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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितयां पञ्चमस्कन्धे
पृष्ठ 626स्थायी लिंक
| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१७ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| संयोगे सुखसम्भूतिर्वियोगे दुःखसम्भवः।<br>कान्तासि रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता॥ ५५<br><br>चातुर्यं त्वयि किं नास्ति यतो मां न भजस्यहो।<br>तवोपदिष्टं केनेदं भोगानां परिवर्जनम्॥ ५६<br><br>वञ्चितासि प्रियालापे वैरिणा केनचित्त्विह।<br>मुञ्चाग्रहमिमं कान्ते कुरु कार्यं सुशोभनम्॥ ५७<br><br>सुखं तव ममापि स्याद्विवाहे विहिते किल।<br>विष्णुर्लक्ष्म्या सहाभाति सावित्र्या च सहात्मभूः॥ ५८<br><br>रुद्रो भाति च पार्वत्या शच्या शतमखस्तथा।<br>का नारी पतिहीना च सुखं प्राप्नोति शाश्वतम्॥ ५९<br><br>येन त्वमसितापाङ्गि न करोषि पतिं शुभम्।<br>कामः क्वादद्य गतः कान्ते यस्त्वां बाणैः सुकोमलैः॥ ६०<br><br>मादनैः पञ्चभिः कामं न ताडयति मन्दधीः।<br>मन्येऽहमिव कामोऽपि दयावांस्त्वयि सुन्दरि॥ ६१<br><br>अबलेति च मन्वानो न प्रेरयति मार्गणान्।<br>मनोभवस्य वैरं वा किमप्यस्ति मया सह॥ ६२<br><br>तेन च त्वय्यरालाक्षि न मुञ्चति शिलीमुखान्।<br>अथवा मेऽहितैर्देवैर्वारितोऽसौ झषध्वजः॥ ६३<br><br>सुखविध्वंसिभिस्तेन त्वयि न प्रहरत्यपि।<br>त्यक्त्वा मां मृगशावाक्षि पश्चात्तापं करिष्यसि॥ ६४<br><br>मन्दोदरीव तन्वङ्गि परित्यज्य शुभं नृपम्।<br>अनुकूलं पतिं पश्चात्सा चकार शठं पतिम्।<br>कामार्ता च यदा जाता मोहेन व्याकुलान्तरा॥ ६५ | संयोगमें सुख उत्पन्न होता है और वियोगमें दुःख। तुम सुन्दर, रूपवती और सभी आभूषणोंसे अलंकृत हो। [यह सब होते हुये भी] तुझमें चतुरता क्यों नहीं है, जिससे तुम मुझे स्वीकार नहीं कर रही हो? इस तरह भोगोंको छोड़ देनेका परामर्श तुम्हें किसने दिया है? हे मधुरभाषिणि! [ऐसा करके] किसी शत्रुने तुम्हें धोखा दिया है॥ ५५-५६½॥<br><br>हे कान्ते! अब तुम यह आग्रह छोड़ दो और अत्यन्त सुन्दर कार्य करनेमें तत्पर हो जाओ। विवाह सम्पन्न हो जानेपर तुम्हें और मुझे दोनोंको सुख प्राप्त होगा। विष्णु लक्ष्मीके साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, शंकर पार्वतीके साथ तथा इन्द्र शचीके साथ रहकर ही सुशोभित होते हैं। पतिके बिना कौन स्त्री चिरस्थायी सुख प्राप्त कर सकती है? हे सुन्दरि! [कौन-सा ऐसा कारण है] जिससे तुम मुझ-जैसे उत्तम पुरुषको अपना पति नहीं बना रही हो?॥ ५७-५९½॥<br><br>हे कान्ते! न जाने मन्दबुद्धि कामदेव इस समय कहाँ चला गया जो अपने अत्यन्त कोमल तथा मादक पंचबाणोंसे तुम्हें आहत नहीं कर रहा है। हे सुन्दरि! मुझे तो लगता है कि कामदेव भी तुम्हारे ऊपर दयालु हो गया है और तुम्हें अबला समझते हुए वह अपने बाण नहीं छोड़ रहा है। हे तिरछी चितवनवाली सुन्दरि! सम्भव है उस कामदेवको भी मेरे साथ कुछ शत्रुता हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर बाण न चलाता हो। अथवा यह भी हो सकता है कि मेरे सुखका नाश करनेवाले मेरे शत्रु देवताओंने उस कामदेवको मना कर दिया हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर [अपने बाणोंसे] प्रहार नहीं कर रहा है॥ ६०-६३½॥<br><br>हे मृगशावकके समान नेत्रोंवाली! मुझे त्यागकर तुम मन्दोदरीकी भाँति पश्चात्ताप करोगी, हे तन्वंगि! पतिरूपमें प्राप्त सुन्दर तथा अनुकूल राजाका त्याग करके बादमें वह मन्दोदरी जब कामार्त तथा मोहसे व्याकुल अन्तःकरणवाली हो गयी, तब उसने एक धूर्तको अपना पति बना लिया था॥ ६४-६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितयां पञ्चमस्कन्धे
महिषद्वारा देवीप्रबोधनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
