देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ८ ] षष्ठ स्कन्ध ७५१
अ० ८ ] षष्ठ स्कन्ध ७५१
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवा देवर्षयस्तथा ॥ ५७
गत्वा चिन्तातुराः प्रोचुः पौलोमीं प्रणतास्ततः।
इन्द्रपत्नि दुराचारो नहुषस्त्वामिहेच्छति ॥ ५८
कुपितोऽस्मानुवाचेदं प्रेषयध्वं शचीमिह।
किं कुर्मस्तदधीनाः स्मो येनेन्द्रोऽयं कृतः किल ॥ ५९
तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह।
रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्तवास्मि शरणं गता ॥ ६०
बृहस्पतिरुवाच
न भेतव्यं त्वया देवि नहुषात्पापमोहितात्।
न त्वां दास्याम्यहं वत्से त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ ६१
शरणागतमार्तं च यो ददाति नराधमः।
स एव नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम्।
स्वस्था भव पृथुश्रोणि न त्यक्ष्ये त्वां कदाचन ॥ ६२
उसकी यह बात सुनकर चिन्तासे व्याकुल देवता तथा ऋषिगण शचीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहने लगे—हे इन्द्रपत्नि ! दुराचारी नहुष इस समय आपकी कामना करता है। उसने क्रुद्ध होकर हमसे यह बात कही है ‘शचीको यहाँ भेज दीजिये।’ हम उसके अधीन हैं, अतः कर ही क्या सकते हैं; क्योंकि उसे इन्द्र बना दिया गया है ॥ ५७–५९॥
यह सुनकर दुःखितमन शचीने बृहस्पतिसे कहा—‘हे ब्रह्मन्! नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये; मैं आपकी शरणमें हूँ’ ॥ ६० ॥
बृहस्पति बोले—हे देवि ! पापसे मोहित नहुषसे तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। हे पुत्रि ! मैं सनातनधर्मका त्यागकर तुम्हें उसको नहीं दूँगा ॥ ६१ ॥
जो अधम मनुष्य शरणमें आये हुए तथा दुःखी प्राणीको दूसरोंको सौंप देता है वह प्रलयपर्यन्त नरकमें वास करता है। अतः हे पृथुश्रोणि ! तुम निश्चिन्त रहो, मैं तुम्हारा त्याग कभी नहीं करूँगा॥ ६२॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रस्य पद्मनालप्रवेशानन्तरं नहुषस्य देवेन्द्रपदेऽभिषेकवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगना, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिको शचीको भगवतीकी आराधना करनेको कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना और शचीको इन्द्रका दर्शन होना
व्यास उवाच
नहुषस्त्वथ तां श्रुत्वा गुरोस्तु शरणं गताम्।
चुक्रोध स्मरबाणार्तस्तमाङ्गिरसमाशु वै ॥ १
देवावाहाङ्गिरससूनुर्हन्तव्योऽयं मया किल।
इतीन्द्राणीं गृहे मूढो रक्षतीति मया श्रुतम् ॥ २
इति तं कुपितं दृष्ट्वा देवाः सर्षपुरोगमाः।
अब्रुवन्नहुषं घोरं सामपूर्वं वचस्तदा ॥ ३
व्यासजी बोले—वे शची देवगुरुकी शरणमें चली गयी हैं—ऐसा सुनकर कामबाणसे आहत नहुष अंगिरापुत्र बृहस्पतिपर बहुत कुपित हुआ और उसने देवताओंसे कहा—यह अंगिरापुत्र बृहस्पति आज मेरेद्वारा निश्चय ही मारा जायगा; क्योंकि मैंने ऐसा सुना है कि उस मूर्खने इन्द्राणीको अपने घरमें रखा है॥ १-२॥
इस प्रकार नहुषको क्रुद्ध देखकर प्रधान ऋषियोंसहित देवतागण उस दुष्टसे सामनीतियुक्त वचन बोले—॥ ३॥
| ७६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्रोधं संहर राजेन्द्र त्यज पापमतिं प्रभो।<br>निन्दन्ति धर्मशास्त्रेषु परदाराभिमर्शनम्॥ ४ | हे राजेन्द्र! क्रोध दूर करो और पापकारिणी बुद्धिका त्याग करो। हे प्रभो! [मनीषियोंने] धर्मशास्त्रोंमें परस्त्रीगमनकी निन्दा की है॥ ४॥ |
