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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ३ ] माहात्म्य ४५

अ० ३ ] माहात्म्य ४५

ऋक्षराजस्ततः प्रीत्या कन्यां जाम्बवतीं निजाम्।<br>ददौ कृष्णाय सम्पूज्य स्यमन्तकमणिं तथा॥ ७६तत्पश्चात् ऋक्षराज जाम्बवान्‌ने श्रीकृष्णकी विधिवत् पूजा करके स्यमन्तकमणि तथा अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अर्पित कर दी॥ ७६॥
स तां पत्नीं समादाय मणिं कण्ठे तथादधत्।<br>अभिमन्त्र्यर्क्षराजञ्च प्रतस्थे द्वारकां प्रति॥ ७७श्रीकृष्णने जाम्बवतीको पत्नीके रूपमें अंगीकार करके मणिको गलेमें धारण कर लिया और ऋक्षराज जाम्बवान्‌से विदा लेकर वे द्वारकापुरीके लिये प्रस्थित हुए॥ ७७॥
कथासमाप्तिदिवसे वसुदेव उदारधीः।<br>ब्राह्मणान् भोजयामास दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ७८उधर द्वारकामें उदारहृदय श्रीवसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतपुराण-कथाकी समाप्तिके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ७८॥
आशीर्वाचं प्रयुञ्जाना द्विजा यत्समये हरिः।<br>आजगाम क्षणे तस्मिन् पत्न्या सह मणिं दधत्॥ ७९जिस समय वे ब्राह्मण वसुदेवको आशीर्वचन प्रदान कर रहे थे, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण मणि धारण किये हुए पत्नी जाम्बवतीके साथ वहाँ आ पहुँचे॥ ७९॥
भार्यया सहितं कृष्णं वसुदेवपुरोगमाः।<br>दृष्ट्वा हर्षाश्रुपूर्णाक्षाः समवापुः परां मुदम्॥ ८०भार्यासहित भगवान् श्रीकृष्णको देखकर वसुदेवजी तथा उपस्थित जनसमूहकी आँखें हर्षातिरेकके अश्रुसे परिपूर्ण हो गयीं और वे परम आनन्दित हुए॥ ८०॥
देवर्षिर्नारदश्चाथ कृष्णागमनहर्षितः।<br>आमन्त्र्य वसुदेवं च कृष्णं ब्रह्मसभां ययौ॥ ८१देवर्षि नारद भी श्रीकृष्णके आगमनसे हर्षित हुए और उन्होंने वसुदेवजी तथा श्रीकृष्णसे विदा लेकर ब्रह्मसभाके लिये प्रस्थान किया॥ ८१॥
हरिचरितमिदं यत्कीर्तितं दुर्यशोघ्नं<br>पठति विमलभक्त्या शुद्धचित्तः शृणोति।<br>स भवति सुखपूर्णः सर्वदा सिद्धकामो<br>जगति च वपुषोऽन्ते मुक्तिमार्गं लभेच्च॥ ८२जो मनुष्य निष्कपट भक्ति एवं शुद्ध हृदयसे भगवान्‌के इस विख्यात तथा कलंकनाशक चरित्रका पाठ एवं श्रवण करता है, वह पूर्ण सुखी हो जाता है, जगत्‌में उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा मृत्युके अनन्तर वह मोक्षपद प्राप्त करता है॥ ८२॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये वसुदेवस्य देवीभागवतनवाह-
श्रवणात्पुत्रप्राप्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


### अथ तृतीयोऽध्यायः
#### श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुद्युम्नकी कथा

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| **सूत उवाच**<br>अथेतिहासमन्यच्च शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>देवीभागवतस्यास्य माहात्म्यं यत्र गीयते॥ १ | **सूतजी बोले—** हे मुनिवरो! अब आपलोग एक अन्य इतिहास सुनिये, जिसमें इस देवीभागवतके माहात्म्यका वर्णन किया गया है॥ १॥ |
| एकदा कुम्भयोनिस्तु लोपामुद्रापतिर्मुनिः।<br>गत्वा कुमारमभ्यर्च्य पप्रच्छ विविधाः कथाः॥ २ | एक बार कुम्भयोनि लोपामुद्रापति महर्षि अगस्त्यने कुमार कार्तिकेयके पास जाकर उनकी भलीभाँति पूजा करके उनसे विविध प्रकारकी बातें पूछीं॥ २॥ |