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| ६१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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अथ सप्तदशोऽध्यायः
महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवी पप्रच्छ दानवम्।<br>का सा मन्दोदरी नारी कोऽसौ त्यक्तो नृपस्तया ॥ १ | [हे महाराज!] उसका यह वचन सुनकर भगवतीने उस दानवसे पूछा—वह स्त्री मन्दोदरी कौन थी और वह राजा कौन था, जिसे उसने त्याग दिया था? ॥ १ ॥ |
| शठः को वा नृपः पश्चात्तन्मे ब्रूहि कथानकम्।<br>विस्तरेण यथा प्राप्तं दुःखं वनितया पुनः ॥ २ | बादमें उसने जिसे पति बनाया, वह धूर्त राजा कौन था? उस स्त्रीको पुनः जिस प्रकार दुःख मिला हो, वह कथानक विस्तारपूर्वक बताओ ॥ २ ॥ |
| महिष उवाच | महिषासुर बोला— |
| सिंहलो नाम देशोऽस्ति विख्यातः पृथिवीतले।<br>घनपादपसंयुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् ॥ ३ | पृथवीतलपर विख्यात सिंहल नामक एक देश है। उसमें बहुत ही घने-घने वृक्ष हैं और वह धन-धान्यसे समृद्ध है ॥ ३ ॥ |
| चन्द्रसेनाभिधस्तत्र राजा धर्मपरायणः।<br>न्यायदण्डधरः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ ४<br><br>सत्यवादी मृदुः शूरस्तितिक्षुर्नीतिसागरः।<br>शास्त्रवित्सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदेऽतिनिष्ठितः ॥ ५ | वहाँ चन्द्रसेन नामका राजा राज्य करता था, जो बड़ा धर्मात्मा, शान्तस्वभाव, प्रजापालनमें तत्पर, न्यायपूर्वक शासन-कार्य करनेवाला, सत्यवादी, मृदु स्वभाववाला, वीर, सहिष्णु, नीतिशास्त्रका सागर, शास्त्रवेत्ता, सब धर्मोंका ज्ञाता और धनुर्वेदमें अत्यन्त प्रवीण था ॥ ४-५ ॥ |
| तस्य भार्या वरारोहा सुन्दरी सुभगा शुभा।<br>सदाचारातिसुमुखी पतिभक्तिपरायणा ॥ ६<br><br>नाम्ना गुणवती कान्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>सुषुवे प्रथमे गर्भे पुत्रीं सा चातिसुन्दरीम् ॥ ७ | उसकी भार्या भी रूपवती, सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, सद्गुणी, सदाचारिणी, अत्यन्त सुन्दर मुखवाली, पतिभक्तिमें लीन रहनेवाली, मनोहर और सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थी। उसका नाम गुणवती था। उसने प्रथम गर्भसे एक अति सुन्दर कन्याको जन्म दिया ॥ ६-७ ॥ |
| पिता चातीव सन्तुष्टः पुत्रीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>मन्दोदरीति नामास्याः पिता चक्रे मुदान्वितः ॥ ८ | उस मनोरम कन्याको पाकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका नाम मन्दोदरी रखा ॥ ८ ॥ |
| इन्दोः कलेव चात्यर्थं ववृधे सा दिने दिने।<br>दशवर्षा यदा जाता कन्या चातिमनोहरा ॥ ९ | वह कन्या चन्द्रमाकी कलाके समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। अत्यन्त मनोहारिणी वह कन्या जब दस वर्षकी हुई, तब उसके वरके लिये राजा चन्द्रसेन प्रतिदिन चिन्तित रहने लगे ॥ ९ ½ ॥ |
| वरार्थं नृपतिश्चिन्तामवाप च दिने दिने।<br>मद्रदेशाधिपः शूरः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १०<br><br>तस्य पुत्रोऽतिमेधावी कम्बुग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>ब्राह्मणैः कथितो राज्ञे स युक्तोऽस्या वरः शुभः ॥ ११<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वविद्यार्थपारगः। | उस समय मद्रदेशके अधिपति सुधन्वा नामवाले एक पराक्रमी नरेश थे। कम्बुग्रीव नामसे अति विख्यात उनका एक पुत्र था, जो बहुत मेधावी था। ब्राह्मणोंने राजा चन्द्रसेनसे कहा कि कम्बुग्रीव उस कन्याके योग्य वर है। वह सुन्दर, सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा समस्त विद्याओंमें पारंगत है ॥ १०-११ ½ ॥ |