| शक्रपत्नी सदा साध्वी जीवमाने पतौ पुनः।<br>कथमन्यं पतिं कुर्यात्सुभगातिपतिव्रता॥ ५ | इन्द्रकी पत्नी शची सदासे अत्यन्त साध्वी, सौभाग्यवती और पतिव्रता हैं; फिर अपने पतिके जीवित रहते वे कैसे दूसरेको पति बना सकती हैं?॥ ५॥ |
| त्रिलोकीशस्त्वमधुना शास्ता धर्मस्य वै विभो।<br>त्वादृशोऽधर्ममातिष्ठेत्तदा नश्येत्प्रजा ध्रुवम्॥ ६ | हे विभो! आज इस समय आप तीनों लोकोंके स्वामी तथा धर्मके रक्षक हैं। आप-जैसा राजा अधर्ममें स्थित हो जाय तब तो निश्चितरूपसे प्रजाका नाश हो जायगा॥ ६॥ |
| सर्वथा प्रभुणा कार्यं शिष्टाचारस्य रक्षणम्।<br>वारमुख्याश्च शतशो वर्तन्तेऽत्र शचीसमाः॥ ७ | राजाको सब प्रकारसे सदाचारकी रक्षा करनी चाहिये। यहाँ स्वर्गमें तो शचीके सदृश सैकड़ों प्रमुख अप्सराएँ हैं॥ ७॥ |
| रतिस्तु कारणं प्रोक्तं शृङ्गारस्य महात्मभिः।<br>रसहानिर्बलात्कारे कृते सति तु जायते॥ ८ | महात्माओंने रतिको ही शृंगारका कारण बताया है, बलप्रयोग किये जानेपर तो रसकी हानि ही होती है॥ ८॥ |
| उभयोः सदृशं प्रेम यदि पार्थिवसत्तम।<br>तदा वै सुखसम्पत्तिरुभयोरुपजायते॥ ९ | हे नृपश्रेष्ठ! जब [स्त्री-पुरुष] दोनोंमें एक समान प्रेम रहता है, तभी उन दोनोंको अधिक सुख प्राप्त होता है॥ ९॥ |
| तस्माद्भावमिमं मुञ्च परदाराभिमर्शने।<br>सद्भावं कुरु देवेन्द्र पदं प्राप्तोऽस्यनुत्तमम्॥ १० | अतः हे देवेन्द्र! परस्त्रीगमनकी यह भावना छोड़ दीजिये और श्रेष्ठ आचरण कीजिये; क्योंकि आपको इन्द्र-जैसा अतिश्रेष्ठ पद प्राप्त है॥ १०॥ |
| ऋद्धिक्षयस्तु पापेन पुण्यैनातिविवर्धनम्।<br>तस्मात्पापं परित्यज्य सन्मतिं कुरु पार्थिव॥ ११ | हे राजन्! पापसे सम्पत्तिका क्षय होता है और पुण्यसे महान् वृद्धि होती है, इसलिये पापकर्म छोड़कर सात्त्विक बुद्धिका आश्रय लीजिये॥ ११॥ |
| नहुष उवाच<br>गौतमस्य यदा भुक्ता दाराः शक्रेण देवताः।<br>वाचस्पतेस्तु सोमेन क्व यूयं संस्थितास्तदा॥ १२ | नहुषने कहा—हे देवताओ! जब देवराज इन्द्रने गौतमकी पत्नीके साथ और चन्द्रमाने बृहस्पतिकी पत्नीके साथ अनाचार किया था, तब तुमलोग कहाँ थे?॥ १२॥ |
| परोपदेशे कुशला प्रभवन्ति नराः किल।<br>कर्ता चैवोपदेष्टा च दुर्लभः पुरुषो भवेत्॥ १३ | लोग दूसरोंको उपदेश देनेमें बहुत कुशल होते हैं, परंतु उपदेश देनेवाला तथा उसका पालन करनेवाला पुरुष दुर्लभ होता है॥ १३॥ |
| मामागच्छतु सा देवी हितं स्यादद्भुतं हि वः।<br>एतस्याः परमं देवाः सुखमेवं भविष्यति॥ १४ | हे देवताओ! वह शची मेरे पास आ जाय, इसीमें आप सबका परम कल्याण है; इससे उसको भी अत्यन्त सुख मिलेगा॥ १४॥ |
| अन्यथा न हि तुष्येऽहं सत्यमेतद् ब्रवीमि वः।<br>विनयाद्वा बलाद्वापि तामाशु प्रापयन्त्विह॥ १५ | अन्य किसी भी प्रकारसे मैं सन्तुष्ट नहीं होऊँगा, यह मैं तुमलोगोंसे कह रहा हूँ। इसलिये विनयसे या बलपूर्वक तुमलोग उसे शीघ्र ही मुझे प्राप्त कराओ॥ १५॥ |
| अ० ८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाश्च मुनयस्तथा।<br>तमूचुश्चातिसन्त्रस्ता नहुषं मदनातुरम्॥ १६<br>इन्द्राणीमानयिष्यामः सामपूर्वं तवान्तिकम्।<br>इत्युक्त्वा ते तदा जग्मुर्बृहस्पतिनिकेतनम्॥ १७ | उसकी यह बात सुनकर भयभीत देवताओं और मुनियोंने उस कामातुर नहुषसे कहा—हमलोग सामनीतिसे इन्द्राणीको आपके पास लायेंगे—ऐसा कहकर वे लोग बृहस्पतिके निवासपर चले गये॥ १६-१७॥ |
