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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८१
पृष्ठ 390स्थायी लिंक
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| क्षामां गर्भसमुद्भूतां गोलकां कन्यकोद्भवाम्।<br>वर्जनीयाः सदा चैताः सर्वपूजादिकर्मसु॥ ३ | अत्यन्त दुर्बल, समयसे पूर्व ही गर्भसे उत्पन्न, विधवा स्त्रीसे उत्पन्न तथा कन्यासे उत्पन्न—ये सभी कन्याएँ पूजा आदि सभी कार्योंमें सर्वथा त्याज्य हैं॥ ३॥ |
| अरोगिणीं सुरूपाङ्गीं सुन्दरीं व्रणवर्जिताम्।<br>एकवंशसमुद्भूतां कन्यां सम्यक्प्रपूजयेत्॥ ४ | रोगसे रहित, रूपवान् अंगोंवाली, सौन्दर्यमयी, व्रणरहित तथा एक वंशमें (अपने माता-पितासे) उत्पन्न कन्याकी ही विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ४॥ |
| ब्राह्मणी सर्वकार्येषु जयार्थे नृपवंशजा।<br>लाभार्थे वैश्यवंशोत्था मता वा शूद्रवंशजा॥ ५ | समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणकी कन्या, विजय-प्राप्तिके लिये राजवंशमें उत्पन्न कन्या तथा धन-लाभके लिये वैश्यवंश अथवा शूद्रवंशमें उत्पन्न कन्या पूजनके योग्य मानी गयी है॥ ५॥ |
| ब्राह्मणैर्ब्रह्मजाः पूज्या राजन्यैर्ब्रह्मवंशजाः।<br>वैश्यैस्त्रिवर्गजाः पूज्याश्चतस्रः पादसम्भवैः॥ ६<br><br>कारुभिश्चैव वंशोत्था यथायोग्यं प्रपूजयेत्।<br>नवरात्रविधानेन भक्तिपूर्वं सदैव हि॥ ७<br><br>अशक्तो नियतं पूजां कर्तुं चेन्नवरात्रके।<br>अष्टम्यां च विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा॥ ८ | ब्राह्मणको ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; क्षत्रियोंको भी ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; वैश्योंको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—तीनों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी तथा शूद्रको चारों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी पूजा करनी चाहिये। शिल्पकर्ममें लगे हुए मनुष्योंको यथायोग्य अपने-अपने वंशमें उत्पन्न कन्याओंकी पूजा करनी चाहिये। नवरात्र-विधिसे भक्तिपूर्वक निरन्तर पूजाकी जानी चाहिये। यदि कोई व्यक्ति नवरात्रपर्यन्त प्रतिदिन पूजा करनेमें असमर्थ है, तो उसे अष्टमी तिथिको विशेषरूपसे अवश्य पूजन करना चाहिये॥ ६–८॥ |
| पुराष्टम्यां भद्रकाली दक्षयज्ञविनाशिनी।<br>प्रादुर्भूता महाघोरा योगिनीकोटिभिः सह॥ ९ | प्राचीन कालमें दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाली महाभयानक भगवती भद्रकाली करोड़ों योगिनियोंसहित अष्टमी तिथिको ही प्रकट हुई थीं॥ ९॥ |
| अतोऽष्टम्यां विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा।<br>नानाविधोपहारैश्च गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ १०<br><br>पायसैरामिषैर्होमैर्ब्राह्मणानां च भोजनैः।<br>फलपुष्पोपहारैश्च तोषयेज्जगदम्बिकाम्॥ ११ | अतः अष्टमीको विशेष विधानसे सदा भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। उस दिन विविध प्रकारके उपहारों, गन्ध, माला, चन्दनके अनुलेप, पायस आदिके हवन, ब्राह्मण-भोजन तथा फल-पुष्पादि उपहारोंसे भगवतीको प्रसन्न करना चाहिये॥ १०-११॥ |
| उपवासे ह्यशक्तानां नवरात्रव्रते पुनः।<br>उपोषणात्रयं प्रोक्तं यथोक्तफलदं नृप॥ १२ | हे राजन्! पूरे नवरात्रभर उपवास करनेमें असमर्थ लोगोंके लिये तीन दिनका उपवास भी यथोक्त फल प्रदान करनेवाला बताया गया है॥ १२॥ |
| सप्तम्यां च तथाष्टम्यां नवम्यां भक्तिभावतः।<br>त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूजनात्॥ १३ | भक्तिभावसे केवल सप्तमी, अष्टमी और नवमी—इन तीन रात्रियोंमें देवीकी पूजा करनेसे सभी फल सुलभ हो जाते हैं॥ १३॥ |
