४१ | ऐसा कहकर व्यासजी चले गये और वह सत्यवती भी अपने पिताके पास चली गयी। सत्यवतीने बालकको यमुनाद्वीपमें जन्म दिया था। अतः वह बालक 'द्वैपायन' नामसे विख्यात हुआ॥ ४१॥ |
| जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्ण्वंशयोगतः।<br>तीर्थे तीर्थे कृतस्नानश्चचार तप उत्तमम् ॥ ४२ | विष्णुभगवान्के अंशावतार होनेके कारण वह बालक उत्पन्न होते ही शीघ्र बड़ा हो गया तथा अनेक तीर्थोंमें स्नान करता हुआ उत्तम तप करने लगा॥ ४२॥ |
| एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात्।<br>चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥ ४३<br><br>वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः।<br>पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमृत्तमम् ॥ ४४<br><br>शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः।<br>सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥ ४५<br><br>असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम्। | इस प्रकार पराशरमुनिके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन उत्पन्न हुए और उन्होंने ही कलि-युगको आया जानकर वेदोंको अनेक शाखाओंमें विभक्त किया, वेदोंका विस्तार करनेके कारण ही उन मुनिका नाम 'व्यास' पड़ गया। उन्होंने ही विभिन्न पुराणसंहिताओं तथा श्रेष्ठ महाभारतकी रचना की। उन्होंने ही वेदोंके अनेक विभाग करके उसे अपने शिष्यों—सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, असित, देवल और अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया॥ ४३—४५ १/२॥ |