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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ९ ] तृतीय स्कन्ध २८३

अ० ९ ] तृतीय स्कन्ध २८३

यथा स्त्रीपुरुषश्चैव मिथुनौ च परस्परम्।<br>तथा गुणाः समायान्ति युग्मभावं परस्परम्॥ ४९जिस प्रकार स्त्री और पुरुष आपसमें मिथुन-भावको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार ये तीनों गुण परस्पर युग्म-भावको प्राप्त रहते हैं॥ ४९॥
रजसो मिथुने सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुने रजः।<br>उभे ते सत्त्वरजसी तमसो मिथुने विदुः॥ ५०रजोगुणका युग्म-भाव होनेपर सत्त्वगुण, सत्त्वगुणका युग्म-भाव होनेपर रजोगुण और तमोगुणके युग्म-भावसे सत्त्वगुण तथा रजोगुण—ये दोनों उत्पन्न होते हैं—ऐसा कहा गया है॥ ५०॥
नारद उवाच<br>इत्येतत्कथितं पित्रा गुणरूपमनुत्तमम्।<br>श्रुत्वाप्येतत्स एवाहं ततोऽपृच्छं पितामहम्॥ ५१नारदजी बोले—इस प्रकार पिताजीने तीनों गुणोंके अत्युत्तम स्वरूपका वर्णन किया। इसे सुननेके पश्चात् मैंने पुनः पितामह ब्रह्माजीसे पूछा॥ ५१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे<br>गुणानां रूपसंस्थानादिवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


अथ नवमोऽध्यायः

गुणोंके परस्पर मिश्रीभावका वर्णन, देवीके बीजमन्त्रकी महिमा

नारद उवाच<br>गुणानां लक्षणं तात भवता कथितं किल।<br>न तृप्तोऽस्मि पिबन्मिष्टं त्वन्मुखात्प्रच्युतं रसम्॥ १नारदजी बोले—हे तात! आपने गुणोंके लक्षणोंका वर्णन किया, किंतु आपके मुखसे निःसृत वाणीरूपी मधुर रसका पान करता हुआ मैं अभी भी तृप्त नहीं हुआ हूँ॥ १॥
गुणानां तु परिज्ञानं यथावदनुवर्णय।<br>येनाहं परमां शान्तिमधिगच्छामि चेतसि॥ २अतएव अब आप इन गुणोंके सूक्ष्म ज्ञानका यथावत् वर्णन कीजिये, जिससे मैं अपने हृदयमें परम शान्तिका अनुभव कर सकूँ॥ २॥
व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तु पुत्रेण नारदेन महात्मना।<br>उवाच च जगत्कर्ता रजोगुणसमुद्भवः॥ ३व्यासजी बोले—अपने पुत्र महात्मा नारदके इस प्रकार पूछनेपर रजोगुणसे आविर्भूत सृष्टि-निर्माता ब्रह्माजीने कहा॥ ३॥
ब्रह्मोवाच<br>शृणु नारद वक्ष्यामि गुणानां परिवर्णनम्।<br>सम्यङ् नाहं विजानामि यथामति वदामि ते॥ ४ब्रह्माजी बोले—हे नारद! सुनिये, अब मैं गुणोंका विस्तृत वर्णन करूँगा; यद्यपि मैं इस विषयमें सम्यक् ज्ञान नहीं रखता फिर भी अपनी बुद्धिके अनुसार आपसे वर्णन कर रहा हूँ॥ ४॥
सत्त्वं तु केवलं नैव कुत्रापि परिलक्ष्यते।<br>मिश्रीभावस्तु तेषां वै मिश्रत्वं प्रतिभाति वै॥ ५केवल सत्त्वगुण कहीं भी परिलक्षित नहीं होता है। गुणोंका परस्पर मिश्रीभाव होनेके कारण वह सत्त्वगुण भी मिश्रित दिखायी देता है॥ ५॥
