देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५९९
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५९९
| कृत्वा सुविपुलं नादं देवी सा निर्भया स्थिता।<br>उभौ च चक्रतुस्तीव्रां बाणवृष्टिं कुरुद्वह॥ १५ | वे भगवती जगदम्बा भी गम्भीर गर्जना करके निर्भीक भावसे विराजमान थीं। हे कुरुनन्दन! वे दोनों दैत्य घनघोर बाण-वृष्टि करने लगे॥ १५॥ |
| भगवत्यपि बाणौघान्मुमोच दानवौ प्रति।<br>कृत्वातिमधुरं नादं देवकार्यार्थसिद्धये॥ १६ | भगवती जगदम्बा भी देवताओंकी कार्य-सिद्धिके निमित्त अत्यन्त मधुर नाद करती हुई उन दोनों दानवोंपर बाण-समूह बरसाने लगीं॥ १६॥ |
| तयोस्तु बाष्कलस्तूर्णं सम्मुखोऽभूद् रणाङ्गणे।<br>दुर्मुखः प्रेक्षकस्तत्र देवीमभिमुखः स्थितः॥ १७ | उन दोनोंमेंसे बाष्कल शीघ्रतापूर्वक समरभूमिमें देवीके सामने आ गया। उस समय दुर्मुख केवल दर्शक बनकर देवीकी ओर मुख करके खड़ा रहा॥ १७॥ |
| तयोर्युद्धमभूद् घोरं देवीबाष्कलयोस्तदा।<br>बाणासिपरिघाघातैर्भयदं मन्दचेतसाम्॥ १८ | अब भगवती तथा बाष्कलके बीच बाणों, तलवार तथा परिघके प्रहारसे भीषण युद्ध होने लगा, जो उत्साहहीन चित्तवाले लोगोंके लिये भयदायक था॥ १८॥ |
| ततः क्रुद्धा जगन्माता दृष्ट्वा तं युद्धदुर्मदम्।<br>जघान पञ्चभिर्बाणैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ १९ | तत्पश्चात् युद्धके लिये उन्मत्त उस बाष्कलको देखकर जगदम्बिका कुपित हो गयीं और उन्होंने पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीखे बनाये गये तथा कानोंतक खींचे गये पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ १९॥ |
| दानवोऽपि शरान्देव्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>सप्तभिस्ताडयामास देवीं सिंहोपरिस्थिताम्॥ २० | उस दानवने भी अपने तीक्ष्ण बाणोंसे देवीके बाणोंको काट दिया और पुनः सिंहपर विराजमान भगवतीपर सात बाणोंसे प्रहार किया॥ २०॥ |
| सापि तं दशभिस्तीक्ष्णैः सुपीतैः सायकैः खलम्।<br>जघान तच्छरांश्छित्त्वा जहास च मुहुर्मुहुः॥ २१ | देवी भगवतीने उसके बाणोंको काटकर पानी चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए दस बाणोंसे उस दुष्टपर प्रहार किया और वे बार-बार जोर-जोरसे हँसने लगीं॥ २१॥ |
| अर्धचन्द्रेण बाणेन चिच्छेद च शरासनम्।<br>बाष्कलोऽपि गदां गृह्य देवीं हन्तुमुपाययौ॥ २२ | जगदम्बाने अपने अर्धचन्द्राकार बाणसे उसका धनुष काट डाला। तब बाष्कल भी गदा लेकर देवीको मारनेके लिये उनकी ओर दौड़ा॥ २२॥ |
| आगच्छन्तं गदापाणिं दानवं मदगर्वितम्।<br>चण्डिका स्वगदापातैः पातयामास भूतले॥ २३ | अभिमानमें चूर उस दानवको हाथमें गदा लिये आता हुआ देखकर देवी चण्डिकाने अपनी गदाके प्रहारसे उसे धराशायी कर दिया॥ २३॥ |
| बाष्कलः पतितो भूमौ मुहूर्तादुत्थितः पुनः।<br>चिक्षेप च गदां सोऽपि चण्डिकां चण्डविक्रमः॥ २४ | बाष्कल मुहूर्तभर पृथ्वीपर पड़ा रहा, इसके बाद वह फिर उठ खड़ा हुआ और प्रचण्ड, पराक्रमी उस वीरने भी भगवतीपर गदा चला दी॥ २४॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी शूलेन वक्षसि।<br>जघान बाष्कलं क्रुद्धा पपात च ममार सः॥ २५ | उस दैत्यको सामने आते देखकर भगवतीने कुपित होकर बाष्कलके वक्षःस्थलपर त्रिशूलसे प्रहार किया, जिससे वह गिर पड़ा और मर गया॥ २५॥ |
