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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० १७] प्रथम स्कन्ध १५७
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अ० १७] प्रथम स्कन्ध १५७
| अपराधो मम ब्रह्मन्नन्निवारितवानहम्।<br>तत्क्षन्तव्यं महाभाग विमुक्तानां क्षमा बलम्॥ ३२ | हे ब्रह्मन्! मैंने जो आपको रोका था, वह मेरा अपराध हुआ। उसके लिये आप क्षमा करें; क्योंकि हे महाभाग! मुक्तजनोंका तो क्षमा ही बल है॥ ३२॥ |
| शुक उवाच<br>किं तेऽत्र दूषणं क्षत्तः परतन्त्रोऽसि सर्वदा।<br>प्रभुकार्यं प्रकर्तव्यं सेवकेन यथोचितम्॥ ३३<br>न भूपदूषणं चात्र यदहं रक्षितस्त्वया।<br>चोरशत्रुपरिज्ञानं कर्तव्यं सर्वथा बुधैः॥ ३४ | **शुकदेवजी बोले—**हे द्वारपाल! इसमें तुम्हारा क्या दोष है; तुम तो सर्वदा पराधीन हो। सेवकको तो स्वामीकी आज्ञाका यथोचित पालन करना ही चाहिये। तुमने मुझे जो रोका इसमें राजाका भी कोई दोष नहीं है; क्योंकि बुद्धिमानोंको चोर और शत्रुओंका सम्यक् ज्ञान रखना चाहिये॥ ३३-३४॥ |
| ममैव सर्वथा दोषो यदहं समुपागतः।<br>गमनं परगेहे यल्लघुतायाश्च कारणम्॥ ३५ | यह सर्वथा मेरा ही दोष है, जो मैं यहाँ आ गया। [बिना बुलाये] दूसरेके घर जाना लघुताका कारण होता है॥ ३५॥ |
| प्रतीहार उवाच<br>किं सुखं द्विज किं दुःखं किं कार्यं शुभमिच्छता।<br>कः शत्रुहितकर्ता को ब्रूहि सर्वं ममाद्य वै॥ ३६ | **द्वारपालने कहा—**हे विप्र! सुख क्या है, दुःख क्या है, कल्याण चाहनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है? शत्रु कौन है और मित्र कौन है? आप मुझे यह सब बताइये॥ ३६॥ |
| शुक उवाच<br>द्वैविध्यं सर्वलोकेषु सर्वत्र द्विविधो जनः।<br>रागी चैव विरागी च तयोश्चित्तं द्विधा पुनः॥ ३७<br>विरागी त्रिविधः कामं ज्ञातोऽज्ञातश्च मध्यमः।<br>रागी च द्विविधः प्रोक्तो मूर्खश्च चतुरस्तथा॥ ३८<br>चातुर्यं द्विविधं प्रोक्तं शास्त्रजं मतिजं तथा।<br>मतिस्तु द्विविधा लोके युक्तायुक्तेति सर्वथा॥ ३९ | **शुकदेवजी बोले—**सभी लोकोंमें सर्वत्र द्वैविध्य रहता है। इसलिये मनुष्य भी दो प्रकारके हैं—एक रागी और दूसरा विरागी। उन दोनोंके मन भी दो प्रकारके होते हैं। उनमें भी विरागी तीन प्रकारके होते हैं—ज्ञात, अज्ञात एवं मध्यम। रागी भी दो प्रकारके कहे गये हैं—मूर्ख तथा चतुर। चातुर्य भी दो प्रकारका कहा गया है—शास्त्रजनित तथा बुद्धिजनित। इसी प्रकार लोकमें बुद्धि भी युक्त और अयुक्त-भेदसे दो प्रकारकी होती है॥ ३७–३९॥ |
| प्रतीहार उवाच<br>यदुक्तं भवता विद्वन्नार्थज्ञोऽहं द्विजोत्तम।<br>तत्सर्वं विस्तरेणाद्य यथार्थं वद सत्तम॥ ४० | **द्वारपालने कहा—**हे विद्वन्! हे विप्रवर! आपने जो कुछ कहा है, उसे मैं भलीभाँति नहीं समझ पाया। अतएव हे श्रेष्ठ! आप फिरसे विस्तारपूर्वक इस विषयको यथार्थरूपसे समझाइये॥ ४०॥ |
| शुक उवाच<br>रागो यस्यास्ति संसारे स रागीत्युच्यते ध्रुवम्।<br>दुःखं बहुविधं तस्य सुखं च विविधं पुनः॥ ४१ | **शुकदेवजी बोले—**इस संसारमें जिसको राग है, वह निश्चय ही रागी कहलाता है। उस रागीको अनेक प्रकारके सुख एवं दुःख आते ही रहते हैं॥ ४१॥ |
| धनं प्राप्य सुतान्दारान्मानं च विजयं तथा।<br>तदप्राप्य महद्दुःखं भवत्येव क्षणे क्षणे॥ ४२ | धन, पुत्र, कलत्र, मान-प्रतिष्ठा और विजय प्राप्त करके ही सुख प्राप्त होता है। इनके न मिलनेपर प्रतिक्षण महान् दुःख होता ही है॥ ४२॥ |