| पूजाभिश्चैव होमैश्च कुमारीपूजनैस्तथा।<br>सम्पूर्णं तद् व्रतं प्रोक्तं विप्राणां चैव भोजनैः॥ १४ | पूजन, हवन, कुमारी-पूजन तथा ब्राह्मण-भोजन—इनको सम्पन्न करनेसे वह नवरात्र-व्रत पूरा हो जाता है—ऐसा कहा गया है॥ १४॥ |
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| ३८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| व्रतानि यानि चान्यानि दानानि विविधानि च।<br>नवरात्रव्रतस्यास्य नैव तुल्यानि भूतले॥ १५<br><br>धनधान्यप्रदं नित्यं सुखसन्तानवृद्धिदम्।<br>आयुरारोग्यदं चैव स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ १६ | इस पृथ्वीलोकमें जितने भी प्रकारके व्रत एवं दान हैं, वे इस नवरात्रव्रतके तुल्य नहीं हैं; क्योंकि यह व्रत सदा धन-धान्य प्रदान करनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला, आयु तथा आरोग्य प्रदान करनेवाला और स्वर्ग तथा मोक्ष देनेवाला है॥ १५-१६॥ |
| विद्यार्थी वा धनार्थी वा पुत्रार्थी वा भवेन्नरः।<br>तेनेदं विधिवत्कार्यं व्रतं सौभाग्यदं शिवम्॥ १७ | अतएव विद्या, धन अथवा पुत्र—इनमेंसे मनुष्य किसीकी भी कामना करता हो, उसे इस सौभाग्यदायक तथा कल्याणकारी व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये॥ १७॥ |
| विद्यार्थी सर्वविद्यां वै प्राप्नोति व्रतसाधनात्।<br>राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं समवाप्नोति सर्वदा॥ १८ | इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे विद्या चाहनेवाला मनुष्य समस्त विद्या प्राप्त कर लेता है और अपने राज्यसे वंचित राजा फिरसे अपना राज्य प्राप्त कर लेता है॥ १८॥ |
| पूर्वजन्मनि यैर्नूनं न कृतं व्रतमुत्तमम्।<br>ते व्याधिनो दरिद्राश्च भवन्ति पुत्रवर्जिताः॥ १९ | पूर्वजन्ममें जिन लोगोंद्वारा यह उत्तम व्रत नहीं किया गया है, वे इस जन्ममें रोगग्रस्त, दरिद्र तथा सन्तानरहित होते हैं॥ १९॥ |
| वन्ध्या च या भवेन्नारी विधवा धनवर्जिता।<br>अनुमा तत्र कर्तव्या नेयं कृतवती व्रतम्॥ २० | जो स्त्री वन्ध्या, विधवा अथवा धनहीन है; उसके विषयमें यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उसने [अवश्य ही पूर्वजन्ममें] यह व्रत नहीं किया था॥ २०॥ |
| नवरात्रव्रतं प्रोक्तं न कृतं येन भूतले।<br>स कथं विभवं प्राप्य मोदते च तथा दिवि॥ २१ | इस पृथ्वीलोकमें जिस प्राणीने उक्त नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं किया, वह इस लोकमें वैभव प्राप्त करके स्वर्गमें आनन्द कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ २१ ॥ |
| रक्तचन्दनसंमिश्रैः कोमलैर्बिल्वपत्रकैः।<br>भवानी पूजिता येन स भवेन्नृपतिः क्षितौ॥ २२ | जिसने लाल चन्दनमिश्रित कोमल बिल्वपत्रोंसे भवानी जगदम्बाकी पूजा की है, वह इस पृथ्वीपर राजा होता है॥ २२॥ |
| नाराधिता येन शिवा सनातनी<br>दुःखार्तिहा सिद्धिकरी जगद्वरा।<br>दुःखावृत्तः शत्रुयुतश्च भूतले<br>नूनं दरिद्रो भवतीह मानवः॥ २३ | जिस मनुष्यने दुःख तथा सन्तापका नाश करनेवाली, सिद्धियाँ देनेवाली, जगत्में सर्वश्रेष्ठ, शाश्वत तथा कल्याणस्वरूपिणी भगवतीकी उपासना नहीं की; वह इस पृथ्वीतलपर सदा ही अनेक प्रकारके कष्टोंसे ग्रस्त, दरिद्र तथा शत्रुओंसे पीड़ित रहता है॥ २३॥ |
| यां विष्णुरिन्द्रो हरपद्मजौ तथा<br>वह्निः कुबेरो वरुणो दिवाकरः।<br>ध्यायन्ति सर्वार्थसमाप्तिनन्दिता-<br>स्तां किं मनुष्या न भजन्ति चण्डिकाम्॥ २४ | विष्णु, इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, कुबेर, वरुण तथा सूर्य समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण होकर हर्षके साथ जिन भगवतीका ध्यान करते हैं, उन देवी चण्डिकाका ध्यान मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥ २४ ॥ |