| ६०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| पतिते बाष्कले सैन्यं भग्नं तस्य दुरात्मनः ।<br>जयेति च मुदा देवाश्चक्रुशुर्गगने स्थिताः ॥ २६ | बाष्कलके गिरते ही उस दुरात्माकी सेना भाग गयी और आकाशमण्डलमें विद्यमान देवता प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जय-जयकार करने लगे ॥ २६ ॥ |
| तस्मिंश्च निहते दैत्ये दुर्मुखोऽतिबलान्वितः ।<br>आजगाम रणे देवीं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २७ | उस दैत्यके मार दिये जानेपर महाबली दुर्मुख क्रोधसे आँखें लाल किये रणभूमिमें देवीके समक्ष आया ॥ २७ ॥ |
| तिष्ठ तिष्ठाबले सोऽपि भाषमाणः पुनः पुनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान्रथस्थः कवचावृतः ॥ २८ | उस समय वह वैभवशाली दैत्य ‘अरी अबले ! ठहरो, ठहरो’—ऐसा बार-बार कहते हुए धनुष-बाण धारण करके कवच पहने हुए रथपर सवार था ॥ २८ ॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।<br>कोपयन्ती दानवं तं ज्याघोषञ्च चकार ह ॥ २९ | उस दानवको अपनी ओर आते देखकर देवीने शंखध्वनि की और उसे कुपित करती हुई वे अपने धनुषकी टंकार करने लगीं ॥ २९ ॥ |
| सोऽपि बाणान्मुमोचाशु तीक्ष्णानाशीविषोपमान् ।<br>स्वबाणैस्तान्महामाया चिच्छेद च ननाद च ॥ ३० | दुर्मुख भी बड़ी तेजीसे सर्पके समान विषैले तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा। तब महामायाने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और वे गर्जन करने लगीं ॥ ३० ॥ |
| तयोः परस्परं युद्धं बभूव तुमुलं नृप ।<br>बाणशक्तिगदाघातैर्मुसलैस्तोमरैस्तथा ॥ ३१ | हे राजन् ! बाण, शक्ति, गदा, मूसल और तोमर आदिके प्रहारसे उन दोनोंमें परस्पर भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३१ ॥ |
| रणभूमौ तदा जाता रुधिरौघवहा नदी ।<br>पतितानि तदा तीरे शिरांसि प्रबभुस्तदा ॥ ३२<br>यथा सन्तरणार्थाय यमकिङ्करनायकैः ।<br>तुम्बीफलानि नीतानि नवशिक्षापरैर्मुदा ॥ ३३ | उस समय रणभूमिमें रुधिरकी नदी बह चली। उसके तटपर गिरे हुए मस्तक इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो वैतरणी पार करनेके लिये तैरना सीखनेवाले यमदूतोंके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक तुम्बीफल लाकर रख दिये गये हों ॥ ३२-३३ ॥ |
| रणभूमिस्तदा घोरा बभूवातीव दुर्गमा ।<br>शरीरैः पतितैर्भूमौ खाद्यमानैर्वृकादिभिः ॥ ३४ | भूमिपर कटकर गिरे शवों तथा उन्हें खानेवाले भेड़िये आदि जन्तुओंसे वह रणभूमि अत्यन्त भयंकर तथा दुर्गम हो गयी थी ॥ ३४ ॥ |
| गोमायुसारमेयाश्च काकाः कङ्का अयोमुखाः ।<br>गृध्राः श्येनाश्च खादन्ति शरीराणि दुरात्मनाम् ॥ ३५ | सियार, कुत्ते, कौए, कंक, अयोमुख नामक पक्षी, गिद्ध और बाज उन दुष्ट दानवोंके शरीरको [नोच-नोचकर] खा रहे थे ॥ ३५ ॥ |
| ववौ वायुश्च दुर्गन्धो मृतानां देहसङ्गतः ।<br>अभूत्किलकिलाशब्दः खगानां पलभक्षिणाम् ॥ ३६ | मृतकोंके शरीरके संसर्गसे दुर्गन्धित हवा चल रही थी और मांसाहारी पक्षियोंकी किलकिला ध्वनि हो रही थी ॥ ३६ ॥ |
| तदा चुकोप दुष्टात्मा दुर्मुखः कालमोहितः ।<br>देवीमुवाच गर्वेण कृत्वा चोर्ध्वकरं शुभम् ॥ ३७ | तब कालसे मोहित वह दुरात्मा दुर्मुख अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और गर्वके साथ अपनी सुन्दर भुजा उठाकर देवीसे कहने लगा— ॥ ३७ ॥ |
| अ० १३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०१ |