४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
स तस्मै भगवान् स्कन्दः कथयामास भूरिशः।<br>दानतीर्थव्रतादीनां माहात्म्योपचिताः कथाः॥ ३<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं मणिकर्णीभवं तथा।<br>गङ्गायाश्चापि तीर्थानां वर्णितं बहुविस्तरम्॥ ४भगवान् कार्तिकेयने दान-तीर्थ-व्रतादिके माहात्म्यसे परिपूर्ण अनेक कथाओंका वर्णन उनसे किया। उन्होंने वाराणसी, मणिकर्णिका, गंगा तथा अनेक तीर्थोंके माहात्म्यका अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥ ३-४॥
श्रुत्वाथ स मुनिः प्रीतः कुमारं भूरिवर्चसम्।<br>पुनः पप्रच्छ लोकानां हितार्थं कुम्भसम्भवः॥ ५उसे सुनकर अगस्त्यमुनि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने महातेजसम्पन्न कुमार कार्तिकेयसे लोक-कल्याणके लिये पुनः पूछा॥ ५॥
अगस्त्य उवाच<br>भगवंस्तारकाराते देवीभागवतस्य तु।<br>माहात्म्यं श्रवणे तस्य विधिं चापि वद प्रभो॥ ६अगस्त्यजी बोले—हे तारकरिपु! हे भगवन्! हे प्रभो! आप मुझे देवीभागवतके माहात्म्य तथा उसके श्रवणकी विधि भी बतायें॥ ६॥
देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥ ७श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है॥ ७॥
स्कन्द उवाच<br>श्रीभागवतमाहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात् क्षमः।<br>शृणु संक्षेपतो ब्रह्मन् कथयिष्यामि साम्प्रतम्॥ ८कार्तिकेय बोले—हे ब्रह्मन्! श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यको विस्तारपूर्वक कहनेमें कौन समर्थ है? मैं इस समय संक्षेपमें इसे कहूँगा, आप सुनिये॥ ८॥
या नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका।<br>साक्षात् समाश्रिता यत्र भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी॥ ९जो शाश्वती, सच्चिदानन्दस्वरूपा, भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली जगदम्बा हैं, वे स्वयं इस पुराणमें विराजमान रहती हैं॥ ९॥
अतस्तद्वाङ्मयी मूर्तिर्देवीभागवते मुने।<br>पठनाच्छ्रवणाद्यस्य न किञ्चिदिह दुर्लभम्॥ १०अतएव हे मुने! यह श्रीमद्देवीभागवत उन जगदम्बिकाकी वाङ्मयी मूर्ति है, जिसके पठन एवं श्रवणसे इस लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ १०॥
आसीद्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः।<br>सोऽनपत्योऽकरोदिष्टं वसिष्ठानुमतो नृपः॥ ११विवस्वान्‌के एक पुत्र हुए, जो श्राद्धदेव नामसे प्रसिद्ध थे। सन्तानरहित होनेके कारण उन राजा श्राद्धदेवने वसिष्ठमुनिकी अनुमतिसे पुत्रेष्टि यज्ञ किया॥ ११॥
होतारं प्रार्थयामास श्रद्धाथ दयिता मनोः।<br>कन्या भवतु मे ब्रह्मंस्तथोपायो विधीयताम्॥ १२तत्पश्चात् मनु श्राद्धदेवकी भार्या श्रद्धाने यज्ञके होतासे प्रार्थना की—हे ब्रह्मन्! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मुझे कन्याकी प्राप्ति हो॥ १२॥
मनसा चिन्तयन् होता कन्यामेवाजुहोद्धविः।<br>ततस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम चाभवत्॥ १३अतः होताने मनमें कन्या-प्राप्तिका संकल्प करते हुए आहुति डाली और उसके विपरीत भावके फलस्वरूप एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'इला' रखा गया॥ १३॥
