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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१

अ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अहोरात्रं परिक्लिष्टो रक्षणार्थं फलोत्सुकः ।<br>काले सुप्तस्तु हेमन्ते वने व्याघ्रादिभिर्भृशम् ॥ २७<br><br>भक्षितं शलभैः सर्वं निराशश्च कृतः पुनः ।<br>तद्वत्तीर्थश्रमः पुत्र कष्टदो न फलप्रदः ॥ २८लिये दिन-रात अनेक कष्ट सहे, किंतु फल लगनेका समय हेमन्त-काल आनेपर वह सो गया, जिससे व्याघ्र आदि वन्य जन्तुओं तथा टिड्डियोंने उस फसलको खा लिया और अन्तमें वह किसान सर्वथा निराश हो गया। उसी प्रकार हे पुत्र! तीर्थमें किया गया वह श्रम भी कष्टदायक ही सिद्ध होता है, उसका कोई फल नहीं मिलता॥ २७-२८॥
सत्त्वं समुत्कटं जातं प्रवृद्धं शास्त्रदर्शनात् ।<br>वैराग्यं तत्फलं जातं तामसार्थेषु नारद ॥ २९हे नारद! शास्त्रके अवलोकनसे सत्त्वगुण समुन्नत होता है तथा बड़ी तेजीसे बढ़ता है। उसका फल यह होता है कि तामस पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो जाता है॥ २९॥
प्रसह्माभिभवत्येव तद्रजस्तमसी उभे ।<br>रजः समुत्कटं जातं प्रवृत्तं लोभयोगतः ॥ ३०<br><br>तत्तथाभिभवत्येव तमःसत्त्वे तथा उभे ।<br>तमस्तथोत्कटं भूत्वा प्रवृद्धं मोहयोगतः ॥ ३१<br><br>तत्सत्त्वरजसी चोभे सङ्गम्याभिभवत्यपि ।<br>विस्तरं कथयाम्यद्य यथाभिभवतीति वै ॥ ३२वह सत्त्वगुण रज और तम—इन दोनोंको बलपूर्वक दबा देता है, लोभके कारण रजोगुण अत्यन्त तीव्र हो जाता है, वह बढ़ा हुआ रजोगुण सत्त्व तथा तम—इन दोनोंको दबा देता है। उसी प्रकार तमोगुण मोहके कारण तीव्रताको प्राप्त होकर सत्त्वगुण तथा रजोगुण—इन दोनोंको दबा देता है। ये गुण जिस प्रकार एक-दूसरेको दबाते हैं? उसे मैं यहाँपर विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ॥ ३०-३२॥
यदा सत्त्वं प्रवृद्धं वै मतिर्धर्मे स्थिता तदा ।<br>न चिन्तयति बाह्यार्थं रजस्तमःसमुद्भवम् ॥ ३३जब सत्त्वगुण बढ़ता है, उस समय बुद्धि धर्ममें स्थित रहती है। उस समय वह रजोगुण या तमोगुणसे उत्पन्न बाह्य विषयोंका चिन्तन नहीं करती है॥ ३३॥
अर्थं सत्त्वसमुद्भूतं गृह्णाति च न चान्यथा ।<br>अनायासकृतं चार्थं धर्मं यज्ञं च वाञ्छति ॥ ३४<br><br>सात्त्विकेष्वेव भोगेषु कामं वै कुरुते तदा ।<br><br>राजसेषु न मोक्षार्थं तामसेषु पुनः कुतः ॥ ३५उस समय बुद्धि सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यको अपनाती है; इसके अतिरिक्त वह अन्य कार्योंमें नहीं फँसती। बुद्धि बिना प्रयासके ही धर्म तथा यज्ञादि कर्ममें प्रवृत्त हो जाती है। मोक्षकी अभिलाषासे मनुष्य उस समय सात्त्विक पदार्थोंके भोगमें प्रवृत्त रहता है; वह राजसी भोगोंमें लिप्त नहीं होता, तब भला वह तमोगुणी कार्योंमें क्यों लगेगा?॥ ३४-३५॥
एवं जित्वा रजः पूर्वं ततश्च तमसो जयः ।<br>सत्त्वं च केवलं पुत्र तदा भवति निर्मलम् ॥ ३६इस प्रकार पहले रजोगुणको जीत करके वह तमोगुणको पराजित करता है। हे तात! उस समय एकमात्र विशुद्ध सत्त्वगुण ही स्थित रहता है॥ ३६॥
यदा रजः प्रवृद्धं वै त्यक्त्वा धर्मान् सनातनान् ।<br>अन्यथाकुरुते धर्माञ्छ्रद्धां प्राप्य तु राजसीम् ॥ ३७जब मनुष्यके मनमें रजोगुणकी वृद्धि होती है, तब वह सनातन धर्मोंको त्यागकर राजसी श्रद्धाके वशीभूत हो विपरीत धर्माचरण करने लगता है॥ ३७॥