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| गच्छ चण्डि हनिष्यामि त्वामद्यैव सुबालिशे।<br>दैत्यं वा भज वामोरु महिषं मदगर्वितम्॥ ३८ | हे चण्डिके! हे मूर्ख बाले! भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा अथवा हे वामोरु! मदसे मत्त महिषासुरको स्वीकार कर लो॥ ३८॥ |
| देव्युवाच<br>आसन्नमरणः कामं प्रलपस्यद्य मोहितः।<br>अद्यैव त्वां हनिष्यामि यथायं बाष्कलो हतः॥ ३९ | देवी बोलीं—अब तुम्हारी मृत्यु समीप है, तभी तुम मोहित होकर ऐसा प्रलाप कर रहे हो। अभी मैं तुम्हें भी उसी प्रकार मार डालूँगी, जैसे मैंने इस बाष्कलको मारा है॥ ३९॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ वा मन्द मरणं यदि रोचते।<br>हत्वा त्वां वै वधिष्यामि बालिशं महिषीसुतम्॥ ४० | हे मूर्ख! भाग जाओ और यदि तुम्हें मृत्यु अच्छी लगती हो तो रुके रहो। तुम्हें मारनेके बाद मैं मूर्ख महिषासुरका भी संहार कर दूँगी॥ ४०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दुर्मुखो मर्तुमुद्यतः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तु चण्डिकां प्रति दारुणाम्॥ ४१ | देवीका वह वचन सुनकर मरणोन्मुख दुर्मुख भगवती चण्डिकाके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगा॥ ४१॥ |
| सापि तां तरसा छित्त्वा बाणवृष्टिं शितैः शरैः।<br>जघान दानवं क्रुद्धा वृत्रं वज्रधरो यथा॥ ४२ | भगवतीने भी कुपित होकर अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस बाण-वृष्टिको तत्काल व्यर्थ करके उस दैत्यपर उसी प्रकार आघात किया, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरपर किया था॥ ४२॥ |
| तयोः परस्परं युद्धं सञ्जातं चातिकर्कशम्।<br>भयदं कातराणाञ्च शूराणां बलवर्धनम्॥ ४३ | अब उन दोनोंमें बड़ा भीषण युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंके लिये भयदायक तथा वीरोंके लिये उत्साहवर्धक था॥ ४३॥ |
| देवी चिच्छेद तरसा धनुस्तस्य करे स्थितम्।<br>तथैव पञ्चभिर्बाणैर्बभञ्ज रथमुत्तमम्॥ ४४ | देवीने बड़ी फुर्तीके साथ उसके हाथमें स्थित धनुषको काट डाला और उसी तरह अपने पाँच बाणोंसे उसके उत्तम रथको छिन्न-भिन्न कर दिया॥ ४४॥ |
| रथे भग्ने महाबाहुः पदातिर्दुर्मुखस्तदा।<br>गदां गृहीत्वा दुर्धर्षां जगाम चण्डिकां प्रति॥ ४५ | रथके नष्ट हो जानेपर महाबाहु दुर्मुख अपनी भयानक गदा लेकर पैदल ही भगवती चण्डिकाकी ओर दौड़ा॥ ४५॥ |
| चकार स गदाघातं सिंहमौलौ महाबलः।<br>न चचाल हरिः स्थानात्ताडितोऽपि महाबलः॥ ४६ | [उनके पास पहुँचकर] उस महाबली दैत्यने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार कर दिया, किंतु महाशक्तिशाली सिंह गदासे मारे जानेपर भी अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ॥ ४६॥ |
| अम्बिका तं समालोक्य गदापाणिं पुरःस्थितम्।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद मौलिमत्॥ ४७ | उसी समय जगदम्बाने हाथमें गदा लिये हुए उस दुर्मुखको सम्मुख उपस्थित देखकर अपनी तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे उसके किरीटयुक्त मस्तकको काट दिया॥ ४७॥ |
| छिन्ने च मस्तके भूमौ पपात दुर्मुखो मृतः।<br>जयशब्दं तदा चक्रर्मुदिता निर्जरा भृशम्॥ ४८ | मस्तक कट जानेपर दुर्मुख जमीनपर गिर पड़ा और मर गया। तब देवता परम प्रसन्न होकर देवीकी जय-जयकार करने लगे॥ ४८॥ |