अथ राजा सुतां दृष्ट्वा प्रोवाच विमना गुरुम्।<br>कथं सङ्कल्पवैषम्यमिह जातं प्रभो तव॥ १४इसके बाद पुत्रीको देखकर उदास मनवाले राजा श्राद्धदेवने गुरु वसिष्ठसे कहा—हे प्रभो! पुत्र-प्राप्तिके आपके संकल्पके विपरीत यह कन्या कैसे उत्पन्न हो गयी?॥ १४॥

| अ० ३ ] | माहात्म्य | ४७ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तच्छ्रुत्वा स मुनिर्दध्यौ ज्ञात्वा होतुर्व्यतिक्रमम्।<br>ईश्वरं शरणं यात इलायाः पुंस्त्वकाम्यया॥ १५यह सुनकर महर्षि वसिष्ठने ध्यान लगाया, इसमें होताका व्यतिक्रम जानकर वे इलाको पुत्र बनानेकी कामनासे ईश्वरकी शरणमें गये॥ १५॥
मुनेस्तपःप्रभावाच्च परेशानुग्रहात्तथा।<br>पश्यतां सर्वलोकानामिला पुरुषतामगात्॥ १६मुनिके तपप्रभाव और भगवान्‌की कृपासे सभी लोगोंके देखते-देखते इला कन्यासे पुरुषरूपमें परिवर्तित हो गयी॥ १६॥
गुरुणा कृतसंस्कारः सुद्युम्नोऽथ मनोः सुतः।<br>निधिर्बभूव विद्यानां सरितामिव सागरः॥ १७इसके बाद गुरु वसिष्ठने पूर्णरूपसे संस्कार करके उसका नाम 'सुद्युम्न' रखा। वे मनुपुत्र सुद्युम्न सभी नदियोंके निधानभूत सागरकी भाँति सभी विद्याओंके निधान हो गये॥ १७॥
अथ कालेन सुद्युम्नस्तारुण्यं समवाप्य च।<br>मृगयार्थं वनं यातो हयमारुह्य सैन्धवम्॥ १८कुछ समय बीतनेपर सुद्युम्न युवा हुए और एक दिन सिन्धुदेशीय घोड़ेपर चढ़कर वे आखेटके लिये वनमें गये॥ १८॥
वनाद् वनान्तरं गच्छन् बहु बभ्राम सानुगः।<br>दैवादधस्ताद्धेमाद्रेः स कुमारो वनं ययौ॥ १९<br><br>कस्मिंश्चित् समये यत्र भार्यायापर्णया सह।<br>अरमद्देवदेवस्तु शङ्करो भगवान् मुदा॥ २०अपने सहचरोंके साथ वे कुमार सुद्युम्न एक वनसे दूसरे वनमें जाते हुए भटकते रहे और फिर संयोगसे वे हिमालयकी तलहटीके उस वनमें पहुँच गये जहाँ किसी समय देवाधिदेव भगवान् शंकर अपनी भार्या अपर्णाके साथ आनन्दपूर्ण मुद्रामें रमण कर रहे थे॥ १९-२०॥
तदा तु मुनयस्तत्र शिवदर्शनलालसाः।<br>आजग्मुरथ तान् दृष्ट्वा गिरिजा व्रीडिताभवत्॥ २१उसी समय भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे मुनिगण वहाँ आ गये और उन्हें देखकर पार्वतीजी लज्जित हो गयीं॥ २१॥
रममाणौ तु तौ दृष्ट्वा गिरिशौ संशितव्रताः।<br>निवृत्ता मुनयो जग्मुर्वैकुण्ठनिलयं तदा॥ २२तब शिव एवं पार्वतीको रमण करते देखकर उत्तम व्रत धारण करनेवाले वे मुनिगण वहाँसे लौटकर वैकुण्ठ-धामकी ओर चल दिये॥ २२॥
प्रियायाः प्रियमन्विच्छञ्छिवोऽरण्यं शशाप ह।<br>अद्यारभ्य विशेद्योऽत्र पुमान् योषिद् भवेदिति॥ २३तदनन्तर अपनी प्रियतमाको प्रसन्न करनेके लिये भगवान्‌ने उस अरण्यको शाप दे दिया कि आजसे जो भी पुरुष यहाँ प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो जायगा॥ २३॥
तत आरभ्य तं देशं पुरुषा वर्जयन्ति हि।<br>तत्र प्रविष्टः सुद्युम्नो बभूव प्रमदोत्तमा॥ २४तभीसे पुरुषोंने उस वनमें जाना त्याग दिया था और संयोगवश वहाँ पहुँचते ही सुद्युम्न एक लावण्यमयी स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हो गये॥ २४॥
स्त्रीभूताननुगानश्वं वडवां वीक्ष्य विस्मितः।<br>अथ सा सुन्दरी योषा विचचार वने वने॥ २५अपने सभी अनुचरोंको पुरुषसे स्त्री तथा घोड़ोंको घोड़ियोंमें रूपान्तरित हुआ देखकर सुद्युम्न आश्चर्यचकित हो गये। अब वह रूपवती तरुणी वन-वनमें विचरण करने लगी॥ २५॥