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| १५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कार्यस्तस्य सुखोपायः कर्तव्यं सुखसाधनम्।<br>तस्यारातिः स विज्ञेयः सुखविघ्नं करोति यः॥ ४३<br><br>सुखोत्पादयिता मित्रं रागयुक्तस्य सर्वदा।<br>चतुरो नैव मुह्येत मूर्खः सर्वत्र मुह्यति॥ ४४ | अतः जैसे सुख प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना चाहिये और सुखके साधनका संग्रह करना चाहिये। जो उस सुखमें विघ्न डाले, उसे शत्रु समझना चाहिये। जो रागी पुरुषके सुखको सर्वदा बढ़ाये, वही मित्र है। चतुर मनुष्य मोहमें फँसता नहीं है; किंतु मूर्ख सर्वत्र आसक्त रहता है॥ ४३-४४॥ |
| विरक्तस्यात्मरक्तस्य सुखमेकान्तसेवनम्।<br>आत्मानुचिन्तनं चैव वेदान्तस्य च चिन्तनम्॥ ४५<br><br>दुःखं तदेतत्सर्वं हि संसारकथनादिकम्।<br>शत्रवो बहवस्तस्य विज्ञस्य शुभमिच्छतः॥ ४६<br><br>कामः क्रोधः प्रमादश्च शत्रवो विविधाः स्मृताः।<br>बन्धुः सन्तोष एवास्य नान्योऽस्ति भुवनत्रये॥ ४७ | विरागी तथा आत्माराम पुरुषको एकान्तवास, आत्म-चिन्तन तथा वेदान्तशास्त्रका अनुशीलन करनेसे ही सुख होता है। सांसारिक विषयोंकी चर्चा आदि—यह सब उनके लिये दुःखरूप है। कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषके लिये बहुत शत्रु हैं; काम, क्रोध, प्रमाद आदि अनेक प्रकारके शत्रु बताये गये हैं; किंतु व्यक्तिका सच्चा बन्धु तो एकमात्र सन्तोष ही है; तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी नहीं है॥ ४५-४७॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मत्वा तं ज्ञानिनं द्विजम्।<br>क्षत्ता प्रवेशयामास कक्षां चातिमनोरमाम्॥ ४८ | **सूतजी बोले—**शुकदेवजीकी बात सुनकर उन्हें ज्ञानी द्विज समझकर उसने शुकदेवजीको एक अत्यन्त रमणीय कक्षसे प्रवेश कराया॥ ४८॥ |
| नगरं वीक्षमाणः संस्त्रैविध्यजनसङ्कुलम्।<br>नानाविपणिद्रव्याढ्यं क्रयविक्रयकारकम्॥ ४९<br><br>रागद्वेषयुतं कामलोभमोहाकुलं तथा।<br>विवदत्सजनाकीर्णं वसुपूर्णं महत्तरम्॥ ५०<br><br>पश्यन्स त्रिविधाँल्लोकान्प्रासरद् राजमन्दिरम्।<br>प्राप्तः परमतेजस्वी द्वितीय इव भास्करः॥ ५१<br><br>निवारितश्च तत्रैव प्रतीहारेण काष्ठवत्।<br>तत्रैव च स्थितो द्वारि मोक्षमेवानुचिन्तयन्॥ ५२ | तीन प्रकारके नागरिकजनोंसे भरे हुए; अनेक प्रकारके क्रय-विक्रयकी वस्तुओंसे सजी दूकानोंवाले; राग-द्वेष, काम, लोभ, मोहसे युक्त एवं परस्पर वाद-विवादमें संलग्न श्रेष्ठीजनोंसे सुशोभित और धन-धान्यसे परिपूर्ण विशाल नगरको देखते हुए शुकदेवजी चले। इस तरह तीन प्रकारके लोगोंको देखते हुए शुकदेवजी राजभवनकी ओर बढ़े। इस प्रकार द्वितीय सूर्यके समान परम तेजस्वी शुकदेवजी द्वारपर पहुँचे; द्वारपालने उन्हें अन्दर जानेसे रोका। तब वे काष्ठके समान वहीं द्वारपर खड़े हो गये और मोक्षसम्बन्धी विषयपर विचार करने लगे॥ ४९-५२॥ |
| छायायामातपे चैव समदर्शी महातपाः।<br>ध्यानं कृत्वा तथैकान्ते स्थितः स्थाणुरिवाचलः॥ ५३ | धूप तथा छायाको समान-समझनेवाले महातपस्वी शुकदेवजी वहाँ एकान्तमें ध्यान करके इस प्रकार खड़े रहे मानो कोई अचल स्तम्भ हो॥ ५३॥ |
| तं मुहूर्तादुपागत्य राज्ञोऽमात्यः कृताञ्जलिः।<br>प्रावेशयत्ततः कक्षां द्वितीयां राजवेश्मनः॥ ५४ | थोड़ी देर बाद राजमन्त्रीने हाथ जोड़े हुए स्वयं आकर उन्हें राजभवनके दूसरे कक्षमें प्रवेश कराया॥ ५४॥ |