| ६०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| तुष्टुवुस्तां तदा देवीं दुर्मुखे निहतेऽमराः।<br>पुष्पवृष्टिं तथा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः॥ ४९ | दुर्मुखके मर जानेपर आकाशमें विद्यमान देवता भगवतीकी स्तुति करने लगे। उनपर पुष्प बरसाने लगे तथा उनकी जयकार करने लगे॥ ४९॥ |
| ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरकिन्नराः।<br>जहृषुस्तं हतं दृष्ट्वा दानवं रणमस्तके॥ ५० | रणभूमिमें उस महान् दानवको मरा हुआ देखकर ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर आनन्दित हो उठे॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषसेनाधिप-<br>बाष्कलदुर्मुखनिपातनवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| दुर्मुखं निहतं श्रुत्वा महिषः क्रोधमूर्च्छितः।<br>उवाच दानवान्सर्वांकिं जातमिति चासकृत्॥ १<br>निहतौ दानवौ शूरौ रणे दुर्मुखबाष्कलौ।<br>तन्व्या तत्परमाश्चर्यं पश्यन्तु दैवचेष्टितम्॥ २ | हे राजन्! दुर्मुख मार दिया गया—यह सुनकर महिषासुर क्रोधसे मूर्च्छित हो गया और दानवोंसे बार-बार कहने लगा—'यह क्या हो गया?' दुर्मुख और बाष्कल तो बड़े शूर-वीर दानव थे। एक सुकुमार नारीने उन्हें रणभूमिमें मार डाला, यह तो महान् आश्चर्य है! दैवका विधान तो देखो॥ १-२॥ |
| कालो हि बलवान्कर्ता सततं सुखदुःखयोः।<br>नराणां परतन्त्राणां पुण्यपापानुयोगतः॥ ३ | समय बड़ा बलवान् होता है, वही परतन्त्र मनुष्योंके पुण्य तथा पापके अनुसार सदा उनके सुखों-दुःखोंका निर्माण करता है॥ ३॥ |
| निहतौ दानवश्रेष्ठौ किं कर्तव्यमतः परम्।<br>ब्रुवन्तु मिलिताः सर्वे यद्युक्तं कार्यसङ्कटे॥ ४ | ये दोनों ही श्रेष्ठ दानव मार डाले गये हैं, अब इसके बाद क्या करना चाहिये? इस विषम स्थितिमें सब लोग विचार करके जो उचित हो, बतायें॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवति राजेन्द्र महिषेऽतिबलान्विते।<br>चिक्षुराख्यस्तु सेनानीस्तमुवाच महारथः॥ ५<br>राजन्नहं हनिष्यामि का चिन्ता स्त्रीविहिंसने। | **व्यासजी बोले—**हे राजेन्द्र! इस प्रकार महाशक्तिशाली महिषासुरके कहनेपर उसके महारथी सेनाध्यक्ष चिक्षुरने कहा—हे राजन्! स्त्रीको मार डालनेमें चिन्ता किस बातकी! मैं उसे मार डालूँगा॥ ५ १/२॥ |
| इत्युक्त्वा स्वबलैर्युक्तः प्रययौ रथसंयुतः॥ ६<br>द्वितीयं पार्ष्णिरक्षं तु कृत्वा ताम्रं महाबलम्।<br>महता सैन्यघोषेण पूरयन्गगनं दिशः॥ ७ | ऐसा कहकर वह चिक्षुराख्य रथपर बैठकर दूसरे महाबली ताम्रको अपना अंगरक्षक बनाकर सेनाकी तुमुल ध्वनिसे आकाश एवं दिशाओंको निनादित करता हुआ युद्धके लिये चल पड़ा॥ ६-७॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी भगवती शिवा।<br>चकार शङ्खज्याघोषं घण्टानादं महाद्भुतम्॥ ८<br>तत्रसुस्तेन शब्देन ते च सर्वे सुरारयः।<br>किमेतदिति भाषन्तो दुद्रुवुर्भयकम्पिताः॥ ९ | उसे आता हुआ देखकर कल्याणमयी भगवतीने अद्भुत शंखध्वनि, घण्टानाद तथा धनुषकी टंकार की। उस ध्वनिसे सभी राक्षस भयभीत हो गये। 'यह क्या'—ऐसा कहते हुए वे भयसे काँपने लगे तथा भाग खड़े हुए॥ ८-९॥ |
| अ० १४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चिक्षुराख्यस्तु तान्दृष्ट्वा पलायनपरायणान्।<br>उवाचातीव संक्रुद्धः किं भयं वः समागतम्॥ १०<br><br>अद्यैवाहं हनिष्यामि बाणैर्बालां मदोन्नताम्।<br>तिष्ठन्त्वत्र भयं त्यक्त्वा दैत्याः समरमूर्धनि॥ ११ | उन्हें भागते हुए देखकर चिक्षुराख्यने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा—तुम्हारे सामने कौन-सा भय आ गया? मैं इस मदोन्मत्त नारीको आज ही बाणोंद्वारा मार डालूँगा। हे दैत्यो! तुम लोग भय छोड़कर लड़ाईके मोर्चेपर डटे रहो॥ १०-११॥ |