४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३

| एकदा सा जगामाथ बुधस्याश्रमसन्निधौ।<br>दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं पीनोन्नतपयोधराम्॥ २६<br><br>बिम्बोष्ठीं कुन्ददशनां सुमुखीमुत्पलेक्षणाम्।<br>अनङ्गशरविद्धाङ्गश्चकमे भगवान् बुधः॥ २७ | एक बार वह बुधके आश्रमके समीप पहुँची। स्थूल तथा उन्नत स्तनोंवाली, बिम्ब-फलके समान लाल ओठोंवाली, कुन्दफूलके समान श्वेत दाँतोंवाली, सुन्दर मुख तथा कमलके समान नयनोंवाली उस सर्वाङ्गसुन्दरी तरुणीको देखकर कामदेवके बाणोंसे बिंधे हुए अंगोंवाले भगवान् बुध उसपर मोहित हो गये॥ २६-२७॥ |
| सापि तं चकमे सुभ्रूः कुमारं सोमनन्दनम्।<br>ततस्तस्याश्रमेऽवात्सीद्रममाणा बुधेन सा॥ २८ | वह सुन्दर भौंहोंवाली युवती भी चन्द्रपुत्र कुमार बुधपर आसक्त हो गयी और बुधके साथ रमण करती हुई उनके आश्रममें रहने लगी॥ २८॥ |
| अथ कालेन कियता पुरूरवसमात्मजम्।<br>स तस्यां जनयामास मित्रावरुणसम्भवः॥ २९ | हे महर्षि अगस्त्य! कुछ समय बाद बुधने उस तरुणीसे पुरूरवा नामक पुत्रको उत्पन्न किया॥ २९॥ |
| अथ वर्षेषु यातेषु कदाचित् सा बुधाश्रमे।<br>स्मृत्वा स्वं पूर्ववृत्तान्तं दुःखिता निर्जगाम ह॥ ३० | इस प्रकार बुधके आश्रममें रहते हुए कई वर्ष बीत जानेपर किसी समय उसे अपने पूर्व वृत्तान्तका स्मरण हो आया और वह दुःखित होकर आश्रमसे चली गयी॥ ३०॥ |
| गुरोरथाश्रमं गत्वा वसिष्ठस्य प्रणम्य तम्।<br>निवेद्य वृत्तं शरणं ययौ पुंस्त्वमभीप्सती॥ ३१ | इसके बाद गुरु वसिष्ठके आश्रममें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया और सारा वृत्तान्त कहकर पुरुषत्वकी कामना करती हुई वह उनके शरणागत हो गयी॥ ३१॥ |
| वसिष्ठो ज्ञातवृत्तान्तो गत्वा कैलासपर्वतम्।<br>सम्पूज्य शम्भुं तुष्टाव भक्त्या परमया युतः॥ ३२ | इस प्रकार सभी बातोंको जानकर वसिष्ठजी कैलास-पर्वतपर जाकर विधि-विधानसे भगवान् शंकरकी पूजा करके परम भक्तिसे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३२॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>नमो नमः शिवायस्तु शङ्कराय कपर्दिने।<br>गिरिजार्द्धाङ्गदेहाय नमस्ते चन्द्रमौलये॥ ३३ | **वसिष्ठजी बोले—**शिव, शंकर, कपर्दी, गिरिजाके अर्धांग एवं चन्द्रमौलिको बार-बार नमस्कार है॥ ३३॥ |
| मृडाय सुखदात्रे ते नमः कैलासवासिने।<br>नीलकण्ठाय भक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने॥ ३४ | मृड, सुखदाता, कैलासवासी, नीलकण्ठ, भक्तोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ३४॥ |
| शिवाय शिवरूपाय प्रपन्नभयहारिणे।<br>नमो वृषभवाहाय शरण्याय परात्मने॥ ३५ | शिव, शिवस्वरूप, शरणागतभयहारी, वृषभवाहन, शरणदाता परमात्माको नमस्कार है॥ ३५॥ |
| ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय सर्गस्थितिलयेषु च।<br>नमो देवाधिदेवाय वरदाय पुरारये॥ ३६ | सृजन, पालन तथा संहारके समय ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशरूपधारी, देवाधिदेव, वरदायक तथा त्रिपुरारिको मेरा नमस्कार है॥ ३६॥ |
| यज्ञरूपाय यजतां फलदात्रे नमो नमः।<br>गङ्गाधराय सूर्येन्दुशिखिनेत्राय ते नमः॥ ३७ | यज्ञरूप तथा याजकोंके फलदाताको बार-बार नमस्कार है। आप गंगाधर, सूर्य-चन्द्र-अग्निस্বরূপ त्रिनेत्रको मेरा नमस्कार है॥ ३७॥ |