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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे

अ० ४ ]चतुर्थ स्कन्ध४१७

| नोवाच विप्रियं किञ्चित्ततः सा वरवर्णिनी।<br>इति ते कथितं राजन् पूर्वशापस्य कारणम्॥ ५५<br>अदितिर्देवकी जाता स्वांशेन नृपसत्तम॥ ५६ | पुनः कोई अप्रिय वाणी नहीं बोली। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको अदितिके पूर्व शापका कारण बताया। हे नृपश्रेष्ठ! वही अदिति अपने अंशसे देवकीके रूपमें उत्पन्न हुई॥ ५४—५६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
दित्या अदित्यै शापदानं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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अथ चतुर्थोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा जनमेजयको मायाकी प्रबलता समझाना

राजोवाचराजा बोले—
विस्मितोऽस्मि महाभाग श्रुत्वाख्यानं महामते।<br>संसारोऽयं पापरूपः कथं मुच्येत बन्धनात्॥ १हे महाभाग! इस आख्यानको सुनकर मैं बड़े आश्चर्यमें पड़ गया हूँ। हे महामते! यह संसार पापका मूर्तरूप है। इसके बन्धनसे मनुष्य किस प्रकार मुक्त हो सकता है?॥ १॥
कश्यपस्यापि दायादस्त्रिलोकीविभवे सति।<br>कृतवानीदृशं कर्म को न कुर्याज्जुगुप्सितम्॥ २जब तीनों लोकोंका वैभव पास रखते हुए भी कश्यपमुनिकी संतान इन्द्रने ऐसा पापकर्म कर डाला, तब कौन मनुष्य पाप नहीं कर सकता?॥ २॥
गर्भे प्रविश्य बालस्य हननं दारुणं किल।<br>सेवामिषेण मातुश्च कृत्वा शपथमद्भुतम्॥ ३अद्भुत शपथ लेकर सेवाके बहाने माताके गर्भमें प्रविष्ट होकर बालककी हत्या करना तो बड़ा भयानक पाप है!॥ ३॥
शास्ता धर्मस्य गोप्ता च त्रिलोक्याः पतिरप्युत।<br>कृतवानीदृशं कर्म को न कुर्यादसाम्प्रतम्॥ ४सबके शासक, धर्मके रक्षक और तीनों लोकोंके स्वामी इन्द्रने जब ऐसा निन्दित कर्म कर डाला, तब फिर दूसरा कौन नहीं करेगा?॥ ४॥
पितामहा मे संग्रामे कुरुक्षेत्रेऽतिदारुणम्।<br>कृतवन्तस्तथाश्चर्यं दुष्टं कर्म जगद्गुरो॥ ५<br><br>भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो धर्मांशोऽपि युधिष्ठिरः।<br>सर्वे विरुद्धधर्मेण वासुदेवेन नोदिताः॥ ६हे जगद्गुरो! मेरे पितामह लोगोंने भी कुरुक्षेत्रके संग्राममें ऐसा ही विस्मयकारी दारुण और निन्दित कर्म किया था। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा धर्मके अंशरूप युधिष्ठिर—इन सभीने भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे धर्मविरुद्ध कर्म किया था॥ ५-६॥
असारतां विजानन्तः संसारस्य सुमेधसः।<br>देवांशाश्च कथं चक्रुर्निन्दितं धर्मतत्पराः॥ ७संसारकी असारता जानते हुए भी उन प्रतिभाशाली तथा देवांशासे उत्पन्न धर्मपरायण पाण्डवोंने भी ऐसा गर्हित कर्म क्यों किया?॥ ७॥
कास्था धर्मस्य विप्रेन्द्र प्रमाणं किं विनिश्चितम्।<br>चलचित्तोऽस्मि सञ्जातः श्रुत्वा चैतत्कथानकम्॥ ८हे द्विजेन्द्र! यदि ऐसी बात है तो धर्मपर किसकी आस्था होगी और धर्मके विषयमें सैद्धान्तिक प्रमाण ही क्या रह जायगा? यह वृत्तान्त सुनकर तो मेरा मन चंचल हो उठा है॥ ८॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 A

