संग्रह पर लौटें



देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८५
पृष्ठ 394स्थायी लिंक
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८५
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तथा तेन ब्राह्मणः संशितव्रतः।<br>उवाच परमप्रीतस्तं वैश्यं नृपसत्तम॥ ४४ | व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! उसके इस प्रकार पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उस ब्राह्मणने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस वैश्यसे कहा—॥ ४४॥ |
| वैश्यवर्य कुरुष्वाद्य नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>पूजनं भगवत्याश्च हवनं भोजनं तथा॥ ४५<br><br>वेदपारायणं शक्तिजपहोमादिकं तथा।<br>कुरुष्वाद्य यथाशक्ति तव कार्यं भविष्यति॥ ४६ | हे वैश्यवर्य! अब तुम पवित्र नवरात्रव्रतका अनुष्ठान करो। इसमें तुम भगवतीकी पूजा, हवन, ब्राह्मणभोजन, वेदपाठ, उनके मन्त्रका जप और होम आदि यथाशक्ति सम्पन्न करो। इससे तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा॥ ४५-४६॥ |
| एतस्मादपरं किञ्चिद् व्रतं नास्ति धरातले।<br>नवरात्राभिधं वैश्य पावनं सुखदं तथा॥ ४७ | हे वैश्य! नवरात्र नामक इस पवित्र तथा सुखदायक व्रतसे बढ़कर इस पृथ्वीतलपर अन्य कोई भी व्रत नहीं है॥ ४७॥ |
| ज्ञानदं मोक्षदं चैव सुखसन्तानवर्धनम्।<br>शत्रुनाशनकरं कामं नवरात्रव्रतं सदा॥ ४८ | यह नवरात्रव्रत सर्वदा ज्ञान तथा मोक्षको देनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला एवं शत्रुओंका पूर्णरूपसे विनाश करनेवाला है॥ ४८॥ |
| राज्यभ्रष्टेन रामेण सीताविरहितेन च।<br>किष्किन्धायां व्रतं चैतत्कृतं दुःखातुरेण वै॥ ४९<br><br>प्रतप्तेनापि रामेण सीताविरहवह्निना।<br>विधिवत्पूजिता देवी नवरात्रव्रतेन वै॥ ५० | राज्यसे च्युत तथा सीताके वियोगसे अत्यन्त दुःखित श्रीरामने किष्किन्धापर्वतपर इस व्रतको किया था। सीताकी विरहाग्निसे अत्यधिक सन्तप्त श्रीरामने उस समय नवरात्रव्रतके विधानसे भगवती जगदम्बाकी भलीभाँति पूजा की थी॥ ४९-५०॥ |
| तेन प्राप्ताथ वैदेही कृत्वा सेतुं महार्णवे।<br>हत्वा मन्दोदरीनाथं कुम्भकर्णं महाबलम्॥ ५१<br><br>मेघनादं सुतं हत्वा कृत्वा भूपं विभीषणम्।<br>पश्चादयोध्यामागत्य प्राप्तं राज्यमकण्टकम्॥ ५२ | इसी व्रतके प्रभावसे उन्होंने महासागरपर सेतुकी रचनाकर महाबली मन्दोदरीपति रावण, कुम्भकर्ण तथा रावणपुत्र मेघनादका संहार करके सीताको प्राप्त किया। विभीषणको लंकाका राजा बनाकर पुनः अयोध्या लौटकर उन्होंने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया था॥ ५१-५२॥ |
| नवरात्रव्रतस्यास्य प्रभावेण विशांवर।<br>सुखं भूमितले प्राप्तं रामेणामिततेजसा॥ ५३ | हे वैश्यवर! इस प्रकार अमित तेजवाले श्रीरामजीने इस नवरात्रव्रतके प्रभावसे पृथ्वीतलपर महान् सुख प्राप्त किया॥ ५३॥ |
| व्यास उवाच<br>इति विप्रवचः श्रुत्वा स वैश्यस्तं द्विजं गुरुम्।<br>कृत्वा जग्राह सन्मन्त्रं मायाबीजाभिधं नृप॥ ५४ | व्यासजी बोले—हे राजन्! ब्राह्मणका यह वचन सुनकर उस वैश्यने उन्हें अपना गुरु मान लिया और उनसे मायाबीज नामक उत्तम मन्त्रकी दीक्षा प्राप्त की॥ ५४॥ |
| जजाप परया भक्त्या नवरात्रमतन्द्रितः।<br>नानाविधोपहारैश्च पूजयामास सादरम्॥ ५५<br>नवसंवत्सरं चैव मायाबीजपरायणः। | तत्पश्चात् आलस्यहीन होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूरे नवरात्रभर उसने उस मन्त्रका जप किया और अनेकविध उपहारोंसे आदरपूर्वक भगवतीका पूजन किया। इस प्रकार मायाबीजपरायण उस वैश्यने नौ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 A