यथा काचिद्वरा नारी सर्वभूषणभूषिता।<br>हावभावयुता कामं भर्तुः प्रीतिकरी भवेत्॥ ६जिस प्रकार सब भूषणोंसे विभूषित तथा हाव-भावसे युक्त कोई सुन्दरी स्त्री अपने पतिको विशेष प्रिय होती है तथा माता-पिता एवं बन्धु-बान्धवोंके
२८४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मातापित्रोस्तथा सैव बन्धुवर्गस्य प्रीतिदा।<br>दुःखं मोहं सपत्नीषु जनयत्यपि सैव हि॥ ७<br><br>एवं सत्त्वेन तेनैव स्त्रीत्वमापादितेन च।<br>रजस्तमसश्चैव जनिता वृत्तिरन्यथा॥ ८<br><br>रजसा स्त्रीकृतेनैव तमसा च तथा पुनः।<br>अन्योन्यस्य समायोगादन्यथा प्रतिभाति वै॥ ९लिये भी प्रीतिकर होती है, किंतु वही स्त्री अपनी सौतोंके मनमें दुःख और मोह उत्पन्न करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर रजोगुण और तमोगुणसे मिलनेपर भिन्न वृत्ति उत्पन्न होती है। ऐसे ही रजोगुण तथा तमोगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर एक-दूसरेके परस्पर संयोगके कारण विपरीत भावना प्रतीत होती है॥ ६-९॥
अवस्थानात्स्वभावेषु न वै जात्यन्तराणि च।<br>लक्ष्यन्ते विपरीतानि योगान्नारद कुत्रचित्॥ १०हे नारद! यदि ये तीनों गुण परस्पर मिश्रित न होते तो उनके स्वभावमें एक-सी ही प्रवृत्ति रहती, किंतु तीनों गुणोंमें मिश्रण होनेके कारण ही विभिन्नताएँ दिखायी देती हैं॥ १०॥
यथा रूपवती नारी यौवनेन विभूषिता।<br>लज्जामाधुर्ययुक्ता च तथा विनयसंयुता॥ ११<br><br>कामशास्त्रविधिज्ञा च धर्मशास्त्रेऽपि सम्मता।<br>भर्तुः प्रीतिकरी भूत्वा सपत्नीनां च दुःखदा॥ १२जैसे कोई रूपवती स्त्री यौवन, लज्जा, माधुर्य तथा विनयसे युक्त हो, साथ ही वह धर्मशास्त्रके अनुकूल हो तथा कामशास्त्रको जाननेवाली हो, तो वह अपने पतिके लिये प्रीतिकर होती है; किंतु सौतोंके लिये कष्ट देनेवाली होती है॥ ११-१२॥
मोहदुःखस्वभावस्था सत्त्वस्थेत्युच्यते जनैः।<br>तथा सत्त्वं विकुर्वाणमन्यभावं विभाति वै॥ १३[सौतोंके लिये] मोह तथा दुःख देनेवाली होनेपर भी कुछ लोगोंके द्वारा वह सत्त्वगुणी कही जाती है और सत्त्वगुणके अनेक शुभ कार्य करनेपर भी वह सौतोंको विपरीत भाववाली प्रतीत होती है॥ १३॥
चौरैरुपद्रुतानां हि साधूनां सुखदा भवेत्।<br>दुःखा मूढा च दस्यूनां सैव सेना तथागुणा॥ १४जैसे राजाकी सेना चोरोंसे पीड़ित सज्जनोंके लिये सुख देनेवाली होती है, किंतु वही सेना चोरोंके लिये दुःखदायिनी, मूढ़ तथा गुणहीन होती है॥ १४॥