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| अ० १७ ] | प्रथम स्कन्ध | १५९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र दिव्यं मनोरम्यं पुष्पितं दिव्यपादपम्।<br>तद्वनं दर्शयित्वा तु कृत्वा चातिथिसत्क्रियाम्॥ ५५<br><br>वारमुख्याः स्त्रियस्तत्र राजसेवापरायणाः।<br>गीतवादित्रकुशलाः कामशास्त्रविशारदाः॥ ५६<br><br>ता आदिश्य च सेवार्थं शुकस्य मन्त्रिसत्तमः।<br>निर्गतः सदनात्तस्माद्व्यासपुत्रः स्थितस्तदा॥ ५७<br><br>पूजितः परया भक्त्या ताभिः स्त्रीभिर्यथाविधि।<br>देशकालोपपन्नेन नानानेनाति तोषितः॥ ५८ | वहाँ एक दिव्य रमणीय उपवन था, जिसमें विविध प्रकारके पुष्पोंसे लदे दिव्य वृक्ष सुशोभित हो रहे थे। उस वनको दिखाकर मन्त्रीने उनका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया। वहाँ राजाकी सेवा करनेवाली अनेक वारांगनाएँ थीं, वे नृत्य-गानमें कुशल तथा कामशास्त्रमें निपुण थीं। शुकदेवजीकी सेवाके लिये उन्हें आदेश देकर राजमन्त्री उस भवनसे निकल गये और शुकदेवजी वहीं स्थित रहे। उन वारांगनाओंने परम भक्तिके साथ उनकी पूजा की और देशकालानुसार उपलब्ध अनेक प्रकारके भोजनसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ५५–५८॥ |
| ततोऽन्तःपुरवासिन्यस्तस्यान्तःपुरकाननम् ।<br>रम्यं संदर्शयामासुरङ्गनाः काममोहिताः॥ ५९<br><br>स युवा रूपवान्कान्तो मृदुभाषी मनोरमः।<br>दृष्ट्वा ता मुमुहुः सर्वास्तं च काममिवापरम्॥ ६० | तत्पश्चात् अन्तःपुरनिवासिनी कामिनी स्त्रियोंने उन्हें अन्तःपुरका वन दिखाया, जो अत्यन्त रमणीय था। वे युवा, रूपवान्, कान्तिमान्, मृदुभाषी एवं मनोरम थे। दूसरे कामदेवके समान उन शुकदेवजीको देखकर वे सभी मुग्ध हो गयीं॥ ५९–६०॥ |
| जितेन्द्रियं मुनिं मत्वा सर्वाः पर्यचरंस्तदा।<br>आरणेयस्तु शुद्धात्मा मातृभावमकल्पयत्॥ ६१ | मुनिको जितेन्द्रिय जानकर वे सब उनकी परिचर्या करने लगीं। अरणिनन्दन शुद्धात्मा शुकदेवजीने उन्हें माताके समान समझा॥ ६१॥ |
| आत्मारामो जितक्रोधो न हृष्यति न तप्यति।<br>पश्यंस्तासां विकारांश्च स्वस्थ एव स तस्थिवान्॥ ६२ | वे आत्माराम तथा क्रोधको जीतनेवाले शुकदेवजी न हर्षित होते थे और न दुःखी। उनकी चेष्टाओंको देखकर भी वे शान्तचित्त होकर स्थित रहे॥ ६२॥ |
| तस्मै शय्यां सुरम्यां च ददुर्नार्यः सुसंस्कृताम्।<br>परार्ध्यास्तरणोपेतां नानोपस्करसंवृताम्॥ ६३<br><br>स कृत्वा पादशौचं च कुशपाणिरतन्द्रितः।<br>उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां ध्यानमेवान्वपद्यत॥ ६४ | तब उन स्त्रियोंने उनके लिये सुरम्य, कोमल तथा बहुमूल्य आस्तरण और नानाविध उपकरणोंसे सुसज्जित शय्या बिछायी। शुकदेवजी हाथ-पाँव धोकर हाथमें कुश लेकर सावधान हो सायंकालीन सन्ध्योपासन सम्पन्न करके भगवान्के ध्यानमें लग गये॥ ६३–६४॥ |
| याममेकं स्थितो ध्याने सुष्वाप तदनन्तरम्।<br>सुप्त्वा यामद्वयं तत्र चोदतिष्ठत्ततः शुकः॥ ६५<br><br>पाश्चात्यं यामिनीयामं ध्यानमेवान्वपद्यत।<br>स्नात्वा प्रातःक्रियाः कृत्वा पुनरास्ते समाहितः॥ ६६ | इस प्रकार एक प्रहरतक ध्यानावस्थित होकर वे शयन करने लगे। दो प्रहर शयन करके पुनः वे शुकदेवजी उठ गये। रात्रिके चौथे प्रहरमें वे पुनः ध्यानमें स्थित रहे; तदनन्तर स्नान करके प्रातःकालीन क्रियाएँ सम्पन्न करके पुनः समाधिस्थ हो गये॥ ६५–६६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
शुकस्य राजमन्दिरप्रवेशवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
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| १६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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अथाष्टादशोऽध्यायः
शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| श्रुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।<br>पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात्॥ १ | शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये॥ १॥ |
| कृत्वार्हणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम्।<br>पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम्॥ २ | महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा॥ २॥ |
| स च तां नृपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।<br>पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम्॥ ३ | शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी कुशल-मंगल पूछा॥ ३॥ |
| कृत्वा कुशलसंप्रश्नमुपविष्टं सुखासने।<br>शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः॥ ४<br>किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति।<br>जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्यं तन्मुनिसत्तम॥ ५ | इस प्रकार कुशल-प्रश्न करके सुखदायी आसनपर बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज जनकने पूछा—हे महाभाग! मेरे यहाँ आप निःस्पृहका आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रेष्ठ! उस प्रयोजन को बताइये?॥ ४-५॥ |
| शुक उवाच | शुकदेवजी बोले— |
|---|---|
| व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम्।<br>सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः॥ ६<br>मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्वा बन्धं गुरोरपि।<br>न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः॥ ७ | महाराज! मेरे पिता व्यासजीने मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही श्रेष्ठ है। गुरुरूप पिताकी आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया॥ ६-७॥ |
| इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः।<br>उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः॥ ८<br>याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः।<br>विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम्॥ ९ | इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्तवाला समझकर मुनिश्रेष्ठ व्यासने तथ्ययुक्त वचन कहा—तुम मिथिला चले जाओ, खेद न करो। वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं, वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं। संसारमें विदेह नामसे विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं॥ ८-९॥ |
| कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते।<br>त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप॥ १० | हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी मायाके जालमें नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो?॥ १०॥ |
| पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम्।<br>कुरु दारान्महाभाग पृच्छ वा भूपतिं च तम्॥ ११<br>सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत॥ १२ | उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें उठते हुए मोहका त्याग करो। हे महाभाग! विवाह करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो। वे राजा तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे। तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही मेरे पास चले आना॥ ११-१२॥ |