| व्यास उवाच<br>ते गत्वाङ्गिरसः पुत्रं प्रोचुः प्राञ्जलयः सुराः।<br>जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि॥ १८<br>सा देया नहुषायाद्य वासवेऽसौ कृतो यतः।<br>वृणोत्वियं वरारोहा पतित्वे वरवर्णिनी॥ १९ | व्यासजी बोले—तदनन्तर वे देवगण अंगिराके पुत्र बृहस्पतिके पास जाकर हाथ जोड़कर उनसे बोले—हमें ज्ञात हुआ है कि इन्द्राणीको आपके घरमें शरण प्राप्त है, उन्हें आज ही नहुषको देना है; क्योंकि वह इन्द्र बना दिया गया है। यह सुलक्षणा सुन्दरी उन्हें पतिके रूपमें वरण कर ले॥ १८-१९॥ |
| बृहस्पतिः सुरानाह तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः।<br>नाहं त्यक्ष्ये तु पौलोमीं सतीं च शरणागताम्॥ २० | यह दारुण वचन सुनकर बृहस्पतीने देवताओंसे कहा—मैं शरणमें आयी हुई इस पतिव्रता शचीका त्याग नहीं करूँगा॥ २०॥ |
| देवा ऊचुः<br>उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यो येन सोऽद्य प्रसीदति।<br>अन्यथा कोपसंयुक्तो दुराराध्यो भविष्यति॥ २१ | देवगण बोले—तब दूसरा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वह आज प्रसन्न हो जाय, अन्यथा क्रुद्ध होनेपर वह दुराराध्य हो जायगा॥ २१॥ |
| गुरुरुवाच<br>तत्र गत्वा शची भूपं प्रलोभ्य वचसा भृशम्।<br>करोतु समयं बाला पतिं ज्ञात्वा मृतं भजे॥ २२<br>इन्द्रे जीवति मे कान्ते कथमम्यं करोम्यहम्।<br>अन्वेषणार्थं गन्तव्यं मया तस्य महात्मनः॥ २३<br>इति सा समयं कृत्वा वञ्चयित्वा च भूपतिम्।<br>भर्तुरानयने यत्नं करोतु मम वाक्यतः॥ २४ | देवगुरु बोले—सुन्दरी शची वहाँ जाकर राजाको अपनी बातसे अत्यन्त मोहित करके यह शपथ ले कि ‘अपने पतिको मृत जाननेके बाद ही मैं आपको अंगीकार करूँगी। अपने पति इन्द्रके जीवित रहते मैं किसी दूसरेको पति कैसे बना लूँ? इसलिये उन महाभागकी खोजके लिये मुझे जाना पड़ेगा।’ इस प्रकार वह मेरे कथनके अनुसार शपथ लेकर और राजाको छलकर अपने पतिको लानेका प्रयत्न करे॥ २२—२४॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मे सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>नहुषं सहिता जग्मुरिन्द्रपत्न्या दिवौकसः॥ २५ | ऐसा विचार करके सभी देवता बृहस्पतिको आगे करके इन्द्रपत्नी शचीके साथ नहुषके पास गये॥ २५॥ |
| तानागतान्समीक्ष्याह तदा कृत्रिमवासवः।<br>जहर्ष च मुदायुक्तस्तां वीक्ष्य मुदितोऽब्रवीत्॥ २६<br>अद्यास्मि वासवः कान्ते भज मां चारुलोचने।<br>पतित्वे सर्वलोकस्य पूज्योऽहं विहितः सुरैः॥ २७ | उन सभीको आया हुआ देखकर वह कृत्रिम इन्द्र नहुष हर्षित हुआ। उस शचीको देखकर वह आनन्दित हो गया और प्रसन्नतापूर्वक बोला—हे प्रिये! आज मैं इन्द्र हूँ, हे सुन्दर नेत्रोंवाली! मुझे पतिरूपमें अंगीकार करो। मैं देवताओंके द्वारा सम्पूर्ण लोकका पूज्य बना दिया गया हूँ॥ २६-२७॥ |
| इत्युक्ता सा नृपं प्राह वेपमाना त्रपायुता।<br>वरमिच्छाम्यहं राजंस्त्वत्तः प्राप्तं सुरेश्वर॥ २८ | नहुषके ऐसा कहनेपर शचीने लज्जित होकर काँपते हुए कहा—हे राजन्! हे सुरेश्वर! मैं आपसे एक वरप्राप्तिकी इच्छा करती हूँ। आप कुछ समयतक |