विपरीतप्रतीतिं वै जनयन्ति स्वभावतः।<br>यथा च दुर्दिनं जातं महामेघघनावृतम्॥ १५<br><br>विद्युत्स्तनितसंयुक्तं तिमिरेणावगुण्ठितम्।<br>सिञ्चद्भूमिं प्रवर्षद्वै तमोरूपमुदाहृतम्॥ १६<br><br>यदेतत्कर्षकाणां वै तदेवातीव दुर्दिनम्।<br>बीजोपस्करयुक्तानां सुखदं प्रभवत्युत॥ १७<br><br>अप्रच्छन्नगृहाणाञ्च दुर्भागानां विशेषतः।<br>तृणकाष्ठगृहीतानां दुःखदं गृहमेधिनाम्॥ १८इससे प्रकट होता है कि स्वाभाविक गुण भी विपरीत लक्षणोंवाले दीख पड़ते हैं। जैसे किसी दिन जब चारों ओर काले-काले मेघ घिर आये हों, बिजली चमक रही हो, मेघ गरज रहे हों, अन्धकारसे आच्छादित हो और घनघोर वर्षाके कारण सूखी भूमि सिंच रही हो, तब भी लोग उसे तमोरूप गाढ़ान्धकारसे व्याप्त दुर्दिन नामसे ही पुकारते हैं। एक ओर वही दुर्दिन किसानोंको खेत जोतने तथा बीज बोनेकी सुविधा देनेके कारण सुखदायी प्रतीत होता है, किंतु दूसरी ओर वही दुर्दिन उन अभागे गृहस्थोंके लिये दुःखदायी हो जाता है, जिनके घर अभी छाये नहीं जा सके हैं और जो तृण, काष्ठ आदिके संग्रहमें व्यस्त हैं। साथ ही वही दुर्दिन उन स्त्रियोंके हृदयमें शोक उत्पन्न करता है, जिनके पति परदेश गये हों।
अ० ९ ]तृतीय स्कन्ध२८५

| प्रोषितभर्तृकाणां वै मोहदं प्रवदन्त्यपि।<br>स्वभावस्था गुणाः सर्वे विपरीता विभान्ति वै॥ १९ | उसी प्रकार ये सत्त्वादि गुण अपनी स्वाभाविक परिस्थितिमें रहते हुए भी अन्य गुणोंसे मिलनेपर विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं॥ १५—१९॥ |
| लक्षणानि पुनस्तेषां शृणु पुत्र ब्रवीम्यहम्।<br>लघुप्रकाशकं सत्त्वं निर्मलं विशदं सदा॥ २० | हे पुत्र! अब मैं उन गुणोंके लक्षण पुनः बता रहा हूँ; सुनो। सत्त्वगुण सूक्ष्म, प्रकाशक, स्वच्छ, निर्मल एवं व्यापक होता है। जब मानवके सम्पूर्ण अंग और नेत्र आदि इन्द्रियाँ हल्के हों, मन निर्मल हो तथा वह उन राजस एवं तामस विषयोंको न ग्रहण करता हो, तब यह समझ लेना चाहिये कि शरीरमें अब सत्त्वगुण प्रधानरूपसे विद्यमान है। जब जिस किसीकी देहमें रजोगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहता है तब यह बार-बार जम्हाई, स्तम्भन, तन्द्रा तथा चंचलता उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जब अत्यन्त कलह करनेका मन चाहता हो, अन्यत्र जानेकी इच्छा हो, चित्त चंचल हो और वाद-विवादमें उलझनेकी प्रवृत्ति हो, मनमें काम-भावनाका गहरा परदा पड़ जाय, तब यह समझ ले कि शरीरमें तमोगुणकी प्रधानता है। उस समय शरीरके अंग भारी हो जाते हैं, इन्द्रियाँ तामसिक भावोंके वशीभूत रहती हैं, चित्त विमूढ़ रहता है और वह निद्राकी इच्छा नहीं करता। हे नारद! इस प्रकार सभी गुणोंके लक्षण समझना चाहिये॥ २०—२५ १/२॥ |
| यदाङ्गानि लघून्येव नेत्रादीनीन्द्रियाणि च।<br>निर्मलं च तथा चेतो गृह्णाति विषयान्न तान्॥ २१ | |
| तदा सत्त्वं शरीरे वै मन्तव्यञ्च समुत्कटम्।<br>जृम्भां स्तम्भं च तन्द्रां च चलञ्चैव रजः पुनः॥ २२ | |