| इत्युक्त्वा दानवश्रेष्ठश्चापपाणिर्बलान्वितः।<br>आगत्य सङ्गरे देवीमित्युवाच गतव्यथः॥ १२<br><br>किं गर्जसि विशालाक्षि भीषयन्तीतरान्ररान्।<br>नाहं बिभेमि तन्वङ्गि श्रुत्वा तेऽद्य विचेष्टितम्॥ १३ | ऐसा कहकर उस पराक्रमी दैत्यश्रेष्ठ चिक्षुरने हाथमें धनुष उठा लिया और युद्धभूमिमें आकर वह निश्चिन्ततापूर्वक भगवतीसे कहने लगा—हे विशालाक्षि! अन्य साधारण मनुष्योंको भयभीत करती हुई तुम क्यों गरज रही हो? तुम्हारा यह व्यर्थ गर्जन सुनकर मैं भयभीत नहीं हो सकता॥ १२-१३॥ |
| स्त्रीवधे दूषणं ज्ञात्वा तथैवाकीर्तिसम्भवम्।<br>उपेक्षां कुरुते चित्तं मदीयं वामलोचने॥ १४<br><br>स्त्रीणां युद्धं कटाक्षैश्च तथा हावैश्च सुन्दरि।<br>न शस्त्रैर्विहितं क्वापि त्वादृशीनां कदाचन॥ १५ | हे सुलोचने! स्त्रीका वध करना पाप है तथा इससे जगत्में अपकीर्ति होती है—यह जानकर मेरा चित्त तुम्हें मारनेसे विचलित हो रहा है। हे सुन्दरि! तुम-जैसी स्त्रियोंके कटाक्षों तथा हाव-भावोंसे समरका कार्य सम्पन्न हो जाता है; कभी कहीं भी शस्त्रोंद्वारा स्त्रीका युद्ध नहीं हुआ है॥ १४-१५॥ |
| पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः।<br>भवादृशीनां देहेषु दुनोति मालतीदलम्॥ १६ | हे सुन्दरि! तुम्हें तो पुष्पसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, तब फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या; क्योंकि तुम्हारी-जैसी सुन्दरियोंके शरीरमें मालतीकी पंखुड़ी भी पीड़ा उत्पन्न कर सकती है॥ १६॥ |
| धिग्जन्म मानुषे लोके क्षात्रधर्मानुजीविनाम्।<br>लालितोऽयं प्रियो देहः कृन्तनीयः शितैः शरैः॥ १७ | इस संसारमें क्षात्रधर्मानुयायी लोगोंके जन्मको धिक्कार है; क्योंकि वे बड़े प्यारसे पाले गये अपने शरीरको भी तीक्ष्ण बाणोंसे छिदवाते हैं!॥ १७॥ |
| तैलाभ्यङ्गैः पुष्पवातैस्तथा मिष्टान्नभोजनैः।<br>पोषितोऽयं प्रियो देहो घातनीयः परेषुभिः॥ १८<br><br>देहं छित्त्वासिधाराभिर्धनभृज्जायते नरः।<br>धिग्धनं दुःखदं पूर्वं पश्चात्किं सुखदं भवेत्॥ १९ | तेलकी मालिशसे, फूलोंकी हवासे तथा स्वादिष्ट भोजन आदिसे पोषित इस प्रिय शरीरको शत्रुओंके बाणोंसे बिंधवाते हैं। तलवारकी धारसे अपना शरीर कटवाकर मनुष्य धनवान् होना चाहते हैं। ऐसे धनको धिक्कार है जो प्रारम्भमें ही दुःख देनेवाला होता है; तो बादमें क्या वह सुख देनेवाला हो सकता है?॥ १८-१९॥ |
| त्वमप्यज्ञैव वामोरु युद्धमाकाङ्क्षसे यतः।<br>सुखं सम्भोगजं त्यक्त्वा कं गुणं वेत्सि सङ्गरे॥ २० | हे सुन्दरि! तुम भी मूर्ख ही हो, तभी तो सम्भोगजन्य सुखको त्यागकर युद्धकी इच्छा कर रही हो। युद्धमें तुम कौन-सा लाभ समझ रही हो?॥ २०॥ |
| खड्गपातं गदाघातं भेदनञ्च शिलीमुखैः।<br>मरणान्ते तु संस्कारो गोमायुमुखकर्षणम्॥ २१ | युद्धमें तलवारें चलती हैं, गदाका प्रहार होता है और बाणोंसे शरीरका बेधन किया जाता है। मृत्युके अन्तमें सियार अपने मुँहसे नोच-नोचकर उस देहका संस्कार करते हैं॥ २१॥ |