४१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आप्तवाक्यं प्रमाणं चेदाप्तः कः परदेहवान्।<br>पुरुषो विषयासक्तो रागी भवति सर्वथा॥ ९<br>रागो द्वेषो भवेन्नूनमर्थनाशादसंशयम्।<br>द्वेषादसत्यवचनं वक्तव्यं स्वार्थसिद्धये॥ १०यदि आप्त वचनको प्रमाण मानें, तो फिर कौन पुरुष आप्त है? विषयासक्त मनुष्यमें राग आ ही जाता है और अपना स्वार्थ भंग होनेपर उसमें निःसन्देह राग-द्वेषकी बहुलता हो जाती है। द्वेषके कारण अपनी स्वार्थसिद्धिके लिये असत्य भाषण करना पड़ता है॥ ९-१०॥
जरासन्धविघातार्थं हरिणा सत्त्वमूर्तिना।<br>छलेन रचितं रूपं ब्राह्मणस्य विजानता॥ ११<br>तदाप्तः कः प्रमाणं किं सत्त्वमूर्तिरपीदृशः।<br>अर्जुनोऽपि तथैवात्र कार्ये यज्ञविनिर्मिते॥ १२परम ज्ञानी और सत्त्वगुणके मूर्तस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी जरासन्धके वधके लिये छलसे ब्राह्मणका वेष धारण किया था। जब सत्त्वमूर्ति भी इस प्रकारके होते हैं, तब किस आप्त पुरुषको प्रमाण माना जाय ? उसी प्रकार [राजसूय] यज्ञके अवसरपर अर्जुनने भी वैसा ही कर्म किया था॥ ११-१२॥
कीदृशोऽयं कृतो यज्ञः किमर्थं शमवर्जितः।<br>परलोकपदार्थं वा यशसे वान्यथा किल॥ १३जिस यज्ञमें अशान्तिका वातावरण रहा, उस यज्ञको किस श्रेणीका यज्ञ कहा जाय ? वह यज्ञ परलोकमें परमपदकी प्राप्तिके लिये किया गया था अथवा सुयश पानेके लिये किया गया था या अन्य किसी कार्यकी सिद्धिके लिये किया गया था ?॥ १३॥
धर्मस्य प्रथमः पादः सत्यमेतच्छ्रुतेर्वचः।<br>द्वितीयस्तु तथा शौचं दया पादस्तृतीयकः॥ १४<br>दानं पादश्चतुर्थश्च पुराणज्ञा वदन्ति वै।<br>तैर्विहीनः कथं धर्मस्तिष्ठेदिह सुसम्मतः॥ १५श्रुतिका यह वचन है कि धर्मका प्रथम चरण सत्य, दूसरा चरण पवित्रता, तीसरा चरण दया तथा चतुर्थ चरण दान है। पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। इन चारोंके बिना परम आदृत धर्म कैसे टिक सकता है ?॥ १४-१५॥
धर्महीनं कृतं कर्म कथं तत्फलदं भवेत्।<br>धर्मे स्थिरा मतिः क्वापि न कस्यापि प्रतीयते॥ १६तब मेरे पूर्वजोंके द्वारा किया गया वह धर्मविहीन यज्ञ-कर्म [उत्तम] फल देनेवाला कैसे हो सकता था ? इससे तो यही प्रतीत होता है कि उस समय किसीका भी कहीं भी धर्ममें अटल विश्वास नहीं था॥ १६॥
छलार्थञ्च यदा विष्णुर्वामनोऽभूज्जगत्प्रभुः।<br>येन वामनरूपेण वञ्चितोऽसौ बलिर्नृपः॥ १७जगत्प्रभु भगवान् विष्णुने भी छलनेहेतु वामनका रूप धारण किया था, जिन्होंने वामनरूपसे राजा बलिको ठग लिया था॥ १७॥
विहर्ता शतयज्ञस्य वेदाज्ञापरिपालकः।<br>धर्मिष्ठो दानशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ १८<br>स्थानात्प्रभ्रंशितोऽकस्माद्विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जितं केन तयोः कृष्ण बलिना वामनेन वा॥ १९<br>छलकर्मविदा चायं सन्देहोऽत्र महान्मम।<br>वञ्चयित्वा वञ्चितेन सत्यं वद द्विजोत्तम॥ २०<br>पुराणकर्ता त्वमसि धर्मज्ञश्च महामतिः।महाराज बलि सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, वेदोंकी आज्ञाका पालन करनेवाले, धर्मात्मा, दानी, सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय थे। ऐसे महापुरुषको परम प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अकस्मात् पदच्युत कर दिया। अतः हे कृष्णद्वैपायन ! उन दोनोंमें कौन जीता ? वंचना करके छलकर्ममें निपुण भगवान् वामनकी विजय हुई या छले गये राजा बलिकी; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे द्विजश्रेष्ठ ! मुझे सत्य बात बताइये; क्योंकि आप पुराणोंके रचयिता, धर्मज्ञ तथा महान् बुद्धिसम्पन्न हैं॥ १८-२० १/२॥

1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 14 B