| यदा तदुत्कटं जातं देहे यस्य च कस्यचित्।<br>कलिं मृगयते कर्तुं गन्तुं ग्रामान्तरं तथा॥ २३ | |
| चलचित्तश्च सोऽत्यर्थं विवादे चोद्यतस्तथा।<br>गुरुमावरणं कामं तमो भवति तद्यदा॥ २४ | |
| तदाङ्गानि गुरूण्याशु प्रभवन्त्यावृतानि च।<br>इन्द्रियाणि मनः शून्यं निद्रां नैवाभिवाञ्छति॥ २५ | |
| गुणानां लक्षणान्येवं विज्ञेयानीह नारद। | |
| नारद उवाच<br>विभिन्नलक्षणाः प्रोक्ताः पितामह गुणास्त्रयः॥ २६<br><br>कथमेकत्र संस्थाने कार्यं कुर्वन्ति शाश्वतम्।<br>परस्परं मिलित्वा हि विभिन्नाः शत्रवः किल॥ २७<br><br>एकत्रस्थाः कथं कार्यं कुर्वन्तीति वदस्व मे। | **नारदजी बोले—**हे पितामह! आपने तीनों गुणोंको भिन्न-भिन्न लक्षणोंवाला बताया, तो फिर ये एक स्थानमें होकर निरन्तर कार्य कैसे करते हैं? विपरीत होते हुए भी शत्रुरूप ये गुण एकत्र होकर परस्पर मिल करके किस प्रकार कार्य करते हैं; यह मुझे बताइये॥ २६—२७ १/२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुणास्ते दीपवृत्तयः॥ २८<br><br>प्रदीपश्च यथा कार्यं प्रकरोत्यर्थदर्शनम्।<br>वर्तिस्तैलं यथार्चिश्च विरुद्धाश्च परस्परम्॥ २९<br><br>विरुद्धं हि तथा तैलमग्निना सह सङ्गतम्।<br>तैलं वर्तिविरोध्येव पावकोऽपि परस्परम्॥ ३०<br>एकत्रस्थाः पदार्थानां प्रकुर्वन्ति प्रदर्शनम्। | **ब्रह्माजी बोले—**हे पुत्र! सुनो, मैं बताता हूँ। उन तीनों गुणोंका स्वभाव दीपकके समान है। जैसे दीपकमें तेल, बत्ती और अग्निशिखा तीनों परस्पर विरोधी धर्मवाले हैं, परंतु तीनोंके सहयोगसे ही दीपक वस्तुओं आदिका दर्शन कराता है। यद्यपि आगके साथ मिला हुआ तेल आगका विरोधी है और तेल बत्ती तथा अग्निका विरोधी है तथापि वे एकत्र होकर वस्तुओंका दर्शन कराते हैं॥ २८—३० १/२॥ |

| २८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| नारद उवाच<br>एवं प्रकृतिजाः प्रोक्ता गुणाः सत्यवतीसुत ॥ ३१<br>विश्वस्य कारणं ते वै मया पूर्वं यथाश्रुतम् ।<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तं नारदेनाथ मम सर्वं सविस्तरम् ॥ ३२<br>गुणानां लक्षणं सर्वं कार्यं चैव विभागशः ।<br>आराध्या परमा शक्तिर्यया सर्वमिदं ततम् ॥ ३३<br>सगुणा निर्गुणा चैव कार्यभेदे सदैव हि ।<br>अकर्ता पुरुषः पूर्णो निरीहः परमोऽव्ययः ॥ ३४<br>करोत्येषा महामाया विश्वं सदसदात्मकम् ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः सूर्यश्चन्द्रः शचीपतिः ॥ ३५<br>अश्विनौ वसवस्त्वष्टा कुबेरो यादसां पतिः ।<br>वह्निवायुस्तथा पूषा सेनानीश्च विनायकः ॥ ३६<br>सर्वे शक्तियुताः शक्ताः कर्तुं कार्याणि स्वानि च ।<br>अन्यथा तेऽप्यशक्ता वै प्रस्पन्दितुमनीश्वराः ॥ ३७ | **नारदजी बोले—**हे सत्यवतीसुत व्यासजी! ये सत्त्वादि तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न कहे गये हैं और ये जगत्के कारण हैं, जैसा मैंने पहले भी सुना है॥ ३१ १/२ ॥<br><br>व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार नारदजीने विस्तारपूर्वक गुणोंके लक्षण और उनके विभागोंके सहित कार्योंको भी मुझे बतलाया है। सर्वदा उन्हीं परमशक्तिकी आराधना करनी चाहिये, जिनसे यह समस्त संसार व्याप्त है। वे भगवती कार्यभेदसे सगुणा और निर्गुणा दोनों हैं। वह परमपुरुष तो अकर्ता, पूर्ण, निःस्पृह तथा परम अविनाशी है; ये महामाया ही सत् और असद्रूप जगत्की रचना करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, विश्वकर्मा, कुबेर, वरुण, अग्नि, वायु, पूषा, कुमार कार्तिकेय और गणपति—ये सभी देवता उन्हीं महामायाकी शक्तिसे युक्त होकर अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। हे मुनीश्वरो! यदि ऐसा न हो तो वे हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३२—३७॥ |
| सा चैव कारणं राजन् जगतः परमेश्वरी ।<br>समाराधय तां भूप कुरु यज्ञं जनाधिप ॥ ३८<br>पूजनं परया भक्त्या तस्या एव विधानतः ।<br>महालक्ष्मीर्महाकाली तथा महासरस्वती ॥ ३९<br>ईश्वरी सर्वभूतानां सर्वकारणकारणम् ।<br>सर्वकामार्थदा शान्ता सुखसेव्या दयान्विता ॥ ४० | हे राजन्! वे परमेश्वरी ही इस जगत्की परम कारण हैं, अतः हे नरपते! अब आप उन्हींकी आराधना करें, उन्हींका यज्ञ करें और परम भक्तिके साथ विधिवत् उन्हींका पूजन करें। वे ही महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती हैं। वे सब जीवोंकी अधीश्वरी, समस्त कारणोंकी एकमात्र कारण, सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली, शान्तस्वरूपिणी, सुखपूर्वक सेवनीय तथा दयासे परिपूर्ण हैं॥ ३८—४०॥ |
| नामोच्चारणमात्रेण वाञ्छितार्थफलप्रदा ।<br>देवैराराधिता पूर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ ४१<br>मोक्षकामैश्च विविधैस्तापसैर्विजितात्मभिः ।<br>अस्पष्टमपि यन्नाम प्रसङ्गेनापि भाषितम् ॥ ४२ | ये भगवती नामोच्चारणमात्रसे ही मनोवांछित फल देनेवाली हैं। पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओं तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अनेक जितेन्द्रिय तपस्वियोंने उनकी आराधना की थी। किसी प्रसंगवश अस्पष्टरूपसे ही उच्चारित किया गया उनका नाम सर्वथा दुर्लभ मनोरथोंको भी पूर्ण कर देता है॥ ४१—४२ १/२ ॥ |
| ददाति वाञ्छितानर्थान्दुर्लभानपि सर्वथा ।<br>ऐ ऐ इति भयार्तेन दृष्ट्वा व्याघ्रादिकं वने ॥ ४३ | हे नृपश्रेष्ठ! इस सम्बन्धमें एक दृष्टान्त है—सत्यव्रत नामके एक मुनिने वनमें व्याघ्रादि हिंसक पशुओंको देखकर भयसे पीड़ित होकर ‘ऐ-ऐ’ |