| ६०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| तस्यैव कविभिर्धूर्तैः कृतं चातीव शंसनम्।<br>रणे मृतानां स्वःप्राप्तिरर्थवादोऽस्ति केवलः ॥ २२ | धूर्त कवियोंने उसी युद्धकी अत्यन्त प्रशंसा की है कि रणभूमिमें मरनेवालोंको स्वर्ग प्राप्त होता है। उनका यह कहना केवल अर्थवादमात्र है॥ २२॥ |
| तस्माद् गच्छ वरारोहे यत्र ते रमते मनः।<br>भज वा भूपतिं नाथं ह्यारिं सुरमर्दनम् ॥ २३ | अतः हे वरारोहे ! तुम्हारा मन जहाँ लगे, वहाँ चली जाओ अथवा तुम देवताओंका दमन करनेवाले मेरे स्वामी महाराज महिषासुरको स्वीकार कर लो ॥ २३ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवाणं तं दैत्यं प्रोवाच जगदम्बिका।<br>किं मृषा भाषसे मूढ बुद्धिमानिव पण्डितः ॥ २४ | व्यासजी बोले—इस प्रकार बोलते हुए उस दैत्यसे भगवती जगदम्बाने कहा—मूर्ख ! तुम अपनेको बुद्धिमान् पण्डितके समान मानकर व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? तुम न तो नीतिशास्त्र जानते हो, न आन्वीक्षिकी विद्या ही जानते हो, तुमने कभी न वृद्धोंकी सेवा की है और न तो तुम्हारी बुद्धि ही धर्मपरायण है ॥ २४-२५ ॥ |
| नीतिशास्त्रं न जानासि विद्यां चान्वीक्षिकीं तथा।<br>न सेवितास्त्वया वृद्धा न धर्मे मतिरस्ति ते ॥ २५ | |
| मूर्खसेवापरो यस्मात्तस्मात्त्वं मूर्ख एव हि।<br>राजधर्मं न जानासि किं ब्रवीषि ममाग्रतः ॥ २६ | क्योंकि तुम मूर्खकी सेवामें लगे रहते हो, अतः तुम भी मूर्ख हो। जब तुम्हें राजधर्म ही ज्ञात नहीं, तब मेरे सामने क्यों व्यर्थ बकवाद कर रहे हो ? ॥ २६ ॥ |
| संग्रामे महिषं हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम्।<br>यशःस्तम्भं स्थिरं कृत्वा गमिष्यामि यथासुखम् ॥ २७ | संग्राममें महिषासुरका वध करके समरांगणको रुधिरसे पंकमय बनाकर अपना यश-स्तम्भ सुदृढ़ स्थापितकर मैं सुखपूर्वक चली जाऊँगी ॥ २७ ॥ |
| देवानां दुःखदातारं दानवं मदगर्वितम्।<br>हनिष्येऽहं दुराचारं युद्धं कुरु स्थिरो भव ॥ २८<br><br>जीवितेच्छास्ति चेन्मूढ महिषस्य तथा तव।<br>तदा गच्छन्तु पातालं दानवाः सर्व एव ते ॥ २९<br><br>मुमूर्षा यदि वश्चित्ते युद्धं कुर्वन्तु सत्वराः।<br>सर्वानेव वधिष्यामि निश्चयोऽयं ममाधुना ॥ ३० | देवताओंको दुःख देनेवाले इस दुराचारी तथा मदोन्मत्त दानवको मैं अवश्य मार डालूँगी। तुम सावधान होकर युद्ध करो। हे मूर्ख! यदि तुम्हें तथा महिषासुरको जीनेकी अभिलाषा हो तो सभी दानव पाताललोकको शीघ्र ही चले जायँ; अन्यथा यदि तुमलोगोंके मनमें मरनेकी इच्छा हो तो तुरंत युद्ध करो। यह मेरा संकल्प है कि मैं सभी दानवोंको मार डालूँगी ॥ २८-३०॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दानवो बलदर्पितः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तां घनवृष्टिमिवापराम् ॥ ३१ | व्यासजी बोले—देवीका वचन सुनकर बलके अभिमानसे युक्त वह दैत्य उनपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगा, मानो दूसरे मेघ ही जलकी धारा बरसा रहे हों ॥ ३१ ॥ |
| चिच्छेद तस्य सा बाणान्स्वबाणैर्निशितैस्तदा।<br>जघान तं तथा घोरैराशीविषसमैः शरैः ॥ ३२<br><br>युद्धं परस्परं तत्र बभूव विस्मयप्रदम्।<br>गदया घातयामास तं रथाज्जगदम्बिका ॥ ३३ | तब भगवतीने अपने तीक्ष्ण बाणोंद्वारा उसके सभी बाण काट डाले और विषधर सर्पके समान विषैले बाणोंसे उसपर प्रहार किया। उन दोनोंमें परस्पर विस्मयकारी युद्ध होने लगा। जगदम्बाने अपने वाहन सिंहपरसे ही उस दैत्यपर गदासे प्रहार किया ॥ ३२-३३ ॥ |