२८२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजसादर्थसंवृद्धिस्तथा भोगस्तु राजसः।<br>सत्त्वं विनिर्गतं तेन तमसश्चापि निग्रहः॥ ३८रजोगुण बढ़नेसे धनकी वृद्धि होती है और भोग भी राजसी हो जाता है। उस दशामें सत्त्वगुण दूर चला जाता है और उससे तमोगुण भी दब जाता है॥ ३८॥
यदा तमो विवृद्धं स्यादुत्कटं सम्बभूव ह।<br>तदा वेदे न विश्वासो धर्मशास्त्रे तथैव च॥ ३९<br><br>श्रद्धां च तामसीं प्राप्य करोति च धनात्ययम्।<br>द्रोहं सर्वत्र कुरुते न शान्तिमधिगच्छति॥ ४०<br><br>जित्वा सत्त्वं रजश्चैव क्रोधनो दुर्मतिः शठः।<br>वर्तते कामचारेण भावेषु विततेषु च॥ ४१जब तमोगुणकी वृद्धि होती है और वह उत्कट हो जाता है, तब वेद तथा धर्मशास्त्रमें विश्वास नहीं रह जाता। उस समय मनुष्य तामसी श्रद्धा प्राप्त करके धनका दुरुपयोग करता है, सबसे द्रोह करने लगता है तथा उसे शान्ति नहीं मिलती। वह क्रोधी, दुर्बुद्धि तथा दुष्ट मनुष्य सत्त्व तथा रजोगुणको दबाकर अनेकविध तामसिक विचारोंमें लीन रहता हुआ मनमाना आचरण करने लगता है॥ ३९-४१॥
एकं सत्त्वं न भवति रजश्चैकं तमस्तथा।<br>सहैवाश्रित्य वर्तन्ते गुणा मिथुनधर्मिणः॥ ४२किसी भी प्राणीमें सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण अकेले नहीं रहते; अपितु मिश्रित धर्मवाले वे तीनों गुण एक-दूसरेके आश्रयीभूत होकर रहते हैं॥ ४२॥
रजो विना न सत्त्वं स्याद्रजः सत्त्वं विना क्वचित्।<br>तमो विना न चैवैते वर्तन्ते पुरुषर्षभ॥ ४३<br><br>तमस्ताभ्यां विहीनं तु केवलं न कदाचन।<br>सर्वे मिथुनधर्माणो गुणाः कार्यान्तरेषु वै॥ ४४हे पुरुषश्रेष्ठ! रजोगुणके बिना सत्त्वगुण और सत्त्वगुणके बिना रजोगुण कदापि रह नहीं सकते। इसी प्रकार तमोगुणके बिना ये दोनों गुण नहीं रह सकते। इस प्रकार ये गुण परस्पर स्थित रहते हैं। सत्त्वगुण तथा रजोगुणके बिना तमोगुण नहीं रहता; क्योंकि इन मिश्रित धर्मवाले सभी गुणोंकी स्थिति कार्य-कारण-भावसे विभिन्न प्रकारकी होती है॥ ४३-४४॥
अन्योन्यसंश्रिताः सर्वे तिष्ठन्ति न वियोजिताः।<br>अन्योन्यजनकाश्चैव यतः प्रसवधर्मिणः॥ ४५ये सभी गुण अन्योन्याश्रयभावसे विद्यमान रहते हैं, अलग-अलग भावसे नहीं। प्रसवधर्मी होनेके कारण ये एक-दूसरेके उत्पादक भी होते हैं॥ ४५॥
सत्त्वं कदाचिच्च रजस्तमसी जनयत्युत।<br>कदाचित्तु रजः सत्त्वतमसी जनयत्यपि॥ ४६<br><br>कदाचित्तु तमः सत्त्वरजसी जनयत्युभे।<br>जनयन्त्येवमन्योन्यं मृत्पिण्डश्च घटं यथा॥ ४७सत्त्वगुण कभी रजोगुणको और कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है; इसी तरह रजोगुण कभी सत्त्वगुणको तथा कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है। इसी प्रकार तमोगुण कभी सत्त्वगुणको एवं कभी रजोगुणको भी उत्पन्न करता है। ये तीनों गुण आपसमें एक-दूसरेको उसी प्रकार उत्पन्न कर देते हैं, जिस प्रकार मिट्टीका लोंदा घड़ेको उत्पन्न कर देता है॥ ४६-४७॥
बुद्धिस्थास्ते गुणाः कामान्बोधयन्ति परस्परम्।<br>देवदत्तविष्णुमित्रयज्ञदत्तादयो यथा॥ ४८मनुष्योंकी बुद्धिमें स्थित ये तीनों गुण परस्पर कामनाओंको उसी प्रकार जाग्रत् करते हैं; जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त आदि मिलकर काम करते हैं॥ ४८॥