पृष्ठ 395स्थायी लिंक
| ३८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
|---|
| नवमे वत्सरान्ते तु महाष्टम्यां महेश्वरी ॥ ५६<br><br>अर्धरात्रे तु सञ्जाते प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>नानावरप्रदानैश्च कृतकृत्यं चकार तम् ॥ ५७ | वर्षोंतक यह अनुष्ठान किया। नौवें वर्षके अन्तमें महाष्टमी तिथिको अर्धरात्रि आनेपर महेश्वरीने उसे अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अनेक प्रकारके वरदानोंसे कृतकृत्य कर दिया॥ ५५-५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीपूजामहत्त्ववर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः
श्रीरामचरित्रवर्णन
| जनमेजय उवाच<br>कथं रामेण तच्चीर्णं व्रतं देव्याः सुखप्रदम्।<br>राज्यभ्रष्टः कथं सोऽथ कथं सीता हृता पुनः॥ १ | जनमेजय बोले— श्रीरामाने भगवती जगदम्बाके इस सुखप्रदायक व्रतका अनुष्ठान किस प्रकार किया, वे राज्यच्युत कैसे हुए और फिर सीता-हरण किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>राजा दशरथः श्रीमानयोध्याधिपतिः पुरा।<br>सूर्यवंशधरश्चासीद्देवब्राह्मणपूजकः ॥ २ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्यापुरीमें राज्य करते थे। वे सूर्यवंशमें श्रेष्ठ राजाके रूपमें प्रतिष्ठित थे और वे देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया करते थे॥ २॥ |
| चत्वारो जज्ञिरे तस्य पुत्रा लोकेषु विश्रुताः।<br>रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चेति नामतः॥ ३<br><br>राज्ञः प्रियकराः सर्वे सदृशा गुणरूपतः।<br>कौसल्यायाः सुतो रामः कैकेय्या भरतः स्मृतः॥ ४<br><br>सुमित्रातनयौ जातौ यमलौ द्वौ मनोहरौ।<br>ते जाता वै किशोराश्च धनुर्बाणधराः किल॥ ५ | उनके चार पुत्र उत्पन्न हुए; जो लोकमें राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामसे विख्यात हुए। गुण तथा रूपमें पूर्ण समानता रखनेवाले वे सभी महाराज दशरथको अत्यन्त प्रिय थे। उनमें राम महारानी कौसल्याके तथा भरत महारानी कैकेयीके पुत्र कहे गये। रानी सुमित्राके लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नामवाले जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए। वे चारों किशोरावस्थामें ही धनुष-बाणधारी हो गये॥ ३–५॥ |
| सूनवः कृतसंस्कारा भूपतेः सुखवर्धकाः।<br>कौशिकेन तदागत्य प्रार्थितो रघुनन्दनः॥ ६ | महाराज दशरथने सुख बढ़ानेवाले अपने चारों पुत्रोंके संस्कार भी सम्पन्न कर दिये। तब एक समय महर्षि विश्वामित्र ने दशरथके यहाँ आकर उनसे रघुनन्दन रामको माँगा॥ ६॥ |
| राघवं मखरक्षार्थं सूनुं षोडशवार्षिकम्।<br>तस्मै सोऽयं ददौ रामं कौशिकाय सलक्ष्मणम्॥ ७ | महाराज दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये लक्ष्मण-सहित सोलहवर्षीय पुत्र रामको विश्वामित्रको समर्पित कर दिया॥ ७॥ |
| तौ समेत्य मुनिं मार्गे जग्मतुश्चारुदर्शनौ।<br>ताटका निहता मार्गे राक्षसी घोरदर्शना॥ ८ | प्रियदर्शन वे दोनों भाई मुनिके साथ मार्गमें चल दिये। रामचन्द्रजीने मुनियोंको सदा पीड़ित करनेवाली तथा अत्यन्त भयानक रूपवाली ताटकाको |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 B