| अ० १४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०५ |
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| मूर्च्छां प्राप स दुष्टात्मा गदयाभिहतो भृशम्।<br>मुहूर्तद्वयमात्रं तु रथोपस्थ इवाचलः॥ ३४ | गदासे अत्यधिक आहत होनेके कारण वह दुष्टात्मा दैत्य मूर्च्छित हो गया और दो मुहूर्ततक पाषाणकी भाँति रथपर ही पड़ा रहा॥ ३४॥ |
| तं तथामूर्च्छितं दृष्ट्वा ताम्रः परबलार्दनः।<br>आजगाम रणे योद्धुं चण्डिकां प्रति चापलात्॥ ३५ | इस प्रकार उसे मूर्च्छित देखकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला ताम्र नामक दैत्य चण्डिकासे लड़नेके लिये वेगपूर्वक रणमें उपस्थित हो गया॥ ३५॥ |
| आगच्छन्तं तु तं वीक्ष्य हसन्ती प्राह चण्डिका।<br>एह्येहि दानवश्रेष्ठ यमलोकं नयाम्यहम्॥ ३६ | उसे आते देखकर भगवती चण्डिका उससे हँसती हुई बोलीं—अरे दानवश्रेष्ठ! आओ-आओ, अभी तुम्हें यमलोक भेज देती हूँ॥ ३६॥ |
| किं भवद्भिः समायातैर्बलैश्च गतायुषैः।<br>महिषः किं गृहे मूढः करोति जीवनोद्यमम्॥ ३७<br><br>किं भवद्भिर्हतैर्मन्दैर्ममापि विफलः श्रमः।<br>अहते महिषे पापे सुरशत्रौ दुरात्मनि॥ ३८<br><br>तस्माद्यूयं गृहं गत्वा महिषं प्रेषयन्त्विह।<br>पश्येन्मां सोऽपि मन्दात्मा यादृशीं तादृशीं स्थिताम्॥ ३९ | निर्बल और समाप्त आयुवाले तुमलोगोंके यहाँ आनेसे क्या लाभ? वह मूर्ख महिषासुर घरमें रहकर अपने जीनेका कौन-सा उपाय कर रहा है? देवताओंके शत्रु, दुष्टात्मा तथा पापी महिषासुरका संहार किये बिना तुम मूर्खोंको मारनेसे मुझे क्या लाभ होगा? इससे तो मेरा परिश्रम भी व्यर्थ हो जायगा, अतः तुमलोग घरपर जाकर महिषासुरको यहाँ भेज दो, जिससे वह मन्दबुद्धि भी मैं जिस रूपमें स्थित हूँ, उसमें मुझको देख ले॥ ३७–३९॥ |
| ताम्रस्तद्वचनं श्रुत्वा बाणवृष्टिं चकार ह।<br>चण्डिकां प्रति कोपेन कर्णाकृष्टशरासनः॥ ४० | भगवतीका वचन सुनकर वह ताम्र कुपित हो धनुषको कानतक खींचकर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४०॥ |
| भगवत्यपि ताम्राक्षी समाकृष्य शरासनम्।<br>बाणान्मुमोच तरसा हन्तुकामा सुराहितम्॥ ४१ | देवताओंके शत्रु उस दैत्यको मारनेकी इच्छावाली ताम्राक्षी भगवती भी धनुष खींचकर उसके ऊपर वेगपूर्वक बाण छोड़ने लगीं॥ ४१॥ |
| चिक्षुराख्योऽपि बलवान्मूर्च्छां त्यक्त्वोत्थितः पुनः।<br>गृहीत्वा सशरं चापं तस्थौ तत्सम्मुखः क्षणात्॥ ४२ | इतनेमें बलवान् चिक्षुराख्य भी मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़ा हुआ और तुरंत बाणसहित धनुष लेकर देवीके सामने आकर खड़ा हो गया॥ ४२॥ |
| चिक्षुराख्यश्च ताम्रश्च द्वावप्यतिबलोत्कटौ।<br>युयुधाते महावीरौ सह देव्या रणाङ्गणे॥ ४३ | चिक्षुराख्य और ताम्र दोनों ही अत्यन्त उग्र बलवान् और महान् वीर थे। अब वे दोनों ही मिलकर भगवती जगदम्बासे रणमें युद्ध करने लगे॥ ४३॥ |
| कुपिता च महामाया ववर्ष शरसन्ततिम्।<br>चकार दानवान् सर्वान् बाणक्षततनुच्छदान्॥ ४४ | तब महामाया क्रोधित होकर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगीं, और उन्होंने अपने बाणोंके प्रहारसे सभी दानवोंके कवच छिन्न-भिन्न कर दिये॥ ४४॥ |
| असुराः क्रोधसम्मूढा बभूवुः शरताडिताः।<br>चिक्षिपुः शरजालानि देवीं प्रति रुषान्विताः॥ ४५ | उन बाणोंसे आहत होकर सभी असुर क्रोधसे व्याकुल हो गये तथा रोषपूर्वक देवीपर बाणसमूह छोड़ने लगे। उस समय समस्त रणभूमिमें भगवतीके |
| ६०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| बभुस्ते राक्षसास्तत्र किंशुका इव पुष्पिणः।<br>शिलीमुखक्षताः सर्वे वसन्ते च वने रणे॥ ४६ | बाणोंसे घायल सभी राक्षस ऐसे सुशोभित होने लगे, जैसे वसन्त ऋतुमें वनमें किंशुकके लाल पुष्प दिखायी पड़ते हों॥ ४५-४६॥ |
| बभूव तुमुलं युद्धं ताम्रेण सह संयुगे।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवा ये प्रेक्षकाः स्थिताः॥ ४७ | उस समरभूमिमें ताम्रके साथ देवीका भीषण युद्ध होने लगा। इसे देखनेवाले जो देवता आकाशमें स्थित थे, वे आश्चर्यचकित हो गये॥ ४७॥ |
| ताम्रो मुसलमादाय लोहजं दारुणं दृढम्।<br>जघान मस्तके सिंहं जहास च ननर्द च॥ ४८ | उसी समय ताम्रने लोहेका बना हुआ एक सुदृढ़ तथा भयंकर मूसल लेकर देवीके सिंहके सिरपर प्रहार किया और वह जोरसे हँसने तथा गरजने लगा॥ ४८॥ |
| नर्दमानं तदा तं तु दृष्ट्वा देवी रुषान्विता।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्शिच्छेद सत्वरा॥ ४९ | तब उसे गरजता हुआ देखकर भगवती क्रोधित हो गयीं और उन्होंने तुरंत अपनी तेज धारवाली तलवारसे उसका मस्तक काट डाला॥ ४९॥ |
| छिन्ने शिरसि ताम्रस्तु विशीर्षो मुसली बली।<br>बभ्राम क्षणमात्रं तु पपात रणमस्तके॥ ५० | सिर कट जानेपर भी वह मस्तकविहीन बलशाली ताम्र मूसल लिये हुए कुछ क्षणतक घूमता रहा, इसके बाद वह समरांगणमें गिर पड़ा॥ ५०॥ |
| पतितं ताम्रमालोक्य चिक्षुराख्यो महाबलः।<br>खड्गमादाय तरसा दुद्राव चण्डिकां प्रति॥ ५१ | ताम्रको गिरा हुआ देखकर महाबली चिक्षुराख्य खड्ग लेकर बड़े वेगसे चण्डिकाकी ओर झपटा॥ ५१॥ |
| भगवत्यपि तं दृष्ट्वा खड्गपाणिमुपागतम्।<br>दानवं पञ्चभिर्बाणैर्जघान तरसा रणे॥ ५२ | हाथमें तलवार लिये उस दानवको रणमें अपनी ओर आते देखकर देवीने भी तुरंत पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ ५२॥ |
| एकेन पातितं खड्गं द्वितीयेन तु तत्करः।<br>कण्ठाच्च मस्तकं तस्य कृन्तितं चापरैः शरैः॥ ५३ | भगवतीने एक बाणसे उसका खड्ग काट दिया, दूसरेसे उसका हाथ काट दिया और अन्य बाणोंसे उसका मस्तक कण्ठसे अलग कर दिया॥ ५३॥ |
| एवं तौ निहतौ क्रूरौ राक्षसौ रणदुर्मदौ।<br>भग्नं सैन्यं तयोस्तूर्णं दिक्षु सन्त्रस्तमानसम्॥ ५४ | इस प्रकार युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले उन दोनों क्रूर राक्षसोंका वध हो गया, तब उन दोनोंकी सेना भयभीत होकर चारों दिशाओंमें शीघ्रतापूर्वक भाग चली॥ ५४॥ |
| देवाश्च मुदिताः सर्वे दृष्ट्वा तौ निहतौ रणे।<br>पुष्पवृष्टिं मुदा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः॥ ५५<br><br>ऋषयो देवगन्धर्वा वेतालाः सिद्धचारणाः।<br>ऊचुस्ते जय देवीति चाम्बिकेति पुनः पुनः॥ ५६ | उन दोनों दानवोंको रणमें मारा गया देखकर आकाशमें विराजमान सम्पूर्ण देवता आह्लादित हो गये और प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जयध्वनि करते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे। ऋषि, देवता, गन्धर्व, वेताल, सिद्ध और चारण—वे सब ‘देवीकी जय, अम्बिकाकी जय' ऐसा बार-बार बोलने लगे॥ ५५-५६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
ताम्रचिक्षुराख्यवधवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
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