पृष्ठ 396स्थायी लिंक
| अ० २८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३८७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रामेणैकेन बाणेन मुनीनां दुःखदा सदा।<br>यज्ञरक्षा कृता तत्र सुबाहुर्निहतः शठः॥ ९<br><br>मारीचोऽथ मृतप्रायो निक्षिप्तो बाणवेगतः।<br>एवं कृत्वा महत्कर्म यज्ञस्य परिरक्षणम्॥ १०<br><br>गतास्ते मिथिलां सर्वे रामलक्ष्मणकौशिकाः।<br>अहल्या मोचिता शापान्निष्पापा सा कृताबला॥ ११ | रास्तेमें ही मात्र एक बाणसे मार डाला। उन्होंने दुष्ट सुबाहुका वध किया तथा मारीचको अपने बाणसे दूर फेंककर उसे मृतप्राय कर दिया और यज्ञ-रक्षा की। इस प्रकार यज्ञ-रक्षाका महान् कृत्य सम्पन्न करके राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्रने मिथिलापुरीके लिये प्रस्थान किया। जाते समय मार्गमें रामने अबला अहल्याको शापसे मुक्ति प्रदान करके उसे पापरहित कर दिया॥ ८—११॥ |
| विदेहनगरे तौ तु जग्मतुर्मुनिना सह।<br>बभञ्ज शिवचापञ्च जनकेन पणीकृतम्॥ १२<br><br>उपयेमे ततः सीतां जानकीञ्च रंमांशजाम्।<br>लक्ष्मणाय ददौ राजा पुत्रीमेकां तथोर्मिलाम्॥ १३ | इसके बाद वे दोनों भाई मुनि विश्वामित्रके साथ जनकपुर पहुँच गये और वहाँ श्रीरामने जनकजीद्वारा प्रतिज्ञाके रूपमें रखे शिव-धनुषको तोड़ दिया और लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न जनकनन्दिनी सीताके साथ विवाह किया। राजा जनकने दूसरी पुत्री उर्मिलाका विवाह लक्ष्मणके साथ कर दिया॥ १२-१३॥ |
| कुशध्वजसुते कन्ये प्राप्तुर्भ्रातरावुभौ।<br>तथा भरतशत्रुघ्नौ सुशीलौ शुभलक्षणौ॥ १४ | शीलसम्पन्न तथा शुभलक्षणोंसे युक्त दोनों भाई भरत तथा शत्रुघ्नने कुशध्वजकी दो पुत्रियों [माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति]-को पत्नीरूपमें प्राप्त किया॥ १४॥ |
| एवं दारक्रियास्तेषां भ्रातॄणां चाभवन्नृप।<br>चतुर्णां मिथिलायां तु यथाविधि विधानतः॥ १५ | हे राजन्! इस प्रकार उन चारों भाइयोंका विवाह मिथिलापुरीमें ही विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ॥ १५॥ |
| राज्ययोग्यं सुतं दृष्ट्वा राजा दशरथस्तदा।<br>राघवाय धुरं दातुं मनश्चक्रे निजाय वै॥ १६ | तत्पश्चात् महाराज दशरथने अपने बड़े पुत्र रामको राज्य करनेयोग्य देखकर उन्हें राज्य-भार सौंपनेका मनमें निश्चय किया॥ १६॥ |
| सम्भारं विहितं दृष्ट्वा कैकेयी पूर्वकल्पितौ।<br>वरौ संप्रार्थयामास भर्तारं वशवर्तिनम्॥ १७ | राजतिलक-सम्बन्धी सामग्रियोंका प्रबन्ध हुआ देखकर रानी कैकेयीने अपने वशीभूत महाराज दशरथसे पूर्वकल्पित दो वरदान माँगे॥ १७॥ |
| राज्यं सुताय चैकेन भरताय महात्मने।<br>रामाय वनवासञ्च चतुर्दशसमास्तथा॥ १८ | उसने पहले वरदानके रूपमें अपने पुत्र भरतके लिये राज्य तथा दूसरे वरदानके रूपमें महात्मा रामको चौदह वर्षोंका वनवास माँगा॥ १८॥ |
| रामस्तु वचनात्तस्याः सीतालक्ष्मणसंयुतः।<br>जगाम दण्डकारण्यं राक्षसै रुपसेवितम्॥ १९ | कैकेयीका वचन मानकर श्रीरामचन्द्रजी सीता तथा लक्ष्मणके साथ दण्डकवन चले गये, जहाँ राक्षस रहते थे॥ १९॥ |
| राजा दशरथः पुत्रविरहेण प्रपीडितः।<br>जहौ प्राणानमेयात्मा पूर्वशापमनुस्मरन्॥ २० | तदनन्तर पुत्रके वियोगजनित शोकसे सन्तप्त पुण्यात्मा दशरथने पूर्वकालमें एक ऋषिद्वारा प्रदत्त शापका स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये॥ २०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 C